Wednesday, January 31, 2024

गोपाल का इलाज (कहानी) : गोपाल भाँड़

 गोपाल भांड नहुत ही बुद्धिमान और मेहनती आदमी था। उसकी बुद्धि और व्यवहार कुशलता के बहुत चर्चे थे। लोगों की हर समस्या का हल वह चुटकियों में करता था। इसलिए उसके पास लोग अपनी – अपनी मुश्किलें लेकर आते ही रहते थे।


किस्मत की बात है – उसके पड़ोस में एक निहायत कमअक्ल दम्पति रहता था। उस पर तुर्रा यह कि पति और पत्नी – दोनों ही दिन में सपने देखने के शौक़ीन थे। अपने वर्तमान को बेहतर बनाने की अपेक्षा, दोनों अपना अधिकतर समय भविष्य के सुनहरे सपने देखने में बिताते थे।


एक दिन वह आदमी अपनी पत्नी से बोला कि वह एक गाय खरीदना चाहता है जिससे कि उनके घर में दूध कि नदियां बहें।


फिर क्या था! दोनों ने एक अदद गाय खरीदने की योजना बना डाली और देखते ही देखते उसके सपनों में खो गए। बात करते – करते उन्हें ख्याल आया कि अगर वे कुछ ज्यादा पैसा बचना शुरू कर दे, तो जल्दी वे एक गाय के मालिक होंगे। पर सच तो यह था कि उनकी जमा – पूँजी इतनी कम थी कि निकट भविष्य में गाय खरीदना तो दूर, गाय का नाम तक नही ले सकते थे। पर सपने देखने के पैसे तो लगते नही। इसलिए पति – पत्नी का गाय – संवाद चलता ही रहा। वे एक सुंदर व् दुधारू गाय खरीदेंगे, भले ही कुछ महंगी क्यों न हो। उन्हें लगता था कि पैसे की ज्यादा परवाह करने की कोई जरूरत नही। उन्होंने सोच लिया कि गाय काले रंग कि होगी और उसका नाम होगा ‘कमली’।


आदमी ने सोच लिया कि वह जल्द से जल्द कमली के लिए एक तबेला बनवाएगा। उसकी पत्नी भला क्यों पीछे रहती! उसने सोच लिया कि वह जल्दी ही दूध दुहने और संभालने के लिए कुछ मटके खरीदेगी। आखिर उसे भी तो कमली से बहुत प्यार होगा।


यही सोचते हुए, अगले दिन वह बाजार पहुँच गई और कुछ अच्छे मटकों की खोज में जुट गई। काफी समय की मेहनत के बाद और दुकानदार से खूब मोलभाव करके, वह पांच बहुत सुंदर मटके खरीद लाई।


शाम को बड़े गर्व के साथ उसने अपने पति को वे मटके दिखाए। पहले मटके में कमली से दूहा दूध, दुसरे में उससे बना मक्खन, तीसरे में छाछ और चौथे में मक्खन से बना घी रखने की बात तय हुई। गाय एक, चीज़ें अनेक – ऐसा सोचकर आदमी की बांछें खिल गई।



दोनों ने के बार फिर कमली – कांड शुरू कर दिया – वे कमली की सेवा ऐसे करेंगे – वैसे करेंगे आदि – आदि। पत्नी बोली कि मै गाय को नित्य बढ़िया स्नान कराऊंगी और उसे खाने के लिए बढ़िया चारा दूँगी। जल्दी ही उनकी गाय दिन में दो बार बहुत सारा दूध देना शुरू कर देगी। आदमी बोला कि मैं रोज उसके लिए अच्छी घास का इंतजाम करूंगा। फिर वे बचा उहा दूध – घी बेच दिया करेंगे और शीघ्र ही बहुत पैसे वाले हो जाएंगे।


तभी आदमी ने पांचवा मटका देखा। उसने अपनी पत्नी से पूछा कि ये पांचवा मटका किसलिए लाइ हो। पत्नी ने हिचकिचाते हुए जवाब दिया कि उस घड़े में थोड़ा – सा दूध डालकर अपनी बहन के घर दे आऊँगी। ऐसा सुनकर आदमी क्रोधित हो उठा क्योंकि उसे अपनी साली फूटी आँख नही सुहाती थी। चिल्लाते हुए उसने अपनी पत्नी से पूछा, “मेरी आज्ञा के बिना अपनी बहन को दूध देने की बात तुमने सोची भी कैसे?”


पत्नी तुनककर बोली, “मुझे तुम्हारी आज्ञा की कोई जरूरत नही। कमली को खरीदने के लिए पैसे तो मैंने ही जमा किये थे और रोज मै ही उसे नहलाती – धुलाती हूँ, खिलाती – पिलाती हूँ, दूध भी रोज मै ही दुहती हूँ। इसलिए बचे हुए दूध का मै जो चाहूँ कर सकती हूँ।”


इतना सुना तो आदमी गुस्से से लाल – पीला होने लगा। “तुमने जो पैसे बचाए, वो मेरे ही खून – पसीने की कमाई के थे,” वह चिल्लाया। “मै ही कमली के लिए घास काटता हूँ। और तुम मेरे परिश्रम का फल अपनी मूर्ख बहन को देना चाहती हो। उसने तो हमे आज तक एक फूटी कौड़ी तक नही दी।”


इस तरह दोनों की लड़ाई चलती रही और दोनों ही अपनी – अपनी बात पर खड़े रहे। आखिर में वह आदमी आपे से बाहर हो गया और उसने एक – एक करके सब घड़े फोड़ डाले। “अब कहो, अपनी बहन के घर दूध कैसे लेकर जाओगी?” उसने पत्नी से पूछा।


गोपाल बहुत देर से यह सब सुन रहा था पर आखिर उससे चुप नही रहा गया। वह उन दोनों के पास गया और पूछने लगा कि आखिर माजरा क्या है।


आदमी एकदम से बोल पड़ा, “यह औरत हमारी कमली का बचा हुआ सारा दूध अपनी बहन को दे देना चाहती है।”


“कमली?” गोपाल ने पूछा। “तुम किसकी बात कर रहे हो?”


“ओह! तुम्हे नही पता, कमली हमारी गाय का नाम है,” आदमी बोला।


गोपाल बहुत हैरान हुआ। उसने तो कभी उनके घर कोई गाय नही देखी थी। उसने फिर पूछा, “तुम्हारी गाय? कहाँ है तुम्हारी गाय?”


आदमी को फिर भी अपनी मूर्खता का अहसास नही हुआ। “वही गाय, जिसे हम खरीदने वाले हैं। जैसे ही हमारे पास ठीक – ठीक पैसे जमा हो जाएंगे, हमारे पास एक स्वस्थ, सुंदर गाय होगी, जो हमे खूब दूध देगी। पर मेरी पत्नी सब बचा हुआ दूध अपनी बहन को देना चाहती है और मै उसे बेचना चाहता हूँ,” वह बोला।



पत्नी ने उसे टोका, “मैंने सारे दूध के लिए नही, थोड़े – से के लिए कहा था। आखिर हमारे पास इतना सारा दूध है।”


गोपाल ने उसे याद दिलाया कि फिलहाल तो उनके पास दूध है ही नही और न ही होगा, जब तक कि वे गाय खरीद न ले।


इस बार पति – पत्नी एक साथ बोले, “तुम देखते जाओ। हमने पैसे बचाने शुरू कर दिए हैं। कमली हमारे घर बस आई ही समझो।”


जब गोपाल ने उनसे पूछा कि उन्होंने कितने पैसे जमा किये हैं तो उसे पता चला कि उन्हें पैसे जोड़ते, बस एक ही दिन हुआ है। गोपाल तो समझदार था ही, फट से जान गया कि उसके पड़ोसी फिर दिन में सपने देख रहे हैं।


गोपाल ने उनकी इस बिमारी का एक झटके में इलाज करने का फैसला कर लिया। वह एकदम से चिल्लाया, “अब मुझे पता चल गया है कि मेरी सब्ज़ियों का बगीचा कौन खराब कर रहा है।” इतना कहकर, उसने एक डंडा उस आदमी के सिर पर रसीद कर दिया।


आदमी को इस आकस्मिक प्रहार की अपेक्षा नही थी। उसने गोपाल से पूछा कि उसने डंडा क्यों मारा।


गोपाल ने कहा, “तुम्हारी गाय ने मेरे खेत में सब फलियां और खीरे खा लिए है,” और एक बार फिर गोपाल ने घुमाकर एक और डंडा उसके सिर पर दे मारा।


आदमी जनता था कि गोपाल के पास कोई खेत नही था। “कैसी फलियां? कौन से खीरे? तुम किस खेत के बारे में बात कर रहे हो?”


“वही खेत, जो मै बनाने वाला हूँ,” गोपाल बोला। “सोचता हूँ, घर के पास वाली खाली जमीन में फलियां और खीरे लगाऊं।”


उस आदमी की पत्नी यह सब देख रही थी। यकायक उसे गोपाल की बात समझ में आ गई और वह अपनी मूर्खता पर जोर से हंस पड़ी। धीरे – धीर, बात उसके पति के दिमाग में भी आ गई। दोनों ने कसम खाई कि वे फिर कभी दिन में सपने नही देखेंगे।


गोपाल ने उन्हें उनके इस संकल्प पर बधाई दी और आशा जताई कि इस वादे को भूलेंगे नही।


पर गोपाल को चिंता करने की कोई जरूरत नही थी। उस आदमी के सिर पर पड़े दो डंडे अपना निशान छोड़ गए थे, जो उसे और उसकी पत्नी को उनकी सुंदर, परन्तु काल्पनिक ‘कमली’ के बारे में लम्बे समय तक याद दिलाने के लिए पर्याप्त थे।

Tuesday, January 30, 2024

गोपाल ने नापी धरती (कहानी) : गोपाल भाँड़

 एक दिन गोपाल भांड जब कृष्‍णनगर के राजा कृष्‍णचंद्र राय के दरबार में पहुंचा, तो उसे वहां का वातावरण कुछ बदला–बदला सा लगा। राजा कृष्‍णचंद्र उदास भाव से अपने सिंहासन पर बैठे हुए थे। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। सारे दरबारी चिंतित भाव में अपने स्‍वामी की तरफ ही देख रहे थे।


गोपाल ने अपनी विशिष्‍ट हास्‍य शैली में राजा को हंसाने की कोशिश की, लेकिन राजा के चेहरे पर मुस्‍कान पैदा न हुई। गोपाल समझ गया कि अवश्‍य ही कोई गंभीर समस्‍या पैदा हो गई है, तभी महाराज इतने गंभीर हैं।


जब बहुत देर तक महाराज की चुप्‍पी न टूटी तो गोपाल ने पूछ लिया—‘अन्‍नदाता! आज आप कुछ ज्‍यादा ही चिंतित लग रहे हैं। क्‍या कोई गंभीर समस्‍या पैदा हो गई है? मुझे बताइए। शायद मैं आपकी समस्‍या का कोई हल निकाल सकूं।’


महाराज ने एक गहरी सांस भरी। बोले—‘तुमने ठीक अंदाजा लगाया है, गोपाल। सचमुच मैं एक गंभीर समस्‍या से घिर गया हूं। समझ में नहीं आता कैसे निपट पाऊंगा इस समस्‍या से।’ 


‘पर समस्‍या क्‍या है, अन्‍नदाता? वही तो मैं जानना चाहता हूं, क्‍योंकि आपको चिंतित देखकर मुझे भी उलझन हो रही है।’ गोपाल ने कहा।


‘तो सुनो। मुर्शिदाबाद के नवाब का आदेश प्राप्‍त हुआ कि उसे एक ऐसा आदमी चाहिए, जो इस धरती का सही माप बता सके। ये बता सके कि धरती की लंबाई कितनी है और चौड़ाई कितनी है। है न पागलपन की बात? भला संपूर्ण धरती की लंबाई–चौड़ाई आज तक कोई माप सका है? अब तुम्‍हीं बताओ, मैं ऐसा आदमी कहां से खोजूं जो धरती के धरातल की सटीक जानकारी नवाब को दे सके।’


महाराज ने आगे कहा—‘उस बदमिजाज आदमी की हिम्‍मत तो देखो। उसने आदेश के साथ–साथ यह धमकी भी दी है कि यदि मैं यह कार्य नहीं करा सका तो वह अंग्रेजी सरकार से कहकर मुझे राजसत्ता से हटवा देगा।’


‘यह तो सचमुच गंभीर बात है, महाराज!’ गोपाल बोला—‘लेकिन क्‍या यह सचमुच ऐसा करा सकता है?’


‘क्‍या पता क्‍या करा सकता है? यह आदमी हमेशा ही मेरे लिए नई–नई मुसीबतें खड़ी करता रहा है। जानते हो गोपाल, इस बार इस संदेश के साथ–साथ उसने क्‍या नया शिगूफा उछाला है? उसने अशर्फियों से भरी दो बड़ी–बड़ी थैलियां भेजी हैं, इस निर्देश के साथ कि धन चाहे जितना खर्च हो जाए, काम हर हालत में होना चाहिए।’



‘तो हो जाएगा उसका काम। इसमें चिंता करने वाली कौन–सी बात है?’ गोपाल ने कहा।


‘बड़ी आसानी से कह दी तुमने यह बात?’ महाराज बोले—‘पर यह काम करेगा कौन?’


‘मैं करूंगा, महाराज! मैं नवाब के प्रश्‍न का उत्तर दूंगा।’ गोपाल बोला—‘बस, आप वह दोनों थैलियां मेरे हवाले कर दीजिए और आराम की नींद सोइए।’


महाराज कृष्‍णचंद्र ने दोनों थैलियां गोपाल के हवाले कर दीं। सोने की अशर्फियां पाकर गोपाल की तो मौज हो गई। दो महीने उसने खूब मौज–मस्‍ती मारी। नवाब के धन से खूब गुलछर्रे उड़ाए।


दो महीने बीतते–बीतते नवाब का फिर संदेश मिला, जिसमें पूछा गया कि कार्य कब तक होगा? उत्तर में गोपाल ने महाराज के माध्‍यम से कहलवा भेजा कि कार्य प्रगति पर है। ऐसा व्‍यक्‍ति खोज लिया गया है, धरती के माप का कार्य आरंभ कर दिया है, लेकिन धन बहुत खर्च हो रहा है, इसलिए और अशर्फियां भेजी जाएं।


ख़ैर, इस बार कलपते हुए नवाब ने अशर्फियों से भरी एक थैली और भेज दी। अशर्फियां मिलते ही गोपाल अपनी कार्य योजना को मूर्तरूप देने में जुट गया।


सबसे पहले उसने नगरभर की दुकानों से सूत के महीन धागों के ढेरों गोले खरीदे। जब नगर के व्‍यापारियों की दुकानों पर गोले समाप्‍त हो गए तो उसने दूसरे नगरों से मंगवाए। उसने इतने गोले खरीद लिए कि दस–बीस छकड़ों में समा जाएं।


फिर उसने लंबे और चौड़े–चौड़े ताल–पत्र मंगवाए और कई व्‍यक्‍तियों को इस बात की जिम्‍मेदारी सौंप दी कि वे उन ताल–पत्रों पर स्‍याही से आड़ी–तिरछी रेखाएं बनाते जाएं। वे आड़ी–तिरछी रेखाएं पहली नजर में देखने पर ऐसे लगें जैसे किसी गुप्‍त भाषा में कोई हिसाब बनाया गया हो। इसके लिए ढेरों ताल–पत्र तोड़े गए और उन पर आड़ी–तिरछी रेखाएं अंकित कर दी गईं। फिर एक दिन उन ताल–पत्रों और सूत के गोलों को पचास छकड़ों में लदवाकर गोपाल मुर्शिदाबाद के लिए चल पड़ा।


नगर में पहुंचकर गोपाल ने नवाब के महल के पास ही पड़ाव डाला। और छकड़ों की जिम्‍मेदारी अपने आदमियों को सौंप कर नवाब के दरबार में जा पहुँचा। उसने शाही परंपरा के अनुसार झुक कर नवाब को आदाब किया। नवाब ने पूछा—‘ले आए मेरी इच्छित चीजें?’


‘हां हुजूर। आपके हुक्‍म की उदूली कैसे करता? सारी चीजें आपके महल के पास वाले मैदान में हैं। चलकर देख लीजिए।’


नवाब बड़े उत्‍साह के साथ गोपाल के साथ मैदान में पहुंचा। उसकी दृष्‍टि छकड़ों पर पड़ी तो उसने पूछा—‘ये सब क्‍या है गोपाल? क्‍या भरा है इन छकड़ों में?’


‘धरती का सही माप है हुजूर।’ गोपाल बोला—‘सूत के वे गोले हैं जिनसे धरती की सही माप की गई है? आप चाहें तो इन्‍हें नपवा कर अपनी तसल्‍ली कर सकते हैं।’


‘ऐसा करने में तो पूरा साल ही गुजर जाएगा।’ नवाब असमंजस भरे स्‍वर में बोला—‘तुमने माप का सही हिसाब भी तो लिखा होगा। हमें वह हिसाब दिखा दो।’


‘वह भी हाजिर है हुजूर। ये देखिए इन दस छकड़ों में उसी का हिसाब–किताब लदा हुआ है।’


नवाब ने ताल–पत्रों को पहाड़–सा देखा तो उसकी सारी हेकड़ी गायब हो गई। वह टुकुर–टुकुर ताल–पत्रों से लदे छकड़ों को देखता रह गया।



गोपाल ने कहा—‘हुजूर! अपने आदमियों से कहो कि वे ताल–पत्रों पर लिखे सारे हिसाब को अच्‍छी तरह से जांच लें। बेहतर तो यही रहेगा कि आप स्‍वयं ही इसकी जांच करें।’


‘नहीं–नहीं। हमारे पास इतना समय कहां है? तुम कहते हो तो ठीक ही होगा।’ नवाब जल्‍दी से बोला, जैसे वह गोपाल से पिंड छुड़ाना चाहता हो।


‘तो हुजूर संतुष्‍ट हुए न। अब हुक्‍म दीजिए कि छकड़ों से लदे सामान का क्‍या करूं? क्‍या इसे सरकारी मालखाने में जमा करवा दूं?’ गोपाल बोला।


‘कोई जरूरत नहीं है। तुम इसे वापस ले जा सकते हो। हमारी आज्ञा है।’


यह कहकर नवाब जाने के लिए मुड़ा, लेकिन तभी गोपाल ने उससे कहा—‘हुजूर! मेरी एक गुजारिश है।’


‘बोलो, क्‍या चाहते हो?’


‘हुजूर। धरती का सही माप लेने के चककर में मैंनें बहुत खाक छानी है। क्‍या हुजूर मेरे काम से खुश होकर मुझे कोई इनाम–इकराम नहीं देंगे?’


‘हां–हां, क्‍यों नहीं।’ बेमन से नवाब ने कहा। फिर मुड़कर अपने कर्मचारी से बोला—‘इसे सरकारी खजाने से सौ अशर्फियां दिलवा दो।’


इस प्रकार चतुर गोपाल ने नवाब से खरीदा गया सारा सामान भी ले लिया और उससे सौ अशर्फियां भी झटक लीं।


कृष्‍णानगर लौट कर उसने दरबार में सारा किस्‍सा सुनाया तो महाराज और सभी दरबारी हंसते–हंसते लोट–पोट हो गए।


राजाकृष्‍णचंद्र ने खुश होकर गोपाल को पुरस्‍कृत में सौ अशर्फियां दे डालीं। आखिर गोपाल ने एक असंभव काम जो कर दिखाया था।

मुख बंद रखने की कीमत (कहानी) : गोपाल भाँड़

 एक समय की बात है। एक दिन महाराज कृष्णचन्द्र ने गोपाल भाड़ से कहा, “एक मैं ही हूँ जिससे तुम हँसी-मजाक करके बड़ी सहजता से आये दिन रुपये लेकर चले जाते हो। यदि मेरी बुआ से तुम्हारा पाला पड़ता, तब तुम्हें पता चलता कि तुम कितने पानी में हो।"


यह सुनते ही गोपाल भाड़ की जिज्ञासा बढ़ गयी। उसने पूछा, “आपने ऐसा क्यों कहा महाराज? आपकी बुआ तो खूब दयालु महिला हैं। मुझसे जब भी भेंट होती है, मेरा हाल-चाल बड़े प्रेम से पूछती हैं।" महाराज ने गोपाल भाड़ के भ्रम को तोड़ना चाहा। कहा, “यह सब तो ऊपरी दिखावा मात्र है। यदि तुम उनसे कुछ रुपये निकाल कर ला सको, तब हम समझेंगे कि वे कितनी दयालु महिला हैं।"


महाराज के इस कथन से गोपाल भांड की जिज्ञासा और बढ़ गयी। उसने कहा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं महाराज? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। "


"समझोगे, समझोगे। ...तो जाओ न चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाये कहावत पर खरी उतरने वाली उस बुढ़िया की गाँठ से कुछ रुपये निकालकर ले आओ। तब हम तुम्हें मान लेंगे।"


महाराज की बात सुनकर गोपाल भांड गम्भीर हो गया। कहा, “क्या आप मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं?"


इस पर महाराज ने भी गम्भीर मुद्रा में गोपाल को फिर चुनौती दी, “मैं अटल हूँ कि तुम उस कंजूस बुढ़िया से एक पैसा भी नहीं ला सकते।"


"और यदि मैंने उनसे रुपये ला दिये तो?... तब आप क्या करेंगे?..."


गोपाल ने महाराज की चुनौती को स्वीकार कर महाराज को उकसाया और महाराज की ओर देखने लगा।


महाराज ने भी तैश में आकर गोपाल से कह ही दिया, " तब... तब जितना तुम लाओगे, उससे दोगुना पैसा मैं तुम्हें दूँगा।"


"तब यही तय रहा महाराज", कहकर गोपाल भाड़ ने महाराज को दण्डवत् प्रणाम किया और खुशी मन से अपने घर लौट आया। गोपाल महाराज की विधवा बुआ को खूब पहचानता था। यद्यपि बुआ कंजूस थी, पर उनके जैसी आचार-विचार वाली, नियम आदि को मानने वाली भद्र महिला का मिलना बड़ा मुश्किल था। विशेष पर्व-त्योहार के दिन व्रत, उपवास तो चलता ही रहता था, उनसे एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि भी नहीं छूटता था। इस दिन भी वे नियमत: उपवास करती ही थीं।


अतः इस प्रकार की निष्ठावती भद्र महिला को किस तरह से काबू में किया जाता है, गोपाल भांड अच्छी तरह जानता था। अपनी योजनानुसार पहले वह बाज़ार पहुँचा। वहाँ से उसने छोटी झींगा मछली खरीदी। घर लाकर अच्छी तरह से उसे तला। फिर कागज में लपेटा और चल दिया महाराज की बुआ से मिलने ।


गोपाल को देखते ही बुआ ने बड़े ही अपनत्व से उसका स्वागत किया।



"आओ गोपाल, आओ" ।


पर गोपाल ने बुआ को जैसे ही दण्डवत् प्रणाम कर चरण-धूलि लेनी चाही, न जाने क्यों बुआ बिदककर दो क़दम पीछे हट गयी। कहने लगी, "रहने दो, रहने दो। अभी मुझे छुओ मत। नहीं तो फिर से मुझे स्नान करना पड़ेगा। पता नहीं बाहर की कितनी गन्दगी तुमने अपने शरीर में लगायी होगी।"


गोपाल को अन्ततः बुआ को दूर से ही दण्डवत् कर सन्तोष करना पड़ा। गोपाल ने कहा, “बहुत दिनों से बुआ तुम्हारे हाथों का भोजन करने का अवसर मुझे नहीं मिला। आज तो मैं आपके हाथों का भोजन ग्रहण करके ही जाऊँगा। यही तय करके आया हूँ।”


सुनते ही बुआ चौकी। कहा, “ऐसा था तो पहले से ही बता देना चाहिए था ताकि तुम्हारे लिए अच्छा भोजन मैं बनाकर रखती। आज तो बस थोड़ी बहुत दाल, लौकी-बड़ी की सब्जी और पोस्ते की चटनी भर है। यह तुम्हें क्या रुचेगा?"


“आपने क्या कह दिया बुआ", गोपाल ने मुस्कुराते हुए कहा। “लौकी-बड़ी की सब्जी, ऊपर से पोस्ते की चटनी। अब इसके साथ और क्या चाहिए? आपने तो भोजन कर ही लिया होगा। उसी थाली में थोड़ा भात और जो कुछ सब्जी है, दे दीजिए। उसी से मेरा भोजन हो जायेगा।"


बुआ जानती थी कि एक बार गोपाल जो ठान लेता है, उसे पूरा करके ही छोड़ता है। अतः हारकर उनको उठना पड़ा। उसी जूठी थाली में उसने भोजन परोसकर गोपाल के सामने रख दिया और घर के अन्दर चली गयीं।


बुआ की अनुपस्थिति में, गोपाल जो तला हुआ लाल-लाल झींगा मछली लाया था, उसे सब्ज़ी में मिला दिया और ऊँचे स्वर में बुआ को आवाज़ लगाने लगा, "बुआ आपने तो लौकी में छोटा झींगा डालकर कमाल की सब्जी बनायी है।... इसका तो कोई जवाब ही नहीं...है तो थोड़ा और दीजिए ना।"


लौकी की सब्ज़ी में झींगा ! सुनते ही बुआ के तो कान खड़े हो गये। दौड़ी आयीं। आँखें बड़ी-बड़ी कर बुआ ने कहा, "पागल की तरह क्या बक रहे हो?"


“हाँ बुआ देखो तो! यह देखो...!" और गोपाल ने थाली से दो-चार लाल झींगा उठाकर बुआ को दिखा दिया। फिर भड़काया... "खूब बढ़िया बना है तो...।"


बुआ ने जैसे ही झींगे को साक्षात अपनी आँखों से देखा वे मूर्छित होने को आयीं। उन्हें लगा उम्र की इस दहलीज पर कहीं आँखों को भ्रम तो नहीं हो रहा। लौकी में झींगा आया कहाँ से ?


बुआ को गोपाल को छूने मात्र से ही स्नान करना पड़ रहा था, वे ही बुआ अब आगे बढ़ आयीं। उन्होंने गोपाल के दोनों हाथ कसकर पकड़ लिये। अनुनय- विनय के साथ बुआ ने गोपाल से कहा, “बेटा गोपाल, इस झींगे लौकी की बात को गुप्त ही रखना। किसी से कहना मत। नहीं तो लज्जा से मैं तो किसी को मुँह ही न दिखा पाऊँगी।'



गोपाल का निशाना सही जगह लग चुका था। अब गोपाल ने अपनी करामात दिखायी। कहा, “बुआ यह क्या कह रही हो? आपने इतनी स्वादिष्ट सब्ज़ी बनायी और इसे गुप्त रखना होगा ? यह मुझसे नहीं हो सकेगा। मैं तो कल ही राजा के दरबार में जाकर इस स्वादिष्ट सब्ज़ी के बारे में सबको बताऊँगा।"


यह सुनकर बुआ के होश उड़ गये। "नहीं बेटा गोपाल, नहीं! ऐसा काम मत करना। तुम मेरे प्रिय बेटे के समान हो। मैं तुमसे हाथ जोड़कर अनुरोध करती हूँ।"


गोपाल और कठोर हो गया। मुख चढ़ाकर बोला, “मुझे क्षमा करना बुआ। ऐसा अनुरोध मुझसे मत कीजिए। मैं महाराज से कभी झूठ नहीं बोल सकता।"


"तुम कर सकोगे बेटा, कर सकोगे!" बुआ ने गोपाल को मनाने की कोशिश नहीं छोड़ी। मैं तुम्हारे लड़कों को मिठाई खाने के लिए दस रुपये देती हूँ। पर गोपाल सहज ही मानने वाला व्यक्ति नहीं था। अतः बुआ के हर अनुरोध पर वह अपना सिर ना में हिलाता रहा। बात न फैले, इस डर से बुआ गोपाल के सामने अपनी गाँठ ढीली करती चली गयी। इस प्रकार जब धनराशि पचपन रुपये पर पहुँच गयी तब जाकर गोपाल ने अपना मुँह बन्द रखने पर सहमति जता दी। बुआ से रुपये लिये। दण्डवत् प्रणाम किया और बड़े खुशी-खुशी मन से अपने घर लौट आया।


अगले दिन वह महाराज के पास पहुँचा। राजा से एकान्त में मिलकर उसने बुआ से पैसे निकलवाने की पूरी कथा विस्तार से सुनायी। और महाराज से एक सौ दस रुपये ले लिये। फिर वह बाज़ार पहुँचा, जहाँ उसने एक लौकी, छोटी झींगा मछली और पोस्ता ख़रीदा। घर आकर स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए सब सामग्री पत्नी के हवाले की और स्नान करने ठाठ से पोखर की ओर चल पड़ा।


Tuesday, January 16, 2024

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Google Free AI Course: गूगल के फ्री कोर्स में दाखिला लेकर एआई के बेसिक्स सीख सकते हैं

Google Free AI Course: गूगल के फ्री कोर्स में दाखिला लेकर एआई के बेसिक्स सीख सकते हैं


नई दिल्ली (Google Free AI Course). एआई के दौर में हर कोई इसमें एक्सपर्ट बनना चाहता है. टेक्नोलॉजी जितनी तेजी से बदल रही है, इतना तो तय है कि आने वाले कुछ सालों में एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाएगा (AI Courses). इसीलिए गूगल ने एआई फ्री ऑनलाइन कोर्स की शुरुआत की है.


गूगल आम लोगों की जरूरतों का पूरा ख्याल रखता है. गूगल क्लाउड स्किल्स बूस्ट प्लेटफॉर्म पर फ्री एआई कोर्स में एनरोल किया जा सकता है. गूगल एआई कोर्स सिलेबस में बेसिक्स से लेकर स्टैंडर्ड तक, हर तरह की जानकारी शामिल की गई है. जानिए cloudskillsboost.google पर गूगल के किन फ्री एआई कोर्स की पढ़ाई कर सकते हैं (Google Courses).



1- इंट्रोडक्शन टु जनरेटिव एआई- इस कोर्स में जनरेटिव एआई के साथ ही उसमें और मशीन लर्निंग मेथड के बीच का अंतर बताया जाएगा. इसे पूरा करने में करीब 45 मिनट लगेंगे.



2- इंट्रोडक्शन टु लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स- इस खास कोर्स में कुछ ऐसे गूगल टूल्स भी कवर किए जाएंगे, जो आपको खुद के GEN AI ऐप्स डेवलप करने में मदद कर सकते हैं.


3- इंट्रोडक्शन टु रिस्पॉन्सिबल एआई- यह एक इंट्रोडक्टरी लेवल माइक्रोलर्निंग कोर्स है. इसमें गूगल के 7 एआई प्रिंसिपल्स की भी बात की जाती है.




4- इंट्रोडक्शन टु इमेज जनरेशन- इस फ्री एआई कोर्स में डिफ्यूजन मॉडल की थ्योरी और वर्टेक्स एआई में उसके इस्तेमाल के बारे में बताया जाता है.


5- क्रिएट इमेज कैप्शनिंग मॉडल्स- इस कोर्स में डीप लर्निंग के जरिए इमेज कैप्शनिंग मॉडल टेक्नीक सिखाई जाती है. इसमें एनकोडर और डिकोडर जैसे कंपोनेंट भी इस्तेमाल किए जाते हैं.


गूगल के ज्यादातर कोर्स मात्र 45 मिनट से 1 घंटे में पूरे किए जा सकते हैं. गूगल फ्री एआई कोर्स की पढ़ाई पूरी होने के बाद सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा.






ये अरबपति हर दिन एक करोड़ रुपये खर्च करें तो इन्हें अपनी पूरी दौलत खत्म करने में 476 साल लग जाएंगे।

 दुनिया के अरबपतियों के पास इतना पैसा है जानकर आपके होश उड़ जाएंगे। अमेरिकी संस्था ऑक्सफैम ने असमानता पर नई रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के पांच सबसे अमीर व्यक्तियों की संपत्ति 2020 के बाद से 114 फीसदी बढ़ गई है।



इस रिपोर्ट के मुताबिक पांच सबसे अमीर एलन मस्क, बर्नार्ड अरनॉल्ट, जेफ बेजोस, लैरी एलिसन और मार्क जुकरबर्ग हैं। ये अरबपति आज 2020 की तुलना में 3.3 खरब डॉलर अधिक अमीर हैं। अगर ये अरबपति हर दिन एक करोड़ रुपये खर्च करें तो इन्हें अपनी पूरी दौलत खत्म करने में 476 साल लग जाएंगे।



रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के इन पांच अरबपतियों ने हर घंटे 1.4 करोड़ अमरीकी डॉलर यानी 116 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की है। एलन मस्क की साल 2020 की शुरुआत में नेटवर्थ करीब 27 अरब डॉलर थी। आज एलन मक्स का साम्राज्य 206 अरब डॉलर के करीब है।



दुनिया के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास 43 फीसदी दौलत है। अमीरों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर शुमार जेफ बेजोस की नेटवर्थ 179 अरब डॉलर है। साल 2020 में जेफ की संपत्ती 113 अरब डॉलर थी। जेफ ने हर घंटे करोड़ों रुपयों की कमाई की है।



दुनिया के अमीरों की दौलत अगर इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो अगले 10 साल में दुनिया को पहला खरबपति मिल जाएगा। बर्नार्ड अरनॉल्ट दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में तीसरे नंबर पर हैं। बर्नार्ड की नेटवर्थ 162 अरब डॉलर है।




अमीर और गरीब के बीच खाई लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, गरीबी ऐसे ही बढ़ी तो यह 229 साल तक भी खत्म नहीं होगी। इधर अरबपतियों की लिस्ट में 5वें नंबर पर शुमार मार्क जुकरबर्ग की नेटवर्थ 135 अरब डॉलर है। साल 2020 में जुकरबर्ग की नेटवर्थ 55 अरब डॉलर थी।





रिपोर्ट के मुताबिक, अमीरों को टैक्स में छूट मिल रही है। अमीरों की दौलत तेजी से बढ़ रही है। वहीं कामगारों पर दबाव बढ़ रहा है। प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा मिल रहा है। दुनिया के आठवें सबसे अमीर लैरी एलिसन की नेटवर्थ साल 2020 में 59 अरब डॉलर थी। वहीं अभी उनकी नेटवर्थ 122 अरब डॉलर है।





आज हम आपको एक ऐसे पोर्टल के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां से आप एक, दो नहीं, पूरे 1185 कोर्सेज कर सकते हैं वह भी घर बैठे बिल्‍कुल फ्री में.

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ये हैं नोडल एजेंसियां

बता दें कि इस पोर्टल के लिए आल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्‍निकल एजुकेशन (AICTE), यूनिवर्सिटी ग्रांटस कमीशन (UGC), अंडरग्रेजुएट एजुकेशन के लिए कंर्सोटियम फॉर एजुकेशनल कम्‍युनिकेशन (CEC), स्‍कूल पास स्‍टूडेंट के लिए इग्‍नू, मैनेजमेंट स्‍टडी के लिए इंडियन इंस्‍टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट बेंगलुरू और टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए नेशनल इंस्‍टीटयूट ऑफ टेक्निकल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च (NITTTR) को नोडल एजेंसी बनाई गई है.



2017 में लांच हुआ था पोर्टल

केंद्र सरकार की ओर से फरवरी 2017 में SWAYAM पोर्टल लांच किया गया था. इस पोर्टल पर 9वीं से लेकर पोस्‍ट ग्रेजुएशन तक के सभी कोर्सेज फ्री में उपलब्‍ध हैं. बता दें कि वर्ष 2020 में कोविड के दौर में काफी संख्‍या में उम्‍मीदवारों ने यहां से बहुत सारे फ्री कोर्सेज का लाभ लिया वर्ष 2019 में इस पोर्टल के जरिये कोर्स करने वालों की संख्‍या में 647% की बढ़ोत्‍तरी हुई थी. इसी तरह वर्ष 2021 में इस पोर्टल पर उम्‍मीदवारों की संख्‍या में 181.9% की वृद्धि हुई इसी तरह वर्ष 2022 में इस पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराने वालों की संख्‍या 28% बढ़ी. पिछले साल यानि वर्ष 2023 में इस पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्‍मीदवारों की संख्‍या में 204% की ग्रोथ देखी गई यानि कि 2022 की तुलना में 2023 में इस पोर्टल पर 204 फीसदी उम्‍मीदवार बढ़े.



ऐसे होती है इस पोर्टल पर पढ़ाई

SWAYAM पोर्टल पर सभी कोर्सेज के रीडिंग व लर्निंग मैटेरियल उपलब्‍ध हैं, इसमें वीडियो लेक्‍चर, कंटेंट, रीडिंग मटेरियल आदि शामिल हैं. इसके अलावा सेल्‍फ एसेसमेंट टेस्‍ट व डिस्‍कशन पूरी तरह से ऑनलाइन होते हैं. कोर्स के लिए अच्‍छा कंटेंट उपलब्‍ध कराने के लिए AICTE, UGC, NPTEL, NCERT, CEC, NIOS, IGNOU, IIM बेंगलुरु, NITTTR नेशनल-को आर्डिनेटर हैं.




पोर्टल पर कितने कोर्स

पोर्टल पर जनवरी 2024 के लिए सीईसी के नॉन इंजीनियरिंग के यूजी पीजी के 153, एनपीटीईएल (यूजी पीजी इंजीनियरिंग) के 720, इग्‍नू के 191 सर्टिफिकेट व डिप्‍लोमा कोर्सेज, आईआईएम बी मैनेजमेंट के 57, यूजीसी के 4, एआईसीटीई (फॉरेन यूनिवर्सिटीज) के 18, एनआईटीटीटीआर (टीचर्स ट्रेनिंग) के 40 कोर्सेज यानि कुल 1185 कोर्सेज स्‍वयं बोर्ड की ओर से अप्रूव किया गया है. इन कोर्सेज के लिए सबसे पहले https://swayam.gov.in/ पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा. रजिस्ट्रेशन के बाद उम्‍मीदवार को अपनी पसंद वाले कोर्स में इनरॉलमेंट कराना होगा.








समोसे की कहानी : गोपाल भाँड़

 "इन दिनों महाराज कृष्णचंद्र को बात-बेबात गुस्सा क्यों आता है ?" राजदरबार में लाख टके का प्रश्न था । प्रजा भी डरी हुई थी कि कहीं उन्हें महाराज का कोप-भाजन न बनना पड़े। महाराज के गुस्से आगे सबकी बोलती बंद हो गई थी।


उन दिनों किसी कारण सुबह - सुबह दरबार लग रहा था। महाराज और दरबारी सुबह का नाश्ता दरबार में ही कर रहे थे। एक सुबह महाराज ने राज- हलवाई को कहलवा भेजा कि उन्हें गरमा-गरम फुलको-लूची (मैदे की पतली पूड़ी) और आलू-दम चाहिए। हलवाई ने बड़े ही यतन से पूड़ी और आलू- दम बनाकर दरबार में भेजा। लेकिन महाराज ने यह कहकर लौटा दिया कि पूड़ी ठंडी पड़ गई है। अब तो हलवाई इतना डरा कि काटो तो खून नहीं! दोबारा, तिबारा, भेजा लेकिन वही शिकायत !


अब हलवाई ने महाराज को प्रसन्न करने की योजना निकाली। उसे स्मरण हो आया कि महाराज तो मिष्ठान्न पसंद करते हैं, क्यों न उन्हें मिष्ठान्न बनाकर भेजी जाए, क्योंकि मिष्ठान्न तो गरम खाने का नियम ही नहीं है। उसने दरबार में अनुमति पाने के लिए संदेश भेजा। लेकिन महाराज को पसंद होने पर भी वे मिष्ठान्न नहीं खा सकते थे। उन दिनों वे मधुमेह की बीमारी से ग्रस्त थे। राज चिकित्सक ने मीठा खाने से मना कर दिया था।


"क्या मजाक बना रखा है हलवाई ने ! वह राजाज्ञा का उल्लंघन कर रहा है। वह अपना नियम हम पर लादना चाहता है। "


महाराज ने तुरंत उसे सूली पर चढ़ाने का आदेश दे दिया। अब तो राज-हलवाई के जान के ही लाले पड़ गए।


उसने राजा से विनती की कि उसे क्षमा कर दिया जाए। बहुत गिड़गिड़ाने पर राजा ने उसकी मृत्यु की सजा को बदलकर देश-निकाले की सजा दे दी। उसे तीन रात का समय दिया गया। तीन रात के अंदर ही परिवार सहित उसे राज्य छोड़कर जाना होगा। फिर ऐसा हुआ कि हलवाई की पत्नी ने राजा के पास प्रार्थना भेजी कि देश त्यागने से पहले उसे महाराज से मिलने का एक अवसर दिया जाए। दो रातें बीत गईं। तीसरे दिन हलवाई की पत्नी ने जाकर महाराज के चरण छुए।


"किस कारण मुझसे मिलने आई हो ?" राजा ने क्रोध में पूछा ।


"महाराज! आज्ञा हो तो एक बात कहूँ?" हलवाईन (हलवाई की पत्नी) ने गिड़ - गिड़ाते हुए विनती की। उन्होंने आज्ञा दे दी।


"महाराज! मैं इस प्रकार पूड़ी और आलू-दम बना सकती हूँ कि आधा घंटा बाद खाने पर भी वह गरम ही रहेगा। साथ ही यह सावधानी बरतरने की बात है कि उसे जरा संभल कर खाया जाए, क्योंकि अधिक गरम मुँह में डालने पर जीभ जलने का डर है।" हलवाईन ने आत्मविश्वास से भर कर कहा ।



महाराज कृष्णचंद्र को कुछ आश्चर्य हुआ, उन्होंने दरबार के विशेष सदस्य गोपाल की ओर मुड़कर देखा । गोपाल ने कुछ न कहकर केवल सिर हिला दिया। इसका अर्थ यह था कि हलवाईन को एक अवसर देकर देखना चाहिए कि वह कौन-सा गुल खिलाती है ? महाराज ने आज्ञा दे दी। शर्त यह लगा दी कि जैसे ही दरबार से सूचना जाए वैसे ही तुरंत उनके लिए नाश्ता बनाकर भेजा जाए।


"जो आज्ञा महाराज, आशा है कि मैं आपको अवश्य संतुष्ट कर पाऊँगी।"


यह कहकर वह फिर एकबार महाराज के चरण छूकर सीधे रसोई की ओर चली गई। गोपाल ने केवल मुस्कुराकर मंत्री की ओर देखा ।


"सबसे पहले मैं चखकर देखूँगा कि वह खाद्य सामग्री महाराज के खाने योग्य है भी या नहीं।" मंत्रीजी ने गोपाल की चुप्पी को आड़े हाथों लेते हुए कहा।


इस बार भी गोपाल चुप ही रहे। गोपाल की चुप्पी को मंत्री अपनी हेठी समझने लगा। वह मिर्च- मसाले -सा जलकर दाँत किटकिटाता रहा और गोपाल मुस्कुराता रहा।


हलवाईन ने राजा के रसोइये को बुला भेजा और मैदा सान कर उससे पतली और छोटी पुड़ियाँ बेलने को कहा। हलवाई तो इतना डरा हुआ था कि उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ने की परिस्थिति आ गई। अब हलवाईन ने आलू-दम कुछ सूखा हुआ-सा बनाया, फिर उसने उन्हीं बेली गई कच्ची पुड़ियों में आलू दम के पूर भर-भरकर बड़े-बड़े पान के बीड़े जैसी बड़ियाँ बनाने लगी। वे बड़ियाँ सम- बाहु त्रिभुज - सी तिकोनी मोटी-मोटी दिख रही थीं। रसोइया भी कम डरा हुआ न था ! वह भी काँपने लगा था यह सोचकर कि न जाने आगे क्या हो ! हलवाई को तो हलवाईन का साहस देखकर चक्कर आने लगे थे। अब रसोइया और हलवाई जितना डरे हलवाईन उतना ही उनका मजाक बनाए। उसे पूरा विश्वास था कि वह अवश्य सफल होगी।


राजा जी की आज्ञा आते ही हलवाईन ने पहले समबाहु त्रिभुज की आकृति वाले पान के बीड़े नुमा आलू- दम भरे हुए पुड़ियों को खौलते घी में डाल दिया।


"छनन-छन ! छनन-छन !!" पूड़ी की बड़ी-बड़ी तिकोनी बड़ियाँ अपनी नाच दिखाने लगीं। वे जितनी बड़ी बनी थीं उससे भी बड़ी मोटी-मोटी बन गईं। यह देख हलवाई और रसोइया दोनों के चेहरों पर प्रसन्नता की रेखाएँ खींच गईं। हलवाईन ने वैसी ही दस बीड़े-नुमा पुड़ियाँ बना डाली। अब महाराज के सामने उन्हें परोसना था। हलवाई और रसोइये ने पहले ही इंकार कर दिया कि वे इस कार्य में सहयोग नहीं कर सकते। एक बड़ी-सी थाली में उन्हें सजाकर हलवाईन स्वयं ही दरबार में ले गई।


महाराज ने जब उन्हें देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। "इनका नाम क्या है? खाने से पहले इनके नाम भी तो जान लूँ।" महाराज ने मुस्कुराकर पूछा।



"इनके नाम 'समभुजा' हैं, इसे धीरे-धीरे मजे से चबा-चबाकर पूरा स्वाद लेते हुए खाएँ । कदापि एक ही बार में मुँह में न डालें, नहीं तो जीभ जल जाएगी।" हलवाईन ने पूरे आत्मविश्वास से भरकर कहा। नियमानुसार पहले मंत्रीजी को चखना था। उन्होंने हलवाईन की बातों को नहीं माना और पूरा- का पूरा समभुजा एक बारगी मुँह में ठूंस लिया। अरे यह क्या! मंत्रीजी का मुँह तो खुला का खुला रह गया! गरम इतना कि मुँह के सामने हाथ ले जाकर पंखा करने लगे। महाराज तो मंत्री की हालत देखकर ठठाकर हँस पड़े। फिर उन्होंने बड़ी सावधानी से एक समभुजा को तोड़कर उसका छोटा-सा टुकड़ा मुँह में डाला। अब तो दृश्य यह था कि महाराज इधर-उधर बिना देखे एक के बाद एक का स्वाद लेने लगे। मंत्री ने किसी तरह पूरा बीड़ा निगलकर ठंडा पानी मंगवा लिया। ऐसे समय पर हलवाईन उन्हें कुछ कहती कि गोपाल ने इशारे से मना कर दिया। उसने अब कुछ पूछने का साहस नहीं किया। दरबारियों की आँखें एकबार महाराज की ओर घूम जातीं तो दूसरी बार साहसी हलवाईन की ओर।


महाराज ने खा-खाकर कुछ भी न कहा । उन्होंने केवल यह किया कि अपने गले से मोतियों की तीन-तीन लड़ियाँ निकालीं और हलवाईन के गले में डाल दीं। तब तक राज रसोई तक सूचना पहुँच गई कि महाराज बहुत प्रसन्न हैं। हलवाईन और पचास समभुजा छानकर ले आई। समभुजा खाने का जो दौर चला तो गोपाल जीभ लपेट-लपेटकर मुँह बना- बनाकर समभुजा खाने लगा। उधर मंत्रीजी का लाल-पीला चेहरा देखने लायक था। वे केवल सबको आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे।


इस पर इधर मंत्रीजी की जग हँसाई खूब होने लगी तो उधर हलवाईन की बड़ाई के पुल बाँधे जाने लगे। महाराज ने उसे राज- रसोई में मुख्य रसोइये की नौकरी दे दी, साथ ही दण्ड भी वापस ले लिया।


महाराज कोई छह माह तक लगातार इस समभुजा का आनंद लेते रहे। इन दिनों शाम होते ही महाराज के होंठों पर हँसी खेलने लगती थी। दरबार में शांति विराजने लगी। जनता ने चैन की सांस ली।


यह बात लगभग ढाई सौ वर्ष पुरानी है। उन्हीं दिनों कलिंग प्रदेश, वर्तमान ओड़ीसा राज्य में गिरिधारी बेहरा नामक एक हलवाई अपनी धर्म-पत्नी धरित्री देवी के साथ बंगाल के कृष्णानगर राज्य के राज दरबार में आए थे। उन्हें महाराज ने राज-हलवाई के रूप में अपनी सेवा में रख लिया था।


गोपाल ने भी धरित्री देवी का लोहा मान लिया। उसने भी धरित्री देवी के सम्मान में बड़ाई के पुल बाँध दिए ।


हलवाईन की सम-भुजा ही बाद में चलकर समोसा या सिंघाड़ा नाम से प्रसिद्ध हो गया। लेकिन यह दुःख की बात है कि धरित्री देवी का नाम काल के गाल में समा गया जब कि हमारे गाल में अगर सिंघाड़ा या समोसा हो तो क्या कहने!


अब आपसे यह पूछा जाए कि समोसे की माँ या आविष्कारक कौन है तो आपका उत्तर क्या होगा ?


Monday, January 15, 2024

रंक से राजा (कहानी) : गोपाल भाँड़

 एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे थे । राज-काज का काम सम्पन्न हो चुका था । उस दिन महाराज बहुत खुश दरबारी भी महाराज की खुशमिजाजी भाँपकर अपने-अपने आस पर बिराजमान थे ।


महाराज ने अचानक दरबारियों से सवाल किया - "बादल क्या करता है?"


दरबारियों ने एक स्वर में कहा- “पानी बरसाता है । "


महाराज ने फिर पूछा - "बादल कैसे बनता है ? ”


"पानी जब गर्म होता है तब वह भाप में बदल जाता है और वही भाप आकाश में जाकर बादल बन जाती है।” दरबारियों ने फिर एक स्वर में जवाब दिया ।


महाराज इसी तरह कुछ-कुछ पूछते रहे और सभी दरबारी उसका जवाब देते रहे। इस बतकही के दौरान महाराज ने अचानक पूछा - "यह दुनिया किसने बनाई ?”


दरबारियों ने जवाब दिया- “भगवान ने ।"


महाराज ने फिर पूछा - "भगवान क्या करते हैं?"


इस प्रश्न के साथ ही दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज कृष्णदेव कुछ देर तक दरबारियों को देखते रहे, लेकिन जब कोई भी दरबारी कुछ नहीं बोला, तब उन्होंने दरबारियों को प्रेरित करते हुए कहा – “भाई, आप सभी इतने विद्वान हैं, कोई तो कुछ बोलिए।”


इसके बाद भगवान के कार्य को लेकर दरबारियों में बहस - सी होने लगी। किसी ने भगवान को दुनिया के कार्य-व्यापार चलानेवाला बताया तो किसी ने कहा कि आदमी के काम-काज में भगवान कोई दखल नहीं देते।


भगवान के कार्य के बारे में जैसे ही कोई दरबारी अपनी कोई युक्ति देता, वैसे ही दूसरा दरबारी अपने तर्क से उस युक्ति को गलत ठहरा देता । दरबार में देर तक बहस होती रही । कोई नतीजा नहीं निकला ।


इसी बीच दरबार में गोपाल भाँड़ आया । दरबार में आकर वह अपने आसन पर बैठा और चुपचाप दरबारियों में चल रही बहस को सुनता रहा ।


महाराज जब किसी भी दरबारी की बात से सहमत नहीं हो पाए, तब उन्होंने गोपाल भाँड़ से कहा - " गोपाल ! अब तुम ही बताओ कि भगवान क्या करते हैं?"


गोपाल ने मुस्कराते हुए कहा- "महाराज ! इस प्रश्न का उत्तर तो मैं जरूर दूँगा, मगर उत्तर पाने के लिए मुझे आप अपना राजसी लिबास धारण करने तथा राजसिंहासन पर बैठने की इजाजत दें । इसके साथ ही आप मेरे वस्त्र पहनकर मेरे आसन पर बैठें। इसके बिना इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है ।"



महाराज कृष्णदेव गोपाल भाँड़ की तीक्ष्ण बुद्धि के कायल थे। उन्होंने इतना तो समझ ही लिया कि गोपाल इन दरबारियों से अलग किस्म की कोई बात बताने जा रहा है। इसलिए उत्सुकतावश उन्होंने वैसा ही किया, जैसा गोपाल ने कहा था ।


गोपाल राजसी लिबास पहनकर राजसिंहासन पर बैठ गया और महाराज कृष्णदेव गोपाल के साधारण लिबास में उसके आसन पर जाकर बैठ गए।


राजसिंहासन पर बैठने के बाद गोपाल ने राजा कृष्णदेव तथा दरबारियों से कहा- “ अब तक आपमें से किसी ने भगवान के कार्य के बारे में सही उत्तर नहीं दिया। मैं आपको बताता हूँ कि “भगवान क्या करता है ।" इतना कहने के बाद गोपाल भाँड़ कुछ देर के लिए चुप हो गया, फिर उसने दरबारियों से कहा- "एक बार आप मुझे देखें और एक बार महाराज को और यह बताएँ कि आप क्या समझे?"


दरबारी कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि राजसिंहासन पर बैठा गोपाल भाँड़ उन्हें क्या समझाना चाहता है। उन्होंने एक बार गोपाल भाँड़ को देखा और फिर महाराज कृष्णदेव को । उन्हें फिर भी कुछ समझ में नहीं आया ।


उन्हें शान्त देखकर गोपाल भाँड़ ने उनसे पूछा - " क्या आप लोगों की समझ में आया कि भगवान क्या करते हैं? " दरबारियों ने फिर कहा - "नहीं।"


गोपाल भाँड़ ने पूछा - "महाराज और मुझको देखकर भी आप कुछ नहीं समझ पाए कि भगवान क्या करते हैं?”


दरबारियों ने जवाब दिया- “ नहीं ।"


महाराज कृष्णदेव उतावले हो रहे थे । उन्होंने गोपाल भाँड़ से कहा—“गोपाल, अब पहेलियाँ मत बुझाओ और साफ-साफ बताओ कि भगवान क्या करते हैं?"


तब गोपाल ने विनम्रता से कहा- “भगवान ही वह शक्ति है जो राजा को रंक और रंक को राजा बना दे। इसी के कारण भगवान को सर्वशक्तिमान कहा जाता है।"


गोपाल का उत्तर सुनकर दरबारी वाह-वाह कर उठे और महाराज कृष्णदेव ने प्रसन्न होकर गोपाल भाँड़ को गले से लगा लिया ।





Saturday, January 13, 2024

गुण का महत्त्व (कहानी) : गोपाल भाँड़

 राजा कृष्णदेव का दरबार मनोरंजक तथा विद्वत्तापूर्ण चर्चाओं के लिए प्रसिद्ध था । महाराज अपने खाली समय में तरह-तरह की बातें कर अपने दरबारियों की बुद्धि की परीक्षा लेते रहते थे।


एक दिन महाराज कृष्णदेव अपने दरबार में बैठे थे । उन्होंने यूँ ही दरबारियों से पूछ लिया- “सबसे बड़ा पत्ता किसका होता है ?"


दरबारियों ने तरह-तरह की अटकलें लगानी शुरू कर दीं। किसी ने अरबी के पत्ते को बड़ा बताया तो किसी ने ढाक के पत्ते को। किसी ने केले के पत्ते को बड़ा कहा तो किसी ने मान कच्चू के पत्ते को सभी वनस्पतियों में सबसे बड़ा पत्ता बताया । दरबार में तरह-तरह की राय आने लगी मगर गोपाल भाँड़ अपने आसन पर चुपचाप बैठा रहा ।


महाराज कृष्णदेव ने उसे चुप देखकर कहा- “गोपाल ! क्या बात है? तुम चुप क्यों बैठे हो ? तुम भी तो कुछ बताओ !”


तब गोपाल ने कहा- "महाराज ! मेरे दरबारी मित्रों ने अब तक जो कुछ भी बताया, उससे मैं सहमत नहीं हूँ।”


महाराज ने पूछा - "फिर तुम ही बताओ, सबसे बड़ा पत्ता किसका होता है?"


गोपाल अपने आसन से उठकर महाराज के आसन तक आया और उनसे विनम्रतापूर्वक कहा - "महाराज! मैं कद में आपसे लम्बा हूँ और तगड़ा भी । है न?"


महाराज ने कहा, “हाँ, सो तो है ।”


गोपाल ने फिर कहा - "महाराज, मेरा शरीर आपके शरीर से स्थूल है । है न?"


महाराज हँस दिए और कहा - "इसमें क्या शक है !"


इसके बाद गोपाल दरबारियों की तरफ मुड़ गया और पूछा-

“भाइयो, बताओ, क्या मैं महाराज से बड़ा हूँ?”


दरबारी गोपाल भाँड़ के सवाल से हत्प्रभ रह गए और सभी ने समवेत स्वर में कहा- “नहीं ।"


तब गोपाल भाँड़ ने कहा - "महाराज, इस समय ये लोग ठीक कह रहे हैं कि मैं आपसे बड़ा नहीं हूँ और न हो सकता हूँ। महज कद-काठी या आकार-प्रकार में बड़ा होने से कोई बड़ा नहीं होता । पत्ते को बड़ा बताने में ये लोग यही भूल कर रहे थे । इन लोगों ने किसी पत्ते को बड़ा बताने में उसके आकार-प्रकार, उसकी लम्बाई- चौड़ाई पर ही ध्यान दिया। किसी ने पत्ते के गुणों पर ध्यान नहीं दिया ।”


थोड़ा रुकने के बाद गोपाल भाँड़ ने फिर कहा - "महाराज ! मेरी समझ से सबसे बड़ा पत्ता पान का पत्ता है । पान अमीर और गरीब सबके लिए उपलब्ध है। यह औषधि भी है और नैवेद्य भी । देवताओं से लेकर मानव जाति के हर वर्ग में पान किसी-न-किसी रूप में उपयोगी है। महिलाओं के होंठों का शृंगार है पान तो ब्राह्मणों और विद्वतजनों के मुखशुद्धि का साधन भी ।”


इस तरह गोपाल भाँड़ ने पान के विविध गुणों का बखान करते हुए महाराज से कहा- "महाराज ! बड़ा या छोटा होना व्यक्ति या वस्तु के गुणों पर निर्भर करता है - लम्बाई, चौड़ाई या मोटाई पर नहीं । पान में बहुत सारे गुण हैं जो अन्य पत्तों में नहीं । इसलिए मेरी समझ से पान ही सबसे बड़ा पत्ता है।"


महाराज गोपाल के उत्तर से बहुत खुश हुए। दरबारियों ने भी गोपाल की तर्क-बुद्धि की सराहना की।

अतिथि की भाषा (कहानी) : गोपाल भाँड़

 18वीं सदी की बात है। तब कृष्णचंद्र बंगाल के नदिया के राजा हुआ करते थे। उनके दरबार में गोपाल भांड एक नवरत्न थे। वह अपनी समझदारी और चतुराई से किसी भी समस्या का हल ढूंढ लेते थे।


एक बार राजा कृष्णचंद्र के दरबार में बाहर से कोई विद्वान पंडित आया। राजा ने परिचय पूछा तो उस विद्वान पुरुष ने अपना परिचय संस्कृत, अरबी और फारसी समेत कई प्राचीन भाषाओं में दिया। जब वह चुप हुए तो राजा कृष्णचंद्र ने अपने दरबारियों की ओर प्रश्न भरी नजरों से देखा कि बताओ इसकी मातृभाषा क्या है? लेकिन दरबारी यह अनुमान न लगा सके कि दरबार में पधारे पंडित जी की मातृभाषा क्या है? सभी चुप, दरबार में सन्नाटा छा गया।


राजा कृष्णचंद्र ने गोपाल भांड से पूछा, ‘क्या तुम कई भाषाओं के ज्ञाता अतिथि पंडित की मातृभाषा बता सकते हो?’ गोपाल भांड ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा, ‘महाराज, मैं तो भाषाओं का जानकार नहीं हूं, फिर भी यदि मुझे अपने हिसाब से पता करने की छूट दे दी जाए तो शायद मैं यह काम कर सकता हूं।’ राजा कृष्णचंद्र ने स्वीकृति दे दी। सभा समाप्त होने के बाद सभी दरबारी सीढ़ियों से उतर रहे थे। तभी गोपाल भांड अतिथि पंडित के पीछे गए और उसे जोर का धक्का दे दिया। पंडित गिर गए, उन्हें चोट भी लगी। चोट और अपमान से तिलमिलाते हुए उन्होंने गोपाल भांड को अपशब्द कहने शुरू किए।


सभी जान गए थे कि उनकी मातृभाषा क्या है। गोपाल भांड ने विनम्रता से कहा, ‘देखिए, तोते को आप राम-राम और राधे-श्याम सिखाया करते हैं। वह भी हमेशा राम-नाम या राधे-श्याम सुनाया करता है। लेकिन जब बिल्ली आकर उसे दबोचना चाहती है, तो उसके मुख से टें-टें के सिवाय और कुछ नहीं निकलता। आराम के समय सब भाषाएं चल जाती हैं, लेकिन जब विपदा आती है तब मातृभाषा ही काम देती है।’ अतिथि पंडित अब गोपाल भांड की चतुराई पर चकित थे।

Thursday, January 11, 2024

प्रथम पुरुष (कहानी) : गोपाल भाँड़

 बहुत समय पहले बंगाल में महाराजा कृष्णचन्द्र का राज्य था। उनके दरबार में बहुत सारे विदूषक थे। सबसे ज्यादा लोकप्रिय था – गोपाल। गोपाल नाई था लेकिन सब लोग उसे गोपाल भांड कहकर बुलाते थे। भांड यानी मसखरा, जो लोगों को हंसा सकता हो। अपने चुटकलों, हावभाव, टीका – टिप्पणी और महाराज या अन्य लोगों को मूर्ख बनाने के तरीको ने गोपाल को प्रसिद्ध कर दिया था।


गोपाल से पार पाना नामुनकिन था। न ही उसके हाथ कोई चालाकी – चुस्ती कर सकता था। गोपाल को सारा खेल पहले ही पता चल जाता और वह चतुराई से पासा पलट देता था। उस जमाने में लोग अजीबोगरीब अंधविश्वास पालते थे। एक तो खुद ही वे कुछ जानते – बुझते नही थे और वह जमाना भी ज्ञान – विज्ञान का नही था।


कई लोगों की तरह महाराजा भी यह मानते थे कि सुबह उठते ही जिस व्यक्ति का चेहरा वह सबसे पहले देखेंगे, वही व्यक्ति उनके उस दिन का समय निर्धारित करेगा। यदि उनका दिन अच्छा निकलता तो वह व्यक्ति शुभ माना जाता। अगले दिन उसे इनाम दिया जाता था। और अगर दिन में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण हो जाता था, तो वह व्यक्ति अमंगल का प्रतीक या राज्य के लिए खतरा हो जाता। अगले दिन महाराजा उसे दंड देते। संकट जितना गहरा होता, दंड उतना ही अधिक।


राज्य में सबको महाराजा के इस विशवास का पता था और सुबह – सुबह कोई भी उनके पास नही फटकता था। अगर कहीं स्वर्ण मुद्राएं, जमीन का टुकड़ा या अच्छी दुधारू गांय मिल जाती तब तो पौ – बारह थी, लेकिन दंड मिलने का भी तो डर था – बेंत भी पड़ सकते थे या फिर देशनिकाला भी दिया जा सकता था। इसलिए, कोई भी अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार नही था।


लेकिन गोपाल, महाराजा या उनकी सनक से डरता नही था। उसे तो अपने दंडित होने का भी डर नही था क्योंकि वह जानता था कि अपनी बुद्धि के बल पर वह हर मुस्किल आसान कर सकता है।


वैसे भी, उठने पर महाराजा अपने सेवकों और अंगरक्षकों या महारानी को ही देखते थे। इतनी सुबह महल में कोई भी आगंतुक तो आने से रहा। हाँ, कभी – कभी महामंत्री कोई जरुरी मसला लेकर महाराजा के पास जरूर आ जाते थे। ऐसी घड़ी में तो महाराजा को इनाम – सजा, सब भूल जाता था।


कभी – कभी महाराजा सुबह – सवेरे उठकर घूमने निकल जाते थे। कभी महल के भीतर ही फल – वाटिका या उद्यान में या नदी किनारे था फिर बाजार भी। उस दौरान आते – जाते वे किसी को भी मिल सकते थे।


जो भी सबसे पहले उनके सामने आता, डर के मारे उसके पसीने छूट जाते और वह सोचने लगता कि जाने महाराजा का आज का दिन कैसा बीतेगा? जाने उसे इनाम मिलेगा या दंड?


एक रोज महाराजा नदी किनारे घूमने चले गए। पौ बस फ़टी ही थी और किनारा भी सुनसान था।


गोपाल वैसे तो देर तक सोता था, लेकिन उस दिन उसके पेट में चूहे ऐसे दौड़े कि वह सुबह – सुबह ही उठ बैठा। उसका मन ताजा मछली खाने का हुआ और उसने सोचा कि नदी के किनारे बैठे मछुआरों से जाकर मछली खरीद ली जाए। वह जानता था कि सूर्योदय से पहले गए हुए मछुआरे उसी समय वापस आतें हैं। पर उस दिन वहां कोई नही था।


गोपाल यह देखकर बहुत हैरान हुआ। फिर उसने महाराज कृष्णचन्द्र को नदी किनारे घुमते हुए देखा।


महाराज ने भी उसे देखा। “अरे गोपाल!” वे चकित होकर बोले, “मै तो सोचता था कि तुम दोपहर से पहले बिस्तर से उठते ही नही।”


“प्रणाम, महाराज,” गोपाल बोला। “जी, वैसे तो मै देर से ही उठता हूँ। आज मेरे मन में जाने क्या आया, सोचा चलूँ, मै भी अपना भाग्य आजमाऊँ। इसी कारण यहाँ नदी किनारे आ गया।”


“मै कुछ समझा नही,” महाराज बोले, “अपने भाग्य का फैसल यहाँ कैसे करोगे?”


“मै जानता था कि आज सबसे पहले मै ही आपको मिलूंगा,” गोपाल चतुराई से बोला।


“तुम ऐसा कैसे जानते थे?” महाराज हैरान होकर बोले।


“बस, कभी – कभी पता चल जाता है, चुटकी बजाते ही…,” गोपाल बोला।


“मै समझा नही सकता। खैर, मुझे विशवास है कि आज मैंने सबसे पहले आप का शुभ चेहरा देखा है, इसलिए मेरा दिन बहुत अच्छा बीतेगा।”


“हाँ, हाँ, क्यों नही, क्यों नही,” महाराज प्रसन्न होकर बोले।


दोनों साथ – साथ महल की ओर चल पड़े। उन दिनों राजा का एक आम नागरिक के साथ चलना मामूली बात थी। कोई भी ऐसा देखकर हैरान नही होता था।


राजा को अधिकार था कि वह जिससे चाहे मिले, जहाँ चाहे मिले। और जनता भी यह नही सोचती थी कि उनका राजा जब भी निकले तो रथ पर सवार हो या कि अपने अंगरक्षकों से घिरा हो।


“भई गोपाल, तुम्हे याद तो है न कि आज सबसे पहले मैंने तुम्हारा चेहरा देखा है,” महाराज बोले। “देखते हैं, आज दिन कैसा बीतता है। तभी पता चलेगा कि तुम मेरे लिए शुभ हो या अशुभ। उसके अनुसार तुम्हे इनाम या दंड मिलेगा।”


“बिलकुल महाराज,” गोपाल आदरपूर्वक बोला, “देखते हैं, कौन ज्यादा शुभ है, आप या मै?”


“तुम्हारा मतलब?” महाराज ने तुनककर पूछा। “ज्यादा चतुर बनने की कोशिश न करो।”


“मै तो मसखरा हूँ, महाराज,” गोपाल ने हाथ बांधकर कहा, “मसखरे की बात का बुरा क्या मानना!”



जल्दी ही दोनों महल पहुँच गए। महाराज ने गोपाल को अपने कक्ष में आने का न्यौता दिया। गोपाल चुटकुलों का भंडार था – उसकी बातें सुनकर लोग, ख़ास तौर पर महाराज खुश हो जाते थे। जैसे ही वे सभी लोग बैठे, शाही हज्जाम आ गया।


“आइए महाराज, आपकी दाढ़ी बना दूँ,” हज्जाम मन ही मन शुक्र मना रहा था कि महाराज को दिखने वाला वह पहला व्यक्ति नही था।


“ठीक है,” महाराज बोले, “तुम दाढ़ी बनाओ। और गोपाल पिछली रात तुम जिस शादी में गए थे, क्यों न वहां का किस्सा हो जाए?”


गोपाल ने हमेशा की तरह अपनी कहानी बढ़ा – चढकर सुनानी शुरू कर दी। हर बात में मजाक, हर बात पर लतीफा। हँसते – हँसते महाराज ने पेट पकड़ लिया। हज्जाम भी हस रहा था। पहरेदारों और सेवकों सहित कमरे में सभी लोग हंस रहे थे।


गोपाल के चुटकले सुनते हुए जैसे ही महाराज हिले, हज्जाम का हाथ फिसल गया। और उस्तरा जाकर महाराज के गाल में लगा, जिससे बहुत ज्यादा खून बहना शुरू हो गया। हज्जाम डर के मारे थरथर काम्पने लगा। उसे विशवास था कि महाराज या तो उसे फांसी दे देंगे या फिर देशनिकाला। आखिर महाराज का खून बहा था और यह कोई साधारण बात नही थी।


महाराज के सेवकों ने तुरंत ही मरहम – पट्टी की और खून बहना बंद हो गया। सब चुप – से, सहमे से खड़े थे, सिवाय गोपाल के। वह पहले की तरह मुस्करा रहा था।


Monday, January 8, 2024

रास्ते का पत्थर (कहानी) : गोपाल भाँड़

 (जब गोपाल भांड ने महाराज कृष्णचंद्र को सिखलाया प्रजावत्सलता का पाठ और वह भी सरोवर किनारे पड़े पत्थर की मदद से।)


एक दिन महाराज कृष्णचंद्र ने सुबह-सुबह गोपाल भांड को अपने महल में बुलाकर कहा, ‘गोपाल, आज मुझे सरोवर में स्नान करने ही इच्छा हो रही है। मैं सामान्य औपचारिकताओं से मुक्त होकर एक सामान्य व्यक्ति की तरह जल-क्रीड़ा करना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि मैं तैरकर सरोवर के मध्य तक जाऊं और वहां से रक्तकमल के कुछ पुष्प स्वयं तोड़ लाऊं। ऐसा करो तुम स्वयं जाओ और देखकर आओ कि इस समय सरोवर के आसपास कितने आदमी हैं।’


गोपाल सुबह-सुबह बुलाए जाने से खीझा हुआ था। उसने महाराज की बातें सुनीं और बिना कुछ बोले सरोवर की ओर चल पड़ा। थोड़ी ही देर में वह सरोवर के पास पहुंच गया। उस समय स्नान करने के लिए अनेक आदमी सरोवर की ओर जा रहे थे। गोपाल उन लोगों को देर तक देखता रहा, फिर वहां से लौटकर महाराज के समक्ष उपस्थित हुआ। महाराज कृष्णचंद्र ने गोपाल को देखते ही पूछा, ‘कहो गोपाल, सब कुछ देख आए? सरोवर में स्नान के लिए मैं निकल सकता हूं या नहीं?’ गोपाल ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया, ‘महाराज, आपने मुझे यह देखकर आने को कहा था कि सरोवर के पास कितने आदमी हैं, मैं देख आया हूं, वहां सिर्फ़ एक आदमी है।’


गोपाल के उत्तर से महाराज प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, ‘तब ठीक है गोपाल। तुम भी चलो, थोड़ी जल-क्रीड़ा कर आएं।’ गोपाल के साथ महाराज सरोवर की ओर चल पड़े। सरोवर के पास पहुंचकर महाराज यह देखकर हतप्रभ रह गए कि सरोवर में सैकड़ों लोग स्नान कर रहे हैं। क्षुब्ध स्वर में महाराज ने गोपाल से कहा, ‘यह क्या गोपाल। तुमने तो कहा था कि सरोवर के पास एक ही आदमी है, मगर यहां तो भीड़ लगी हुई है। ऐसे में जल-क्रीड़ा की मेरी इच्छा तो पूरी हो ही नहीं सकती।’ गोपाल भांड ने संयत स्वर में महाराज से कहा, ‘महाराज, मैंने आपसे जो भी कहा था, वह शत-प्रतिशत सही था। मैं अब भी यही कह रहा हूं कि सरोवर के पास केवल एक आदमी है। बाक़ी जो भीड़ आप देख रहे हैं वह संवेदनहीन और विवेकशून्य पुतलों की भीड़ है। इन्हें आदमी मानकर किसी तरह का संकोच करने की आवश्यकता नहीं। सरोवर में कल्लोल करती जिस भीड़ को देखकर आप अपनी जल-क्रीड़ा की इच्छा को तिलांजलि देना चाहते हैं, उस भीड़ में ऐसा कोई भी नहीं है, जिसे ख़ुद के सिवा कुछ और भी दिखता हो। आप नि:संकोच जल में उतरें और अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए तैरें... रक्तकमल तोड़ें... इनमें से कोई भी न तो आपको पहचानेगा और न ही देखेगा कि आप क्या कर रहे हैं।’


उसकी बात सुनकर महाराज की भृकुटियां तन गईं। उन्होंने आवेश-युक्त स्वर में पूछा, ‘ऐसा क्यों कहते हो गोपाल। क्या ये लोग अंधे हैं?’



‘नहीं महाराज, विवेकशून्य और संवेदनहीन। बिना संवेदना और विवेक के आंखों का कोई अर्थ नहीं होता महाराज। आप वस्त्र उतारकर मुझे दें और निश्चिंत होकर जल में उतरें।’


महाराज कृष्णचंद्र ने कुपित स्वर में कहा, ‘यदि मुझे किसी ने भी पहचान लिया तो तुम्हारी ख़ैर नहीं। गोपाल, याद रखना।’


गोपाल मुस्कराया और बोला, ‘महाराज, आप अपने वस्त्र उतारकर यहीं मुझे दे दें। मैं घोड़े के साथ आपकी इसी बरगद के वृक्ष के नीचे प्रतीक्षा करूंगा। आप जल-क्रीड़ा करके लौटें। यदि आपको मार्ग में किसी ने भी टोका तो आप जो चाहें, मुझे सज़ा दे दें, मैं स्वीकार कर लूंगा।’


गोपाल की बात सुनकर महाराज कृष्णचंद्र ने अपनी पगड़ी उतारी, कुर्ता उतारा और धोती-बंडी पहने सरोवर के पास पहुंच गए। महाराज को सचमुच रास्ते में किसी ने नहीं टोका। महाराज पानी में उतरे और तैरते हुए सरोवर के मध्य तक गए। चार-पांच रक्तकमल तोड़े और फिर तैरते हुए किनारे आ गए। किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया। पानी से निकलकर महाराज भीगे बदन ही बरगद के वृक्ष के पास आए और वस्त्र बदलते हुए गोपाल भांड से कहने लगे, ‘गोपाल, तुमने ठीक कहा था। मुझे न तो किसी ने पहचाना और न ही किसी ने टोका।’


अभी गोपाल कुछ कहता कि एक व्यक्ति वहां आया और विनम्रतापूर्वक महाराज को नमस्कार किया। महाराज चौंके और गोपाल से कहने लगे, ‘लेकिन गोपाल, देखो, यह व्यक्ति मुझे पहचानता है, अब बताओ, तुम सज़ा के भागी हो या नहीं?’


‘नहीं, महाराज, क़तई नहीं।’ गोपाल ने तत्काल उत्तर दिया। उसने पुन: कहा, ‘महाराज, आप भूल गए मैंने आपसे सुबह यह भी कहा था कि सरोवर के पास केवल एक आदमी है। यह आदमी वही है महाराज, जो अपने राजा को सामान्य नागरिक के वेश में भी पहचान गया और उसे अपना अभिवादन देने पहुंच गया महाराज।’


महाराज को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने आगे बढ़कर उस व्यक्ति को गले लगा लिया।


थोड़ी देर के बाद महाराज गोपाल के साथ ही महल लौटने के लिए उद्यत हुए। रास्ते में उन्होंने पूछा, ‘गोपाल, तुमने यह कैसे जाना कि इतने सारे लोगों में कोई भी मुझे नहीं पहचानेगा तथा इतने सारे लोगों के होते हुए भी तुमने यह क्यों कहा कि सरोवर के पास एक ही आदमी है?’



गोपाल ने शांत भाव से कहा, ‘महाराज, जब मैं सुबह आपके पास आया, तब अशांत था। मेरा चित्त खिन्न था। रात को सही ढंग से सो नहीं पाया था, इसलिए तंद्रिल और बोझिल-सा था। ऐसे में आपने मुझे सरोवर की ओर भेजा। मैं सरोवर के पास उसी बरगद के नीचे थोड़ी देर बैठकर विश्राम करने लगा, ताकि चैतन्य हो लूं। मैंने देखा, सरोवर की राह में एक बड़ा-सा पत्थर पड़ा हुआ है। कई लोगों को उस पत्थर से चोट लग चुकी थी। मैं पत्थर के क़रीब गया कि उसे वहां से हटा दूं किंतु मैं वैसा नहीं कर पाया, क्योंकि पत्थर का कुछ भाग मिट्‌टी में गड़ा हुआ था। मैं थककर पुन: बरगद के नीचे आकर बैठ गया। कई लोग पुन: इस पत्थर की ठोकर से आहत हुए लेकिन सब अपनी चोट सहलाते आगे बढ़ गए। किसी को भी यह चिंता नहीं हुई कि उस पत्थर को वहां से हटाने का उद्योग करे। लेकिन एक आदमी उधर से गुज़रते समय पत्थर के पास रुका और उसे हटाने लगा। काफ़ी परिश्रम के बाद उसने पत्थर को वहां से उखाड़कर सड़क से दूर ले जाकर रखा और थककर सरोवर के किनारे विश्राम करने लगा। उसे न तो किसी से प्रशंसा की अपेक्षा थी और न किसी से अपने श्रम का मूल्य पाने की लालसा। उसके चेहरे पर कर्तव्य-पालन की तृप्ति की आभा थी। महाराज, मैंने इसी व्यक्ति के बारे में कहा था कि सरोवर के पास केवल एक आदमी है। आदमी वही होता है, जो अपने अलावा औरों के बारे में भी सोचे। सरोवर में स्नान करने गए शेष तमाम लोगों को अपने सिवा और किसी की परवाह नहीं थी।’


महल निकट आ चुका था। महाराज ने पूछा, ‘ऐसा क्यों है गोपाल?’


गोपाल ने उत्तर दिया, ‘महाराज, यथा राजा तथा प्रजा। आप स्वयं कभी अपनी प्रजा का हालचाल जानने का उद्यम नहीं करते। कभी कोई आयोजन नहीं करते, जिसमें प्रजा की भागीदारी हो। ऐसी प्रजा का ऐसा ही एकांगी विकास होता है, इसलिए यदि ऐसा है तो किम् आश्चर्यम्?’


महाराज को गोपाल की बात समझ में आ गई। इसके बाद महाराज कृष्णचंद्र ने महीने में एक बार खुला दरबार लगाना शुरू कर दिया, जिसमें अपनी समस्याओं से महाराज को अवगत कराने की सुविधा प्रजा को मिल गई। महाराज स्वयं भी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए प्राय: रात्रि भ्रमण पर निकलने लगे।


इस सबका नतीजा हुआ कि देखते-देखते कुछ दिनों में ही कृष्णनगर में सामाजिक समरसता का संचार होने लगा।


Sunday, January 7, 2024

भविष्यवाणी (कहानी) : गोपाल भाँड़

 गोपाल भाँड़ बचपन से ही प्रखर बुद्धि का था। साहस और पराक्रम की उसमें कमी नहीं थी। दीन-दुखियों को देखकर द्रवित हो जाना और उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाना उसका स्वभाव था।


एक बार गोपाल को उसकी माँ मेला घुमाने के लिए ले गई। गोपाल गाँव से पहली बार बाहर निकला था। उसे अनेक ऐसी चीजें देखने को मिलीं जिन्हें उसने पहले कभी देखा नहीं था। उसने पहली बार शहर की चैड़ी सड़कें देखीं। कई सड़कें ऐसी थीं जिन पर ईंट और पत्थर के चौकोर टुकड़े बिछाए गए थे। धूप में ये सड़कें तप सी जातीं।


गोपाल भाँड़ और उसकी माँ नंगे पाँव थे। ऐसे भी उस जमाने में जूते जमींदार-साहूकार, राजा-महाराजा आदि ही पहनते थे। गोपाल का मन चिकनी सड़क पर सरपट भागने को हो रहा था मगर धूप के कारण तपती सड़क पर पाँव रखने पर उसके तलवे जलते से महसूस होते।


गोपाल की बेचैनी और उसकी हसरत दोनों को उसकी माँ समझ रही थी। अपना आँचल गोपाल के सिर पर रखते हुए उसने बहुत प्यार से उससे कहा-‘‘बेटा! सड़क के दोनों किनारों को देखो। कितने अच्छे सायेदार पेड़ लगे हैं! ये पेड़ इसलिए ही लगाए गए हैं कि इस सड़क से गुजरनेवाले पैदल यात्रियों को इन पेड़ों की छाया मिल सके। तुम सड़क के बीच में चल रहे हो जिसके कारण तुम्हारे पैर में जलन हो रही है। किनारे-किनारे चलो जहाँ कच्ची मिट्टीवाली राह है। यह कच्ची मिट्टीवाली राह ही पैदल चलनेवालों के लिए है।’’


”नहीं माँ! मैं थोड़ी देर इस सड़क पर और चलूँगा।“ गोपाल बाल सुलभ जिद में मचलकर बोला।


असल में पहली बार गाँव से बाहर आने के कारण वह एक अजीब से उमंग का अनुभव कर रहा था। थोड़ी ही देर के बाद उसे पीछे से ‘हटो-हटो’ की आवाज सुनाई दी। उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़कर झटके से उसे पक्की सड़क से कच्ची सड़क पर खींच लिया।


गोपाल ने आश्चर्य से पक्की सड़क की ओर देखा जिस पर अभी चार कहार एक खुली पालकी में एक मोटे से आदमी को बैठाए तेज कदमों से, लगभग दौड़ते हुए, चले जा रहे थे। चारों हाँफ रहे थे और पसीने से तरबतर हो रहे थे। उन्हें देखकर गोपाल ने आश्चर्य से अपनी माँ से पूछा-”यह क्या है माँ?’’


माँ ने उसे बताया-‘‘गोपाल, यह पालकी है। पालकी में कोई पैसेवाला आदमी ही बैठता है, जैसे-जमींदार, साहूकार आदि।’’


‘‘छीः, कितने गन्दे होते हैं ये जमींदार-साहूकार! आदमी की सवारी करते हैं और कहते हैं कि पालकी पर सवार हैं!’’ गोपाल ने तपाक से कहा।


उसकी माँ अपने बेटे की बात सुनकर दंग रह गई और इधर-उधर देखने लगी कि कहीं किसी ने उसकी बातें सुन तो न लीं?


‘‘चुप रह गोपाल! ऐसे नहीं बोलते। जो लोग पालकी उठाए हुए हैं, वे मुफ्त में थोड़े ही न पालकी उठाकर दौड़ रहे हैं? इन्हें इस काम के लिए मेहनताना भी तो मिलेगा, यही इनकी आजीविका का साधन है। यही इनका काम है।’’ माँ ने गोपाल को समझाया।


मगर गोपाल को माँ की बात से कोई सन्तुष्टि नहीं हुई। उसने फिर कहा-‘‘लेकिन माँ, ये कुछ और भी तो कर सकते थे...यदि आदमी को जानवर की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति न होती।’’


‘‘चुप रह!“ माँ ने गोपाल को झिड़क दिया। ‘‘डेढ़ बित्ता का है। अभी से इतनी बड़ी-बड़ी बातें करता है!’’


गोपाल रुआँसा होकर चुप हो गया। मगर उसके भावुक मन में चार आदमियों के कन्धे पर सवार मोटे इनसान की छवि बार-बार कौंध रही थी- ‘कैसी विडम्बना है? आदमी ही आदमी की सवारी कर रहा है! आदमी के आगे आदमी ही विवश है...उफ! ऐसा क्यों है? माँ से पूछूँ तो वह डाँटेंगी...’ बहुत देर तक गोपाल इसी उधेड़-बुन में लगा रहा और माँ के साथ चुपचाप चलता रहा। उसके दिमाग में बातें आ-जा रही थीं-‘अरे, वह मोटा-जो पालकी में बैठा था-खुद चार के बराबर रहा होगा...उसे ढोनेवाले मजदूर तो बेचारे दुबले-पतले थे। पसीने से नहाए हाँफते-काँपते बढ़े जा रहे थे। उनकी यह हालत क्या उस मोटे को दिखाई नहीं दे रही थी?’


गोपाल के बाल-मन में इस तरह के भाव आ-जा रहे थे। माँ के साथ चलता गोपाल देर तक इसी बिन्दु पर सोचता रहा और स्वगत ढंग से, खुद को समझाया कि ‘जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तब ऐसी दुनिया बनाऊँगा जिसमें आदमी की सवारी आदमी नहीं करेगा!’ यह विचार आते ही गोपाल आश्वस्त-सा हो गया और फिर शहर के मंजर में उसका मन रमने लगा।


शहर करीब आने पर इस पक्की सड़क से इक्का-दुक्का घुड़सवार भी गुजरते दिखे। उन्हें देखकर गोपाल को बहुत आनन्द आता और मन-ही-मन सोचता कि वह जब बड़ा हो जाएगा तो वह भी घोड़े पर बैठेगा। लाल नहीं, सफेद घोड़े पर। सफेद घोड़ा कितना अच्छा लगता है! एक बार रामदीन की बहन की शादी में गाँव में भी तो आया था सफेद घोड़ा!...नहीं, घोड़ा नहीं, सफेद घोड़ी, जिस पर दूल्हा सवार था।


अचानक गोपाल ने माँ से पूछा-‘‘माँ, मेले में घोड़ा भी होगा न?“


”हाँ बेटा...घोड़ा भी होगा और हाथी भी, गाय और बैल भी। कबूतर, तोता, मैना भी।’’ उसकी माँ ने उसे लाड़ में डूबी आवाज में कहा।


दरअसल गोपाल को झिड़कने के बाद से वह भी अफसोस कर रही थी कि बेकार डाँट दिया बच्चे को, ठीक ही तो कह रहा था! मगर न डाँटती तो ऐसी बात करने की उसे आदत पड़ जाती। जमाना खराब है। कहीं किसी बड़े आदमी के कान में उसकी बातें पड़ जाएँ तो...राम न करे कि कभी ऐसा हो। ये बड़े लोग होते बड़े अजीब हैं। चिकनी-चुपड़ी बतियाएँगे मगर इनकी भृकुटि तनते देर नहीं लगती। जब तक बेगार करते रहो तब तक मेहरबान दिखेंगे, काम निकल जाए तब फिर तू कौन और मैं कौन? पहचानने तक से कर देते हैं इनकार। बड़े तोताचश्म होते हैं ये बड़े लोग-चाहे जमींदार हों, चाहे साहूकार! देर तक यही सब सोचती चलती रही थी गोपाल की माँ। जब गोपाल ने उससे सवाल किया तो उसकी तन्द्रा टूटी।



शाम होने के पहले ही दोनों माँ-बेटे मेला-स्थल तक पहुँच गए। गोपाल की माँ ने एक छायादार वृक्ष के नीचे चादर बिछा ली और गोपाल से कहा- ‘‘आ बेटा, थोड़ा सुस्ता ले। फिर चलेंगे मेला देखने।’’


गोपाल चादर पर बैठ गया। उसने माँ को देखा, वह थकी सी लग रही थी। उसने माँ से कहा-”माँ, तू जरा पैर फैला ले। मैं दाब देता हूँ। तुम्हारा पैर थक गया होगा। बाप रे! हम लोग सुबह से पैदल चल रहे हैं न?’’


गोपाल की माँ को अपने बेटे पर बहुत प्यार आया और उसने गोपाल को अपनी गोद में समेट लिया। गोपाल थका हुआ था। माँ की गोद में आने और सहलाए जाने से उसे नींद आने लगी और वह माँ की गोद में ही सो गया।


गोपाल की माँ भी थकान मिटाने के लिए बेटे को गोद में चिपकाए वहीं लेट गई। थोड़ी ही देर में उसे भी नींद आ गई।


एक अजीब से शोर के कारण उन दोनों की नींद खुल गई। शोर का कारण समझने के लिए गोपाल की माँ ने सड़क के दोनों ओर देखा। मेला जाने की राह में उसे एक हाथी जाता हुआ दिखा। हाथी पर एक मोटा आदमी बैठा हुआ था। हाथी के पीछे ग्रामीण बच्चों की भीड़ तालियाँ बजाते हुए चल रही थी। जब कभी भी हाथी अपने सूँड़ हिलाता या सूँड़ से कोई हरकत करता तो बच्चे शोर मचाने लगते...बच्चों के मुँह से हर्षातिरेक में निकलनेवाली आवाजों से पैदा हुए शोर के कारण ही उनकी नींद खुली थी।


गोपाल ने भी हाथी की ओर देखा मगर उनींदा होने के कारण उसमें उसने कोई रुचि नहीं ली। अपनी माँ की गोद में सिर रखकर फिर लेट गया।


गोपाल की माँ उसके सिर पर हाथ फेर रही थी। थोड़ी देर के बाद उसने बहुत प्यार से गोपाल से पूछा-‘‘बेटा, रोटी खाएगा? एक रोटी खा ले! भूख लगी होगी तुझे।...भूख लगी है न?’’


‘‘हाँ, माँ!’’ गोपाल ने कहा।


गोपाल की माँ ने झोले से एक मसालेदार रोटी निकालकर गोपाल के हाथों में थमा दी और एक रोटी लेकर खुद भी खाने लगी।


रोटी खा चुकने के बाद गोपाल ने कहा-”माँ...पानी!“


गोपाल की माँ ने कहा-”चल बेटा, अब रास्ते में कहीं पानी मिल जाएगा। इतना बड़ा मेला है तो वहाँ प्याऊ तो होगा ही। रास्ते में न मिला तो मेले में मिल ही जाएगा।“


मेला का नाम सुनते ही गोपाल में फिर बाल सुलभ उत्सुकता पैदा हो गई। वह प्यास भूल गया और माँ के साथ मेले की ओर बढ़ने लगा।


मेला पहुँचकर उसकी माँ ने गोपाल को झूले पर बैठा दिया और देर तक उसने झूले का मजा लिया। फिर वे दोनों मेले में आए पशुओं को देखने गए। मेले में गोपाल ने पहली बार ऊँट देखा। माँ ने उसे बताया कि ऊँट को रेगिस्तान का जहाज कहते हैं। दरअसल रेगिस्तान बहुत विस्तृत बलुआ मैदान होता है। दूर तक बालू ही बालू। जिधर नजर दौड़ाओ उधर बालू! इस मैदान में अन्य जानवरों का चलना मुश्किल होता है मगर ऊँट की पतली और लम्बी टाँगें इस रेगिस्तान में आराम से चलती हैं। दूसरी विशेषता ऊँट की यह भी होती है कि वह कई-कई दिनों तक बिना पानी के रह सकता है क्योंकि ऊँट के पेट में एक थैली होती है जिसमें ऊँट अपनी जरूरत के लिए पानी सुरक्षित रख लेता है।


पानी का नाम सुनते ही गोपाल को अपनी प्यास याद आ गई और वह पानी पीने के लिए मचल उठा।


उसकी माँ ने पता किया। संयोगवश पशु मेले में ही प्याऊ की व्यवस्था थी। वह उसे लेकर प्याऊ पर गई। खुद भी पानी पीया और गोपाल को भी पानी पिलाया।


पानी पी लेने के बाद गोपाल में ताजगी आ गई और वह प्रसन्नचित्त होकर मेले का आनन्द उठाने लगा।




एक स्थान पर उसने देखा, थोड़ी भीड़-सी लगी है। उसने अपनी माँ से उस ओर चलने को कहा। भीड़ के निकट पहुँचने पर उसने देखा, एक मोटा आदमी एक हाथी पर सवार है और वह हाथी लकड़ी के भारी टुकड़ों को सूँड़ से उठाकर एक स्थान विशेष तक पहुँचा रहा है। भीड़ के लोग हाथी के काम को विस्मय के भाव से देख रहे थे। तभी किसी ने कहा-‘‘जरा मोटे को तो देखो...’’


अभी वह कुछ आगे बोलता कि बगल में खड़े गोपाल ने तंज किया- ‘‘ऊपरवाले मोटे को या नीचेवाले मोटे को?’’


भीड़ ने बच्चे के मुँह से निकली यह बात सुनी तो सबके सब हँस पड़े। लेकिन गोपाल की माँ की भृकुटियाँ तन गईं। आवेश में उसका हाथ उठा और गोपाल के गाल पर ‘चट’ से एक तमाचा पड़ गया होता मगर एक व्यक्ति ने गोपाल की माँ का हाथ पकड़ लिया। ”नहीं बहन, नहीं! इस मासूम को मत मारो। तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे इस बच्चे में ईश्वर ने कैसी ऊर्जा भर दी है। मैं ज्योतिष शास्त्र का जानकार हूँ। तुम्हें बताता हूँ। याद रखना, यह बच्चा राजा से भी समानता का व्यवहार करेगा। न किसी को बड़ा मानेगा, न छोटा। इसकी बुद्धिमत्ता की सभी सराहना करेंगे। शत्रु को भी मित्र बनाने की कला में यह माहिर होगा। कटु सत्य बोलकर भी यह किसी को अप्रसन्न और खिन्न नहीं होने देगा। ऐसे लोग सदियों में पैदा होते हैं और सदियों-सहस्रब्दियों तक याद किए जाते हैं।“


गोपाल की माँ का क्रोध एकबारगी शान्त हो गया। उसने गोपाल को प्यार से चिपका लिया।


मेले का भरपूर आनन्द उठाने के बाद वे दोनों अपने घर की ओर चल पड़े।


रंग-बिरंगी मिठाइयां : तेनालीराम की कहानी

 वसंत ऋतु छाई हुई थी। राजा कृष्णदेव राय बहुत ही खुश थे। वह तेनालीराम के साथ बाग में टहल रहे थे। वह चाह रहे थे कि एक ऐसा उत्सव मनाया जाए, जिसमें उनके राज्य के सारे लोग शामिल हों। पूरा राज्य उत्सव के आनंद में डूब जाए। इस विषय में वह तेनालीराम से भी राय लेना चाहते थे। तेनालीराम ने राजा की इस सोच की प्रशंसा की और इसके बाद राजा ने विजयनगर में राष्ट्रीय उत्सव मनाने का आदेश दे दिया। शीघ्र ही नगर को स्वच्छ करवा दिया गया, सड़कों व इमारतों में रोशनी की व्यवस्था कराई गई। पूरे नगर को फूलों से सजाया गया। सारे नगर में उत्सव का वातावरण था। इसके बाद राजा ने घोषणा की कि राष्ट्रीय उत्सव मनाने के लिए हलवाई की दुकानों पर रंग-बिरंगी मिठाइयां बेची जाएं। घोषणा के बाद नगर के सारे हलवाई रंगीन मिठाइयां बनाने में व्यस्त हो गए।


इस घोषणा के बाद कई दिनों तक तेनालीराम दरबार में नजर नहीं आए। किसी को भी उनके बारे में कुछ नहीं पता था। राजा कृष्णदेवराय ने तेनालीराम को ढूंढ़ने के लिए सिपाहियों को भेजा, लेकिन वे भी तेनालीराम को नहीं ढूंढ़ पाए। उन्होंने राजा को इस बारे में बताया।


यह सुनकर राजा और भी अधिक चिंतित हो गए। उन्होंने दोबारा सिपाहियों को तेनालीराम की खोज में जुट जाने का आदेश दिया।


कुछ दिनों बाद सैनिकों ने तेनालीराम को ढूंढ़ निकाला। वापस आकर उन्होंने राजा को बताया, ‘महाराज, तेनालीराम ने तो कपड़ों की रंगाई की दुकान खोल ली है। वह सारा दिन अपने इसी काम में व्यस्त रहते हैं। जब हमने उन्हें अपने साथ आने को कहा तो उन्होंने आने से मना कर दिया।’


यह सुनकर राजा को गुस्सा आ गया। वह सैनिकों से बोले,‘मैं तुम्हें आदेश देता हूं कि तेनालीराम को जल्दी से जल्दी पकड़कर यहां ले आओ। अगर वह तुम्हारे साथ अपनी मर्जी से न आए तो उसे बलपूर्वक लेकर आओ।’

राजा के आदेश का पालन करते हुए सैनिक तेनालीराम को बलपूर्वक पकड़कर दरबार में ले आए।


राजा ने पूछा, ‘तेनाली, तुम्हें लाने के लिए जब मैंने सैनिकों को भेजा तो तुमने शाही आदेश का पालन क्यों नहीं किया? और एक बात और बताओ। हमारे दरबार में तुम्हारा अच्छा स्थान है, जिससे तुम अपनी सभी आवश्यकताएं पूरी कर सकते हो। फिर भला तुमने यह रंगरेज की दुकान क्यों खोली?’


तेनालीराम बोले,‘महाराज, दरअसल मैं राष्ट्रीय उत्सव के लिए अपने कपड़ों को रंगना चाहता था। नगर में बहुत सारे लोग उत्सव में पहनने के लिए अपने कपड़े रंगवाना चाहते हैं। इस काम में अच्छी कमाई है। इससे पहले कि सारे रंगों का इस्तेमाल दूसरे लोग कर लें, मैं रंगाई का काम पूरा कर लेना चाहता था।’



‘सभी रंगों के इस्तेमाल से तुम्हारा क्या मतलब है? क्या नगर के सारे लोग अपने कपड़ों को रंग रहे हैं?’ राजा ने पूछा।

‘नहीं महाराज, वास्तव में रंगीन मिठाइयां बनाने के आपके आदेश के बाद से नगर के ज्यादातर हलवाई मिठाइयों को रंगने के लिए रंग खरीदने में व्यस्त हो गए हैं। अगर वे सारे रंगों को मिठाइयां रंगने के लिए खरीद लेंगे तो मेरे कपड़े कैसे रंगे जाएंगे?’


इतना सुनते ही राजा को अपनी भूल का अहसास हो गया। वह बोले,‘तो तुम यह कहना चाहते हो कि मेरा आदेश अनुचित है। मेरे आदेश का फायदा उठाकर मिठाइयां बनाने वाले मिठाइयों को रंगने के लिए घटिया व हानिकारक रंगों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि उन्हें केवल खाने योग्य रंगों का ही इस्तेमाल करना चाहिए’, इतना कहकर महाराज ने तेनालीराम की तरफ देखा। तेनालीराम के चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कराहट थी। राजा कृष्णदेव राय ने गंभीर होते हुए आदेश दिया कि जो मिठाई बनाने वाले हानिकारक रासायनिक रंगों का प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें कठोर दंड दिया जाएगा। इस तरह तेनालीराम ने अपनी बुद्धि के इस्तेमाल से विजयनगर के लोगों को बीमार होने से बचा लिया।

Saturday, January 6, 2024

मृत्युदंड की धमकी : तेनालीराम की कहानी

 थट्टाचारी कृष्णदेव राय के दरबार में राजगुरु थे। वे तेनालीराम से बहुत ईर्ष्या करते थे। उन्हें जब भी मौका मिलता तो वे तेनालीराम के विरुद्ध राजा के कान भरने से नहीं चूकते थे।

एक बार क्रोध में आकर राजा ने तेनालीराम को मृत्युदंड देने की घोषणा कर दी, परंतु अपनी विलक्षण बुद्धि और हाजिरजवाबी से तेनालीराम ने जीवन की रक्षा की।


एक बार तेनालीराम ने राजा द्वारा दी जाने वाली मृत्युदंड की धमकी को हमेशा के लिए समाप्त करने की योजना बनाई। वे थट्टाचारी के पास गए और बोले, 'महाशय, एक सुंदर नर्तकी शहर में आई है। वह आपके समान किसी महान व्यक्ति से मिलना चाहती है।


उसने आपकी काफी प्रशंसा भी सुन रखी है। आपको आज की रात उसके घर जाकर उससे अवश्य मिलना चाहिए, परंतु आपकी बदनामी न हो इसलिए उसने कहलवाया है कि आप उसके पास एक स्त्री के रूप में जाइएगा।'

थट्टाचारी तेनालीराम की बातों से सहमत हो गए।


इसके बाद तेनालीराम राजा के पास गए और वही सारी कहानी राजा को सुनाई। राजा की अनेक पत्नियां थीं तथा वे एक और नई पत्नी चाहते थे अतः वे भी स्त्री के रूप में उस नर्तकी से मिलने के लिए तैयार हो गए।


शाम होते ही तेनालीराम ने उस भवन की सारी बत्तियां बुझा दीं, जहां उसने राजगुरु और राजा को बुलाया था। स्त्री वेश में थट्टाचारी पहले पहुंचे और अंधेरे कक्ष में जाकर बैठ गए। वहीं प्रतीक्षा करते हुए उन्हें पायल की झंकार सुनाई दी।


उन्होंने देखा कि एक स्त्री ने कमरे में प्रवेश किया है, परंतु अंधेरे के कारण वह उसका चेहरा ठीक से नहीं देख पाए। वास्तव में राजगुरु जिसे स्त्री समझ रहे थे वह स्त्री नहीं, बल्कि राजा ही थे और वार्तालाप शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी देर पश्चात कमरे की खिड़की के पास खड़े तेनालीराम को आवाज सुनाई पड़ी।

'प्रिय, तुम मुझे अपना सुंदर चेहरा क्यों नहीं दिखा रही हो?' थट्टाचारी मर्दाना आवाज में बोले।

राजा ने राजगुरु की आवाज पहचान ली और बोले, 'राजगुरु, आप यहां क्या कर रहे हैं?'


राजगुरु ने राजा की आवाज पहचान ली। शीघ्र ही वे दोनों समझ गए कि तेनालीराम ने उन्हें मूर्ख बनाया है। दोनों ने कक्ष से बाहर आने का प्रयास किया, परंतु तेनालीराम ने द्वार बाहर से बंद कर उस पर ताला लगा दिया था।

वह खिडकी से चिल्लाया, 'यदि आप दोनों यह वचन दें कि भविष्य में कभी मृत्युदंड देने की धमकी नहीं देंगे तो मैं दरवाजा खोल दूंगा।'


महाराज को तेनालीराम के इस दुस्साहस पर बहुत ही क्रोध आया, पर इस परिस्थिति में दोनों अंधकारमय कक्ष में असहाय थे और तेनालीराम की इस हरकत का उसे मजा भी नहीं चखा सकते थे।

ऊपर से दोनों को बदनामी का डर अलग था और दोनों के पास अब कोई रास्ता भी नहीं बचा था इसलिए दोनों ने ही तेनालीराम की बात मान ली।

Friday, January 5, 2024

11 नारे जिन्होंने चीन को बदल दिया

 चीन में कम्युनिस्ट शासन के संस्थापक रहे माओत्से तुंग ने राजनीतिक नारेबाज़ी को एक कला में तब्दील कर दिया था.


वैसे तो, माओ के बाद के चीन के नेताओं ने उनके कई कट्टर सिद्धांतों को बदल डाला है.


लेकिन, आज भी ऐसे कई नारे हैं, जिन्हें माओ के राजनीतिक वारिस बार-बार दोहराते रहे हैं. ऐसे ही 11 नारों के बारे में आपको बताते हैं, जिन्होंने चीन को बदल डाला.



100 फूल खिलने दो (1956)

जुमलेबाज़ी चीन की रोज़मर्रा की बोलचाल का अटूट हिस्सा है. चीन में ये माना जाता है कि अगर कोई बात काफ़िए या तुकबंदी में कही जाए, तो वो बिल्कुल सटीक मालूम होती है.


ऐसे वाक्यों को चीन की भाषा के चार अक्षरों के ज़रिए पूरा किया जाता है. पिछले दो हज़ार साल से चीन के नेता ऐसी तुकबंदी वाले जुमले इस्तेमाल करते आए हैं.


माओत्से तुंग अक्सर चीन के ऐसे पुराने जुमलों में हेर-फेर करके अपनी बात जनता को समझाया करते थे.


'सौ फूल खिलने दो; सौ विचारों में मुक़ाबला होने दो.' ये नारा माओ ने ईसा से 221 साल पहले ही ख़त्म हो गए चीन के 'सूबों के संघर्ष' के दौर से लिया था.



माओ ये इशारे देते रहते थे कि कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना की इजाज़त होगी. लेकिन, जब लोगों ने असल में निंदा करनी शुरू की, तो ये बेहद व्यापक और ज़हरीले मुक़ाबले में तब्दील हो गई. अधिकारियों की आलोचना करने वाले विशाल पोस्टर लगाए गए; छात्रों और अध्यापकों ने खुलकर पार्टी की नीतियों को ख़ारिज करना शुरू कर दिया.


तो, चीन में सौ फूल खिलने का दौर शुरू होने के एक साल के बाद माओ ने इस पर विराम लगा दिया.


एक भाषण में माओ ने कहा कि, 'ग़ैर मार्क्सवादी विचारों के प्रति हमारी नीति क्या होनी चाहिए? जहां तक क्रांति और समाजवाद के मक़सद के विरोधियों की बात है, तो इस सवाल का जवाब बेहद आसान है. हम उन्हें बोलने की आज़ादी से महरूम कर देंगे.'


अधिकारों की मांग करने वालों के ख़िलाफ़ एक विशेष अभियान चलाया गया. बुद्धिजीवियों का बहिष्कार किया गया. उन्हें जेल में बंद कर दिया गया या फिर गांवों में काम करने भेज दिया गया.


विवेचना करने वाले आज भी इस अभियान पर तर्क वितर्क कर रहे हैं; क्या ये खुलापन लाने की ईमानदार कोशिश थी? या फिर एक शातिर रणनीति थी जिससे क्रांति के विरोधियों को अपना नक़ाब उतार फेंकने के लिए उकसाया गया?


2. सोचने का साहस दिखाओ, क़दम उठाने की ताक़त दिखाओ 1958

माओ ने ये बेहद अहम नारा अपने 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' अभियान के तहत दिया था. 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' दो साल का वो अभियान था, जिसमें माओ ने किसानों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वो सामूहिक खेती के लिए एकजुट हों.


'सोचने का साहस दिखाओ, बोलने की हिम्मत जुटाओ. चलने की ताक़त दिखाओ' का नारा माओ ने इसलिए दिया कि किसान उनके दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ें.


लेकिन, इस दौरान चीन में खेती की उपज बर्बाद हो गई. क़ुदरती आपदाओं और माओ की नीतियों के चलते चीन में क़रीब तीन करोड़ लोग बेमौत मर गए.


'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' तबाही से जुड़ा होने के बावजूद, माओ के समर्थक बाद के कई वर्षों तक उनका ये नारा इस्तेमाल करते रहे थे.



. चार पुरानी रवायतों को तोड़ डालो 1966

लंदन के किंग्स कॉलेज की जेनिफर आल्टेहेंगर कहती हैं कि पश्चिम की जनता के ज़हन में माओ का ये जुमला आते ही उनकी आंखों के सामने युवाओं के मंदिरों को तोड़ने की तस्वीरें तैर जाती हैं. लेकिन, बाद में पुरानी रवायतों को तोड़ने के इस आंदोलन का दायरा बढ़ गया और बहुत से बुज़ुर्गों और बुद्धिजीवियों के साथ मार-पीट की गई; उनमें से कई की मौत हो गई थी.


चीन की सांस्कृतिक क्रांति से मानो नारों का एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया था, जिसमें वो जुमला भी शामिल था कि, 'इंक़लाबी होना वाजिब है'. ये नारा 'पुरानी रवायतों को नष्ट करने' के नारे का सच्चा साथी कहा जाता है.


एक स्थायी क्रांति के लिए माओ ने देश की लगभग हर संस्था और व्यवस्था पर हमले की इजाज़त दे दी थी. असल में 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' से उनकी छवि को जो धक्का लगा था, उसे वो सांस्कृतिक क्रांति के ज़रिए दोबारा बहाल करना चाहते थे.



4. चार ग़द्दारों के गिरोह को नष्ट कर दो 1976

माओ की मौत के बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच सत्ता के लिए संघर्ष छिड़ गया था.


माओ के नामित उत्तराधिकारी हुआ गुओपेंग ने नेतृत्व की सभी औपचारिक भूमिकाओं को अपना लिया था. लेकिन, माओ की पत्नी जियांग क़्विंग और उनके तीन सहयोगियों ने हुआ गुओपेंग का कड़ा विरोध किया.


इन सबका ताल्लुक़ सांस्कृतिक क्रांति के दौरान ढाए गए ज़ुल्मों से था. तो, उन्हें फ़ौरन गिरफ़्तार करके उनके पदों से हटा दिया गया.


उस दौर में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार वाले पोस्टरों में चारों को ग़द्दार बताया जाता था. उनमें सबसे चर्चित व्यंग चित्र वो था, जिसमें उनके चेहरों पर क्रॉस का निशान बनाया गया था. इस पोस्टर में लिखा रहता था कि, 'वैंग-झैंग-जियांग-याओ के पार्टी विरोधी गिरोह को हमेशा के लिए बाहर कर दो!'


बाद में ख़ुद हुआ गुओपेंग की कुर्सी उन डांग श्याओपिंग ने हथिया ली, जिन्होंने चीन में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी. ग़द्दार कहे जाने वाले इन चारों नेताओं पर मुक़दमा चलाया गया. आधुनिक चीन के इतिहास में इसे सबसे ख़ूनी सत्ता संघर्ष कहा जाता है.


मुक़दमे की सुनवाई को टीवी पर दिखाया जाता था. लोगों की दिलचस्पी ख़ास तौर से माओ की पत्नी जियांग क़्विंग और वकीलों के बीच होने वाली बहस में हुआ करती थी. जियांग आख़िरी वक़्त तक बाग़ी तेवर अपनाए रहीं, जबकि उनके पूर्व सहयोगियों ने भी उनसे पल्ला झाड़ लिया था. चारों नेताओं को उम्र क़ैद की सज़ा दी गई थी. जियांग क्विंग की मौत 1991 में हुई थी; कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जान ख़ुद 

ही ले ली थी




5. सुधार और दुनिया के लिए दरवाज़े खोलना 1978

डांग श्याओपिंग ने चीन को बड़ी तेज़ी से आर्थिक सुधारों की पटरी पर दौड़ाया. पहले तो उन्होंने चुपचाप 'वर्ग संघर्ष' के जुमले से किनारा कर लिया. डांग श्याओपिंग से पहले के 12 वर्षों के दौरान 'वर्ग संघर्ष' के बड़े बड़े बैनर लटकाए जाते थे और अख़बारों में भी इसे छापा जाता था.


अब उसकी जगह अख़बारों और बैनरों में 'चार आधुनिकीकरणों' ने ले ली. ये एक ज़ोरदार नीति का मंच था, जिसे 1960 के दशक में प्रस्तावित किया गया था. लेकिन, माओ के दौर में इसे कभी लागू नहीं किया गया था.


डांग श्याओपिंग ने, 'चीन की ख़ूबियों वाले समाजवाद' का विचार दिया. इससे चीन के नेताओं को माओ के सिद्धांतों से दूर जाने का काफ़ी लचीलापन मिला.


कुल मिलाकर डांग श्याओपिंग की योजना का सूत्र वाक्य 'सुधार और दुनिया के लिए दरवाज़े खोलना' बन गया.


आख़िर में चीन के संविधान की प्रस्तावना में भी इन शब्दों में शामिल कर लिया गया:


'किसी भी राष्ट्रीयता वाले चीनी लोग जनवादी लोकतांत्रिक तानाशाही और समाजवाद के रास्ते पर चलते रहेंगे. वो सुधारों और दुनिया के लिए दरवाज़े खोलने की बात पर भी डटे रहेंगे.



6. तथ्यों से हक़ीक़त तलाशो 1978

चीन के नेताओं ने थोड़ी व्यवहारिकता और कुछ तर्क से काम लेते हुए इस नारे को पसंद किया. हालांकि, अपनी अस्पष्टता के चलते ये नारा बहुत खीझ भी पैदा करता था.


डॉक्टर जेनिफर कहती हैं कि, 'ये चीन का एक प्राचीन दार्शनिक सिद्धांत है, लेकिन 1970 के दशक के आख़िरी वर्षों में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के साथ इस नारे को ख़ूब इस्तेमाल किया गया.'


ऐसे जुमलों के पुराने रूप हमें चीन में ईसा से भी दो सदी पहले के वाद-विवाद के दौरान देखने को मिलते हैं. उस दौर में क़ानून के जानकार ऐसी कहावतें गढ़ा करते थे, जिनमें कहा जाता था कि, 'क़ुदरत की स्थिरता का पालन करो' और 'चारों मौसमों के हिसाब से ख़ुद को ढालो'.


असल में चीन के 'नारे' चेंग्यू नाम की चीनी भाषा की विशेषता हैं, जिनमें चार अक्षरों वाले वाक्यांशों या वाक्यों के गहरे सांस्कृतिक मायने होते हैं. दूसरे शब्दों में इसे बातचीत का असरदार तरीक़ा कहा जाता है.


'तथ्यों से हक़ीक़त तलाशो' इसकी अच्छी मिसाल है. माओ ने शायद इसका इस्तेमाल 1930 के दशक में किया था, जिससे कि नया नेतृत्व इसे दोबारा ज़िंदा करके अपनी सत्ता को वाजिब ठहरा सके.


1978 के अपने एक भाषण में डांग श्याओपिंग ने कहा था कि, 'अगर हम अपने दिमाग़ को मुक्त कर लें, तथ्यों में सच तलाशें, हर बाद में हक़ीक़त से वाबस्ता हों और परिकल्पनाओं को अपने बर्ताव में अपनाएं, तो हम अपने समाजवादी आधुनिकीकरण के कार्यक्रम को सफलता से चला सकेंगे.'


डॉक्टर जेनिफर कहती हैं कि ये एक व्यापक अवधारणा है. और, इसमें ये मानकर चला जाता है कि कोई निष्पक्ष सत्य भी है. जबकि हक़ीक़त ये है कि जिसके हाथ में सत्ता है, वो अपने हिसाब से इसके मायने बदल सकता है.




7. कम बच्चे पैदा करो, ज़्यादा सुअर पालो 1979

चीन की एक बच्चे की नीति से कई अजीब-ओ-ग़रीब नारे और सियासी जुमले जुड़े हुए हैं. ज़रूरी नहीं था कि इन नारों को कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से मंज़ूरी मिली हो लेकिन, उत्साही स्थानीय अधिकारी दशकों तक इन नारों से दीवारों को रंगते रहे थे.


ज़्यादा खुली बयानबाज़ी वाले नारों में 'बच्चे पैदा करने के दर्द को उभारो! गर्भपात कराओ! कुछ भी करो लेकिन बच्चे ज़्यादा न पैदा करो.' 'अगर एक भी परिवार में एक बच्चा ज़्यादा हुआ, तो पूरे गांव की नसबंदी कर दी जाएगी.' और 'एक और बच्चे का मतलब एक और क़ब्र है.'


अब जैसे जैसे चीन की जन्म दर गिरी है, तो उसे अपनी जनसंख्या नीति में लगातार बदलाव करने पड़े हैं. 2016 में चीन ने पहले दो बच्चे पैदा करने की इजाज़त दी. और, अभी हाल ही में हर विवाहित दंपति को तीन बच्चे पैदा करने का अधिकार दे दिया गया है.


2007 के एक निर्देश और 2011 में चलाए गए अबियान के तहत, चीन के राष्ट्रीय जनसंख्या और परिवार नियोजन आयोग ने सुझाव दिया था कि कम बच्चे पैदा करने के ऐसे सीधे नारों के बजाय, कुछ नरम जुमलों का इस्तेमाल किया जाए.


नए नज़रिए के तहत कुछ इस तरह के नारे गढ़े गए: धरती मां बहुत थक गई है. वो और बच्चों का बोझ उठाने के क़ाबिल नहीं रही.




8. थ्री रिप्रेज़ेंट्स 2000

जियांग जेमिन ने चीन की राजनीति में अपनी सत्ता के दस वर्षों के दौरान 'थ्री रिप्रेज़ेंट्स का महत्वपूर्ण विचार' दिया था, जिसे चीन के संविधान की प्रस्तावना में भी शामिल किया गया.


जियांग जेमिन ने ये विचार वर्ष 2000 में एक भाषण के दौरान सामने रखा था, और 2002 में कम्युनिस्ट पार्टी की 80वीं सालगिरह के मौक़े पर इसे और विस्तार से पेश किया था.


जियांग जेमिन ने कहा था कि, 'कम्युनिस्ट पार्टी को हमेशा चीन की उन्नत उत्पादक ताक़तों के विकास संबंधी ज़रूरतों की नुमाइंदगी करनी चाहिए. उसे चीन की उन्नत संस्कृति को बढ़ावा देने और चीन की जनता के बहुमत के बुनियादी हितों को बढ़ावा देने का काम करना चाहिए.'


लेकिन, माओ के पुराने नारों से प्रेरित जुमलों के बजाय इसमें गहराई नहीं दिखती.


इसके बजाय, इसमें जियांग जेमिन के इंजीनियर होने की पृष्ठभूमि ज़्यादा झलकती है. जियांग जेमिन, माओ जैसे प्रेरक कवि और योद्धा के बजाय टेक्नोक्रेट ज़्यादा थे.


9. समाज में मधुरता 2005

अगर किसी नारे की सफलता का पैमाना ये मान लिया जाए कि उसे चीन के संविधान में शामिल किया गया या नहीं, तो हू जिंताओ निश्चित रूप से अभी इंतज़ार की क़तार में ये सोचते हुए खड़े हैं कि उन्हें ये सम्मान मिलेगा या नहीं. चीन की संसद के सदस्यों (NPC) ने पहली बार जिंताओ के सौहार्द्रपूर्ण समाज के विचार को 2005 में संविधान में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन, अब तक ऐसा होने का इंतज़ार है.


हालांकि, नारों की सफलता के दूसरे पैमाने भी हैं. दर्जनों नीतियां, नियम और सुधार इसी नारे से निकले हैं (या फिर उन्हें इसके दर्जे में रखा गया है).


जैसे कि क्विंघाई और उरुमची जैसे चीन के पश्चिमी शहरों के व्यापक विकास के प्रोजेक्ट इसी नारे के तहत आते हैं. लेकिन, बोलने की आज़ादी पर प्रतिबंध और तिब्बत व शिंजियांग में ज़ुल्म को भी इसी नारे की पैदाइश माना जाता है.


हू जिंताओ ने अपने मंच की शुरुआत जान-बूझकर उस असमानता से निपटने के लिए की थी, जो 1980 और 1990 के दशक के तेज़ आर्थिक विकास से पैदा हुई थी. उन्होंने 2005 के एक भाषण में कहा था कि, 'एक समरसता वाले समाज में लोकतंत्र, क़ानून का राज, समानता, इंसाफ़, ईमानदारी, ऊर्जा और सहयोग होना चाहिए.'


हालांकि, शायद ये इसकी सफलता का ही नतीजा था कि सौहार्द्रपूर्ण समाज के जुमले का चीन के इंटरनेट यूज़र ख़ूब मज़ाक़ उड़ाते हैं. वो इसके लिए 'नदी के केकड़े' का इस्तेमाल करते हैं, जो सुनने में तो समरसता जैसा लगता है, लेकिन वो इसके ज़रिए चीन की सरकार के सेंसर से बचकर उसकी आलोचना कर पाते हैं.


10. तीन सर्वोच्च 2007

ये किसी म्यूज़िक एल्बम के नाम जैसा लगता है. लेकिन, हू जिंताओ के ज़हन में ये सुधारवादी न्यायपालिका पर क़ाबू पाने का एक तरीक़ा था.


उन्होंने कहा था कि, 'महान जज और वकील लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए कि पार्टी का काम, लोगों के हित और संविधान व क़ानून सबसे ऊपर हैं'.


हू जिंताओ ने कम्युनिस्ट पार्टी के नेता वैंग शेंगजुन को सुप्रीम कोर्ट का अध्यक्ष नियुक्त करके क़ानूनी सुधारों की चर्चा पर विराम लगा दिया था.


वैंग शेंगजुन को क़ानून का कोई अनुभव नहीं था. लेकिन, उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि देश की अदालतें तीन सर्वोच्च के सिद्धांत का पालन करें. उसके बाद से तो पार्टी के हित ही बाक़ी दोनों सर्वोच्च पर हावी रहे हैं.



11. चाइनीज़ ड्रीम या चीनी ख़्वाब 2013

ये शी जिनपिंग का पसंदीदा नारा है. शी जिनपिंग 2013 की शुरुआत में चीन के सर्वोच्च नेता बने थे. लेकिन, अभी इसके मायने को लेकर लोगों में मतभेद हैं. पार्टी के कट्टर समर्थकों की नज़र में भी इसका मतलब साफ़ नहीं है.


वॉशिंगटन के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन में चीन के विशेषज्ञ टॉम केलॉग कहते हैं कि, 'चीन की सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी की एक समस्या है; ये नारे न तो आम जनता के बीच और न ही राजनीतिक वर्ग के बीच बहुत प्रचलित हैं, जबकि ये उन्हीं के लिए गढ़े जाते हैं.'


टॉम कहते हैं कि, 'शी जिनपिंग ने चाइनीज़ ड्रीम के नारे से इस स्थिति को बदलने की कोशिश की है. लेकिन, यहीं समस्या है. क्योंकि इस नारे को अन्य लोगों के अपना लेने का डर है. फिर वो संविधानवाद के चीनी ख़्वाब की बात उठा सकते हैं या फिर सामाजिक समरसता के चीनी ख़्वाब की मांग कर सकते हैं.'


शायद चीन का ये नारा ब्रिटेन की लेबर पार्टी के 2005 के चुनावी नारे, 'फॉरवर्ड नॉट बैक' या फिर 2012 में ओबामा की टीम के दिए गए नारे 'फॉरवर्ड' की ही एक कमज़ोर नक़ल लगता है.


मोटे तौर पर किसी इंसान के लिए चाइनीज़ ड्रीम का मतलब कुछ भी हो सकता है. हालांकि, उसके बाद से शी जिनपिंग ने काफ़ी लंबा सफ़र तय कर लिया है. उन्होंने ऐसे कई और जुमले गढ़े हैं और ख़ुद को देश का सबसे ताक़तवर नेता बना लिया है.



नली का कमाल : तेनालीराम की कहानी

 राजा कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था। महाराज अपने दरबारियों के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे। अचानक से चतुर और चतुराई पर चर्चा चल पड़ी। महाराज कृष्णदेव के दरबार में दरबारियों से लेकर राजगुरु तक तेनालीराम से चिढ़ते थे। तेनालीराम को नीचा दिखाने के उद्देश्य से एक मंत्री ने खड़े होकर कहा – महाराज! आपके इस दरबार मे बुद्धिमान और चतुर लोगो की कमी नहीं। यदि अवसर दिया जाए तो हम भी अपनी बुद्धिमानी सिद्ध कर सकते हैं किंतु?


“किन्तु क्या मंत्री जी”, महाराज कृष्णदेव ने आश्चर्य से पूछा। सेनापति अपने स्थान से उठकर बोला – मैं बताता हूं महाराज! मंत्री जी क्या कहना चाहते हैं। तेनालीराम के सामने किसी भी दरबारी को अपनी योग्यता सिद्ध करने की प्राथमिकता नहीं दी जाती। हर मामले में तेनालीराम आगे अड़ कर चतुराई का श्रेय स्वयं ले जाते हैं। जब तक अन्य लोगो को अवसर नही मिलेगा। वे अपनी योग्यता कैसे सिद्ध करेंगे। सेनापति की बात सुनकर महाराज समझ गए कि सभी दरबारी तेनालीराम के विरोध में हैं। महाराज कुछ क्षण के लिए शांत होकर सोचने लगे। तभी उनकी दृष्टि कोने में लगी ठाकुर जी की प्रतिमा पर गयी। प्रतिमा के सामने जलती धूपबत्ती को देखकर राजा को सभी दरबारियों की परीक्षा लेने का उपाय सूझ गया।


उन्होंने फौरन कहा – आप सभी को अपनी योग्यता सिद्ध करने का एक अवसर अवश्य दिया जाएगा। और जब तक आप सभी अपनी योग्यता सिद्ध नही कर देते तेनालीराम भी बीच में नहीं आएगा। यह सुनकर सभी दरबारी बड़े प्रसन्न हुए। ठीक है महाराज! कहिए हमें क्या करना है। राजा ने धूपबत्ती की और इशारा करते हुए कहा – मुझे दो हाथ धुंआ चाहिए। जो भी दरबारी ऐसा कर पाया उसे तेनालीराम से भी अधिक बुद्धिमान और चतुर समझा जाएगा। राजा कृष्णदेव की बात सुनकर सभी दरबारी आपस में फुसफुसाने लगे कि यह कैसा मूर्खतापूर्ण कार्य है। भला धुंआ भी कभी नापा जा सकता है। एक-एक कर सभी दरबारी अपनी-अपनी युक्ति लगाकर धुंआ नापने में लग गए। कोई दोनों हाथों में धुंआ नापने की कोशिश करता किन्तु धुंआ हाथों से निकल लहराता हुआ ऊपर की तरफ निकल जाता। सभी ने भरपूर कोशिश की लेकिन कोई भी दो हाथ धुंआ महाराज को न दे सका।


जब सभी दरबारी थक कर बैठ गए तो एक दरबारी बोला – महाराज! धुंआ नापना हमारी दृष्टि में असंभव कार्य है। हाँ, यदि तेनालीराम ऐसा कर पाए तो हम उसे अपने से भी चतुर मान लेंगे। किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाए तो आप उसे हमारे समान ही समझेंगे। राजा मंद-मंद मुस्कुरातें हुए बोले – क्यों तेनाली! क्या तुम्हें यह चुनौती स्वीकार है। तेनालीराम ने अपने स्थान से उठकर सिर झुकाते हुए कहा – अन्नदाता! मैंने सदैव आपके आदेश का पालन किया है। इस बार भी अवश्य करूँगा।


तेनालीराम ने एक सेवक को बुलाकर उसके कान में कुछ शब्द कहे। सेवक तुरंत दरबार से चला गया। अब तो दरबार मे सन्नाटा छा गया। सभी यह देखने के लिए उत्सुक थे कि कैसे तेनालीराम राजा को दो हाथ धुंआ देता है। तभी सेवक शीशे की बनी दो हाथ लंबी नली लेकर दरबार मे हाज़िर हुआ। तेनालीराम ने उस नली का मुंह धूपबत्ती से निकलते धुंए पर लगा दिया। थोड़ी ही देर में शीशे की नली धुंए से भर गयी और तेनाली ने नली के मुहँ पर कपडा लगा दिया और उसे महाराज की ओर करते हुए कहा महाराज ये लीजिए दो हाथ धुआं। यह देख महाराज के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी और उन्होंने तेनाली से नली ले ली और दरबारियों की तरफ देखा। सब के सिर नीचे झुके हुए थे। लेकिन दरबार में कुछ दरबारी ऐसे भी थे जो तेनालीराम के पक्ष में थे। उन सब की आँखों में भी तेनाली के लिए प्रशंसा के भाव थे। तेनालीराम की बुद्धिमानी और चतुराई देख, राजा बोले- अब तो आप मान गए होंगे की तेनालीराम की बराबरी कोई नही कर सकता। दरबारी भला क्या बोलते, वो सब चुप सुनते रहे।

Thursday, January 4, 2024

दूध न पीने वाली बिल्ली : तेनालीराम की कहानी

 एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने सुना कि उनके नगर में चूहों ने आतंक फैला रखा है। चूहों से छुटकारा पाने के लिए महाराज ने एक हजार बिल्लियां पालने का निर्णय लिया। महाराज का आदेश होते ही एक हजार बिल्लियां मंगवाई गयी। उन बिल्लियों को नगर के लोगों में बांटा जाना था। जिसे बिल्ली दी गयी उसे साथ में एक गाय भी दी गयी ताकि उसका दूध पिलाकर बिल्ली को पाला जा सके।


चूहों से सभी लोग परेशान थे, अतः जब बिल्लियाँ बंट रही थी तो लोगों की लंबी-लंबी कतारें लग गयी थीं। इस अवसर पर तेनालीरामन भी एक कतार में खड़ा हो गया। जब उसकी बारी आयी तो उसे भी एक बिल्ली और साथ में एक गाय दे दी गई। बिल्ली को घर ले जाकर उसने गरमागरम एक कटोरा दूध उसे पीने को दिया। बिल्ली भूखी थी। बेचारी ने जैसे ही कटोरे में मुंह मारा तो गर्म दूध से उसका मुहँ बुरी तरह जल गया। इसके बाद बिल्ली के आगे जब दूध रखा जाता ,चाहे वह ठंडा ही क्यों न हो, बिल्ली वहां से भाग खड़ी होती। गाय का सारा दूध अब तेनालीराम व उसके परिवार के अन्य सदस्य ही पी जाते। बेचारी बिल्ली कुछ ही दिनों में इतनी कमजोर हो गयी कि उसमे चूहे पकड़ने की ताकत भी नहीं रही। 3 माह बाद महाराज ने बिल्लियों की जांच करवाई। गाय का दूध पी -पीकर सभी की बिल्लियां मोटी-तगड़ी हो गयी थी, परन्तु तेनालीराम की बिल्ली सूखकर कांटा हो चुकी थी। वह सब बिल्लियों के बीच में अलग पहचानी जा रही थी। महाराज ने जब तेनालीराम की बिल्ली की हालत देखी तब वे क्रोधित हो उठे। उन्होंने तुरंत ही तेनालीराम को हाजिर करने का आदेश दिया। तेनालीराम के आने पर वे गरजते हुए बोले, ”तुमने बिल्ली का यह क्या हाल बना दिया है? क्या तुम इसे दूध नहीं पिलाते ?”


“महाराज ! मै तो रोज इसके सामने दूध भरा कटोरा रखता हूँ, अब यह दूध पीती ही नहीं है तो इसमें मेरा क्या दोष है ?” महाराज को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अविश्वास भरे स्वर में बोले, ”क्यों झूठ बोल रहे हो ? बिल्ली दूध नहीं पीती ? मै तुम्हारी झूठी बातों में आने वाला नहीं। “


“परन्तु महाराज यही सच है। यह बिल्ली दूध नहीं पीती। ” महाराज झल्लाकर बोले, “ठीक है। यदि तुम्हारी बात सच निकली तो तुम्हे सौ स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँगी। अन्यथा सौ कोड़ों की सजा मिलेगी।” मुझे मंजूर है! तेनालीराम शांत भाव से बोला। तुरंत ही महाराज ने एक सेवक से दूध का भरा कटोरा लाने का आदेश दिया। सेवक जल्द ही दूध से भरा कटोरा ले आया। अब महाराज ने तेनालीराम की बिल्ली को हाथों में उठाया और उसका सिर सहलाते हुए दूध के कटोरे के पास छोड़ते हुए कहा, “बिल्ली रानी दूध पियो !”



बिल्ली ने जैसे ही कटोरे में रखा दूध देखा, वह म्याऊं-म्याऊं करती हुई वहां से भाग निकली। “महाराज, अब तो आपको विश्वास हो गया होगा कि मेरी बिल्ली दूध नहीं पीती। लाइए अब मुझे सौ स्वर्ण मुद्राएं दीजिये।” तेनालीराम ने कहा। “वह तो ठीक है, लेकिन मैं एक बार उस बिल्ली को ध्यान से देखना चाहता हूँ।”


यह कहकर महाराज ने एक कोने में छिप गयी बिल्ली को पकड़कर लाने का आदेश दिया। बिल्ली को अच्छी तरह देखने पर उन्होंने पाया की उसके मुँह में जले का एक बड़ा सा निशान है। वह उसी क्षण समझ गए कि बिल्ली मुँह जल जाने के डर से दूध पीने से कतराती है। वे तेनालीराम की तरफ देखते हुए बोले। “अरे निर्दयी! तुमने इस बिल्ली को जानबूझकर गर्म दूध पिलाया ताकि यह दूध न पी सके। ऐसा करते हुए हुए तुम्हे शर्म नहीं आयी।”


तेनालीराम ने उत्तर दिया, “महाराज!, यह देखना तो राजा का कर्तव्य है कि उसके राज्य में बिल्लियों से पहले मनुष्य के बच्चो को दूध मिलना चाहिए।” इस बात पर महाराज हँस दिए। उन्होंने तेनालीराम को तुरंत ही एक हजार स्वर्ण मुद्राएं भेंट की और बोले, “तुम्हारा कहना ठीक है, परन्तु मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में तुम बेजुबान पशुओं के साथ दुष्टता नहीं करोगे।”

बूढ़ा भिखारी और महाराज कृष्णदेवराय की उदारता : तेनालीराम की कहानी

 सर्दियों का मौसम था। महाराज कृष्णदेव अपने कुछ मंत्रियों के साथ किसी काम से नगर से बाहर जा रहे थे। ठंड इतनी थी कि सभी दरबारी मोटे-मोटे ऊनी वस्त्र पहनने के बाद भी काँप रहे थे। चलते-चलते राजा की दृष्टि एक बूढ़े भिखारी पर पड़ी जो हाथ में कटोरा लिए इस कड़कड़ाती ठंड में एक पत्थर पर बैठा काँप रहा था।


भिखारी की ऐसी स्थिति देखकर महाराज से रहा न गया। रथ रूकवाकर पहुँच गए उस स्थान पर जहाँ वह बूढ़ा भीख मांग रहा था। कुछ देर तक राजा कृष्ण देव भिखारी को देखते रहे और फिर अपना कीमती शॉल उतार कर बूढ़े भिखारी को ओढ़ा दिया। महाराज की ऐसी उदारता देख सभी दरबारी व आसपास के लोग राजा की प्रशंसा करते हुए जय-जयकार करने लगे। जब सब लोग महाराज की प्रशंसा करने में लगे थे तब केवल तेनालीरामन ही ऐसा व्यक्ति था जो चुप खड़ा हुआ था। तेनाली को चुप देख राजपुरोहित को बोलने का अवसर मिल गया।


वह तपाक से बोला- क्या बात है तेनालीरामन यहाँ सभी महाराज के इस कार्य की प्रशंसा कर रहे हैं? केवल तुम ही चुप हो। क्या तुम्हें महाराज की उदारता पर कोई संदेह है? तेनाली फिर भी चुप रहे। अब महाराज को भी तेनालीराम की यह चुप्पी खलने लगी। वह वही से वापस राजमहल लौट चले। पूरे रास्ते राजपुरोहित तेनालीराम के विरुद्ध महराज कृष्ण देव को भड़काता रहा।


अगले दिन जब दरबार लगा तो सबसे पहले दरबार में महाराज ने तेनालीराम को संबोधित करते हुए पूछा – लगता है तुम्हें स्वयं पर अधिक घमंड हो गया है। तभी कल तुम चुप चाप खड़े थे। महाराज के पूछने पर भी तेनालीराम कुछ नहीं बोले। अब तो महाराज तिलमिला उठे और तेनाली को एक वर्ष के लिए देश निकाले की सजा दे डाली। सजा सुनाते हुए महाराज ने कहा – “तुम अभी विजयनगर को छोड़कर चले जाओ और जाते समय अन्य सभी कुछ यहीं छोड़कर केवल एक वस्तु अपने साथ ले जा सकते हो। बताओ, तुम क्या साथ ले जाना चाहते हो?” तेनालीरामन ने मुस्कुराते हुए कहा – “महाराज!, आपका दिया दंड भी मेरे लिए पुरूस्कार के समान है। लेकिन आपकी आज्ञा है तो मैं अपने साथ वह शॉल ले जाना चाहता हूं। जो कल आपने उस बूढ़े भिखारी को दिया था।”


तेनाली की बात सुनकर दरबार में उपस्थित सभी दरबारी और महाराज सन्न रह गए। भला दिया गया शॉल वापस कैसे मांगा जाए। ऐसा करना तो महाराज का अपमान जैसा होगा। अब चूँकि शॉल का मामला दंड से जुड़ चुका था इसलिए महाराज ने आदेश दिया कि उस बूढ़े भिखारी को शॉल सहित दरबार मे उपस्थित किया जाए।



आदेश का पालन करते हुए सैनिक कुछ ही देर में बूढ़े भिखारी को दरबार में लेकर आ गए। राजा कृष्ण देव ने उस भिखारी से कहा – “कल जो शॉल हमनें तुम्हें दिया था वह हमें वापस कर दो। बदले में हम तुम्हें अन्य बहुमूल्य वस्त्र और शॉल दे देंगे।” राजा की बात सुनकर भिखारी घबरा गया और इधर-उधर बगलें झाँकने लगा। सैनिकों के जोर देकर पूछने पर उसने कहा – महाराज! वह शॉल बेचकर तो मैंने रोटी खा ली।


बूढ़े भिखारी के मुँह से यह बात सुनकर महाराज कृष्ण देव क्रोध से भर गए। परन्तु बात उनके सम्मान की थी इसलिए उन्होंने भिखारी को आगे कुछ न कहते हुए दरबार से चले जाने का आदेश दिया। अब वे तेनाली की और देखते हुए बोले – “हमें सीधे-सीधे जवाब दो कल तुम चुप क्यों थे? क्या कल तुम्हें हमारा कार्य पसन्द नहीं आया?”


तेनालीराम हाथ जोड़ते हुए कहने लगा – “क्षमा करें! महाराज!, आपको मेरी चुप्पी का उत्तर भिखारी से मिल गया। भिखारी को कीमती शॉल की नहीं बल्कि पेट भरने के लिए रोटी की जरूरत थी। मैं आपको शॉल देते हुए रोक नहीं सकता था इसलिए चुप ही रहा।” राजा कृष्ण देव राय को तेनालीराम की बात जच गयी। उन्होंने तभी अपने मंत्रियों को आज आदेश दिया कि नगर में ऐसा प्रबंध करो ताकि किसी भी नगरवासी को पेट भरने के लिए भीख न मांगनी पड़े।

Wednesday, January 3, 2024

तेनालीराम की मनपसन्द मिठाई : तेनालीराम की कहानी

 महाराज, राजपुरोहित और तेनालीराम राज उद्यान में टहल रहे थे कि महाराज बोले , “ऐसी सर्दी में तो खूब खाओ और सेहत बनाओ। वैसे भी इस बार तो कड़के की ठण्ड पड़ रही है। ऐसे में तो मिठाई खाने का मज़ा ही कुछ और है।”


जैसे ही खाने पीने की बात शुरू हुई तो राजपुरोहित के मुंह में पानी आ गया और वह बोला, “महाराज ऐसे में तो मावे की मिठाई खाने में बड़ा ही आनंद आता है।”


“सर्दियों की सबसे बढ़िया मिठाई कौन सी है ?”महाराज ने अचानक से पूछा


तेनालीराम से पहले पुरोहित बोला, “ महाराज एक हो तो बताओ। काजू , पिस्ते की बर्फी, हलवा,रसगुल्ले आदि बहुत सी मिठाईयां हैं जो हम सर्दी में खा सकते हैं।”


अब महाराज ने तेनालीराम से पूछा , “ अब तुम बताओ।”


तेनालीराम बोला, “महाराज आज रात आप मेरे साथ चलना। मैं आपको अपनी पसंद की सर्दियों की मिठाई खिला दूंगा।”


“कहाँ चलना है?” महाराज ने पूछा


महाराज दरअसल मेरी पसंद की मिठाई यहाँ मिलती नही है। इसीलिए आपको मेरे साथ चलना होगा।”


महाराज ने कहा, “ ठीक है हम तुम्हारे साथ चलेंगे।”


रात होते ही महाराज ने साधारण मनुष्य का भेष बना लिया और तीनों निकल पड़े तेनालीराम की पसंद की मिठाई खाने के लिए।


काफी देर चलते- चलते एक गाँव भी पार हो गया और वे अब खेतों में पहुँच गए कि महाराज बोले, “तेनालीराम आज तो तुमने हमें बिलकुल थका दिया। तुम्हारी मनपसंद मिठाई खाने के लिए हमें अभी कितना और चलना पड़ेगा।”


बस महाराज जहाँ ये लोग बैठे हाथ सेक रहे हैं बस वही तक चलना है।” तेनालीराम ने कहा


थोड़ी ही देर में तीनों वहाँ पहुँच गए। तेनालीराम ने महाराज और पुरोहित को वहाँ रुकने के लिए कहा और खुद थोड़ी ही दूरी पर स्थित एक कोल्हू में जा पहुंचा।जहाँ एक तरफ गन्नों की पिराई हो रही थी और एक तरफ बड़े -बड़े कड़ाहो में गन्ने का रस पका कर ताज़ा गुड़ बनाया जा रहा था।


वहाँ काम कर रहे एक व्यक्ति से तेनालीराम ने तीन पत्तलों में गुड़ रखवाया और आग तेप रहे महाराज और पुरोहित को लाकर एक-एक पत्तल थमा दी।महारज ने जैसे ही गरमागरम गुड़ मुंह में डाला तो वे बोले , “वाह! क्या मिठाई है। सच में तेनालीराम इसे खाते ही हमारी तो सारी थकान उतर गई।”


अब महाराज ने पुरोहित से पूछा , “क्यूँ पुरोहित जी आपको कैसी लगी मिठाई?”


“यह मिठाई तो वाकई लाजवाब है।” पुरोहित ने कहा


तभी दोनों ने एक साथ पूछा, “ पर ये है कौन-सी मिठाई तेनालीराम,अब तो बता दो ?”


महाराज ये गुड़ है। गरमागरम गुड़ किसी मिठाई से कम थोड़ी होता है।”तेनालीराम ने कहा


दोनों आश्चर्यचकित होकर बोले, “ क्या! ये गुड़ है?”


“जी महाराज।”तेनालीराम ने उत्तर दिया


“सच में तेनालीराम ये किसी मिठाई से कम नहीं है।” महाराज ने तेनालीराम की पीठ थपथपाते हुआ कहा।

Monday, January 1, 2024

सात जूते मारने वाली चमेली : तेनालीराम की कहानी

 चाननपुर गाँव में चांदकुमारी नाम की एक रूपवती कन्या रहती थी। वह विवाह के योग्य हो गई थी लेकिन अपनी माँ के व्यवहार के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था।उसकी माँ का नाम चमेली था जो अपने पति माधो को रोज़ सात जूते मारा करती थी।यह बात दूर – दूर तक के लोगों को पता थी इसलिए कोई भी चांदकुमारी को अपनी बहु नहीं बनाना चाहता था।


वहीँ दूसरी तरफ तेनालीराम की बुद्धिमत्ता के कारण दरबारियों के साथ – साथ उसके कुछ रिश्तेदार भी उससे जलते थे।एक बार तेनालीराम घर पर आराम फरमा रहा था कि अचानक उसका एक दूर का रिश्तेदार चाँदकुमारी का रिश्ता लेकर उसके घर पहुँच गया। वह भी तेनालीराम से जलनेवालों में से एक था। वह तेनालीराम के पास जाकर बोला , “मैं एक रिश्ता लेकर आया हूँ तुम अपने छोटे भाई का रिश्ता ले लो।वह ये नही जानता था की तेनालीराम का कोई भाई नहीं है। फिर भी तेनालीराम ने लड़की के बारे में पूछा, “आखिर लड़की कैसी है ?”उसके बारे में कुछ तो बताओ।” वह बोला, “ लड़की का नाम चांदकुमारी है। वह बहुत ही सुंदर है।”


तेनालीराम ने भी उसकी माँ को बारे में बहुत कुछ सुन रखा था लेकिन फिर भी उसने रिश्ते के लिए हामी भर दी।


अब वह रिश्तेदार चमेली के घर पहुँच गया और उसने ये खुशखबरी चमेली को सुनाई। चमेली यह खबर सुनकर बहुत खुश हो गई और उसने बहुत जल्दी शादी का महूर्त निकलवाकर उसे बता दिया। अब उसने महूर्त का समय तेनालीराम को जाकर बता दिया। तेनालीराम ने उसे खिला -पिलाकर विदा किया।उसके जाने के बाद तेनालीराम सोचने लगा कि अब छोटा भाई कहाँ से लाया जाए? मेरा तो कोई छोटा भाई है ही नहीं।


छोटे भाई की खोज में वह नगर की ओर चल पड़ा। वहाँ उसने एक परेशान नौजवान युवक को देखा।तेनालीराम ने उसके पास जाकर उसकी परेशानी का कारण पूछा तो उसने सारी बात बता डाली। तेनालीराम ने उसे काम देने का वादा कर लिया लेकिन उसके सामने एक शर्त रख दी।


उसने तेनालीराम से शर्त के बारे में पूछा।


तेनालीराम बोला, “मैं जिससे कहूँ तुम्हे उस लड़की से शादी करनी पड़ेगी।”


वह युवक तैयार हो गया।


महूर्त के अनुसार उसका विवाह हो गया। चांदकुमारी को विदा करते समय उसकी माँ ने उसे भी अपने पति को रोज़ जूते मारने की सलाह दी। चमेली बोली, “ बेटी मैंने तेरे पिता को अपने वश में कर रखा है। अगर तू भी अपने पति को अपने वश में रखना चाहती है तो तू अपने पति को सात की जगह रोज़ पंद्रह जूते मरना।”


चांदकुमारी ने अपनी माँ की बातों पर हामी भर दी।अब जैसे ही बेटी चल दी तो चमेली ने माधो को उसके साथ जाने के लिए कहा। बेचारा माधो अपनी बेटी के साथ उसके ससुराल चला गया।चांदकुमारी ने ससुराल आकर देखा की तेनालीराम और उसके पति का स्वभाव तो बहुत अक्खड़ है। वह उनसे डरकर रहने लगी लेकिन वह फिर भी अपने पति को जैसे -तैसे रोज़ पंद्रह जूते मार ही देती थी।


वही जब तेनालीराम ने माधो का टूटा बदन देखा तो वह समझ गया की यह जरुर सब उसकी पत्नी की वजह से ही ऐसा है। तब तेनालीराम ने माधो को चार – पांच महीने अपने पास रखकर उसे मोटा – तगड़ा कर दिया और फिर उसे अपने घर जाने को कहा।


जब माधो चलने लगा तो तेनालीराम ने उसे एक मोटा सा लोहा चढ़ा डंडा देते हुए कहा, “ डरने से कुछ नहीं होगा ,यह सब तुम्हारी ही कमी है अगर तुम पहले से ही कठोर बनकर रहते तो ऐसा कभी नहीं होता।”


तेनालीराम की बात सुनकर माधो अच्छे से समझ चूका था कि तेनालीराम क्या कहना चाहता है।


डंडा लेकर माधो अपने घर पहुँच गया। माधो को घर देखकर चमेली बहुत खुश हो गई। उसने पहले तो माधो का अच्छी तरह स्वागत किया और फिर उसे पीढ़े पर बिठाकर जूता लेने चली गई। वह मन ही मन बहुत खुश थी कि अब तो उसका पति मोटा हो गया है और वैसे भी मैंने कितने महीने से उसे जूते से नहीं मारा।अब तो जूते मरने में बहुत ही मज़ा आएगा।


जैसे ही वो जूता लाकर माधो को मरने चली तो माधो ने उसे डंडे से पीटना शुरू कर दिया। चमेली जोर – जोर से चिल्लाने लगी।जिसकी वजह से आसपास के लोग वहाँ आ गए और जैसे – तैसे उसे पीटने से बचाया।उसके बाद से उसने कभी भी माधो को नही मारा और अब वह जैसा कहता चमेली वैसा ही करती। अपने पति का ये रूप देखकर चमेली ने अपनी बेटी भी समझा दिया कि ज़िन्दगी में वो ऐसी गलती कभी ना करे। हमेशा अपने पति की बात माना करे।


महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...