Sunday, May 12, 2024

मोस्ट वॉन्टेड मानव तस्कर तक पहुंचने की कहानी

 पूर्व सैनिक रॉब लॉरी, जो शरणार्थियों के लिए काम करते हैं, उनके साथ मैं 'स्कॉर्पियन' नाम से पहचाने जाने वाले शख़्स को ढूंढने और उससे सवाल करने निकली थी.


स्कॉर्पियन यानी बिच्छू.



उनके गैंग ने कई सालों तक नावों और लॉरी के ज़रिये इंग्लिश चैनल के पार मानव तस्करी के धंधे पर क़ब्ज़ा जमाया था.


साल 2018 से अब तक नाव के जरिए इंग्लिश चैनल पार करते वक़्त 70 से ज़्यादा प्रवासियों की मौत हो चुकी है. पिछले महीने फ्रांसीसी तट पर पांच लोग मारे गए, इनमें सात साल की एक बच्ची भी थी.



ये एक ख़तरनाक यात्रा है, लेकिन तस्करों के लिए ये लुभावनी हो सकती है. इंग्लिश चैनल नाव से पार कराने के लिए तस्कर हर प्रवासी से 6 हज़ार पाउंड (क़रीब 6 लाख 27 हज़ार रुपये) लेते हैं.


साल 2023 में क़रीब 30 हज़ार लोगों ने इंग्लिश चैनल पार करने की कोशिश की थी. इससे आप मुनाफ़े का अंदाजा लगा सकते हैं.


उत्तरी फ्रांस के एक प्रवासी कैंप में हमारी मुलाक़ात एक बच्ची से हुई थी, इसी मुलाक़ात के बाद हमारी दिलचस्पी स्कॉर्पियन में बढ़ी.


वो छोटी बच्ची एक डोंगी में सवार होकर इंग्लिश चैनल पार करने की कोशिश में लगभग मरने ही वाली थी.


वो डोंगी समंदर में यात्रा करने के योग्य नहीं थी. वो सस्ती थी, बेल्जियम से सेकेंड हैंड खरीदी गई थी और उस पर 19 लोग सवार थे, जिनके पास लाइफ़ जैकेट्स भी नहीं थे.


ब्रिटेन में पुलिस जब अवैध प्रवासियों को पकड़ती है तो उनके मोबाइल ले लेती है और जांच करती है. साल 2016 से ही प्रवासियों के मोबाइल में एक नंबर था जो बार-बार दिखता था.


इसे अक्सर 'स्कॉर्पियन' नाम से सेव किया गया था. कई मोबाइल में इसे बिच्छू की तस्वीर के साथ सेव किया गया था.


ब्रिटेन की नेशनल क्राइम एजेंसी (एनसीए) में सीनियर इन्वेस्टिगेशन ऑफ़िसर मार्टिन क्लार्क ने बताया कि धीरे-धीरे पुलिस को पता चल गया कि 'स्कॉर्पियन' नाम से एक कुर्दिश इराक़ी शख़्स बरज़ान मजीद को संबोधित किया जा रहा है.




कौन है ये 'स्कॉर्पियन'?

साल 2006 में जब मजीद 20 साल के थे तब उन्हें एक लॉरी में छिपाकर इंग्लैंड लाया गया था. बाद में उन्हें ब्रिटेन से बाहर करने का फ़ैसला सुनाया गया लेकिन इसके बावजूद वो कई साल तक ब्रिटेन में रहे. कुछ साल उन्होंने बंदूक और ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए जेल में बिताए.


आख़िरकार साल 2015 में उन्हें इराक़ भेज दिया गया. इसके कुछ समय बाद ही ऐसा पता चला कि मजीद को अपने बड़े भाई से मानव तस्करी का कारोबार मिल गया. उनका बड़ा भाई तब बेल्जियम की जेल में सज़ा काट रहा था.


मजीद को ही बाद में 'स्कॉर्पियन' के नाम से जाना जाने लगा.


साल 2016 से 2021 के बीच स्कॉर्पियन के गिरोह ने ही यूरोप और यूके के बीच मानव-तस्करी के ज़्यादातर कारोबार पर दबदबा जमाए रखा था.


इंटरनेशनल पुलिस के दो साल के ऑपरेशन का नतीजा ये हुआ कि गिरोह के 26 सदस्यों को ब्रिटेन, फ्रांस और बेल्जियम की अदालतों में सज़ा सुनाई गई.


लेकिन स्कॉर्पियन बचते गए और फ़रार रहे.


उनकी गैर-मौजूदगी में बेल्जियम की एक अदालत में उन पर मुक़दमा चलाया गया. स्कॉर्पियन पर 121 लोगों की तस्करी का आरोप था. अक्टूबर 2022 में उन्हें 10 साल की जेल की सज़ा मिली और 8 लाख 34 हज़ार पाउंड का जुर्माना लगाया गया.


इस सज़ा के बाद से ही किसी को ख़बर नहीं थी कि आख़िर स्कॉर्पियन कहां हैं.


हम इस रहस्य को सुलझाना चाहते थे.



रॉब के जानकार ने हमें एक ईरानी शख़्स से मिलवाया, जिसका कहना था कि जब वो चैनल पार करने की कोशिश कर रहा था तब उसका पाला स्कॉर्पियन से पड़ा था. स्कॉर्पियन ने उस शख़्स को बताया था कि वो तुर्की में रहकर बिज़नेस चला रहे हैं.


बेल्जियम में हमने मजीद के बड़े भाई को ढूंढा, अब वो जेल से बाहर हैं. उनका भी कहना था कि स्कॉर्पियन तुर्की में हो सकता है.


यूके जाने वाले ज़्यादातर प्रवासियों के लिए तुर्की एक महत्वपूर्ण जगह है. यहां के इमिग्रेशन कानूनों की वजह से अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के देशों से तुर्की में प्रवेश के लिए वीज़ा हासिल करना आसान है.


एक गुप्त सूचना के जरिए हमें इस्तान्बुल के एक ऐसे कैफ़ै का पता चला जहां मानव-तस्करों का आना जाना लगा रहता है. बरज़ान मजीद को हाल ही में यहां देखा गया था.


हमारी शुरुआती पूछताछ अच्छी नहीं गई. हमने मैनेजर से पूछा कि क्या आप कारोबार के बारे में कुछ बता सकते हैं. पूरे कैफ़ै में सन्नाटा पसर गया.


कुछ देर बाद ही एक शख़्स हमारी टेबल पर आया और उसने अपने जैकेट के भीतर रखी बंदूक दिखाई. उसका मतलब साफ़ था कि हम ख़तरनाक लोगों के बीच थे.


हमारे अगले पड़ाव में हमें कुछ अच्छा नतीजा हासिल हुआ. हमें बताया गया कि मजीद हाल ही में कुछ सड़कों दूर एक मनी एक्सचेंज में एक लाख 72 हज़ार पाउंड जमा करने गए थे. हमने वहां अपना नंबर छोड़ दिया और अगली ही रात रॉब का फ़ोन बजा.


कॉलर आईडी पर ''नंबर विदहेल्ड'' लिखा था, यानी फ़ोन करने वाले का नंबर नहीं दिख रहा था.


फ़ोन करने वाले शख़्स ने दावा किया कि वो बरज़ान मजीद ही है.


बहुत देर हो चुकी थी और इसकी आशा नहीं थी, वक्त भी नहीं था कि कॉल को शुरुआत से रिकॉर्ड किया जाए. रॉब उस बातचीत को याद करते हुए बताते हैं, ''सामने से कहा गया- 'मैंने सुना है कि तुम मुझे ढूंढ रहे हो.' मैंने पूछा, 'कौन हैं आप? स्कॉर्पियन?' जवाब आया, 'हां, तुम मुझे इसी नाम से बुलाना चाहते हो, चलो ठीक है.'''


कोई भी ऐसा रास्ता नहीं था जिससे हम ये जान सकें कि ये असली बरज़ान मजीद हैं या नहीं, लेकिन जो जानकारी उस शख़्स ने दी, वो हमारी जानकारी से मेल खाती थी.


उस शख़्स ने कहा कि साल 2015 में निर्वासित किए जाने तक वो नॉटिंगम में रह रहा था. लेकिन उसने तस्करी के धंधे में शामिल होने की बात से इनकार कर दिया.


उसने कहा, ''ये सही नहीं है, ये बस मीडिया की फैलाई बातें हैं.''


लाइन बार-बार कट रही थी. उसने इस बात की जानकारी नहीं दी कि वो कहां से बात कर रहा है.





वो शख़्स दोबारा कॉल कब करेगा या नहीं करेगा, इस बात की हमें कोई जानकारी नहीं थी. इस बीच, रॉब के एक स्थानीय जानकार ने बताया कि स्कॉर्पियन अब तुर्की से ग्रीस और इटली में प्रवासियों की तस्करी कर रहा था.


जो हमने सुना वो परेशान करने वाला था. क़रीब 12 लोगों को ले जाने के लिए लाइसेंस हासिल करने वाली नावों पर 100 से ज़्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को बैठाया जा रहा था.


ये नाव ऐसे तस्कर चलाते थे, जिनके पास नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं होता था और तटरक्षक दल से बचने के लिए ये ख़तरनाक रास्ते से नाव को ले जाते थे.


ये लोग बहुत सारा पैसा कमा रहे थे. ऐसा कहा जाता है कि हर एक व्यक्ति को इस नाव से जाने के लिए 10 हज़ार यूरो देने होते हैं.


पिछले 10 साल में सात लाख 20 हज़ार से ज्यादा लोगों ने भूमध्य सागर को पार करके यूरोप में जाने की कोशिश की. क़रीब 2,500 लोगों मौत हो गई, ज़्यादातर लोग डूबने से मरे.


चैरिटी एसओएस मेडिटेरेनियन की जूलिया शेफ़रमेयर कहती हैं कि तस्कर लोगों की ज़िंदगियों को ख़तरे में डालते हैं. ''लोग मरें या ज़िंदा रहें, इससे उन लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.''


अचानक एक बार फिर उसकी कॉल आई. अब हमारे पास 'स्कॉर्पियन' से सीधे सवाल करने का वक्त था.


एक बार फिर स्कॉर्पियन ने तस्कर होने से इनकार किया. हालांकि, तस्कर शब्द के लिए उनकी परिभाषा किसी ऐसे शख़्स से थी, जो शारीरिक रूप से मौजूद होकर ये काम करता है, न कि ऐसा व्यक्ति जो इससे जुड़ा हुआ है.


उनका कहना था, "आपको वहां रहना होता है. अब भी मैं वहां नहीं हूं."


मजीद का कहना था कि वो बस ''पैसे वाले आदमी'' हैं.


मजीद भी डूबे हुए प्रवासियों के लिए थोड़ी सहानुभूति दिखाते हैं.


उनका कहना था, ''ऊपर वाले को पता होता है कि आपको कब जाना है, लेकिन ये कभी-कभी आपकी ग़लती होती है. ऊपर वाले ने कभी नहीं कहा कि जाओ उस नाव में बैठ जाओ.''




इराक़ में है स्कॉर्पियन''

हमारा अगला पड़ाव मार्मारिस का एक रिज़ॉर्ट था. तुर्की की पुलिस का मानना था कि यहां स्कॉर्पियन का एक विला है. हमने आसपास बात की और हमें एक कॉल आई, एक महिला की, जिनका कहना था कि उनकी स्कॉर्पियन से जान पहचान है.


वो जानती थीं कि मजीद लोगों की तस्करी में शामिल हैं. उनका कहना था कि इससे स्कॉर्पियन को तनाव होता है लेकिन उन्हें प्रवासियों से ज़्यादा पैसों की चिंता है.


वो कहती हैं, ''उसे उनकी परवाह नहीं. ये सच में दुखद है ना? ये कुछ ऐसा है जिसके बारे में मैं सोचती हूं और शर्म महसूस करती हूं क्योंकि... मैंने चीजें सुनी हैं और मुझे पता है कि वो चीजें अच्छी नहीं हैं.''


इस महिला ने कहा कि उन्होंने हाल फ़िलहाल में स्कॉर्पियन को मार्मारिस के विला में नहीं देखा, हालांकि किसी ने उनसे कहा था कि स्कॉर्पियन इराक़ में है.


इस बात की पुष्टि एक दूसरे संपर्क से हुई. उसका कहना था कि उसने इराक़ के कुर्दिस्तान क्षेत्र के सुलेमानियाह शहर में एक मनी एक्सचेंज पर स्कॉर्पियन को देखा था.


हम चल पड़े. हमने तय किया कि अगर यहां हमें स्कॉर्पियन नहीं मिलता है तो हम ये सब रोक देंगे. लेकिन रॉब का कॉन्टेक्ट स्कॉर्पियन से संपर्क करने में कामयाब रहा.


शुरुआत में वो बहुत शक कर रहा था, इस बात से चिंतित लग रहा था कि हमने उसे दोबारा यूरोप ले जाने की कोई योजना बनाई है.


इसके बाद लगातार टेक्स्ट मैसेज आने लगे. पहले रॉब के कॉन्टैक्ट के ज़रिए और फिर सीधे रॉब को.


स्कॉर्पियन का कहना था कि वो हम से मिल सकते हैं, लेकिन तब जब मिलने की जगह उनकी चुनी हुई हो. हमने ये शर्त खारिज कर दी, हमें शक था कि इससे हमें फँसाया जा सकता है.


और फिर एक टेक्स्ट मैसेज आया. ये पूछते हुए, ''तुम कहां हो?''


हमने कहा कि हम पास के एक मॉल में है. स्कॉर्पियन ने हमें वहां ग्राउंड फ़्लोर पर एक कॉफ़ी शॉप में मिलने के लिए कहा.


आख़िरकार, हम स्कॉर्पियन को देख पाए.





बरज़ान मजीद एक गोल्फ़र की तरह दिखते थे. अच्छी तरह से कपड़े पहने हुए थे, नई जींस, हल्के नीले रंग की शर्ट और हाफ़ जैकेट.


जब उन्होंने अपने हाथ टैबल पर रखे तो मैंने देखा कि उनके नाखून मैनीक्योर किए हुए थे.


इस बीच, तीन और लोग बगल की सीट पर आकर बैठे. हमारा अनुमान था कि ये लोग उनकी सिक्योरिटी टीम के थे.


एक बार फिर उन्होंने किसी बड़े आपराधिक संगठन के टॉप पर बैठा हुआ शख़्स होने से इनकार कर दिया.


उनका कहना था कि दूसरे गैंग के लोग उन्हें फंसाने की कोशिश कर रहे हैं.


वो कहते हैं, ''कुछ लोग जब गिरफ़्तार होते हैं तो कहते हैं कि हम उसके लिए काम करते हैं, ताकि उन्हें कम सजा मिले.''


उन्हें ये बात भी ख़राब लग रही थी कि कुछ तस्करों को ब्रिटिश पासपोर्ट मिले हुए थे और वो अपना कारोबार कर रहे थे.


बरज़ान का कहना था, ''तीन दिनों में एक शख़्स ने 170 या 180 लोगों को तुर्की से इटली भेजा, उसके पास अब भी ब्रिटिश पासपोर्ट है. लेकिन मैं किसी दूसरे देश में कारोबार करने जाना चाहता हूं लेकिन नहीं जा सकता.''


जब हमने उन पर प्रवासियों की मौत की ज़िम्मेदारी को लेकर दबाव डाला तो उनका वही कहना था जो उन्होंने फ़ोन पर कहा था कि मैं बस पैसे लेता हूं और जगह बुक करता हूं.


उनके हिसाब से, तस्कर वो है जो लोगों को नाव और लॉरियों पर चढ़ाता है और उन्हें ले जाता है. ''मैंने किसी को नाव पर नहीं चढ़ाया और न ही किसी को मारा है.''


बातचीत ख़त्म हो गई लेकिन स्कॉर्पियन ने रॉब को सुलेमानियाह में उस मनी एक्सचेंज को दिखाने के लिए आमंत्रित किया जहां से वो काम करते थे.


ये एक छोटा ऑफ़िस था, वहां अरबी में खिड़की पर कुछ लिखा हुआ था और कुछ मोबाइल नंबर लिखे हुए थे.


लोग यहां पर यात्रियों के लिए पैसे जमा करने आते थे. रॉब ने बताया कि जब वो वहां थे तो उस समय एक शख़्स बक्से में भरकर कैश लेकर आया था.





मानव तस्करी की बात से लगातार इनकार

इस मौके़े पर स्कॉर्पियन ने बताया कि कैसे वो साल 2016 में इस कारोबार में आए. ये वो दौर था, जब हज़ारों लोग यूरोप जा रहे थे.


स्कॉर्पियन का कहना था, ''उन्हें किसी ने मजबूर नहीं किया, वो जाना चाहते थे. वो तस्करों से भीख मांग रहे थे कि कृपया हमारे लिए ये काम कर दो. कभी कभी तस्कर कहते हैं, 'सिर्फ़ ऊपरवाले के लिए वो मदद करेंगे.' फिर वो शिकायत करते थे, 'अरे ये नहीं वो नहीं... ये सच नहीं है.''


स्कॉर्पियन ने बताया कि साल 2016 से 2019 के बीच वो बेल्जियम और फ्रांस में ऑपरेशन का नेतृत्व करने वाले दो अहम लोगों में से एक थे. उन्होंने लाखों डॉलर की हेराफेरी की बात मानी. उन्होंने कहा, ''मैंने उनके साथ कई तरह का काम किया. पैसा, स्थान, यात्री, तस्करी... मैं इन सब चीज़ों में था.''


इसके बाद भी वो मानव-तस्करी की बात से इनकार करते रहे, लेकिन उनके काम उनकी बात से मेल नहीं खा रहे थे.


स्कॉर्पियन को इस बात का अहसास नहीं हुआ कि जब वो अपने फोन को स्क्रॉल कर रहे थे, रॉब ने पीछे की पॉलिश की हुई दीवार पर उनके मोबाइल की स्क्रीन देखी.


रॉब ने मोबाइल में पासपोर्ट नंबरों की लिस्ट देखी. हमें बाद में पता चला कि तस्कर इन्हें इराक़ी अधिकारियों को भेजेंगे. बाद में उन्हें ग़लत वीज़ा जारी करने के लिए रिश्वत दी जाएगी ताकि वो लोग तुर्की जा सकें.


वो आख़िरी मौक़ा था जब हमने स्कॉर्पियन को देखा था.


हर चरण में हमने अपनी जानकारी ब्रिटेन और यूरोप के अधिकारियों के साथ साझा की है.


स्कॉर्पियन को दोषी ठहराने में शामिल बेल्जियम की पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एन लुकोविआक को अब भी उम्मीद है कि स्कॉर्पियन को एक दिन इराक़ से प्रत्यर्पित किया जा सकेगा.


वो कहती हैं, ''इस बात का संकेत देना ज़रूरी है कि आप वो सब नहीं कर सकते, जो आप करना चाहते हैं. हम उसे ले आएंगे.''






दूध से भागने वाली बिल्ली : गोनू झा

 मिथिला में एक बार चूहों की संख्या इतनी बढ़ गई कि लोगों का जीना हराम हो गया । चूहे खेत- खलिहान में उत्पात मचाते । धान की कोठियों में बिल बनाते । चौका में उछल-कूद करते । राजमहल भी चूहों की आमद का शिकार हो गया था । एक रात चूहे ने महाराज की पगड़ी कुतर डाली और सुबह जब महाराज ने अपनी पगड़ी की हालत देखी तो उन्हें बहुत गुस्सा आया ।


उसी दिन महाराज ने बड़ी तादाद में बिल्लियाँ मँगाईं । अपने राज्य के समस्त परिवार को एक- एक बिल्ली पालने का हुक्म दिया । गरीब प्रजा इस फरमान के विरुद्ध खड़ी हो गई । दरबार में इस समस्या पर विचार-विमर्श हुआ। महराज की चिन्ता का विषय था कि मिथिला के लोग मृदुभाषी होते हैं । विरोध या विद्रोह से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है फिर बिल्ली पालने के राजाज्ञा का उल्लंघन करने पर वे कैसे आमादा हो गए ?


निष्कर्ष निकला कि लोग अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण बहुत मुश्किल से कर पाते हैं । ऐसे में वे बिल्ली पालने के लिए दूध कहाँ से लाएँगे ?


मूल बात महाराज को भी समझ में आ गई और उन्होंने नया फरमान जारी किया कि जिन लोगों को बिल्लियाँ दी गई हैं, वे उन बिल्लियों के लालन-पालन के लिए राज्य गौशाला से एक-एक गाय ले जाएँ ।


प्रजा तक जब यह बात पहुँची तो उनमें खुशी की लहर दौड़ गई। महाराज को प्रजावत्सल कहा जाने लगा । महाराज ने खुद अपनी देख-रेख में गायों का वितरण किया । प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को, जिसे वे गाय की रस्सी थमाते, यह निर्देश भी देते कि बिल्ली को दूध देने में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। अगले साल राज्य में बिल्लियों की प्रतियोगिता कराई जाएगी । जिसकी बिल्ली बहुत मजबूत होगी, मोटी और सुन्दर, उस व्यक्ति को पारितोषिक प्रदान किया जाएगा । इसके विपरीत जिस व्यक्ति की बिल्ली कमजोर होगी उसे दंडित किया जाएगा ।


गोनू झा को भी बिल्ली दी गई थी । गोनू झा भी अपने साथ गाय लेकर घर पहुँचे। शाम को गाय दूहकर उन्होंने भरी बाल्टी अपनी पत्नी को थमाई और कहा कि एक कटोरा दूध खूब गर्म करके लाओ।


पंडिताइन ने दूध उबालकर कटोरा में भरा और आँचल से कटोरा पकड़े हुए गोनू झा के पास आई और उनके पास कटोरा रख दिया ।



गोनू झा बिल्ली के बच्चे को गोद में लिए बैठे थे। दूध की गन्ध पाकर बिल्ली के बच्चे ने उनकी गोद से निकलने की कोशिश की । गोनू झा ने बिल्ली के बच्चे का सिर अपनी अँगुलियों से पकड़ लिया और बोले-“दूध पीओ।” इतना कहकर उन्होंने बिल्ली के बच्चे का मुँह दूध से भरे कटोरे में सटा दिया । बिल्ली गर्म दूध होने के कारण छटपटाकर गोनू झा के हाथ से निकलने की कोशिश करने लगी । गोनू झा ने बिल्ली के बच्चे को पुचकारकर शान्त किया और फिर दूध पीओ कहकर उसका मुँह गर्म दूध में डुबोकर निकाल लिया । इस बार बिल्ली का बच्चा अपनी पूरी ताकत से गोनू झा के हाथ से निकलने की कोशिश करने लगा । उसके पंजों से गोनू झा के हाथ में कई स्थानों पर खरोंचे भी आ गईं । गोनू झा ने बिल्ली के बच्चे को अपने हाथ से निकल जाने दिया ।


एक हफ्ते तक गोनू झा अपने ढंग से बिल्ली के बच्चे को दूध पिलाने के लिए खूब गर्म दूध मँगाते और वही क्रिया दुहराते। स्थिति यह हो गई कि बिल्ली का बच्चा 'दूध' शब्द सुनते ही डरकर दुबक जाता । दूध की कटोरी पड़ी रहती मगर उसकी ओर देखता तक नहीं ।


थोड़े ही दिनों में गोनू झा ने अपनी बिल्ली को चूहों के शिकार के लिए प्रेरित करना शुरू किया । स्थिति यह हुई कि चूहा देखते ही गोनू झा की बिल्ली उस पर झपट पड़ती और अपने पंजों में दबोचकर उसके साथ खिलवाड़ करती और अन्ततः उससे अपनी क्षुधापूर्ति करती । दूध की ओर जाना तो दूर, उसकी ओर देखना तक इस बिल्ली को गँवारा न था ।


गोनू झा रोज गाय का दूध पीते । दही खाते । मलाई खाते। दूध के तरह-तरह के पकवान उनके घर में बनते रहते थे।


दूसरी तरफ गाँव के लोगों में होड़-सी मची थी कि किसकी बिल्ली ज्यादा दमदार दिखती है । अपनी बिल्ली के साज-सँवार में ये लोग जितना ध्यान दे रहे थे, कभी उतना ध्यान अपने बच्चों की परवरिश पर भी इन लोगों ने नहीं दिया था ।


गाँव में प्रायः चर्चा होती रहती थी कि अमुक व्यक्ति की बिल्ली बहुत सुन्दर है। अमुक की बिल्ली के म्याऊँ बोलने का अन्दाज बहुत प्यारा है । अमुक की बिल्ली बड़ी ढीठ है तो अमुक की बिल्ली बड़ी चपल है ।


लोग अपनी बिल्ली को नहला-धुलाकर घंटों उसके रोओं को तरह-तरह का उपक्रम करके चमकाने में लगे रहते । उनमें से कुछ तो अपनी बिल्ली को नहलाने के बाद कंघी करने में लगते ।


दूध को गाढ़ा होने तक उबाला जाता ताकि बिल्ली जो दूध पीए, वह ज्यादा पौष्टिक हो । कहने का तात्पर्य यह कि लोग अपना कम और बिल्लियों का खयाल ज्यादा रख रहे थे। ग्रामीणों में इस बात की खुशी थी कि गोनू झा की बिल्ली पिलपिल ही है। बीमार- सी दिखती है। लोग फुसफुसाकर आपस में बातें भी करते थे कि गोनू झा खुद गाय का दूध पी जाते हैं, बिल्ली बेचारी तो इधर-उधर मुँह मारकर गुजारा करती है । ग्रामीणों को विश्वास था कि इस बार गोनू झा इस बिल्ली वाले मसले पर जरूर राजदण्ड के भागी बनेंगे ।




इसी तरह एक साल बीत गया ।


एक दिन महाराज ने मुनादी करा दी कि शरद पूर्णिमा के दिन सभी ग्रामीण अपनी अपनी बिल्ली के साथ राज -उद्यान में उपस्थित हों ।


देखते-देखते शरद पूर्णिमा का दिन भी आ गया । राज-उद्यान में ग्रामीण अपनी बिल्लियों के साथ उपस्थित हुए । महाराज ने ग्रामीणों के पास जा -जाकर उनकी बिल्लियाँ देखीं । सहलाईं । प्यार किया और आगे बढ़ते गए । उन्हें प्रसन्नता हो रही थी कि उनके राज्य में अब बिल्लियों की कमी नहीं है । राज्य से चूहों का सफाया होना निश्चित है ।


गोनू झा सबसे अलग अपनी बिल्ली के साथ एक किनारे खड़े थे। जब महाराज उनके पास पहुँचे तो चौंक गए – “अरे, यह क्या पंडित जी ! बिल्ली बीमार है क्या ?" उन्होंने गोनू झा से पूछा ।


“नहीं, महाराज! बिल्ली स्वस्थ है, मगर यह दूध नहीं पीती।"


गोनू झा का यह उत्तर सुनकर महाराज तैश में आ गए। तुरन्त एक कटोरी दूध मँगाई। दूध देखते ही गोनू झा की बिल्ली गोनू झा की गोद से जबरन छटपटाकर निकली और छलाँग लगाकर दूसरी ओर महाराज के बैठने के लिए रखे आसन के पास जाकर छुप गई। महाराज को विश्वास हो गया कि गोनू झा की बिल्ली दूध नहीं पीती ।


दूसरे ही क्षण गोनू झा ने महाराज से कहा-“महाराज ! मेरी बिल्ली में वे तमाम गुण हैं जो एक बिल्ली में होने चाहिए । यह चूहे का शिकार करने में बहुत कुशल है। इतनी कुशल कि यहाँ उसके मुकाबले में कोई बिल्ली नहीं है। महाराज ! मेरी विनती है कि आप सभी सज्जनों से अपनी बिल्ली छोड़ देने के लिए कहें । मेरे पास एक पिंजड़े में कई चूहे बन्द हैं, मैं उन्हें खोलता हूँ।”


महाराज ने सबको बिल्लियाँ छोड़ देने के लिए कहा। सबकी बिल्ली जमीन पर रखी गई । गोनू झा ने चूहेदानी का मुँह खोल दिया । सभी देखते रह गए। बिजली जैसी तेजी से गोनू झा की बिल्ली ने ताबड़ -तोड़ सारे चूहे मार डाले। अन्य लोगों की बिल्लियाँ दूध से अघाई ; अपने स्थान पर अलसाई हुई पड़ी रहीं ।


गोनू झा ने कहा “महाराज ! राज्यहित में यही है कि बिल्ली ऐसी हो जो चूहों को मार सके।"


महाराज गोनू झा के तर्क से प्रसन्न हो गए और उस वर्ष बिल्ली पालन का पारितोषिक गोनू झा को ही प्राप्त हुआ ।


पाकिस्तान और चीन के छूटेंगे पसीने; भारत का ये है प्लान पाकिस्तान और चीन को करारा जवाब देने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। विश्वसनीय सूत्रों ने बताया है कि ईरान और भारत के बीच महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह समझौते पर हस्ताक्षर होंगे। इसके लिए केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल सोमवार को ईरान के लिए रवाना हो गए है। बता दें कि इस समझौते के बाद भारत एक दशक के लिए चाबहार बंदरगाह का प्रबंधन संभालेगा।

 पाकिस्तान और चीन की टेंशन बढ़ाने के लिए भारत सोमवार को ईरान के साथ चाबहार पोर्ट के प्रबंधन से जुड़े समझौते पर मुहर लगाएगा। इसके लिए केंद्रीय बंदरगाह और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल सोमवार को ईरान के लिए रवाना हो गए है। 





जानकारी के लिए बता दें कि इस समझौते के बाद भारत अगले 10 सालों तक चाबहार बंदरगाह का प्रबंधन संभालेगा। यह रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक कराची के साथ-साथ पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाहों को दरकिनार करते हुए, ईरान के माध्यम से दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच एक नया व्यापार मार्ग खोलेगा। कनेक्टविटी के मामले में अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशियन क्षेत्रों के बीच चाबहार पोर्ट काफी अहम साबित होगा। 


भारत के लिए बड़ी उपलब्धि 

चाबहार पोर्ट ऑपरेशंस का अनुबंध इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती समुद्री पहुंच की एक और बड़ी उपलब्धि होगी। शिपिंग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने ठीक एक साल पहले -मई 2023 में म्यांमार में सिटवे बंदरगाह का उद्घाटन किया था। बता दें कि दोनों का ही उद्देश्य क्षेत्र में बढ़ती चीनी उपस्थिति को बेअसर करना है। 




भारत का लक्ष्य सीआईएस (स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल) देशों तक पहुंचने के लिए चाबहार बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के तहत एक ट्रांजिट हब बनाना है। INSTC भारत और मध्य एशिया के बीच माल की आवाजाही को किफायती बनाने का भारत का विजन है। चाबहार बंदरगाह इस क्षेत्र के लिए एक कमर्शियल ट्रांजिट सेंटर के रूप में काम करेगा। 


जानकारी के लिए बता दें कि आईएनएसटीसी एक मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्टेशन रूट है जो हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के माध्यम से कैस्पियन सागर और रूस में सेंट पीटर्सबर्ग के माध्यम से उत्तरी यूरोप तक जोड़ता है।



इस जनवरी की शुरुआत में, विदेश मंत्री एस जयशंकर और ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने चाबहार बंदरगाह विकास योजना सहित ईरान-भारत समझौतों के कार्यान्वयन में तेजी लाने और अधिक क्षतिपूर्ति करने पर चर्चा की थी।



महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...