Friday, June 30, 2023

बदलते रिश्तो की दास्तान | मतलबी रिश्ते – सत्य घटना पर आधारित🥲कब आपको अपने ही किस मोड़ पे धोखा दे दे, ये आप सोच नहीं सकतें।

 ये कहानी हमारे सोसाइटी में रहने वाले एक व्यक्ति कि है। जिनको मै बचपन से अपने सोसाइटी में रहते देख रहा हूँ। एक ही सोसाइटी में रहते रहते मै उनको अच्छे से जनता हु। मेरा और उनका मिलना जुलना भी होता है। जो अब बूढ़े हो चुके है, ये बात पच्चीस साल पहले कि जब वह व्यक्ति गाव से अपने बड़े भाई के पास मुंबई रहने के लिए आये थे। उनके बड़े भाई अपने परिवार के साथ मुंबई में रहते थे जिसमे उनकी पत्नी और दो बेटे थे। दोनों बेटो कि उम्र पांच छह साल के आस पास ही थी।


कम पढ़ा लिखें होने कि वजह से उस व्यक्ति को कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल रही थी। बहुत कोशिश किया उन्होंने लेकिन उन्हें कोई भी नौकरी नहीं मिली और कई महीने बित गए। उनके पास जो भी पैसे थे वो भी ख़तम हो ने लगे फिर उन्होंने हिम्मत करके मुंबई की एक सड़क के किनारे बैठकर बेल्ट और पर्स बेचने का व्यापार सुरु किया। धीरे धीरे उनका सड़क पर बेल्ट और पर्स बेचने का व्यापार चलने लगा और वो उसी काम में व्यस्त हो गए और उसी को अपना काम बना लिया। अब समय अच्छा बित रहा था उनकी जीवन कि गाड़ी पटरी पर आ गयी थी।


कुछ साल के बाद उनके बड़े भाई का देहांत हो गया। अब बड़े भाई के परिवार कि जिम्मेदारी इनके कंधो पर आ गयी। इनके व्यापार से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि जिससे वो मुंबई जैसे शहर में अपने लिए कोई निजी घर ले सके। उनके पास भी कोई और रास्ता नहीं था और बड़े भाई के परिवार जिम्मेदारी भी थी, इसलिए वे बड़े भाई के परिवार को अपनी जिम्मेदारी समजकर अच्छे से निभाने लगे, लेकिन उनकी भाभी भी जादा दिन तक नहीं रुकी वो अपने बच्चो को छोड़कर चली गयी और दूसरी शादी करी ली।


अब उन दोनों बच्चो का इनके सिवा और कोई नहीं था और बच्चे भी छोटे थे स्कूल भी जाने लगे थे। उनके लिए अकेले बच्चो को संभालना स्कूल ले जाना बड़ा मुश्किल हो रहा था। इसलिए उन्होंने अपनी शादी करने का फैसला लिया जिससे कि उन दोनों बच्चो कि अच्छे से देखभाल हो सके। और शादी करके अपनी पत्नी को भी मुंबई में ले आये और अपने भाई के घर में उन दोनों बच्चो के साथ हसी खुसी से रहने लगे।


कुछ समय बाद उनके घर एक बेटी पैदा हुई और कुछ समय के बाद उनको एक और बेटी पैदा हुई,और समय बीतता गया। अब उनके भाई के दोनों बेटे और बड़े हो गयेउन्होंने अपने भतीजो को उच्च शिक्षा दिलाई। जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी आमदनी भी लगा दी और अपने लिए कुछ भी नहीं रखा। यहाँ तक कि उन्होंने अपने लिए कोई निजी घर भी नहीं लिया यह जानते हुए भी कि जिस घर में वो रह रहे है वो उनके बड़े भाई का घर है।


पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके दोनों भतीजे नौकरी करने लगे। कुछ सालो के बाद उन्होंने अपने दोनों भतीजो कि शादी करवा दिया और उसके बाद अपने दोनों बेटियों कि भी शादी करवा दी और वो भी अपने घर चली गयी। यह सब करने क बाद उनके पास कुछ भी बचत नहीं रह गयी। अब उनके दोनों हाथ खली हो चुके थे और बूढ़े हो गए, वो तो ये सोच रहे थे कि वो अपने भतीजो के साथ अब आराम से रहेंगे और अपना जीवन व्यतीत करेंगे

उनको क्या पता जिनको वे अपना मानकर निश्चिन्त थे कि उनका बुढ़ापा आराम से कटेगा उनके साथ लेकिन उनके भतीजो के मन में तो कुछ और ही चल रहा था। लेकिन वो कहते है न कि जिंदगी में हम जैसा सोचते है वैसा होता नहीं। उनके साथ भी कुछ वैसा ही हुआ उनके भतीजे जो अब कमा रहे थे वे सिर्फ अपना फायदा देख रहे थे वे अपने चाचा से पिछा छुड़ाना चाह रहे थे और वे जानते थे कि जिस घर में वो रहते है वो घर उनके पिताजी का है उनके चाचा का नहीं।


उन्होंने एक तरकीब निकाली अपने चाचा से पीछा छुड़वाने कि, उन्होंने अपने चाचा से कहा कि चाचा अब हमारा परिवार बड़ा हो गया है हमें बड़े घर कि जरुरत है क्यों न हम बड़ा घर खरीद ले। चाचा ने कहा ठीक है खरीद लो बड़ा घर फिर उनके भतीजो ने कहा कि बड़ा घर लेने के लिए उनके पास अधिक पैसे नहीं है क्यों न हम इसी घर को बेच कर और बाकि पैसे बैंक से कर्ज लेकर बड़ा घर खरीद लेते है।


फिर उनके भतीजो ने उनको कुछ महीनो तक कई जगह ले जा कर अलग अलग जगह घर दिखाए। पुराना घर बेच दिया गया और किराये का घर ले लिया उसमे रहने लगे और चाचा से कहा कि कुछ दिनों की बात है नया घर लेते ही हम उसमे चले जायेंगे। अपने लिए कही दूर उनके भतीजो ने घर ले लिया था, और एक दिन अचानक से चाचा को बिना बताये ये लोग अपने नए घर चले गए और अपने चाचा को अकेला और असहाय छोड़कर। फिर चाचा अकेले रह गए उन्हें बहुत दुःख हुआ।


अब वो इस अवस्था में कहा और किसके पास जाये। इस कलयुग में किसी का कोई भरोसा नहीं है कोई कब दगा दे दे।

क्या है किस्मत कनेक्शन? नसीब की कहानी::अगर किस्मत ख़राब हो तो ऊँट पर बैठे बौने आदमी को भी कुत्ता काट लेता है।

 यह कहानी व्यक्ति के किस्मत के बारे में है, कि कैसे हम सब किस्मत से बंधे हुए है। किस्मत को हम अलग अलग शब्दों में नसीब, समय और प्रकृति भी कह सकते है। मेरे जीवन के अब तक के अनुभव के अनुसार जो भी मैंने इस संसार में घटित होते देखा है वह सब किस्मत या नसीब पर आधारित होता है। हम सिर्फ एक कठपुतली के सामान है इस पृथ्वी पर एक निश्चित अवधि के लिए। जीवन में हम जो भी कुछ सोचते है सबकुछ वैसा नहीं होता है, क्योकि यह संसार सिर्फ हमारे अकेले लिए नहीं है। पशु, पक्षी, जिव, जंतु सभी का इस संसार पर सामान अधिकार है। किस्मत पर एक कहावत भी है जो मुझे याद है, “अगर किस्मत ख़राब हो तो ऊँट पर बैठे बौने आदमी को भी कुत्ता काट लेता है।”


आइये मै आपको एक कहानी के माध्यम से बताता हु, जो मेरे एक मित्र के बारे में है, जिससे आपको समझ में आ जायेगा कि किस्मत क्या होती है, और किस्मत इन्सान को कहा से कहा पंहुचा सकती है।


यह बात लगभग १४ साल पहले कि है। जब मै BAMS कि पढाई करने के लिए बेलगाम गया था। बेलगाम कर्नाटक में स्थित है। वहा पर मेरी मुलाकात प्रदीप से हुई। वह अपने चाचा के साथ आया था। प्रदीप उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से है। वहा मेरी मुलाकात और दो लडको से हुई वह दोनों अपने पिताजी के साथ आये थे उनमे से एक का नाम धर्मेन्द्र था और दुसरे का नाम ज्ञानेंद्र। मै अकेला गया था, मेरे पिताजी साथ नहीं आये थे।


वहा हम चारो ने आपस में बातचीत कि एक दुसरे से जान पहचान हुई तब मुझे पता चला कि हम चारो में एक समानता यह है कि हम चारो उत्तर प्रदेश से है और मुंबई में रहते है। हम चारो एक ही राज्य के होने कि वजह से एक दुसरे पर भरोसा भी बन गया और सामान्य तौर पर ऐसा होता भी है कि जहा एक ही राज्य के लोग किसी और राज्य में मिलते है तो एक दुसरे कि मदद भी करते है और भरोसा भी करते है।


इसलिए हमने आपस में बातचीत करके उसी दिन कॉलेज से दूर एक मकान किराये पर ले लिया और साथ मिलकर रहने लगे। साथ रहते रहते हम चारो एक दुसरे को अच्छे से जानने लगे एक दुसरे के व्यवहार को भी समझने लगे और काफी अच्छी दोस्ती भी हो गयी हम चारो में। प्रदीप उन दोनों से एकदम अलग और दबंग था। प्रदीप हट्टा कट्टा था और हम तीनो दुबले पतले थे इसलिए अगर प्रदीप कभी किसी बात को लेकर भड़क जाता तो उसे संभालना हम तीनो के लिए बहुत मुस्किल हो जाता था। लेकिन प्रदीप और मुझमे बहुत सी समानताये थी हमारे विचार एक दुसरे से बहुत मिलते जुलते थे इसलिए हमारी दोस्ती बहुत गहरी हो गयी।


हम चारो एक ही राज्य के होने कि वजह से एक दुसरे पर भरोसा भी बन गया और सामान्य तौर पर ऐसा होता भी है कि जहा एक ही राज्य के लोग किसी और राज्य में मिलते है तो एक दुसरे कि मदद भी करते है और भरोसा भी करते है। इसलिए हमने आपस में बातचीत करके उसी दिन कॉलेज से दूर एक मकान किराये पर ले लिया और साथ मिलकर रहने लगे। साथ रहते रहते हम चारो एक दुसरे को अच्छे से जानने लगे एक दुसरे के व्यवहार को भी समझने लगे और काफी अच्छी दोस्ती भी हो गयी हम चारो में। प्रदीप उन दोनों से एकदम अलग और दबंग था। प्रदीप हट्टा कट्टा था और हम तीनो दुबले पतले थे इसलिए अगर प्रदीप कभी किसी बात को लेकर भड़क जाता तो उसे संभालना हम तीनो के लिए बहुत मुस्किल हो जाता था। लेकिन प्रदीप और मुझमे बहुत सी समानताये थी हमारे विचार एक दुसरे से बहुत मिलते जुलते थे इसलिए हमारी दोस्ती बहुत गहरी हो गयी।


धीरे धीरे मै प्रदीप के बारे में मै सबकुछ जान गया उसके चाचा से भी मिला, प्रदीप के मुंबई वाले घर पर भी गया सबकुछ देखा काफी अच्छा लगा और उत्तर प्रदेश गया तो प्रदीप के पिताजी से भी मिला वो भी अच्छे है। प्रदीप के पिताजी एक किसान है जो गाव में ही रहकर खेती करते है। उनकी आमदनी अधिक नहीं थी लेकिन प्रदीप के दो चाचा जो मुंबई में रहते है उनकी आमदनी अच्छी थी और प्रदीप कि किस्मत भी अच्छी थी इसलिए प्रदीप को उसके चाचा ने डॉक्टर बनाने कि सोची। वर्ना आज के समय में एक किसान के लिए अपने बेटे को निजी कॉलेज डॉक्टर कि पढाई करवाना आसान नहीं है। ये सब किस्मत से ही हो सकता है। घर में बड़ा होने के कारण प्रदीप को उसके चाचाओ से बहोत प्यार और दुलार मिला वो उनका लाडला भी था इसलिए वो प्रदीप को स्कूल कि छुट्टियों में मुंबई घुमाने के लिए लाते रहते थे। गाव से प्रदीप को बारहवी कि पढाई पूरी करने के बाद मुम्बई लेकर आये।


मेडिकल कॉलेज का पता किया और मेडिकल कॉलेज में दाखिला करवाया बेलगाम में वह जाकर रहने खाने कि व्यवस्था सबकुछ किया। प्रदीप के कॉलेज के एक साल के बाद प्रदीप के लिए अस्पताल खोलने के लिए अपने गाव में जमीन भी खरीद लिया और प्रदीप के पढाई पूरा करते ही उस जमीन पर एक बड़ा सा अस्पताल भी बनवा कर दिया जो उन्होंने पहले से ही अस्पताल के लिए ख़रीदा था। साथ ही एक बड़ी गाडी और ड्राइवर भी दिया आने जाने के लिए। सबकुछ पहले से तैयार मिला प्रदीप को इसको किस्मत ही कहते है वर्ना कई डॉक्टर को भी अपना निजी अस्पताल खोलने में पूरी उम्र बीत जाती है। आज प्रदीप भी अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभा रहा है अस्पताल अच्छे से चला रहा है। अपने अस्पताल में बहुत सी सुविधाए दे रहा है। मरीजो कि लम्बी कतारे लगी रहती है। शादी कर लिया एक बेटा भी है। एक और बड़ी सी गाड़ी ले लिया है। जीवन का आनंद ले रहा है। यह सब किस्मत से ही संभव है। जिसकी किस्मत जहा होती है वह वहा पहुच ही जाता है।

सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग | Sabse Bada Rog Kya Kahenge Logदुनिया को छोड़ो पहले उसे खुस रखो जिसको तुम रोजाना आईने में देखते हो।

 लोगो का क्या है वो कुछ कुछ न कुछ बोलते ही रहेंगे। कुछ करो तब भी बोलेंगे और कुछ न करो तब भी बोलेंगे।


कुछ तो लोग कहेंगे, लोगो का काम है कहना, छोडो बेकार कि बाते कही बीत न जाए रैना। इसलिए सुनो सबकी और करो अपने मन कि जो आपका दिल कहे लेकिन आपकी वजह से किसी को कष्ट न पहुचे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।


मनुष्य का स्वभाव ऐसा है की वह अपने आप को न देख कर दुसरो की ओर पहले देखता है की लोग क्या कह रहे है उसके बारे में?, क्या बाते करते है उसके और उसके काम के बारे में? मनुष्य जब भी कुछ नया करने जाता है तो वह पहले ये सोचने लगता है की लोग क्या कहेंगे। इसी कारण वह बहोत सारे काम छोड़ देता है लोगो के डर से।


यह कहना गलत नहीं होगा की हमारे समाज में ऐसे कुछ दोगले इंसान बस्ते है जिनका काम सिर्फ दुसरो की पैरो की ज़ंजीर बनना होता हैं। वे स्वयं तो कोई कार्य करते तो नहीं है पर जब कोई दूसरा व्यक्ति करने जाता है तो सवाल खड़े करने लगते है ताने मारने लगते है जैसे की अगर किसी दूसरे की बहु नौकरी करने लगे तो उसके काम करने पे ऐतराज जताने लगते है, पहनावे पे उल्टी उल्टी बाते करने लगते है।


गलती उनकी नहीं है जो कमेंट पास करते है बल्कि गलती तो उनकी है जो उनकी बातो में आकर अपना काम नहीं करते है और स्वयं का नुक्सान कर बैठते है। चलिये एक उदाहरण के माध्यम से समझाता हूँ।


बहुत समय पहले कि बात है। एक गॉंव में एक परिवार रहता था, जिसमे एक बाप और बेटे रहते थे। जिनके पास एक गधा था, जिसपर वे सामान लादकर ले जाते आते थे। एक बार वह बाप बेटे किसी काम से अपने गधे को लेकर बाज़ार जा रहे थे। बाप बेटे दोनों पैदल ही जा रहे थे और गधे पर कोई सामान भी नहीं रखा था गधा भी आराम से चल रहा था।


क्यू न हम इस गधे पर बैठ कर शहर जाए। फिर सोचने लगे कि अब इसपर बैठेगा कौन? फिर उस आदमी ने अपने बेटे को उस गधे पर बिठा दिया और चलने लगे। फिर कुछ दूर जाने पर रस्ते में कुछ लोग फिर कहने लगे कि देखो कितना स्वार्थी बेटा है खुद गधे पर बैठकर आराम से जा रहा है और बुढा बाप पैदल जा रहा है इसको अपने बाप कि बिलकुल भी चिंता नहीं है।


यह सब सुनने के बाद वह बाप और उसका बेटा फिर आपस में बात करने लगे और सोचने लगे कि अब क्या किया जाए लोग बोल रहे है। तभी कुछ देर सोचने के बाद बेटा गधे पर से उतर जाता है और उसका बाप उस गधे पर बैठ जाता और फिर वे बाज़ार कि तरफ जाने लगते है।


कुछ दुरी तय करने के बाद और कुछ लोग उन्हें रास्ते में मिलते है और वे बोलते है कि देखो कितना स्वार्थी बाप है, देखो खुद तो मजे से गधे पर बैठकर जा रहा है और बेटे को पैदल लेकर जा रहा है इसे अपने बेटे कि बिलकुल चिंता नहीं है। यह सब सुनने के बाद वे दोनों फिर आपस में बाते करते है और कुछ सोचने लगते है थोड़ी देर सोचने के बाद वे दोनों बाप और बेटे गधे पर बैठ कर बाज़ार कि ओर जाने लगते है।


और कुछ दूर जाने के बाद फिर से कुछ लोग रास्ते में दीखते है और बोलते है कि देखो ये कितने स्वार्थी लोग इन्हें इस बेजुबान गधे पर बिलकुल भी दया नहीं आ रही है दोनों इसपर बैठ कर जा रहे है। ये बिचारा गधा कैसे इनका बोझ लेकर जा रहा है। यह बात सुनकर बाप और बेटे दोनों गधे से उतर जाते है और फिर से पैदल चलने लगते है।

प्यार से उम्मीद और सच्चाई। क्यों टूट रहे हैं आपके रिश्ते::/कई लडकियों को तो प्यार का झासा देकर कोठे पर बेच दिया जाता है।

 आज के समय में प्यार एक खेल एक मनोरंजन और एक टाइम पास का जरिया बन गया है। प्यार का एक चलन सा हो गया है, आज इससे कल उससे तो परसों किसी और से हो जाता है यह प्यार नहीं बल्कि एक आकर्षण होता है जो समय समय पर परिवर्तित होता है लेकिन कुछ लोग इसे प्यार समझ बैठते है और इसमें पड़कर अपना समय और जिंदगी बर्बाद कर लेते है। कई लोग तो इस प्यार में अंधे होकर अपना घर छोड़ कर भाग जाते है और कई लोग तो शादी होने के बाद भी किसी और के साथ भाग जाते है।


आज के समय में ये प्यार में घर से भागना आम बात है। आज के युवा लड़के और लडकिया इस मामले में जादा फसकर अपना जीवन बर्बाद कर लेते है और अपने पीछे अपने घरवालो को भी परेशान कर देते है। ज्यादातर लडकिया ही ऐसा करती है थोडा पढ़ लेने के बाद उनको लगता है कि उनके जैसा विद्वान् दुनिया में और कोई नहीं है वो जो कर रही है वही सही है और उनके घरवाले और बाकि दुनिया वाले गलत है उनको प्यार कि समझ ही नहीं है।


जबकि ऐसा नहीं है असली दुनिया किताबी दुनिया से और फिल्मी दुनिया से बहुत ही अलग है जैसा कि हम फिल्मो में दिखाया जाता है और किताबो में बताया जाता है वैसा बिलकुल भी नहीं है। घर से भागने के बाद अपने मनपसंद आशिक के साथ जीवन में अनेक संघर्षो का सामना पड़ता है अपनी कई इच्छाओ को मरना पड़ता है और जिंदगी मज़बूरी में बितानी पड़ती है, सभी सपने चूर चूर हो जाते है जो घर से भागने के पहले देखे थे तब प्यार का भूत उतर जाता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है कई तो बच्चा पैदा कर के छोड़ देते है और फिर मज़बूरी में आकार कई तो आत्महत्या कर लेते है और कई तो गलत रस्ते पर चली जाती है।


कई लडकियों को तो प्यार का झासा देकर कोठे पर बेच दिया जाता है। और कई वर्षो तक शोषण भी किया जाता है जब तक कि उनका मन न भर जाये। और मन भर जाने के बाद उन्हें बड़ी बेरहमी से मार भी दिया जाता है। ऐसे कई मामले देखने को मिलते है लेकिन फिर भी लडकियों को अकल नहीं आती वो प्यार में इस कदर अंधी हो जाती है कि उन्हें और कुछ दिखाई या सुनाई नहीं देता बाद में रोने और पछताने के अलावा कुछ नहीं होता। इसमें हर तरह से लडकियों का फायदा उठाया जाता है। लडकियों को यह समझना चाहिए कि उनके लिये क्या सही है और क्या गलत उनके एक गलत फैसले कि वजह से उनके घरवालो को कितना दुःख झेलना पड़ता है कितनी मुश्किलों से गुजरना पड़ता है।


जीवन बहुत ही अनमोल है अपने जीवन का हर एक फैसला बहुत ही सोच समझ कर ले, नहीं समझ में आए तो अपने घरवालो कि राय अवश्य ले।

आत्महत्या करना सही या गलत? Suicide is crime?जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है। आत्महत्या कोई हल नहीं है।

 आजकल जैसे कि आत्महत्या का एक दौर सा चल पड़ा है हर दुसरे तीसरे दिन किसी न किसी के आत्महत्या करने कि खबर आती रहती है। अब जैसे हाल ही में अभिनेता शुशांत सिंह राजपूत(Sushant Singh Rajput) कि आत्महत्या कि खबर आई। सुनकर बड़ा ही दुःख होता है कि लोग आत्महत्या जैसा बड़ा फैसला इतनी आसानी से कैसे ले लेते है।


आत्महत्या एक अपराध है। जीवन बड़ा ही अनमोल है। ईश्वर का दिया हुआ अनमोल उपहार है जीवन। हमारे वेद और पुराणों के अनुसार मानव जीवन चौरासी लाख(84 Lac) योनियो में भटकने के बाद एक बार मिलती है। ईश्वर कि प्रत्येक रचना अपने आप में सर्वश्रेष्ठ है।


मानव जीवन कि रचना सबसे सर्वश्रेष्ठ है इन सब रचनाओं में। इसे इस तरह आत्महत्या करके व्यर्थ न करे। समस्या किसके जीवन में नहीं आती? हमारे यहाँ तो भगवान् को भी अनेको समस्यायों का सामना करना पड़ा है, भगवान् का जीवन भी आसान नहीं रहा, समस्यायों पर विजय हासिल करने के कारण ही वो भगवान् कहलाते है। तो हमने यह कैसे सोच लिया कि हमारे जीवन में समस्याए नहीं आएँगी।


सच तो यह है कि समस्यायों का सामना करके ही लोग महान बनते है। समस्याए तो आती जाती रहेंगी हमें समस्यायों से घबराना नहीं है उन समस्यायों का सामना करना है और जीवन में आगे बढना है। समस्या को किस रूप में लेना है, समस्या या अवसर? यह प्रत्येक व्यक्ति के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यह आज के इस आधुनिक युग में लोग अज्ञानता के कारण तुरंत जीवन की समस्यायों से हार मान कर आत्महत्या कर लेते है, जबकि ये बिलकुल गलत है।


अपने जीवन कि समस्या को अपने घरवालो तथा मित्रो के साथ साझा करे कोई न कोई हल जरुर निकलेगा। सुख दुःख तो प्रकृति का नियम है। इससे कोई भी नहीं बच पाया है। तो भला हम कैसे बच सकते है सुख दुःख के इस चक्कर से। सुख दुःख जीवन के दो पहलु है। जिस प्रकार दिन और रात है। दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन इसी प्रकार सुख आता है और सुख के बाद दुःख फिर दुःख के बाद सुख यह जीवन का चक्र है यह निरंतर ऐसे ही चलता रहेगा। जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है।


“nothing is impossible“ डर के आगे जीत है। एक रास्ता बंद होता है तो ईश्वर दूसरा रास्ता खोल देते है बस कोशिस करने कि देरी होती है। लेकिन आजकल लोगो में सब्र नहीं है। वो तो जाते ही है दुनिया से आत्महत्या करके लेकिन अपने साथ अपने पुरे परिवर को गम के अँधेरे में छोड़ कर चले जाते है। अपने परिवर जनो को दुखी कर जाते है अपने बच्चों को बेसहारा छोड़ कर चले जाते है। उनके जीवन पे उनका ही अधिकार ही नहीं होता है बल्कि उनके आलावा उनके घर वालों का, सगे संबंधी, दोस्तों का भी अधिकार होता हैं। उनके जाने के बाद उनके परिवार वालो का क्या होगा वे इस बारे में जरा भी नहीं सोचते है।


इसीलिए यह सब देखकर आजकल माँ बाप ने भी अपने बच्चो को डाटना छोड़ दिया है कि कही उनका बेटा या बेटी गुस्से में आकर कही आत्महत्या न कर ले। आत्महत्या कोई हल नहीं है। अपने जीवन का अंत कर लेने से समस्यायों का अंत नहीं होता बल्कि उनके परिवार वालो कि समस्याए और बढ़ जाती है। इसलिए कोई भी आत्महत्या(Suicide) करने कि ना सोचे बल्कि अपने समस्याओ परिवार के अन्य लोगो से साझा करे अपने घर के बड़ो कि राय लेकर काम करे।


जीवन में एक बार सभी को श्रीमद भगवदगीता पढ़नी चाहिए जीवन के सभी प्रशनो का हल दिया गया है और यह सत्य पर आधारित है और यह सभी मनुष्य के जीवन पर आश्रित हैं। भगवदगीता यह एक प्रेरणा का स्रोत है।

एक गलत फैसला और मौत मिली वृद्धाश्रम में./बुढ़ापे के डर से दुसरो पर किया भरोसा और जिंदगी तबाह हुई।

 इस कहानी कि सुरुआत होती है उत्तर प्रदेश के एक गॉव आजमगढ़ से जहा एक बुजुर्ग धनि दम्पति रहते थे। वो एक सरकारी कोटा चलते थे जिससे उन्होंने बहुत धन कमाया और मजे से जीवन व्यतीत कर रहे थे। आलीशान मकान और जमीन जायदात सबकुछ था उनके पास सिवाय औलाद के।


वे लगभग सत्तर वर्ष के हो चुके थे। कोई संतान न होने के कारण उन्हें बुढ़ापे का डर सताता था कि बुढ़ापे में उनका क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा? उनकी सम्पत्ति का क्या होगा? और बहुत सी चिंता होती रहती थी।


उनके एक दूर के रिश्तेदार थे शर्मा जी जो कि मुंबई में रहते थे अक्सर उनकी बाते शर्मा जी से होती रहती थी। वे शर्मा जी के बारे में सबकुछ जानते थे और शर्मा जी भी उनके बारे में सबकुछ जानते थे। एक बार शर्मा जी ने उन्हें मुंबई बुलाया अपने घर पर रखा और पूरी मुंबई में घुमाया हर जगह ले गए उनका अच्छे से ध्यान रखा और देखभाल कि जिससे वे बुजुर्ग दम्पति बहुत खुश हुए और उनका विश्वास शर्मा जी पर और बढ़ गया। और मुंबई किसको पसंद नहीं आयेगी, मुंबई शहर ही ऐसा है कि हर कोई यहाँ खीचा चला आता है उनको भी मुंबई भा गयी।


फिर धिरे धिरे यह सिलसिला चलने लगा वे बुजुर्ग दम्पति हर पांच छह महीने के बाद मुंबई में घुमाने के लिए ले आते थे और शर्मा जी के साथ उनके घर पर रहते थे और शर्मा जी भी उनकी अच्छे से सेवा भाव करते थे।


फिर एक दिन शर्मा जी के मन में एक विचार आया और शर्मा जी ने बजुर्ग दम्पति से कहा कि अब आप मुंबई में हमारे साथ हमारे घर पर ही रहे बार बार मुंबई से उत्तर प्रदेश ले आने और ले जाने में दिक़्कत होती है हम आप दोनों कि देखभाल यहीं करेंगे।


बुजुर्ग दम्पति का शर्मा जी पर बहुत विश्वास था और उनको मुंबई(Mumbai) उनको जम गयी थी मुंबई कि सुख और सुविधाए उनको बहुत अच्छी लगती थी इसलिए उन्होंने शर्मा जी के साथ मुंबई में रहने का फैसला कर लिया और मुंबई में रहने के लिए आ गये शर्मा जी के घर।


शर्मा जी को भी लग रहा था कि बुजुर्ग दम्पति अब सत्तर कि उम्र पार कर चुके है इसलिए अब जादा उम्र तक जीवित नहीं रहेंगे चार पांच सालो में मर जाएंगे और उनकी गॉव कि पूरी संपत्ति शर्मा जी कि हो जाएगी। इसलिए उन्होंने यह सुझाव बुजुर्ग दम्पति को दिया था।


जैसे ही कुछ महीने बीत गए उनको शर्मा जी के साथ रहते हुए फिर शर्मा जी ने अपना रंग दिखाना सुरु किया। शर्मा जी ने बुजुर्ग दम्पति से कहा कि अब आपको तो हमारे साथ ही यहाँ मुंबई में रहना है तो गॉव कि सम्पति को रखकर क्या करेंगे आप? वो गॉव कि सम्पति बेचकर हमें दे दीजिये हम आपकी देखभाल करेंगे, आपकी सेवा करेंगे और कर भी रहे है।


बुजुर्ग दम्पति के गॉव वालो ने उनको कई बार मना किया कि वे ऐसा न करे और गॉव में ही आकर उनके साथ रहे और गॉव वाले ही उनका देखभाल करेंगे अपनी सम्पति न बेचे और अपनी थोड़ी सी जमीन गॉव वालो को दे दे एक मंदिर बनाने के लिए लेकिन उन्होंने किसी कि भी बात नहीं मानी।


उनको शर्मा जी पर पूरा विश्वास था इसलिए वे राजी हो गए और एक एक करके अपनी पूरी सम्पत्ति को बेच कर उसका पूरा पैसा शर्मा जी को दे दिया। पैसा मिल जाने के बाद जब शर्मा जी को पूरा यकीन हो गया कि बुजुर्ग दम्पति के पास अब कुछ भी सम्पति नहीं बची है और न ही कोई पैसा तब शर्मा जी ने उनपर अत्याचार करना सुरु कर दिया क्योकि अब बुजुर्ग अब पूरी तरह से शर्मा जी पर निर्भर थे उनके पास और कोई दूसरा चारा नहीं था।


उनसे घर के काम करवाना सुरु कर दिया जैसे कि घर कि साफ सफाई बाज़ार से सब्जी लाना दूध लाना इत्यादि और उनकी सब सुविधाये बंद कर दी सिर्फ दो वक्त का भोजन देते थे यहाँ तक कि उनको दवा के लिए भी पैसे नहीं देते थे।


ऐसे ही चलता रहा और दस वर्ष बीत गए लेकिन बुजुर्ग दम्पति कि उम्र घटने कि जगह बढ़ती जा रही थी जिससे शर्मा जी बहुत परेशान थे वो इनसे अपना पीछा छुड़ाना चाहते थे लेकिन वैसा हो नहीं रहा था इसलिए शर्मा जी ने इनपर और अत्याचार करना सुरु कर दिया अत्याचार कि सीमाओं को और बढ़ा दिया।


वो रोज सुबह होते ही बुजुर्ग दम्पति को घर से बहार निकल देते थे और रात होने तक घर के अन्दर नही लेते थे। वे बिचारे दिनभर घर के बहार बैठे रहते थे दूप हो या बरसात या फिर यहाँ वह रस्ते पर भटकते रहते थे और वे इतना डरे हुए रहते थे कि उनकी भी हिम्मत नहीं होती थी कि रात होने के पहले घर के अन्दर जाने कि कोशिश भी करे।


इतने वर्ष तक रहते रहते उन बुजर्ग कि भी आस पास पड़ोस में थोड़ी बहुत जान पहचान हो गयी इसलिए वे जब शर्मा जी के पड़ोसियों को देखते थे तब उनसे थोड़ी बाते कर लिया करते थे अपना दुःख बताते थे अपने अत्याचार के बारे के बताते थे और उनसे अपने लिए मदद मांगते थे कि हमारा ध्यान रखो और दवा के लिए पैसे भी मांगते थे भिखारियों के जैसी जीने के लिए मजबूर थे और शर्मा जी के कुछ पडोसी उनकी मदद भी कर देते थे उन्हें दवा लाकर दे देते थे और कुछ खाने पिने के लिए भी दे देते थे।


शर्मा जी को यह सब पता चल गया और शर्मा जी का यह कारनामा भी लोगो को पता चल गया जिससे कि उनकी समाज में उनके पड़ोस में बुराई होने लगी। जिससे परेशान होकर शर्मा जी ने उन दोनों बुजुर्ग को घर निकलना बंद कर दिया उन्हें घर में ही कैद कर दिया। और कुछ महीनो के बाद चुपके से बिना किसी को बताये चुपके से उनको विरार के एक वृद्धाश्रम में डाल दिया।


फिर उनकी जिंदगी वृद्धाश्रम में बीतने लगी वे बहुत दुखी रहते थे बहुत परेशान रहते थे कि उन्हें इस तरह जिल्लत भरा जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है उनका ऐसा हाल हो जायेगा बुढ़ापे में ऐसा उनको अंदाजा न था यह सब सोच सोच कर वे बहुत चिंता में डूबे रहते थे और बहुत दुखी रहते थे रोते थे, जिससे उनको मानसिक बिमारी भी हो गयी।


एक वर्ष तक वृद्धाश्रम (Vrddhaashram) में रहने के बाद बुजुर्ग दमप्ती में से पुरुष कि मृत्यु हो गयी। शर्मा जी को यह खबर मिली तो शर्मा जी ने किसी को नहीं बताया अकेले वृद्धश्रम गए और उनका क्रियाकर्म किया और बुजुर्ग महिला को घर वापस लेकर चले आये। महिला के घर आने के बाद लोगो को पता चला कि शर्मा जी ने उनको वृद्धाश्राम में रखा था।


वो बुजुर्ग महिला भी अपने पति के गम में डूबी रहती थी और उनको भी अपने गलत फैसले पर बहुत पछतावा होता था और अकेलेपन के कारण वे भी जादा दिन तक जीवित नहीं रही और एक वर्ष के भीतर ही उनकी मृत्यु हो गयी।

आत्मा की शान्ति के धैर्य, संतोष, मन पर काबू करना होता है।

 आत्मा की शान्ति” सूनने में तो यह शब्द बहुत छोटा लगता है लेकिन इसका अर्थ बहुत बड़ा और गहरा है। जो इसका अर्थ समझ गया उसकी जिंदगी आसान हो जाएगी। वह अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर लेगा, सुखी जीवन का आनंद ले सकेगा और जीवन में तरक्की भी करेगा। आत्मा कि शान्ति का मतलब यहाँ मन कि शान्ति से है। इसपर एक कहावत भी है।


“ मन चंगा तो कठौती में गंगा ”

यदि आपका मन संतुष्ट है, आपके मन में सतोष है तब आपको कठौती में भी गंगा नज़र आएगी अन्यथा आपको गंगा नदी में जाकर भी गंगा के दर्शन नहीं होंगे। जिसके मन में संतोष है, धीरज है उसका मन उसके वश में है वह अपने जीवन को सुखमय तरीके से जीवन का आनंद लेते हुए व्यतीत कर सकता है, अन्यथा वह पूरी जीवनकाल में परेशान रहेगा यह जीवन उसे हमेशा कष्टों से भरा नजर आयेगा और वह यहाँ वहा सुख के चक्कर मे भटकता रहेगा।


सुख कि प्राप्ति के लिए वह अधर्म के मार्ग पर चला जायेगा या ज्यादा सुख के लालच में या जल्दी से सुख प्राप्त हो जाये इसलिए वह गलत रास्ते पर चला जाता है और अधर्म करने लगता है।


आत्मा कि शान्ति के लिए कार्य करना जरुरी है। इसलिए हमें प्रतिदिन थोडा समय निकाल कर अपने लिए मनन और चिंतन करना चाहिए कि जो कार्य हम कर रहे है वह हमें कहा ले जा रहे है? हम जो कर रहे है वह सही है या नहीं इसका भी ध्यान रखना चाहिए। अच्छे और बुरे कार्यो का चयन ही हमारे जीवन को निर्धारित करता है। इसका असर हमारे पुरे परिवार पर भी पड़ता है। हमारे बच्चे भी वही सब सीखते है इसलिए हमेशा अपने आचरण को सही रखना चाहिए।


इसलिए आपने मन को काबू से रखना बहुत जरुरी है। हमारे जो भी सपने है उनको मन में रखते हुए धीरे धीरे उसे पूरा करना चाहिए लेकिन उसके लिए कभी गलत रस्ते पर नहीं जाना चाहिए, कोई अधर्म नहीं करना चाहिए। हमारे वजह से किसी को कष्ट न पहुचे इसका भी ध्यान रखना चाहिए।


जिस भी मनुष्य ने अपने मन पर क़ाबू पा लिया उसमे अपने आप सतोष और संतुष्टि की भावना जाग जाएगी और वह मनुष्य सुख – शांति, समृद्वि की ओर अग्रसर हो जाये गए। वह मनुष्य चिंता से मुख्त हो सकता है, उसे मान – अपमान की कोई चिंता नहीं रहेगीं। दुःख – सुख उसके लिए सामान रूप से होंगे। वह जो भी काम करेगा उसमे उसे शांति मिलेगी, सतोष और संतुष्टि के कारण वह व्यक्ति अपने जीवन को धर्म – कर्म के द्वारा ब्यतीत कर सकेगा।


जिस तरह से जन्म और मृत्यु सत्य है उसी प्रकार से आत्मा की शान्ति के धैर्य, संतोष, मन पर काबू करना भी उतना ही सत्य है।

नींद क्या है? | How Much Do You Sleep | नींद का मतलबनींद की कमी स्वास्थ्य और कामकाजी जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।

 नींद क्या है? sleep जैसा कि हम सब जानते है कि जीवन के लिए जल अत्यंत आवश्यक है। जल के बिना हम एक दिन भी नहीं रह सकते है। जल ही जीवन है। ऐसा भी कहा जाता है, और यह प्रमाणित भी है। उसी प्रकार भोजन के बिना भी हम एक महीने से उपर जीवित नहीं रह सकते है। लेकिन क्या आपको पता है कि हम नींद के बिना कितने दिनों तक जीवित रह सकते है?


तो आइये आज हम नींद के बारे में बात करते है। जिस प्रकार जल और भोजन हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है उसी प्रकार नींद भी हमारे ले अत्यंत उपयोगी है एक बार तो हम बिना भोजन के एक महिना या उससे अधिक दिन भी जीवित रह सकते है लेकिन बिना सोये या बिना नींद लिए हम ग्यारह दिन (11 days) से अधिक जीवित नही रह सकते है। तो आइये आज हम नीद के बारे में विस्तार से बात करते है।


नींद एक चमत्कारी दुनिया है एक अलग ही दुनिया है। सोने के पश्चात् हम एक अलग ही दुनिया में पहुच जाते है। जिस पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं रहता है। नींद में हमें कुछ पता नहीं रहता है। नींद एक रहस्य है। हमें नींद क्यों आती है यह एक रहस्य है इसके बारे में किसी को भी पता नहीं है और यह नींद अप  cb.ने आप ही आती है और किसी भी वक्त आ जाती है। हम रोज सोते है रोज जागते भी है।लेकिन फिर भी हम न तो नींद को जानते है और न ही जागने को जानते है। नींद तो हम सब रोज लेते है, क्या कभी आपने गौर किया आप रोज सोते है नींद लेते है लेकिन कभी आपको यह पता नही चलता कि कब आप सो गये? या आपको नींद आ गयी।


बस आप गायब हो जाते है। न कोई रिश्ता रहता है न कोई दोस्ती और न ही कोई दुश्मनी रह जाती है। और न ही कोई भविष्य कि प्लानिंग होती है। और न ही कोई भूतकाल का डर रहता है। सब शून्य हो जाता है। आपने जो इस दुनिया में अपना अस्तित्व बनाया हुआ है वह जैसे ख़त्म हो जाता है। और कुछ भी नही बचता। यह जो कुछ भी है वह सब आपके होने से है। आप नही है तो कुछ भी नही है। आप है तो सबकुछ है। लेकिन यह बात थोड़ी गहरी है। शब्दों में समझ में नही आने वाली। होने और न होने वाली बात सबपर लागु होती है। यह दुनिया यह संसार यह ब्रम्हांड हर किसी के लिए अलग अलग है। लेकिन यह अलग अलग होने कि बात मन के प्रथम स्थर पर जिसपर हम सभी जीते ही है पर ही लागु होती है।


मन का यही स्तर एक ही चीज में हजारो प्रकार के अंतर प्रकट कर सकता है। और मन का यही प्रथम स्तर आप स्वयं भी है। मन के बाकी स्तर भी आपके पूर्ण निर्माण के सहायक होते है। लेकिन वह सक्रीय होकर भी आपके समक्ष कभी नहीं आते है। जैसे नींद तो आती है लेकिन आप कभी नींद को महसूस नही कर पाते। नींद अपना खेल करके चली जाती है। और आपको कुछ पता भी नहीं चलता है। आप या तो नींद के पहले कि स्थिति को जानते है या नींद के बाद कि स्थिति को जानते है। नींद को नही जानते। मन का एक और स्तर होता है जिसे हम अचेतन मन यानि subconsius mind कहते है। जब हम बहुत अधिक नशा कर लेते है तब हम इसी subconsius mind के दहलीज पर आ जाते है। consius mind यानि चेतन मन अवरुद्ध होने लगता है। क्योकि चेतन मन को शक्ति अचेतन मन से ही मिलती है। लेकिन अचेतन मन कि दहलीज पर सबकुछ अधुरा रहता है। प्रेम होता है लेकिन प्रेम नहीं रहता, क्रोध होता है लेकिन क्रोध नहीं रहता, यादे होती है लेकिन कुछ याद नहीं रहता है। याद रहता भी है लेकिन धुंधला सा रहता है, स्पस्ट नही होता।


यह सब मन के प्रथम स्तर पर होता है। यानि कि यह सब चेतन मन पर आकर ही सम्पूर्ण आकर लेती है। तब हम अपनी भावनाए प्रकट कर पाते है। मन में तिन प्रकार के दरवाजे होते है इस तरह से समझते है। पहला दरवाजा हम खुद ही है, यानि consius mind। दुसरा दरवाजा यानि subconsius mind। नींद मन के तीसरे दरवाजे को खोल देती है। और यह तब होता है जब चेतन मन और अचेतन मन कि उर्जा निश्चित स्तर से निचे आ जाती है। अब इन दोनों दरवाजो को काम करने के लिए उर्जा कि आवश्कता होती है। बिना उर्जा के यह ठीक से काम नही कर सकते है, और शांत रहते है। दुसरे दरवाजे के पास रिजर्व उर्जा रहती है, लेकिन यह इसका उपयोग तभी करता है जब कोई खास मौका हो। दोनों दरवाजो के शांत होने के बाद इसी शांति से नींद का आरम्भ होता है। यह तीसरा दरवाजा खुला हुआ नही होता है। नींद ही इस दरवाजे को खोलती है। और आपको भीतर ले जाती है।


यह सब कार्य प्राकृतिक रूप से होता है। दवाई खाकर ली हुई नींद आपको इस दरवाजे के अन्दर नहीं ले जा सकती है। क्योकि नींद कि दवाई आप तभी खाते है जब आपका मन ठीक से कार्य नही करता है। आप बेचैन रहते है मन में हजारो प्रकार के विचार आते रहते है। और ये विचार शांत होने का मान नही लेते है। इस समय दूसरा दरवाजा अपने रिजर्व उर्जा का इस्तेमाल कर रहा होता है, फिर भी नींद कि दवा लेने के बाद भी एक दो क्षण के लिए जब प्राकृतिक स्थिति बनती है तब आप तीसरे दरवाजे में प्रवेश कर जाते है। तब यह ख्याल अत है कि तीसरे दरवाजे में क्या है?


जिस प्रकार एक समुन्द्र के अनगिनत किनारे हो सकते है। उन किनारों पर अनगिनत लहरे हो सकती है लेकिन फिर भी समुन्द्र कि गहराई में जहा बिलकुल शांति रहती है जहा कोई लहर नही होती सभिरे एक साथ हो समुन्द्र को प्रदर्शित करती है। इसी तरह जब आप तीसरे दरवाजे में प्रवेश करते है तब आप विराट के साथ एक हो जाते है। जैसे एक माँ के गर्भ में बच्चा पूर्ण रुप से अपनी माँ से जुड़ा रहता है। ठीक उसी प्रकार आप विराट अस्तित्व से जुड़ जाते है। यहाँ रोज के आधार पर सूचनाओ का आदान प्रदान होता है। पुरे ब्रम्हांड में हर कोई किसी न किसी से किसी न किसी रूप में जुड़ा होता है। नींद हमें एक नियंत्रण के साथ जाग्रत कर देती है, और इस जाग्रत अवस्था के साथ तीसरे दरवाजे में प्रवेश करते है। लेकिन नींद का पूर्ण नियंत्रण होता है। यहाँ हम याये नहीं बना सकते, यहाँ केवेल हम अहसास कर सकते है, और इस अहसास को भी याद नहीं किया जा सकता है।


नींद memorise नहीं करने देती। कभी कभी हम छोटे छोटे अहसास को साथ ले आते है। रातभर सोने पर भी हम चार या पांच मिनट तीसरे दरवाजे में रह पाते है। इन चार पांच मिनट में ही आप इतने उर्जा से भर जाते है कि पहला और दूसरा दरवाजा actve हो जाता है। जैसे ही पहला और दूसरा दरवाजा एक्टिव हो जाता है नींद आपको खीचकर तीसरे दरवाजे से बहार ले आती है। और वह दरवाजा बंद हो जाता है इसके बाद दूसरा दरवाजा यानि कि uncosius mind अपना काम सुरु करता है, और आप सपने देखने लगते है। और आपका पहला दरवाजा यानि consius mind काम करता है तब आप सपने से जाग जाते है, और सुबह अपने काम पर चले जाते है। यह काम पर जाने और दिनभर काम करने कि उर्जा उन चार पांच मिनट से ही आती है। इसलिए नींद भी बहुत जरुरी है एक स्वस्थ जीवन जीने के लिए।

गुस्सा या क्रोध को कैसे काबू में करे? | How to control angerगुस्से में मनुष्य ऐसे शब्द बोल देता है जिसका उन्हें जीवन भर पछतावा रहता है।

 जैसे कि इस संसार में सभी लोगो को कभी न कभी गुस्सा या क्रोध आता ही है। जब यह गुस्सा या क्रोध आता है तब मनुष्य का दिमाग काम करना बंद कर देता है। उस समय मनुष्य के मन में जो भी आता है सब बोल देता है अच्छा बुरा कुछ नही देखता है। गुस्सा शांत होने के बाद पता चलता है कि यह हमने क्या कर दिया और अपनी गलती का अहसास भी होता है, और पछतावा भी होता है, लेकिन उससे कोई फायदा नहीं। इसके ऊपर हिंदी में एक मुहावरा भी है। “अब पछताने से क्या होगा जब चिड़िया चुग गयी खेत।”


एक कहानी के माध्यम से समझते है इसके बाद आप गुस्सा करना छोड़ देंगे। अपने क्रोध को अपने वश में करना सिख जाओगे। एक गाव में एक झगड़ालू औरत रहा करती थी। अक्सर वह छोटी छोटी बातो पर गुस्सा हो जाती, गुस्से में किसी को भी गालियां दे देती और भला बुरा कहती। लेकिन कुछ समय पश्चात् उसका गुस्सा उतरता तब उसे अपने किये पर बहुत पछतावा होता। उसके परिवार के सभी सदस्य उसके इस स्वाभाव से अत्यंत परेशान रहते थे। उस घर में हमेशा ही एक लड़ाई और अशांति का माहौल बना रहता था।


उस औरत के उस क्रोधी स्वाभाव के कारण उसके पडोसी भी उसे पसंद नहीं करते थे। इस बात कि समझ उस औरत को भी थी, कि उसके इस गुस्सैल स्वाभाव के कारण उसे कोई भी पसंद नहीं करता था। लेकिन चाह कर भी गुस्सा आने पर वह अपने आप को अपशब्द बोलने से नहीं रोक पाती थी। एक दिन एक साधू उस औरत के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आये। साधू को भिक्षा देने के बाद वह स्त्री अपनी यह परेशानी उस साधू महाराज को बताती है। वह कहती है साधू महाराज, मुझे बहुत जल्दी ही गुस्सा आ जाता है। और मै चाहकर भी अपने गुस्से को रोक नहीं पाती हूँ। कृपा करके मुझे इस गुस्से का कोई उपाय बताये?


जिससे मै अपने गुस्से को काबू में कर सकू। साधू महाराज ने उस स्त्री कि बात को बड़े ध्यान से सुना और कुछ देर तक सोचने के बाद अपने झोले में से दवा से भरी एक बोतल निकाल कर उस स्त्री को देते है और कहते है कि मेरी बात को ध्यान से सुनो, यह क्रोध को वश में करने कि सबसे अचूक दवा है। अबसे जब भी तुन्हें क्रोध आये और किसी को कुछ भी अपशब्द कहने का मन करे तब अपनी जीभ पर इस दवा कि चार बुँदे डाल लेना। और कम से कम दस मिनट तक अपने मुह को बंद रखना। यदि तुमने दस मिनट से पहले मुह को खोल दिया तब इस दवा का कोई महत्त्व नहीं रहेगा। और यह दवा अपना प्रभाव ठीक से नही दिखा पायेगी।


इतना कहकर वह साधू महाराज वह से चले जाते है। और इसके बाद से वह स्त्री साधू के बताये अनुसार उस दवा का उपयोग करना सुरू कर दिया। जब भी उसे गुस्सा आता वह उस दवा कि चार बूंद अपने जीभ पर डाल लेती और कम से कम दस मिनट तक अपना मुह बंद रखती और फिर गुटक लेती। इस प्रक्रिया को अगले पंद्रह दिन तक करने के बाद ही उस स्त्री कि गुस्सा करने कि आदत छुट जाती है।


एक महीने के बाद जब वह साधू महाराज दुबारा उस औरत के घर भिक्षा मांगने आते है तब वह औरत दौड़ते हुए साधू महाराज के पास आती है, और साधू महाराज के पैर पकड़ लेती है। और कहती है कि महाराज आपकी दवा ने तो मुझपर जादू कर दिया। आपके दवा के प्रभाव के कारण अब मुझे बात बात पर गुस्सा नहीं आता। और अब मेरे घर परिवार में भी शान्ति का वातावरण रहता है।


अब मै बहुत खुश हूँ महाराज। उस स्त्री के मुह से यह शब्द सुनकर साधू महाराज मुस्कुराते हुए कहते है, कि पुत्री उस बोतल में तो क्रोध कि कोई दवा थी ही नही। बल्कि वह बोतल तो सिर्फ पानी से भरी हुई थी उसमे सिर्फ पानी के अलावा और कुछ भी नहीं था। तुमने अपने गुस्से पर काबू उस दवा के वजह से नही, बल्कि चुप्प रहने से पाया है। गुस्से पर काबू केवल चुप्प रहकर ही पाया जा सकता है। क्योकि गुस्से में मनुष्य अपने मुह से अपशब्द बोलता है। जो नए नए झगड़े और परेशानियों को जन्म देते है। इसलिए क्रोध के वक्त मौन धारण कर लेना ही क्रोध को वश में करने का एकमात्र उपाय है।


हम हमारी जीवन में भी हर एक छोटी छोटी बातो पर गुस्सा हो जाते है। अपना आपा खो बैठते है। और फिर बाद में हम पछताते है कि काश गुस्सा न किया होता। जब मनुष्य गुस्से में होता है तब उसका दिमाग काम करना बंद कर देता है। सिर्फ उसका मुह बोल रहा होता है। और कई बार गुस्से में मनुष्य ऐसे शब्द बोल देता है जिसका उन्हें जीवन भर पछतावा रहता है। कई बार कुछ मिनटों के गुस्से के वश में आकर मनुष्य न केवल मेंटल विओलेंस करता है बल्कि कई बार घातक physical violance कर बैठता है। फिर जिसका परिणाम उसे अपनी पुरे जीवन भर भुगतना पड़ता है। जबकि गुस्सा तो केवल कुछ मिनटों का होता है।


यदि हम गुस्से के उन पलो में कुछ देर शांत रह पाए तो हम अपनी जीवन कि बहुत सी लड़ाई झगड़ो और समस्याओ को सुरु होने से पहले ही ख़तम कर सकते है। इसलिए अब जब भी अगली बार गुस्सा आये तब दिमाग को शांत रखते हुए उस दवा के कुछ बूंद अपने मुह के अन्दर डाल ले और कुछ समय तक अपना मुह बंद रखे। जिससे आप आगे आनेवाली कई समस्याओ से बच जायेंगे।

काश! की शादी न की होती – एक विचार | shaadi ka laddooभारतिय संस्कृति में विवाह एक शुभ और पवित्र बंधन माना गया है। मंत्रों द्वारा अग्नि के सात फ़ेरे दिलवाये जाते हैं और वर-वधू को आशीर्वाद दिये जाते है और यह सात जन्मों का बंधन माना गया हैं।

 हर शादी शुदा व्यक्ति के मन में कभी न कभी यह विचार आ ही जाता होगा कि काश! शादी न की होती, चाहे वह महिला हो या पुरुष। किसी ना किसी कारण वश यह विचार आना संभव है किसी भी इंसान के मन में, गृहस्थ जीवन को सबसे कठिन माना गया है मनुष्यो के लिए। सभी मनुष्य इसी में उलझे रहते है किसी न किसी रूप में।


अक्सर जब घर के मौहोल में जब तनाव उत्पन होता है और वह तनाव हद पार करने लगता है, झेलने की ताकत को कम करने लगता है तभी ये उत्तम विचार मन में दौड़ने लगता है कि काश! शादी न की होती, काश! घर वालो की बात नहीं सुनी होती तो आज ये दिन न देखना पड़ता। काश! शादी के लिए मना कर दिया होता, ऐसी तम्माम बातें मन में आने लगती हैं। ऐसी विचार आये भी ना क्यों, क्यों की आज भी जायदातर शादियाँ घर-रिश्तेदार वाले ही करवाते हैं चाहें मर्जी हो या ना हो, लड़का या लड़की एक दूसरे को पसंद हो या ना हो, चाहें उनके विचार एक दूसरे के साथ मिलते ही ना हो, चाहें घर वालों के विचार एक दूसरे से मिलते हो या ना मिलते हो।


अकसर आपने सास बहू की लड़ाई, झगड़ों के बारे में सुना होगा, सास बहू के चुटकुले सुने होंगे। जब तक ये किसी और के घर की बात होती है तब तक सब ठीक रहता है पर जैसे ही ये आपके घर में सुरु होता तो मानो जिंदगी नरक से बदतर लगने लगती है और फिर दिमाग काम करने बंद करने लगता है। आप लाख कोशिश करते हो की सब ठीक हो जाये घर में शांति रहे, सब लोग खुश रहे पर ऐसा हो नहीं पाता हैं इसके कई कारण होते हैं। कारण गलत हो या सही पर जब भी बात शादी को लेकर कहा सुनी सुरु होती है तब यही बात होती है काश! शादी न की होती, हमने शादी तो अपने मर्जी से तो की नहीं या love marriage तो की नहीं, लड़की और लड़की के परिवार से तो हमने तो बात की नहीं, शादी तो माँ बाप ने करवाई, लड़की भी उन्होंने ही देखी, पर वही जब इसके बारे में बोलना सुरु करते है तब दिमाग काम करने बंद करता है और फिर इससे छुटकारा पाने के बारे में सोचता है, सब कुछ छोड़ कर भागने का विचार आता है, divorce के बारे में सोचने लगते हैं।


माँ बाप के emotional atyachar, संस्कार के बाद रहीं सही कसर जब पति पत्नी पूरी कर दे तब तो जिंदगी में दुःख, पछतावा के आलावा कुछ बचता ही नहीं। तब यही जिंदगी नर्क से भी बदतर होने लगती हैं। सारी अच्छी बुरी बाते शादी के आड़े आने लगती है दिमाग मानो फट सा जायेगा, suicide तक विचार आने लगते हैं। लोग एक दूसरे से नफ़रत करना सुरु कर देते हैं। नफ़रत तो ऐसी हो जाती है की मजबूरी न हो तो एक दूसरे के साथ एक मिनट भी साथ ना रहे चाहे वो पति पत्नी हो या माँ बाप।


कहते है ना की शादी के पहले इंसान एक आज़ाद पंक्षी की तरह होता है ज्यादा तर वह अपना जीवन अपने हिसाब से जीता है न उसे किसी की जिम्मेदारी उठने और निभाने की जरूरत होती है न ही कोई ज़बाब देहि होती है किसी भी बात की।


रोज रोज वहीं ऑफिस, घर, माँ बाप, बीवी और बच्चे इन सब की जिम्मेदारी उठाते उठाते इंसान थक जाने लगता हैं और सुख शान्ति की कामना करने लगता हैं। तब वो धीरे धीरे अपने पुराने दिनों के यादों की तरफ मुड़ने लगता है उसे अपने पुराने सुनहरें दिन अपनी ओर खींचने लगते है धीरे धीरे उसे अपने पुराने दिनों में बिताये हुए दिन याद आने लगते हैं धीरे धीरे वह अपने स्कूल-कॉलेज और स्कूल-कॉलेज के दोस्तों को याद करने लगता हैं। बचपन जवानी के बिताये हुए दिन, दोस्तों के साथ की गयी मस्ती, वो आज़ादी के बिताये हुए पल एक एक कर सब अपनी ओर खिंचने लगते हैं।


अब बात शादी का लड़्डू खाकर पछताने वालों की करते हैं। जीवन में उतार चढ़ाव तो आते रहते है सुख दुःख लगा रहता हैं कभी कभी कुछ बड़ी परेशानियाँ आ जाती है या कुछ ऐसे हादसे भी जीवन में हो जाते है जिस से मनुष्य बहोत दुःखी और खुद को बहोत कमज़ोर मह्सूस करने लगता हैं।


भारतिय संस्कृति में विवाह एक शुभ और पवित्र बंधन माना गया है। मंत्रों द्वारा अग्नि के सात फ़ेरे दिलवाये जाते हैं और वर-वधू को आशीर्वाद दिये जाते है और यह सात जन्मों का बंधन माना गया हैं।

कहते है अच्छी संगत का अच्छा नतीजा। जिसकी जैसी सोच होती है उसके दोस्त भी वैसे ही होते है।

 आज हम २१ सदी में जी रहे है | २१ सदी में तकनीक (technology) अत्यधिक तेज गति से बढ़ती जा रही है। आज के युग में ज्यदातर लोगो कि दुनिया उनके मोबाइल फोन से ही सुरु होकर मोबाइल फोन में ख़तम हो रही है। अब सबकुछ मोबाइल फोन में ही सिमित हो गया है। कहने को सब सोशल मीडिया में एक्टिव है लेकिन सिर्फ डिजिटल तरीके से। सोशल मीडिया पर सबके पास हजारो मित्र होते है। लेकिन असल जिंदगी में एक भी मित्र नहीं होते है। २१ सदी के इस युग में सभी का जीवन इतनी तेज गति से चल रहा है कि किसी के पास किसी और से मिलने का समय ही नहीं मिल रहा है।


इसलिए हमें भी चाहिए कि हम सोशल मीडिया से बहार निकलकर भी देखे। सोशल मीडिया के बाहर भी बहुत ही खूबसूरत दुनिया है। और इस खूबसूरत दुनिया में अनेक खूबसूरत लोग भी है। जिसके लिए हमें सबसे एक सम्बन्ध बनाना चाहिए जो भी हमारे जीवन में आये। जिसमे सबसे अच्छा सम्बन्ध होता मित्रता का। जो किसी से भी किया जा सकता है। सम्बन्ध हो या रिश्ता इसका नियम भी पैसो कि तरह ही है। रिश्ते या संबंधो को भी कमाना पड़ता है और निभाना भी पड़ता है। नहीं तो सम्बन्ध या रिश्ते भी ख़तम हो जाते है।


इसी युग में एक और वर्ग के लोग भी रहते है। जो कि 60 वर्ष से अधिक हो गये है, रिटायर्ड हो चुके है। जिनके पास करने के लिए कुछ भी नहीं रहता है। उनके पास समय ही समय रहता है। इसलिए वे समय बिताने के लिए घंटो अपना समय गार्डन में बैठकर बिताते है।


ऐसे ही एक व्यक्ति है, जिनका नाम जीवनलाल है। जीवनलाल बहुत ही अच्छे स्वाभाव के व्यक्ति है और काफी समझदार भी है। वे भी रिटायर्ड हो चुके है। रिटायर्ड होने के बाद उन्हें जो भी पैसा मिला था उससे उन्होंने एक दूकान लेकर किराये पर चढ़ा दिये थे और कुछ पैसे बैंक में जमा कर दिये थे जिससे भी उनको कुछ रूपये ब्याज के रूप में मिल जाते थे जिससे उनका खर्चा आराम से चल जाता था। जीवनलाल के पास भी अब कुछ करने के लिए नहीं है। उनकी पत्नी का देहांत भी कुछ वर्ष पहले ही हो गया था, और उनकी कोई संतान भी नही थी। इसलिए वे काफी समय से अपना जीवन अकेले ही बिता रहे थे।


जीवनलाल काफी समझदार व्यक्ति है इसलिए वे संबंधो को भी अच्छी तरह से समझते थे। और उन्होंने अपने जीवन में सबसे अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखे थे। जरुरत पड़ने पर वे अपने दोस्तों कि मदद भी किया करते थे। उन्होंने अपने दोस्तों को यह भी बता दिया था कि उनके पास अब कितने पैसे है और कहा रखे है यह सब उन्होंने एक डायरी में लिख कर उसे अलमारी में रखा है। और साथ ही उन्होंने अपने लिए एक स्वास्थ्य बीमा (health insurance) लेकर रखा था और उसका पेपर भी अलमारी में है यह भी अपने सभी दोस्तों को बता दिया था। इसलिए वे हमेशा निश्चिन्त रहते थे।


जीवनलाल भी अपना समय बिताने के लिए गार्डन में जाया करते थे। वहा गार्डन में उनके कुछ मित्र भी आते थे। उनका यह सब रोज का कार्यक्रम था रोज सुबह शाम गार्डन जाना वहा घंटो बैठकर एक दुसरे से बाते करना, हसी मजाक और योगासन भी किया करते थे। यह सिलसिला कुछ वर्षो तक चलता रहा। सबकुछ ठीक चल रहा था। एक दिन ऐसा भी आया कि जीवनलाल गार्डन नहीं आये और उनके सभी मित्र अपने रोज के समय पर गार्डन में आ गये और रोज कि तरह बैठकर अपनी बाते करने लगे। कुछ देर के बाद जीवनलाल के मित्र उनको याद करने लगे और आपस में बाते करने लगे कि आज जीवनलाल अभी तक नहीं आये क्या हुआ होगा ? वे आपस में कुछ सोचने और अनुमान लगाने लगे कि शायद कुछ काम होगा या कही गए होंगे इसलिए नहीं आये।


फिर उनमे से एक मित्र ने जीवनलाल को फोन मिलाया, फोन कि घंटी बज रही थी लेकिन जीवनलाल ने फोन नहीं उठाया। जीवनलाल के मित्रो ने सोचा कि शायद वो कही व्यस्त होंगे इसलिए नहीं आये शाम को तो आ ही जायेंगे तब बात होगी। वक्त बीतता गया शाम हो गयी। शाम को भी जीवनलाल गार्डन में नही आये तब फिर उनके मित्रो ने उनको फोन मिलाया लेकिन फिर शाम भी जीवनलाल ने फोन नहीं उठाया। तब जीवनलाल के मित्र सोचने लगे कि शायद जीवनलाल कही बाहर गये होंगे इसलिए अभी तक घर नही लौटे होगे इसलिए नहीं आये यह समझकर वह बात वहीं ख़तम कर दिये।


अगले दिन फिर सुबह जब सब मित्र गार्डन में आये और देखा कि जीवनलाल आज भी गार्डन में नहीं आये है। फिर वही सिलसिला चला उनके दोस्तों ने फिर से फोन किया, फोन बजा और किसी जीवनलाल ने फोन नही उठाया। फिर से सब सोचने लगे कि शायद अभी तक वे बहार से नही लौटे होंगे इसलिए अभी तक नही आये। फिर उसी दिन शाम को भी सब जीवनलाल का इंतजार करने लगे। लेकिन शाम को भी जीवनलाल गार्डन में नही आये फिर उनके दोस्तों ने उनको फिन किया और जीवनलाल ने फोन नहीं उठाया। इस तरह पुरे दो दिन बीत गए।


अगले दिन सुबह जब जीवनलाल के सब मित्र गार्डन में इकठ्ठा हुए और जीवनलाल का इंतजार करने लगे, लेकिन जीवनलाल का कही कोई अता पता नहीं था। फिर सभी दोस्तों ने निर्णय लिया कि वे सब जीवनलाल के घर जायेंगे और जीवनलाल का पता लगायेंगे। फिर सभी दोस्त जीवनलाल के घर पहुच गए। वहा जाकर उन्होंने जीवनलाल के दरवाजे कि घंटी बजाई लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला। उन्होंने काफी देर तक इन्तजार भी किया लेकिन किसी ने दरवाजा नही खोला। फिर उन्होंने जीवनलाल के पड़ोसियों को बुलाया। उनको भी कुछ पता नहीं था कि क्या मामला है। जीवनलाल को दो दिन से उनके पड़ोसियों ने भी नहीं देखा था। जीवनलाल ने अपने पडोसी के पास अपने घर कि एक डुप्लीकेट चाभी दे कर रखी थी। इसलिए जीवनलाल के पडोसी ने तुरंत जाकर उनके घर कि चाभी लायी और दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही घर के अन्दर का दृश्य देखते ही सब चौक गए थे।


सबने देखा कि जीवनलाल अपने बिस्तर पर पड़े थे और न ही कुछ बोल पा रहे थे और न ही हिल पा रहे थे क्योकि उनको पैरालिसिस का अटैक आया था। इसलिए वे दो दिन से ऐसे ही पड़े थे। जीवनलाल के दोस्तों ने उन्हें तुरंत उठाया और अस्पताल लेकर गए। जैसा कि जीवनलाल ने पहले ही अपने दोस्तों को अपने पैसो और एक स्वास्थ्य बीमा (health insurance) के बारे में बताया था। इसलिए जीवनलाल के दोस्तों ने उनके एक स्वास्थ्य बीमा का पालिसी का उपयोग किया और उन्हें अच्छे और बड़े अस्पताल में भर्ती कराया। और अपने जेब से भी जितना बन सका सबने पैसा लगाया और बारी बारी से उनकी सेवा भी की। तिन चार महीनो के इलाज़ और सेवा कि बदौलत जीवनलाल फिर से स्वस्थ हो गये। अपने समझदारी और अपने दोस्तों कि समझदारी बदौलत एक बार उनको फिर से नयी जिंदगी मिल गयी। उन्होंने अपने दोस्तों का धन्यवाद किया और उनके जो भी रूपये खर्च हुए थे उनके पीछे उसे भी लौटाया।

सूने घर आज भी राह देखते हैं.. वो बंद दरवाजे बुलाते हैं पर कोई नहीं आता.!आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?

 किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव, पूना, बेंगलुरु, चंडीगढ़, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं?


कल आप एक बार उन गली मोहल्लों से पैदल निकलिएगा जहां से आप बचपन में स्कूल जाते समय या दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे।


तिरछी नज़रों से झांकिए.. हर घर की ओर आपको एक चुपचाप सी सुनसानियत मिलेगी, न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते जाते लोगों को ताकते बूढ़े जरूर मिल जायेंगे। आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?


भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उसके एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें लिखें। उनको लगता है या फिर दूसरे लोग उसको ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस यहीं से बच्चे निकल जाते हैं बड़े शहरों के होस्टलों में।


अब भले ही दिल्ली और उस छोटे शहर में उसी क्लास का सिलेबस और किताबें वही हों मगर मानसिक दबाव सा आ जाता है बड़े शहर में पढ़ने भेजने का।


हालांकि इतना बाहर भेजने पर भी मुश्किल से 1% बच्चे IIT, PMT या CLAT वगैरह में निकाल पाते हैं। फिर वही मां बाप बाकी बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर बिज़नेस मैनेजमेंट में दाखिला कराते हैं।


4 साल बाहर पढ़ते पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच बस जाते हैं। फिर वहीं नौकरी ढूंढ लेते हैं । सहपाठियों से शादी भी कर लेते हैं।आपको तो शादी के लिए हां करना ही है ,अपनी इज्जत बचानी है तो, अन्यथा शादी वह करेंगे ही अपने इच्छित साथी से। अब त्यौहारों पर घर आते हैं माँ बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु।


माँ बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं । दो तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। एक साल, दो साल, कुछ साल बीत गये । मां बाप बूढ़े हो रहे हैं । बच्चों ने लोन लेकर बड़े शहरों में फ्लैट ले लिये हैं। अब अपना फ्लैट है तो त्योहारों पर भी जाना बंद।


अब तो कोई जरूरी शादी ब्याह में ही आते जाते हैं। अब शादी ब्याह तो बेंकट हाल में होते हैं तो मुहल्ले में और घर जाने की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है। होटल में ही रह लेते हैं।


हाँ शादी ब्याह में कोई मुहल्ले वाला पूछ भी ले कि भाई अब कम आते जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का उलाहना देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?


खैर, बेटे बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं । अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ बाप को साथ में रखा जाये। बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकानों में।


अब साहब, घर खाली खाली, मकान खाली खाली और धीरे धीरे मुहल्ला खाली हो रहा है। अब ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये “प्रॉपर्टी डीलरों” की गिद्ध जैसी निगाह इन खाली होते मकानों पर पड़ती है । वो इन बच्चों को घुमा फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं । उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है । एक प्लाट भी लिया जा सकता है।


साथ ही ये किसी बड़े लाला को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं। बाबू जी और अम्मा जी को भी बेटे बहू के साथ बड़े शहर में रहकर आराम से मज़ा लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को तैयार कर लेते हैं।


आप स्वयं खुद अपने ऐसे पड़ोसी के मकान पर नज़र रखते हैं । खरीद कर डाल देते हैं कि कब मार्केट बनाएंगे या गोदाम, जबकि आपका खुद का बेटा छोड़कर पूना की IT कंपनी में काम कर रहा है इसलिए आप खुद भी इसमें नहीं बस पायेंगे। हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं।


वही बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं,अब वो वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है । इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, हॉबी क्लासेज नहीं है, IIT/PMT की कोचिंग नहीं है, मॉल नहीं है, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है साहब, आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?


भाईसाब ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपेर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं। आज गांव सूने हो चुके हैं शहर कराह रहे हैं |

भारत का सबसे पहला प्राचीन विश्वविद्यालय नालंदा संस्कृत के अनुसार नालंदा का अर्थ – “नालम् ददाति इति नालन्दा” मतलब कमल का फूल है. कमल के फूल के डंठल को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. “दा” का अर्थ देना है। अतः जहाँ ज्ञान देने का अंत न हो उसे नालंदा कहा गया है.

 बिहार राज्य की राजधानी पटना से 88 किलोमीटर तथा बिहार के प्रमुख तीर्थ स्थान राजगीर से 13 किमी की दूरी पर बड़ा गांव के पास प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर स्थित है.


नालंदा विश्वविद्यालय को दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय माना जाता है, प्राचीन काल में नालंदा में बौद्ध विश्वविद्यालय था, और एशिया में सबसे बड़ा स्नातकोत्तर शिक्षा का केन्द्र था. पांचवीं शताब्दी के आरम्भ से 700 वर्ष तक यहां बौद्ध धर्म दर्शन तथा अन्य विषयों की शिक्षा दी जाती थी. नालंदा की लाइब्रेरी में तकरीबन 90 लाख पांडुलिपियां और हजारों किताबें रखी हुई थी.


आज से लगभग ढाई हजार साल पहले एशिया में तीन विश्वविद्यालय थे. तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा. तक्षशिला के बाद. नालंदा 800 साल तक अस्तित्व में रही. नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास चीन के ह्वेनसांग और इत्सिंग ने खोजा था. ये दोनों 7वीं शताब्दी में भारत आए थे. इन्होनें इसे दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय भी बताया था.


नालंदा विश्व की यह प्रथम पूर्णत: आवासीय विश्वविद्यालय थी और उस समय इसमें तकरीबन 10,000 विद्यार्थी और लगभग 2,000 अध्यापक थे. इसमें शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी आते थे. नागार्जुन, शीलमद्ध, आर्यदेव, संतरक्षित, वसुवंधु दिग्नाग, धर्मकीर्ति, कमलशील, अतिस, दीपकर, कुमारजीव, तथा पद्मसम्भव आदि आचार्यों ने यही से शिक्षा प्राप्त की थी, और विद्या की ज्योति विदेशों में ले गये थे.


नालंदा में लिटरेचर, एस्ट्रोलॉजी, साइकोलॉजी, लॉ, एस्ट्रोनॉमी, साइंस, वारफेयर, इतिहास, मैथ्स, आर्किटेक्टर, भाषा विज्ञानं, इकोनॉमिक, मेडिसिन आदि कई विषय पढ़ाएं जाते थे.


सम्राट अशोक ने 1200 गांव नालंदा विश्वविद्यालय के लिए दे दिए थे. कि इनसे जो भी आमदनी हो उससे विश्वविद्यालय का खर्च चलाया जाए. विद्यालय में विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थीं, और उनको खाना पीना भी मुफ्त दिया जाता था. चीनी यात्री हवांग यांग के कथन के अनुसार नालंदा के विद्यार्थियों को खाने पीने के लिए भीक्षा नहीं मांगनी पड़ती थी. हवांग यांग के बाद इतिसंघ 673 ईसवी में भारत पहुंचा था उसने भी कई वर्ष तक नालंदा में विद्या ग्रहण की थी.


नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda Vishwavidyalaya) के अवशेष 1.5 लाख वर्ग फीट में मिले हैं. नालंदा विश्वविद्यालय सात मील लंबी और तीन मील चौडी भूमि में फैला हुआ था. ऐसा माना जाता है कि ये इस विश्वविद्यालय का सिर्फ 10% ही हिस्सा है. अर्थात ऐसा कहना गलत नहीं होगा की नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है जिसे इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था.


नालंदा विश्वविद्यालय का पतन कब और कैसे हुआ ?

अभिलेखों के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय को आक्रमणकारियों ने तीन बार नष्ट किया था.


पहला विनाश स्कंदगुप्त (455-467 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान मिहिरकुल के तहत ह्यून के कारण हुआ था.


दूसरा विनाश 7वीं शताब्दी की शुरुआत में गौदास ने किया था.


तीसरा और सबसे विनाशकारी हमला 1193 में तुर्क सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी और उसकी सेना ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda Vishwavidyalaya) को नष्ट कर दिया था.

खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों नष्ट कर दिया था?भारतीय विद्वान और शिक्षक को उनके हकीमों से ज्यादा ज्ञान था क्या ये कारण है

 1193 में तुर्क सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था. एक बार वह काफी बीमार पड़ा. उसने अपने हकीमों से काफी इलाज करवाया मगर वह ठीक न हो सका और मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया. उस समय नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda vishwavidyalaya) के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र की काफ़ी चर्चा थी.


तभी किसी ने उसको सलाह दी कि वह नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को दिखाए और इलाज करवाए. परन्तु खिलजी (Khalji) इसके लिए तैयार नहीं था. उसे अपने हकीमों पर ज्यादा भरोसा था. वह यह मानने को तैयार नहीं था की भारतीय वैद्य उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञान रखते हैं और ज्यादा काबिल हो सकते हैं.


लेकिन अपनी जान बचाने के लिए उसको नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलवाना पड़ा. फिर बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी और कहां की में उनके द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की दवा नहीं खाऊंगा. बिना दवा के वो उसको ठीक करें. वैद्यराज ने कुछ सोच कर उसकी ये शर्त मान ली और कुछ दिनों के बाद वो खिलजी के पास एक कुरान लेकर पहुंचे और कहा कि इस कुरान की पृष्ठ संख्या.. इतने से इतने तक पढ़ लीजिये ठीक हो जायेंगे.


बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के बताए अनुसार कुरान को पढ़ा और ठीक हो गया. ऐसा कहा जाता हैं कि राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पन्नों पर एक दवा का लेप लगा दिया था, वह थूक के साथ उन पन्नों को पढ़ता गया और ठीक होता चला गया. खिलजी इस तथ्य से परेशान रहने लगा कि एक भारतीय विद्वान और शिक्षक को उनके हकीमों से ज्यादा ज्ञान था.


फिर उसने भारत देश से ज्ञान, बौद्ध धर्म और आयुर्वेद की जड़ों को नष्ट करने का फैसला किया. परिणाम स्वरूप खिलजी ने नालंदा (Nalanda) की महान पुस्तकालय में आग लगा दी और लगभग 9 मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया.


ऐसा कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में इतनी किताबें थीं कि वह तीन महीने तक जलती रहीं. इसके बाद खिलजी के आदेश पर तुर्की आक्रमणकारियों ने नालंदा के हजारों धार्मिक विद्वानों और भिक्षुओं की भी हत्या कर दी.


ऐसा माना जाता है धार्मिक ग्रंथों के जलने के कारण भारत में एक बड़े धर्म के रूप में उभरते हुए बौद्ध धर्म को सैकड़ों वर्षों तक का झटका लगा था और तब से लेकर अब तक यह पूर्ण रूप से इन घटनाओं से नहीं उभर सका है.

मानव कि उत्पत्ति का इतिहास सच या काल्पनिक?“पहले अंडा आया या मुर्गी“ इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

 जैसा कि हमें बताया गया है, हमने पढा भी है कि हम बंदरो से इंसान बने है। और इस बन्दर कि प्रजाति से मनुष्य बनने कि प्रक्रिया में हजारो वर्षो का समय लगा है। मनुष्य कि जीवन शैली भी पहले जानवरों कि तरह ही हुआ करती थी। वे भी अन्य जानवरों कि तरह ही जंगलो और गुफाओ में रहते थे। जानवरों को मारकर खाते थे। शिकार के लिए यहाँ वहा भटकते थे। शिकार कि खोज में बहुत दूर तक निकल जाते थे। जानवरों कि तरह रहना, जानवरों कि तरह खाना, जानवरों कि तरह शिकार करना यह सब तो संभव है। क्योकि आज भी कई ऐसे पिछड़े इलाके है जहा के आदिवासी लोग आदिमानव कि तरह जीवन व्यतीत करते है। ऐसा कई लेखको और वैज्ञानिको द्वारा बताया गया है।


प्रमाण के तौर पर केवल हड्डियों के अवशेष के आलावा कुछ भी नहीं है जो यह साबित करे कि हम बन्दर से मनुष्य बने है। यह सब एक काल्पनिक कथा, कहानी बनायी गयी है, कि हम बन्दर से मनुष्य बने है। या अनुमान लगाया गया है कि शायद ऐसा हुआ होगा और इस तरह परिवर्तन हुआ होगा। हा बंदरो के शरीर कि रचना हम इंसानों के शरीर रचना जैसी ही दिखती है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम यह मान ले कि हम बन्दर से ही मनुष्य बने है। यह सब लेखको कि कल्पना मात्र है और कुछ भी नहीं। सबने अपने अपने तर्क दिए है जिनको यह तर्क उचित लगा उन्होंने इस तर्क को सत्य मान लिया। यह सब एक रहस्य है जो किसी को भी नहीं पता है। प्रकृति अपने अन्दर असंख्य रहस्य समेटे हुए है, जिसे इंसान कभी समझ ही नहीं सकता है।


उदहारण के तौर पर बरमूडा ट्रेंगल को ही ले लीजिये। बरमूडा ट्रंगल भी एक रहस्यमयी जगह है जहा से कोई लौटकर नहीं आता। और भी कई अनेक रहस्य है। प्रकृति ने सबके ऊपर किसी न किसी को बिठाया है जिससे वह अपना संतुलन बना सके। जैसे कि घास को खाने के लिए शाकाहारी जानवर और उन शाकाहारी जानवरों को खाने के लिए मांसाहारी जानवर और उन मांसाहारी जानवरों को खाने के लिए छोटे छोटे जीव जंतु। इसी तरह प्रकृति ने एक एक श्रंखला बनायीं है, हम उससे बहार नहीं है और न ही उससे बहार जा सकते है। इसी तरह पृथ्वी अपना संतुलन बनाये रखती है। पृथ्वी के रहस्य को जान पाना समझ पाना संभव नहीं है इसके लिए पूरा जीवन भी कम पड़ जायेगा।


आज मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर ली है लेकिन अभी भी प्रकृति के नियम को पूरी तरह नहीं समझ सका है, और न ही कभी समझ पायेगा। आज भी मनुष्य समुद्र के अन्दर का रहस्य सिर्फ पांच प्रतिशत ही देख और समझ पाया है। आज भी असंख्य प्रजाति के पशु पक्षी, कीड़े मकोड़े और जानवरो कि प्रजातियो को मनुष्य देख नहीं पाया है। आज भी हमें कही कही ऐसी प्रजाति के प्राणियों के मृत शरीर समुद्र से प्राप्त होते है जिसे हमने या किसी ने पहले कभी नहीं देखा होता है। जो आकार में विशालकाय होते है और इतने सालो से कहा थे इसका पता भी नहीं लगा पाया है। केवल मृत होने पर उनका मृत शरीर समुद्र के किनारे मिलता है तब पता चलता है कि ऐसा भी कोई जिव मौजूद था पृथ्वी पर।


कुछ बुद्धिजीवी ऐसे भी मौजूद है इस पृथ्वी पर जो थोडा सा ज्ञान प्राप्त कर लेने पर या कुछ पुस्तके पढ़ लेने के बाद अपने आप को सृष्टि का पालनहार भी समझने लगते है उन्हें लगता है कि जो वे देखते, सोचते और कहते है वही सच है। और उनके जैसा बुद्धिमान इस दुनिया में और कोई नहीं है। वे अपने आप को दुनिया से अलग समझने लगते है, अपने आप को सर्वश्रेठ समझने लगते है और सबसे अलग रहना सुरु कर देते है।


उदहारण के तौर पर देखे तो बिल्ली और बाघ कि बनावट भी एक जैसी ही दिखती है इसका मतलब यह नहीं है कि बिल्ली बाघ की पूर्वज है या बाघ बिल्ली का पूर्वज है। या बाघ समय परिवर्तन के साथ बिल्ली बन गए या बिल्ली में परिवर्तन होकर बाघ बन गए। क्योकि इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण किसी के पास नहीं है और न ही कोई वहां उस समय मौजूद था यह सब बन्दर से मनुष्य के रूप में बदलने कि प्रक्रिया देखने के लिए।


यदि हम बंदर से मनुष्य बने होते तो आज बन्दरो कि प्रजाति मौजूद नहीं होनी चाहिए थी? बंदरो कि सभी प्रजातिया या उनमे से कोई एक प्रजाति जो बन्दर से मनुष्य बन रही थी वह विलुप्त हो जानि चाहिए थी? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। क्योकि जब बन्दर से मनुष्य बनने कि प्रक्रिया सुरु हुई तो अब वर्तमान समय में जो बन्दर और उसके कई प्रजातीया मौजूद है वे सब मनुष्य क्यों नहीं बने? आज के समय कोई बन्दर या बंदरो कि कोई प्रजाति मनुष्य में परिवर्तित होती क्यू नहीं दिख रही है? जो परिवर्तन हजारो लाखो साल पहले हुआ था मनुष्य बन्दर से इंसान बन रहा था वह प्रक्रिया अब क्यू नहीं हो रही है? वर्तमान समय में भी कई बंदरो कि प्रजातीया है। उनमे बदलाव क्यू नहीं आ रहा है? कही ऐसा तो नहीं कि यह बंदर से मनुष्य बनने कि प्रक्रिया केवल एक बार हो कर बंद हो गयी? उसके बाद मशीन में खराबी आ गयी और फिर उसके बाद बन्दर से बन्दर ही बनकर रह गये? दोबारा बन्दर से मनुष्य बनने कि कोशिश आज तक नहीं कि?


यह सब मात्र एक कल्पना है और कुछ भी नही। क्योकि बन्दर से मनुष्य बनने कि प्रक्रिया का उल्लेख और कही भी नहीं किया गया है। यह एक पहेली कि तरह है जैसे कि “पहले अंडा आया या मुर्गी“ इसका जवाब किसी के पास नहीं है। उसी प्रकार यह भी सत्य नहीं लगता है कि मनुष्य बंदरो से मनुष्य बना है।


कई लेखको ने तो यह भी कहा है कि मनुष्यों का पहला विकास लगभग पच्चीस लाख साल पहले पूर्वी अफ्रीका में वानरों के एक आरंभिक जींस औस्त्रलोपिथिकास से हुआ था जिसका मतलब है दक्षिणी वानर। लगभग बीस लाख साल पहले इनमे से कुछ आदिम पुरुष और स्त्रिया अफ्रीका, यूरोप और एशिया के इलाको में बसने के लिए चले गए। अब आप ही सोचिए पच्चीस लाख साल पीछे कैसे कोई जा कर यह सब देख सकता है क्या यह संभव है? यह केवल मात्र एक कल्पना है, एक अनुमान है या एक तर्क दिया है। यहाँ वास्तविक जीवन में बीस सेकेण्ड बाद में क्या होगा? कुछ नहीं कह सकते। परन्तु यहाँ लोगो ने एक दो वर्ष नहीं पच्चीस लाख वर्ष पहले कि बात कही है और लोग उनकी बातो को सच भी मन लेते है। किसी लेखक ने यह भी कहा है कि समाज को जोड़े रखने के लिए विभिन्न धर्म बनाए गए है और उन धर्मो पर आधारित विभिन्न कहानिया बनायी गयी है ताकि लोग आपस में जुड़े रहे। चलिए मान लिया क्योकि किसी में प्रत्यक्ष रूप से किसी भी धर्म के देवताओ को नहीं देखा है इसलिए उनकी बात सत्य हो सकती है। लेकिन यह भी तो हो सकता है कि जिस प्रकार धर्म कि कहानी बयानी गयी है, उसी प्रकार मानव जाती कि उत्पति कि भी कहानी बनायीं गयी हो कि मनुष्य बंदरो से मनुष्य बने है। क्योकि यह बंदरो से मनुष्य बनाने कि कहानी भी हम बचपन से ही सुन रहे है और यही बन्दरो मनुष्य बनाने कि कहानी हमारे पूर्वजो ने भी सुनि और सुनाई है। जिस तरह हम उनके द्वारा धर्म कि बाते सुनते है।


कई लेखको ने छोटे और बौने इंसानों का तर्क भी दिया है कि कई इलाको में बौने इंसान होते थे और कई तो वहां के परिस्थिति के कारण कई पीढियों के दौरान बौने हो गए। लेकिन यह सत्य नहीं लगता क्योकि बौने और ऊँचे लोग आज हर जगह मौजूद है। हमारे आस पास और हमारे घर में भी ऊँचे और बौने सदस्य है। जबकि हम सभी का कद हमारे जींस पर आधारित होता है यह वांशिक होता है। यदि माता पिता लम्बे होते है तो संतान भी लम्बी होती है। यदि माता पिता बौने है तो संतान भी बौनी होगी।


बन्दर से मनुष्य बनने का इतिहास सत्य होगा भी तो, यह इतिहास विदेशियों का होगा हम भारतवासियों का नहीं। जिस समय विदेशी लोग पत्थर रगड़ कर आग जलाना सीख रहे थे उसी समय भारत में ऋषि मुनि रसायन और मंत्र पढ़कर यज्ञ कुंड में बिना माचिस जलाये अग्नि को प्रवेश करा देते थे। भारत में विरासते और राज घराने हुआ करते थे जिसके प्रमाण आज भी पाए जाते है। हमारे भारत का इतिहास अद्भुत और अकल्पनीय है भारत कि तुलना विदेशो से करना मुर्खता है। ईस्वी सदी कि सुरुआत में जब अखंड भारत से अलग दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग पढ़ना लिखना और सभ्य होना सिख रहे थे तो दूसरी ओर भारत में विक्रमादित्य, पाणिनि, चाणक्य जैसे विद्वान् व्याकरण और अर्थशाश्त्र कि नयी नयी इमारतें खड़ी कर रहे थे। इसके बाद आर्यभट्ट, वराहमिहिर जैसे विद्वान् अन्तरिक्ष कि खाक छान रहे थे।


वसुबन्धु, धर्मपाल, सुविष्णु, असंग, धर्मकीर्ति, शांताराक्षिता, नागार्जुन, आर्यदेव, पद्मसंभव जैसे लोग उन विद्यालयों में पढ़ते थे जो सिर्फ भारत में ही थे। तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा, आदि अनेक विश्वविद्यलयो में देश विदेश के लोग पढ़ने के लिए आते थे। यदि आप भारतीय है तो गर्व कीजिये आप एक महान विरासत का हिस्सा है। अपने धर्म ग्रंथो का अध्ययन कीजिये और उनके ज्ञान से स्वयं को उन्नत और सर्वश्रेस्ठ बनाये। भारत के किसी भी ग्रन्थ या पुराण में इस तरह से मानव उत्पत्ति के जिक्र या उल्लेख कही नहीं है। भारत के वेदों और पुराणों में मानव कि उत्पत्ति का अलग विश्लेषण दिया गया है। जिसका उल्लेख हम हमारे अगले ब्लॉग में विस्तार से करेंगे।

भारत का टाइटैनिक जो 1888 में डूब गया जहाज में 746 लोग (703 यात्री और 43 चालक दल के सदस्य) लापता हुए थे । SS Vaitarna

 एसएस वैतरणा, जिसे विजली (Vijli) के रूप में जाना जाता है, जो 8 नवंबर 1888 को मांडवी से बॉम्बे जाने के दौरान चक्रवाती तूफान में गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के तट से गायब हो गई थी। आपदा में 740 से अधिक लोग लापता हो गए। SS Vaitarna Grangemouth Dockyard Co. Ltd द्वारा निर्मित पहला स्टीमर था।


विजली को 1885 में लॉन्च किया गया। वह स्टील से बनी स्कूनर थी और इसे पूरा करने में तीन साल लगे। इस पेंच स्टीमर में तीन मंजिल और पच्चीस केबिन थे। विजली को मांडवी, कच्छ राज्य और बॉम्बे के बीच यात्रियों और सामानों का व्यापार में इस्तेमाल किया गया। मांडवी से बंबई तक 8 रुपये के किराए पर यात्रा करने में उसे 30 घंटे लगते थे।


एसएस वैतरणा को 8 नवंबर 1888, गुरुवार को मांडवी बंदरगाह पर लंगर डाला गया था, और वहा से 520 यात्रियों को लेकर द्वारका के लिए रवाना हुए। वह द्वारका पहुंची और उसमें सवार कुछ और यात्री थे, जो संख्या में 703 तक पहुंच गए। वह पोरबंदर के लिए रवाना हुई।


उस समय कुछ जहाजों को तूफानों को कम करने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था क्योंकि वे आमतौर पर शांत मौसम के दौरान बंदरगाह से बंदरगाह तक जाते हैं और तूफानी मानसून समुद्र के दौरान बंदरगाह में स्थापित होते थे।


हालांकि, लॉर्ड्स के अनुसार, पोरबंदर बंदरगाह के प्रशासक लेली ने कैप्टन से कहा कि वे समुद्र में न जाएं, लेकिन बाद में अनुसंधान ने दावे का समर्थन नहीं किया। खराब मौसम के कारण वह पोरबंदर में नहीं रुका और सीधे बॉम्बे के लिए रवाना हुआ। शाम को, उसे मांगरोल के तट से दूर देखा गया था, और बाद में रात में कुछ लोगों ने दावा किया कि उसे गंभीर तूफान के बीच माधवपुर (गेद) के पास मलबे में देखा गया था। अगले दिन उसे लापता घोषित कर दिया गया।


बॉम्बे प्रेसीडेंसी और शिपिंग कंपनियों ने जहाजों को खोजने के लिए स्टीमर भेजे लेकिन असफल रहे। जहाज का कोई शव या मलबा नहीं मिला। अरब सागर में एक चक्रवाती तूफान में वह बर्बाद हो गया था। हालांकि लोककथाओं में 1300 लोगों के हताहत होने की बात है, जहाज में 746 लोग (703 यात्री और 43 चालक दल के सदस्य) थे जो आपदा में लापता हो गए थे।

Thursday, June 29, 2023

तुलसीदास जी द्वारा श्री रामचरितमानस की रचना - सत्य कथा (Goswami Tulsidas Dwara Shri Ramcharit Manas Ki Rachna)

 श्री रामचरितमानस की रचना:

चित्रकूट से लौट कर, गोस्वामी जी काशी पहुँचे और वहां प्रह्लाद घाटपर एक ब्रह्मण के घर निवास किया । वहाँ उनकी कवित्व शक्ति स्फुरित हो गयी और वह संस्कृत में रचना करने लगे।


यह एक अद्भुत बात थी कि दिन में वे जितनी कविता रचना करते रात मे सब की सब लुप्त हो जाती। यह घटना रोज घटती परंतु वे समझ नहीं पाते थे कि मुझको क्या करना चाहिये। आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ। भगवान् शंकर ने प्रकट होकर कहा कि तुम अपनी भाषा मे काव्य रचना करो, संस्कृत में नहीं।


नींद उचट गयी तुलसीदास जी उठकर बैठ गये। उनके हृदय मे स्वप्न की आवाज गूंजने लगी। उसी समय भगवान् श्री शंकर और माता पार्वती दोनों ही उनके सामने प्रकट हुए। तुल्सीदास जी ने साष्टांग् प्रणाम किया। शिव जी ने कहा: मातृभाषा में काव्य निर्माण करो, संस्कृत के पचडे में मत पडो। जिससे सबका कल्याण हो वही करना चाहिये। बिना सोचे विचारे अनुकरण करने की आवश्यकता नहीं है। तुम जाकर अयोध्या में रहो और वही काव्य रचना करो। जहां भगवान् की जन्म स्थली है और जो भगवान् श्रीसीताराम जी का नित्य धाम है वही उनकी कथा की रचना करना उचित होगा। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान सफल होगी।


इतना कहकर गौरीशंकर जी अन्तर्धान हो गये और उनकी कृपा एवं अपने सौभाग्य की प्रशंसा करते हुए तुलसीदास जी अयोध्या पहुँचे। तुलसीदास जी वही रहने लगे। एक समय दूध पीते थे। भगवान् का भरोसा था। संसार की चिंता उनका स्पर्श नहीं कर पाती थी।


कुछ दिन यों ही बीते, संवत् १६३१ आ गया। उस वर्ष चैत्र शुक्ल रामनवमी के दिन प्राय: वैसा ही योग जुट गया था, जैसा त्रेतायुग मे रामजन्म के दिन था।

उस दिन प्रातः काल तुलसीदास जी सोचने लगे: क्या इस समय भगवान् का अवतार होने वाला है? आश्चर्य है, अभी इस समय अवतार कैसे हो सकता है?


उसी समय श्री हनुमान जी ने प्रकट होकर तुलसीदास जी को दर्शन दिया। तुलसीदास जी ने प्रणाम् करके पूछा: क्या पृथ्वी पर इस समय भगवान् का अवतार होने वाला है?

हनुमान जी बोले: अवतार तो होगा परंतु मनुष्य शरीर के रूप में नहीं अपितु ग्रन्थ के रूप में। इसके बाद हनुमान जी ने गोस्वामी जी का अभिषेक किया। शिव, पार्वती, गणेश, सरस्वती, नारद और शेषने आशीर्वाद दिये और सबकी कृपा एवं आज्ञा प्राप्त करके श्रीतुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस की रचना प्रारम्भ की।


दो वर्ष सात महीने छब्बीस दिन मे श्रीरामचरित मानस की रचना समाप्त हुई। संवत् १६३३ मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।


यह कथा पाखंडियो छल-प्रपञ्च को मिटाने वाली है। पवित्र सात्त्विकधर्म का प्रचार करने वाली है। कलिकाल के पाप-कलापका नाश करने वाली है। भगवत् प्रेम की छटा छिटकाने वाली है। संतो के चित्त में भगवत्प्रेम की लहर पैदा करनेवाली है। भगवत् प्रेम श्री शिवजी की कृपा के अधीन है, यह रहस्य बताने वाली है। इस दिव्य ग्रन्थ की समाप्ति हुई, उसी दिन इसपर लिखा गया: शूभमिति हरि: ओम् तत्सत्। देवताओंने जय जयकार की ध्वनि की और फूल बरसाये। श्री तुलसीदास जी को वरदान दिये, रामायण की प्रशंसा की।


श्री गणेश जी का गोस्वामी जी के पास आकर मानस की कुछ प्रतियां अपने लोक को ले जाना:

श्री रामचरितमानस की रचना के बाद श्री गणेश जी वहाँ आ गए और अपनी दिव्या दिव्य लेखनी से मानस जी की कुछ प्रतियां क्षण भर में लिख ली।


उन प्रतियोगिता को लिखकर गोस्वामी जी से कहा कि इस सुंदर मधुर काव्य का रसपान हम अपने लोक में करेंगे और अन्य गणो को भी कराएँगे। ऐसा कहकर गणेश जी अपने लोक को चले गए। श्री रामचरितमानस क्या है, इस बात को सभी अपने-अपने भाव के अनुसार समझते एवं ग्रहण करते हैं। परंतु अब भी उसकी वास्तविक महिमा का स्पर्श विरले ही पुरुष का सके होंगे।

सभी के कर्म एक समान नहीं हैं - प्रेरक कहानी (Sabhi Ke Karm Ek Saman Nahin Hain)

 एक बार एक शिव भक्त धनिक शिवालय जाता है। पैरों में महँगे और नये जूते होने पर सोचता है कि क्या करूँ?

यदि बाहर उतार कर जाता हूँ तो कोई उठा न ले जाये और अंदर पूजा में मन भी नहीं लगेगा। सारा ध्यान् जूतों पर ही रहेगा। उसे बाहर एक भिखारी बैठा दिखाई देता है।

वह धनिक भिखारी से कहता है: भाई मेरे जूतों का ध्यान रखोगे? जब तक मैं पूजा करके वापस न आ जाऊँ भिखारी: हाँ कर देता है।


अंदर पूजा करते समय धनिक सोचता है कि "हे प्रभु! आपने यह कैसा असंतुलित संसार बनाया है? किसी को इतना धन दिया है कि वह पैरों तक में महँगे जूते पहनता है तो किसी को अपना पेट भरने के लिये भीख तक माँगनी पड़ती है! कितना अच्छा हो कि सभी एक समान हो जायें।" वह धनिक निश्चय करता है कि वह बाहर आकर भिखारी को 100 का एक नोट देगा।


बाहर आकर वह धनिक देखता है कि वहाँ न तो वह भिखारी है और न ही उसके जूते ही। धनिक ठगा सा रह जाता है। वह कुछ देर भिखारी का इंतजार करता है कि शायद भिखारी किसी काम से कहीं चला गया हो। पर वह नहीं आया। धनिक दुखी मन से नंगे पैर घर के लिये चल देता है।


रास्ते में फुटपाथ पर देखता है कि एक आदमी जूते चप्पल बेच रहा है। धनिक चप्पल खरीदने के उद्देश्य से वहाँ पहुँचता है, पर क्या देखता है कि उसके जूते भी वहाँ रखे हैं। जब धनिक दबाव डालकर उससे जूतों के बारे में पूछता हो वह आदमी बताता है कि एक भिखारी उन जूतों को 100 रु. में बेच गया है। धनिक वहीं खड़े होकर कुछ सोचता है और मुस्कराते हुये नंगे पैर ही घर के लिये चल देता है। उस दिन धनिक को उसके सवालों के जवाब मिल गये थे।


समाज में कभी एकरूपता नहीं आ सकती, क्योंकि हमारे कर्म कभी भी एक समान नहीं हो सकते। और जिस दिन ऐसा हो गया उस दिन समाज-संसार की सारी विषमतायें समाप्त हो जायेंगी। ईश्वर ने हर एक मनुष्य के भाग्य में लिख दिया है कि किसको कब और क्या और कहाँ मिलेगा। पर यह नहीं लिखा होता है कि वह कैसे मिलेगा। यह हमारे कर्म तय करते हैं।


जैसे कि भिखारी के लिये उस दिन तय था कि उसे 100 रु. मिलेंगे, पर कैसे मिलेंगे यह उस भिखारी ने तय किया। हमारे कर्म ही हमारा भाग्य, यश, अपयश, लाभ, हानि, जय, पराजय, दुःख, शोक, लोक, परलोक तय करते हैं। हम इसके लिये ईश्वर को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं।

छोटे से बीज में से वटवृक्ष बनता है - प्रेरक कहानी

 बात बहुत पुरानी है। एक महान संत के पास एक युवक आया और बोला: मुझे आपका शिष्य बनना है महाराज।

संत बोले: तुझे शिष्य क्यों बनना है।

युवक ने कहा: मुझे परमात्मा से प्रेम करना है

संत ने कहा: पहले मुझे बताओं कि क्या तुम्हें अपने घर के किसी व्यक्ति से प्रेम है?


युवक बोला: नहीं, मुझे किसी से भी प्रेम नहीं है।

संत ने पूछा: तुझे तेरे माता-पिता या भाई-बहन किस पर ज्यादा स्नेह आता है?

युवक ने नकारते हुए कहा: मुझे किसी से भी तनिक मात्र स्नेह नहीं है। पूरी दुनिया स्वार्थ परायण है, ये सब मिथ्या मायाजाल है। इसीलिए तो मैं आपकी शरण में आया हूं।

तब संत ने कहा: बेटा, मेरा और तेरा कोई मेल नहीं। तुझे जो चाहिए वह मैं नहीं दे सकता।


युवक यह सुन स्तब्ध रह गया। संत बोले: यदि तुझे तेरे परिवार से प्रेम होता, जिन्दगी में तूने तेरे निकट के लोगों में से किसी से भी स्नेह किया होता तो मैं उसे विशाल स्वरूप दे सकता था। थोड़ा भी प्रेमभाव होता, तो मैं उसे ही विशाल बना के परमात्मा के चरणों तक पहुंचा सकता था।


छोटे से बीज में से वटवृक्ष बनता है, परन्तु जो पत्थर जैसा कठोर हो उसमें से प्रेम का झरना कैसे बहा सकता हूं। परमात्मा को पाने का पहली शर्त ही कोमल हृदयी और प्रेमी होना है।

सबसे ज्यादा खुश पक्षी कौन? - प्रेरक कहानी

 एक कौआ था जो अपनी जिंदगी से बहुत खुश और संतुष्ट था। एक बार वह एक तालाब पर पानी पीने रुका। वहां पर उसने सफ़ेद रंग के पक्षी हंस को देखा। उसने सोचा मैं बहुत काला हूँ और हंस इतना सुन्दर इसलिए शायद हंस इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा।


कौआ हंस के पास गया और बोला: तुम दुनिया के सबसे खुश प्राणी हो।


हंस बोला: मैं भी यही सोचा करता था कि मैं दुनिया का सबसे खुश पक्षी हूँ जब तक कि मैंने तोते को न देखा था। तोते को देखने के बाद मुझे लगता है कि तोता ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि तोते के दो खुबसूरत रंग होते है इसलिए वही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होना चाहिए।


कौआ तोते के पास गया और बोला: तुम ही इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो।


तोता ने कहा: मैं पहले बहुत खुश था और सोचा करता था कि मैं ही दुनिया का सबसे खुबसूरत पक्षी हूँ। लेकिन जब से मैंने मोर को देखा है, मुझे लगता है कि वो ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि उसके कई तरह के रंग है और वह मुझसे भी खुबसूरत है।


कौआ चिड़ियाघर में मोर के पास गया और देखा कि सैकड़ों लोग मोर को देखने के लिए आए है।

कौआ मोर के पास गया और बोला: तुम दुनिया के सबसे सुन्दर पक्षी हो और हजारों लोग तुम्हे देखने के लिए आते है इसलिए तुम ही दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो।


मोर ने कहा: मैं हमेशा सोचता था कि मैं दुनिया का सबसे खुबसूरत और खुश पक्षी हूँ लेकिन मेरी खूबसूरती के कारण मुझे यहाँ पिंजरे में कैद कर लिया गया है। मैं खुश नहीं हूँ और मैं अब यह चाहता हूँ कि काश मैं भी कौआ होता तो मैं आज आसमान में आजाद उड़ता। चिड़ियाघर में आने के बाद मुझे यही लगता है कि कौआ ही सबसे खुश पक्षी होता है।


हम लोगों की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही हो गयी है। हम अपनी तुलना दूसरों से करते रहते है और दूसरों को देखकर हमें लगता है, कि वो शायद हम से अधिक खुश है। इस कारण हम दु:खी हो जाते है।


हम उनका आनंद नहीं उठा पाते जो हमारे पास पहले से ही और उन वस्तुओं के पीछे भागने लगते है जो हमारे पास नहीं है । और इसी चक्कर में समय निकलता जाता है और बाद में आकर हम सोचते है कि पहले हम अधिक खुश थे। दुनिया में हर व्यक्ति के पास अन्य व्यक्ति से कुछ वस्तुएं अधिक और कुछ कम होगी इसलिए दुनिया में सबसे खुश वही जो अपने आप से संतुष्ट है।

यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है - प्रेरक कहानी

 एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था।


उसकी पत्नी ने कहा: वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।

कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया। कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने..

किसान से पूछा: क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ?

किसान ने कहा: नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?


उस व्यक्ति ने कहा: मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए, लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।


किसान ने कहा: मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है। इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है। वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था। फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता। अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा। इसलिए वह थक गया है।


देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है। जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन राह में मिलने वाले कुत्ते व्यक्ति को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रहे हैं। इंसान अपने लक्ष्य से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है। यह लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। आपकी ऊर्जा को रास्ते में मिलने वाले कुत्ते बर्बाद करते है।


भौंकने दो इन कुत्तो को और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सीधे बढ़ते रहो फिर एक दिन ना एक दिन मंजिल मिल ही जाएगी। लेकिन इनके चक्कर में पड़ोगे तो थक ही जाओगे। अब ये आपको सोचना है कि किसान की तरह सीधी राह चलना है या उसके कुत्ते की तरह।


संसार के सभी प्राणी अपूर्ण हैं - प्रेरक कहानी

 एक कवि राजा भर्तृहरि थे। उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थीं। भर्तृहरि ने स्त्री के सौंदर्य और उसके बिना जीवन के सूनेपन पर 100 श्लोक लिखे, जो श्रृंगार शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं।


उन्हीं के राज्य में एक ब्राह्मण भी रहता था, जिसने अपनी नि:स्वार्थ पूजा से देवता को प्रसन्न कर लिया। देवता ने उसे वरदान के रूप में अमर फल देते हुए कहा कि इससे आप लंबे समय तक युवा रहोगे।


ब्राह्मण ने सोचा कि भिक्षा मांग कर जीवन बिताता हूं, मुझे लंबे समय तक जी कर क्या करना है। हमारा राजा बहुत अच्छा है, उसे यह फल दे देता हूं। वह लंबे समय तक जीएगा तो प्रजा भी लंबे समय तक सुखी रहेगी।


वह राजा के पास गया और उनसे सारी बात बताते हुए वह फल उन्हें दे आया। राजा फल पाकर प्रसन्न हो गया। फिर मन ही मन सोचा कि यह फल मैं अपनी पत्नी को दे देता हूं। वह ज्यादा दिन युवा रहेगी तो ज्यादा दिनों तक उसके साहचर्य का लाभ मिलेगा। अगर मैंने फल खाया तो वह मुझ से पहले ही मर जाएगी और उसके वियोग में मैं भी नहीं जी सकूंगा। उसने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया।


लेकिन, रानी तो नगर के कोतवाल से प्यार करती थी। वह अत्यंत सुदर्शन, हृष्ट-पुष्ट और बातूनी था। अमर फल उसको देते हुए रानी ने कहा कि इसे खा लेना, इससे तुम लंबी आयु प्राप्त करोगे और मुझे सदा प्रसन्न करते रहोगे।


फल ले कर कोतवाल जब महल से बाहर निकला तो सोचने लगा कि रानी के साथ तो मुझे धन-दौलत के लिए झूठ-मूठ ही प्रेम का नाटक करना पड़ता है। और यह फल खाकर मैं भी क्या करूंगा। इसे मैं अपनी परम मित्र राज नर्तकी को दे देता हूं। वह कभी मेरी कोई बात नहीं टालती। मैं उससे प्रेम भी करता हूं। और यदि वह सदा युवा रहेगी, तो दूसरों को भी सुख दे पाएगी। उसने वह फल अपनी उस नर्तकी मित्र को दे दिया।


राज नर्तकी ने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप वह अमर फल अपने पास रख लिया। कोतवाल के जाने के बाद उसने सोचा कि कौन मूर्ख यह पाप भरा जीवन लंबा जीना चाहेगा। हमारे देश का राजा बहुत अच्छा है,

उसे ही लंबा जीवन जीना चाहिए। यह सोच कर उसने किसी प्रकार से राजा से मिलने का समय लिया और एकांत में उस फल की महिमा सुना कर उसे राजा को दे दिया। और कहा कि महाराज, आप इसे खा लेना।


राजा फल को देखते ही पहचान गया और भौंचक रह गया। पूछताछ करने से जब पूरी बात मालूम हुई, तो उसे वैराग्य हो गया और वह राज-पाट छोड़ कर जंगल में चला गया। वहीं उसने वैराग्य पर 100 श्लोक लिखे जो कि वैराग्य शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं।


यही इस संसार की वास्तविकता है। एक व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है और चाहता है कि वह व्यक्ति भी उसे उतना ही प्रेम करे। परंतु विडंबना यह कि वह दूसरा व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है। इसका कारण यह है कि संसार व इसके सभी प्राणी अपूर्ण हैं। सब में कुछ न कुछ कमी है। सिर्फ भगवान् ही एक मात्र पूर्ण हैं । एक वही हैं जो हर जीव से उतना ही प्रेम करते हैं , जितना जीव उनसे करता है बल्कि उससे कहीं अधिक। बस हम ही उन्हें सच्चा प्रेम नहीं करते

बस! अपने मां बाप की सेवा करो - प्रेरक कहानी

 एक छोटा सा बोर्ड रेहड़ी की छत से लटक रहा था, उस पर मोटे मारकर से लिखा हुआ था...

घर मे कोई नही है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टायलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल ले और पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, साथ ही रेट भी लिखे हुये हैं।

और अगर आपके पास पैसे नही हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाजत है!


मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले, दर्जन भर केले लिए, बैग में डाले, प्राइज लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया वहाँ सौ पच्चास और दस दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमे रख कर उसे ढक दिया। बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं और भाई उधर निकले तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो हमें देख कर मुस्कुराया और बोला साहब! फल तो खत्म हो गए।


नाम पूछा: तो बोला सीताराम...

फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए...

चाय आयी, कहने लगा पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछ पागल सी भी हो गईं है, और अब तो फ़ालिज भी हो गया है, मेरी कोई संतान नही है, बीवी मर गयी है, सिर्फ मैं हूँ और मेरी माँ! माँ की देखभाल करने वाला कोई नही है इसलिए मुझे हर वक़्त माँ का ख्याल रखना पड़ता है।

एक दिन मैंने माँ का पाँव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, माँ! तेरी सेवा करने को तो बड़ा जी चाहता है। पर जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नही देती, कहती है तू जाता है तो जी घबराने लगता है, तू ही बता मै क्या करूँ? अब क्या गले से खाना उतरेगा? न मेरे पास कोई जमा पूंजी है।


ये सुन कर माँ ने हाँफते काँपते उठने की कोशिश की, मैंने तकिये की टेक लगवाई, उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाया अपने कमज़ोर हाथों को ऊपर उठाया मन ही मन राम जी की स्तुति की फिर बोली: तू रेहड़ी वहीं छोड़ आया कर हमारी किस्मत हमे इसी कमरे में बैठ कर मिलेगा।

मैंने कहा: माँ क्या बात करती हो, वहाँ छोड़ आऊँगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जायेगा, आजकल कौन लिहाज़ करता है? और बिना मालिक के कौन खरीदने आएगा?

कहने लगीं: तू राम का नाम लेने के बाद बाद रेहड़ी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस, ज्यादा बक बक नही कर, शाम को खाली रेहड़ी ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो।


ढाई साल हो गए है भाई! सुबह रेहड़ी लगा आता हूँ शाम को ले जाता हूँ, लोग पैसे रख जाते है फल ले जाते हैं,एक धेला भी ऊपर नीचे नही होता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते है, कभी कोई माँ के लिए फूल रख जाता है, कभी कोई और चीज़! परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गयी साथ मे एक पर्ची भी थी अम्मा के लिए।


एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़ गए पीछे लिखा था माँ की तबियत नाज़ुक हो तो मुझे काल कर लेना मैं आजाऊँगा, कोई खजूर रख जाता है, रोजाना कुछ न कुछ मेरे हक के साथ मौजूद होता है। न माँ हिलने देती है न मेरे राम कुछ कमी रहने देता है माँ कहती है तेरा फल मेरा राम अपने फरिश्तों से बिकवा देता है।


आखिर में इतना ही कहूँगा की अपने मां बाप की सेवा करो, और देखो दुनिया की कामयाबियाँ कैसे हमारे कदम चूमती है।

लक्ष्मी जी कहाँ निवास करतीं हैं - प्रेरक कहानी

 एक बार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे के रूप में छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए उन्हें ढूँढ रहे थे। एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताया। साथ ही उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया।



तभी राजा बलि के शरीर से एक दिव्य रूपात्मा स्त्री निकली।

उसे देखकर इन्द्र ने पूछा: दैत्यराज! यह स्त्री कौन है? देवी, मानुषी अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है?

राजा बलि बोले: देवराज! ये देवी तीनों शक्तियों में से कोई नहीं हैं। आप स्वयं पूछ लें।


इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोलीं: देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते हैं और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वी लोक पर लोग मुझे अनेक नामों से पुकारते हैं। जैसे- श्री, लक्ष्मी आदि।

इन्द्र बोले: देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप इन्हें छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं?


लक्ष्मी जी बोलीं: देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूँ। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उसके पास रहती हूँ। अर्थात मैं समयानुसार एक को छोड़कर दूसरे के पास निवास करती हूँ।


इन्द्र बोले: देवी! आप असुरों के यहाँ निवास क्यों नहीं करतीं?

लक्ष्मी जी बोलीं: देवेन्द्र! मेरा निवास वहीं होता है जहाँ सत्य हो, धर्म के अनुसार कार्य होते हों, व्रत और दान देने के कार्य होते हों। लेकिन असुर भ्रष्ट हो रहे हैं। ये पहले इन्द्रियों को वश में कर सकते थे, सत्यवादी थे, ब्राह्मणों की रक्षा करते थे, पर अब इनके ये गुण नष्ट होते जा रहे हैं।...


...ये तप-उपवास नहीं करते, यज्ञ, हवन, दान आदि से इनका कोई संबंध शेष नहीं है। पहले ये रोगी, स्त्रियों, वृद्धों, दुर्बलों की रक्षा करते थे, गुरुजन का आदर करते थे, लोगों को क्षमादान देते थे। लेकिन अब अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध, आलस्य, अविवेक, काम आदि ने इनके शरीर में जगह बना ली है। ये लोग पशु तो पाल लेते हैं लेकिन उन्हें चारा नहीं खिलाते, उनका पूरा दूध निकाल लेते हैं और पशुओं के बच्चे भूख से चीत्कारते हुए मर जाते हैं।..


..ये अपने बच्चों का लालन-पालन करना भूलते जा रहे हैं। इनमें आपसी भाईचारा समाप्त हो गया है। लूट, खसोट, हत्या, व्यभिचार, कलह, स्त्रियों की पतिव्रता नष्ट करना ही इनका धर्म हो गया है। सूर्योदय के बाद तक सोने के कारण स्नान-ध्यान से ये विमुख होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मन इनसे उचट गया।..


देवताओं का मन अब धर्म में आसक्त हो रहा है। इसलिए अब मैं इन्हें छोड़कर देवताओं के पास निवास करूँगी। मेरे साथ श्रद्धा, आशा, क्षमा, जया, शान्ति, संतति, धृति और विजति ये आठों देवियाँ भी निवास करेंगी। देवेन्द्र! अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि मैंने इन्हें क्यों छोड़ा है। साथ ही आपको इनके अवगुणों का भी ज्ञान हो गया होगा।


तब इन्द्र ने लक्ष्मी को प्रणाम किया और उन्हें आदर सहित स्वर्ग ले गए।

जब तक दुख नहीं मिलते, प्रभु की याद नहीं आती - प्रेरक कहानी

 एक दिन किसी निर्माण के दौरान भवन की छटी मंजिल से सुपर वाईजर ने नीचे कार्य करने वाले मजदूर को आवाज दी।


निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण नीचे काम करने वाला मजदूर कुछ समझ नहीं सका की उसका सुपरवाईजर उसे आवाज दे रहा है।


फिर सुपरवाईजर ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक १० रु का नोट नीचे फैंका, जो ठीक मजदूर के सामने जा कर गिरा।


मजदूर ने नोट उठाया और अपनी जेब मे रख लिया, और फिर अपने काम मे लग गया ।


अब उसका ध्यान खींचने के लिए सुपर वाईजर ने पुन: एक ५०० रु का नोट नीचे फैंका।


उस मजदूर ने फिर वही किया और नोट जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया।


ये देख अब सुपर वाईजर ने एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा लिया और मजदूर के उपर फैंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा।


अब मजदूर ने ऊपर देखा और उसकी सुपर वाईजर से बात चालू हो गयी।


ये वैसा ही है जो हमारी जिन्दगी मे होता है।


भगवान् हमसे संपर्क करना, मिलना चाहता है, लेकिन हम दुनियादारी के कामो मे व्यस्त रहते है, अत: भगवान् को याद नहीं करते।


भगवान् हमें छोटी छोटी खुशियों के रूप मे उपहार देता रहता है, लेकिन हम उसे याद नहीं करते, और वो खुशियां और उपहार कहाँ से आये ये ना देखते हुए, उनका उपयोग कर लेते है, और भगवान् को याद नहीं करते।


भगवान् हमें और भी खुशियों रूपी उपहार भेजता है, लेकिन उसे भी हम हमारा भाग्य समझ कर रख लेते है, भगवान् का धन्यवाद नहीं करते, उसे भूल जाते है।


तब भगवान् हम पर एक छोटा सा पत्थर फैंकते है, जिसे हम कठिनाई कहते है, और तुरंत उसके निराकरण के लिए भगवान् की और देखते है, याद करते है।


यही जिन्दगी मे हो रहा है यदि हम हमारी छोटी से छोटी ख़ुशी भी भगवान् के साथ उसका धन्यवाद देते हुए बाँटें, तो हमें भगवान् के द्वारा फैंके हुए पत्थर का इन्तजार ही नहीं करना पड़ेगा।

हमारी लालसाएँ और वृत्तियाँ नहीं बदलती - प्रेरक कहानी

 एक पेड़ पर दो बाज रहते थे। दोनों अक्सर एक साथ शिकार की तलाश में निकलते और जो भी पाते, उसे शाम को मिल-बांट कर खाते। कभी-कभी दोनों को दो अलग-अलग शिकार भी मिल जाते थे।


बहुत दिन से उनका यही क्रम चल रहा था। एक दिन दोनों शिकार के लिए निकले, तो एक को एक साँप मिला और दूसरे को एक चूहा।


अपना-अपना शिकार चोंच में दबाए दोनों पेड़ पर वापस लौटे और एक-दूसरे की शिकार कथा सुनने के लिए एक डाल पर पास-पास बैठ गए। दोनों ने अभी तुरंत ही झपट्टा मार कर अपना शिकार पकड़ा था और उन्हें बस चोंच में दबा रखा था, इसलिए साँप और चूहा- दोनों ही शिकार तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की तो सांप ने चूहे की ओर देखा और चूहे ने सांप को।


सांप, चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा सांप के प्रयत्नों को देखकर अपने ही शिकारी बाज के डैनों में छिपने का उपक्रम करने लगा। यह दृश्य देखकर एक बाज गंभीर हो गया और विचारमग्न सा दिखने लगा। दूसरे ने उससे पूछा, दोस्त! यह दार्शनिकों की तरह किस चिंतन में डूब गए?


पहले बाज ने अपने पकड़े हुए सांप की ओर संकेत करते हुए कहा, देखते नहीं यह कैसा मूर्ख प्राणी है। जीभ की लिप्सा के आगे इसे अपनी मौत का विस्मरण हो रहा है। तब दूसरे बाज ने अपने चूहे की ओर देखते हुए कहा, यह भी तो उतना ही नासमझ है। भय इसे प्रत्यक्ष मौत से भी अधिक डरावना लगता है। पता है कि अगले ही पल मेरा निवाला बनने वाला है, तब भी साँप को देख कर मेरे डैनों में छुपने की कोशिश कर रहा है।


वहीं पेड़ के नीचे एक मुसाफिर बैठा सुस्ता रहा था। उसने दोनों बाजों की बात सुनी और सोचने लगा, हम मनुष्यों की दशा भी इसी सांप और चूहे की तरह है। अंतिम क्षणों तक जीवन की आशा नहीं छूटती और न हमारी लालसाएँ और वृत्तियाँ ही बदलती हैं।

बहरे भक्त का सत्संग प्रेम - प्रेरक कहानी

 एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था। उसे कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे। एकदम बहरा, एक शब्द भी सुन नहीं सकता था।


किसी ने संतश्री से कहा - बाबा जी! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते-सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं।

बहरे मुख्यत - दो बार हँसते हैं, एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब और दूसरा, अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं।

बाबा जी ने कहा - जब बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है? रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है। चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है, घंटों बैठा रहता है।


बाबाजी सोचने लगे, बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा। रस नहीं आता होगा तो यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए, उठकर चले जाना चाहिए। यह जाता भी नहीं है!


बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहा - कथा सुनाई पड़ती है?

उसने कहा - क्या बोले महाराज?

बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछा - मैं जो कहता हूँ, क्या वह सुनाई पड़ता है?

उसने कहा - क्या बोले महाराज?


बाबाजी समझ गये कि यह नितांत बहरा है। बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखकर पूछा।

वृद्ध ने कहा - मेरे कान पूरी तरह से खराब हैं। मैं एक भी शब्द नहीं सुन सकता हूँ।

कागज कलम से प्रश्नोत्तर शुरू हो गया।

फिर तुम सत्संग में क्यों आते हो?

बाबाजी! सुन तो नहीं सकता हूँ लेकिन यह तो समझता हूँ कि ईश्वरप्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं। संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती हैं। मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूँ पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं।


दूसरी बात, आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है।


बाबा जी ने देखा कि ये तो ऊँची समझ के धनी हैं।

उन्होंने कहा - आप दो बार हँसना, आपको अधिकार है किंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुँच जाते हैं और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों?


मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ। बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं। मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा। शुरुआत में कभी-कभी मैं बहाना बना के उसे ले आता था। मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहाँ ले आया, पत्नी बच्चों को ले आयी, सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गये।


ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आये तो क्या, सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन-निदिध्यासन करे उसके परम कल्याण में संशय ही क्या !

ज्ञानपिपासु विद्यार्थियों - प्रेरक प्रसंग

 एक गुरु के दो शिष्य थे। एक पढ़ाई में बहुत तेज और विद्वान था और दूसरा फिसड्डी। पहले शिष्य की हर जगह प्रसंशा और सम्मान होता था। जबकि दूसरे शिष्य की लोग उपेक्षा करते थे।


एक दिन रोष में दूसरा शिष्य गुरू जी के जाकर बोला- गुरूजी! मैं उससे पहले से आपके पास विद्याध्ययन कर रहा हूँ। फिर भी आपने उसे मुझसे अधिक शिक्षा दी?


गुरुजी थोड़ी देर मौन रहने के बाद बोले- पहले तुम एक कहानी सुनो। एक यात्री कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे प्यास लगी। थोड़ी दूर पर उसे एक कुआं मिला। कुएं पर बाल्टी तो थी लेकिन रस्सी नहीं थी। इसलिए वह आगे बढ़ गया।


थोड़ी देर बाद एक दूसरा यात्री उस कुएँ के पास आया। कुएँ पर रस्सी न देखकर उसने इधर-उधर देखा। पास में ही बड़ी-बड़ी घास उगी थी। उसने घास उखाड़कर रस्सी बटना प्रारम्भ किया।


थोड़ी देर में एक लंबी रस्सी तैयार हो गयी। जिसकी सहायता से उसने कुएँ से पानी निकाला और अपनी प्यास बुझा ली।


गुरु जी ने उस शिष्य से पूछा- अब तुम मुझे यह बताओ कि प्यास किस यात्री को ज्यादा लगी थी?

शिष्य ने तुरंत उत्तर दिया कि दूसरे यात्री को।


गुरूजी फिर बोले- प्यास दूसरे यात्री को ज्यादा लगी थी। यह हम इसलिए कह सकते हैं क्योंकि उसने प्यास बुझाने के लिए परिश्रम किया। उसी प्रकार तुम्हारे सहपाठी में ज्ञान की प्यास है। जिसे बुझाने लिए वह कठिन परिश्रम करता है। जबकि तुम ऐसा नहीं करते।


इस प्रकार शिष्य को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था। अब से वह भी कठिन परिश्रम में जुट गया।

इल्ली और घुन की कहानी (Elli Aur Dhun Ki Kahani)

 एक इल्ली और घुन था। इल्ली बोली आओ घुन कार्तिक स्नान करे, घुन बोला तू ही कार्तिक स्नान कर ले। मैं तो नहीं करूँगा। बाद में इल्ली तो राजा की लड़की के पल्ले के लगकर कार्तिक स्नान करती। घुन ने कार्तिक स्नान नहीं किया।


दोनों मर गये। बाद में इल्ली के कार्तिक स्नान के पुण्य के कारण राजा के घर जन्म हुआ और घुन राजा के घर गधा बन गया।


राजा ने बेटी का विवाह किया। बेटी ससुराल जाने लगी तो उसने अपनी पालकी रुकवाई और राजा से कहा यह गधा मुझे चाहिए। तब राजा ने कहा यह मत ले चाहे और धन दौलत ले ले पर लड़की नहीं मानी। मुझे तो यही चाहिए।


गधे को रथ के बांध दिया तो गधा दौड़ने लगा। महल में पहुँचने पर गधे को महल के नीचे बांध दिया। जब लड़की नीचे उतरती तो गधा कहता मुझे पानी पिलादे तब लड़की ने कहा मैंने पहले ही कहा था कार्तिक स्नान कर ले पर तूने कहा था मैं तो बाजरा खाऊँगा और ठंडा-ठंडा पानी पीऊँगा।


उनको बातें करते राजा ने सुन लिया, जब राजा ने कहा कि आप मुझे सारी बात बताओ तब रानी (लड़की) ने राजा को सारी बात बताई कि मैं पिछले जन्म में इल्ली थी और ये घुन था। तब मैंने कहा तू भी कार्तिक नहा ले पर वह नहीं नहाया। मैं कार्तिक स्नान के पुण्य से राजा के घर लड़की हुई और आपके घर में राज पाठ कर रही हूँ।


तब राजा ने कहा कि कार्तिक स्नान का इतना पुण्य है तो हम दोनों जोड़े से नहायेंगे। रानी-राजा ने अत्यंत प्रसन्न मन से कार्तिक स्नान कर दोनों ने दान–पुण्य किया और सारी नगरी में कहलवा दिया की सब कार्तिक स्नान कर नहाया हुआ पानी घुन पे डालेगे जिससे घुन की मोक्ष हुई।


हे कार्तिक! भगवान श्रीहरि विष्णु जैसा सुख इल्ली को दिया वैसा सबको देना।

हिन्दू या मुसलमान धर्मवीर भारती की कहानी |

 सरकारी अस्पताल के बरामदे में 30 लाशें एक कतार में रक्खी हुई थीं। लाशें, नहीं उन्हें लाशें कहना गलत होगा, मगर उन्हें जिन्दा भी नहीं कहा जा सकता था। वे सूखी हड्डियों के मुरदार ढाँचे जिन पर जर्द, झुर्रीदार चमड़ा मढ़ा हुआ था । कलकत्ते की विभिन्न सड़कों से मुरदे उठाकर लाये गये थे इलाज के लिये । उन्हें भूख की बीमारी हो गयी थी और इसीलिये वे चलते-चलते सड़क पर गिर पड़ते थे और धीरे-धीरे दम तोड़ देते थे । हिन्दोस्तान जैसे खराब आबोहवा के देश में जहाँ आये दिन एक बीमारी चल पड़ती है, यह भी एक नयी बीमारी चल निकली थी। झुण्ड के झुण्ड लोग गाँवों से चल पड़ते और चलते-चलते बिना दायीं और बायीं पटरी का ख्याल किये गिर पड़ते और फिर उठने का नाम न लेते। शासकों ने समझा यह सत्याग्रह का कोई नया तरीका है मरने दो; मेडिकल विभाग ने समझा यह मलेरिया की कोई नयी किस्म है जो बंगाल के लिए साधारण बात है। लेकिन बीमारी बढ़ती गयी। जब सड़कों पर पड़ी हुई लाशों की वजह से, मारवाड़ियों की मोटरें, दफ्तर की बसें और फौज की लारियों के आने-जाने में रुकावट होने लगी तो हमारी मेहरबान सरकार को फिक्र हुई, और इसीलिए वे 30 भुखमरे, सरकारी अस्पताल में जाँच के लिए लाये गये और सावधानी से बरामदों में नरम और सीले हुए पक्के फर्शो पर लिटा दिये गये ।


डाक्टर परेशान थे, नर्सों परेशान थीं। यह भी क्या बीमारी है ? और एकदम से तीस नये मरीज ।


बरामदे में शान्ति थी । एक सुनसान कब्रगाह की तरह डरावनी खामोशी । मुरदे खामोश थे। एकाएक खटखट की आवाज हुई और एक नर्स बरामदे की सीढ़ियों पर चढ़ती हुई दीख पड़ी। चढ़ने में उसका मोजा नीचे खिसक गया और वह रुक कर उसे ठीक करने लगी। उसके जूतों की खटखट शायद किसी भुखमरे के बेहया दिल से जा टकराई। उसने करवट बदली। नर्स आगे बढ़ी और जब उसके पास से गुजरने लगी तो उसने बेबस निगाहें उठाकर नर्स की ओर देखा और बहुत प्रयत्न कर बोला- “पानी।”


नर्स पल भर को ठिठकी ।


“उहँ, कहाँ तक कोई काम करे सुबह से पोशाक भी तो नहीं सम्हाल पायी हूँ।” वह आगे बढ़ गयी ।


मरीज की प्यासी पसलियों से फिर दर्दनाक कराह उठी- “पानी ।”


“मरने दो !” नर्स ने कहा। और बगल के कमरे में एक शीशे के सामने खड़े होकर गले में बँधे रूमाल की गाँठ खोलने लगी ।


नर्स परेशान थी । गाँठ खुल ही नहीं रही थी। वह आदमी चुप हो गया। नर्स ने अपनी पोशाक ठीक की और चली गयी।


मरीज की कराह बन्द न हुई । बगल की लाश में कुछ हरकत हुई और कम्बल उठाकर एक बुढ़िया ने सर बाहर निकाला। उसके बाद वह उठी और कंकालों की तरह लड़खड़ाते हुए एक टीन के डब्बे में पानी लायी और मरीज के मुँह से लगा दिया। वह अपनी दम तोड़ रहा था। पहला घूँट गले से उतरा मगर दूसरा घूँट हिचकी के कारण नीचे गिर गया। बुढ़िया ने क्षण भर मायूसी से मरीज की ओर देखा और उसके बाद चुपचाप कम्बल के नीचे लुढ़क गयी ।


इतने में नर्स डाक्टर को साथ लेकर लौटी और प्यासे मरीज की ओर इशारा किया। डाक्टर ने स्टेथेस्कोप लगाकर देखा। उस कम्बख्त की प्यास हमेशा के लिए बुझ गयी थी । डाक्टर ने स्टेथेस्कोप हटाया और अजीब आवाज में कहा – “खतम।”…


फिर जेब से नोटबुक निकाली। घड़ी देखकर टाइम दर्ज किया और नर्स से पूछा – “यह भुखमरा कहाँ से लाया गया था।”


“सप्लाई आफिस के सामने से ! नर्स ने जवाब दिया ।


” हिन्दू था, या मुसलमान ।”


“मालूम नहीं।”


“मालूम नहीं ? अच्छा इसके बगलवाले मरीज से पूछो ?”


नर्स ने बगल वाले मरीज को उठाया। वह नहीं उठा।


डाक्टर ने जूते से कम्बल उलट दिया और डाँटकर कहा- “उठो ?”


बुढ़िया काँपकर उठ बैठी ।


“यह आदमी कौन था ?” डाक्टर ने पूछा ।


“हुजूर यह आदमी भूखा था ।”


“भूखा था ? यह कौन पूछता है-ठीक से जवाब दो।” डाक्टर ने डाँटा ।


“देखो ! यह सरकारी काम है ! नर्स ने आहिस्ते से समझाया- “सरकार यह नहीं पूछती कि यह आदमी भूखा था या प्यासा । सरकार यह पूछती है कि यह आदमी हिन्दू था या मुसलमान ? बोलो अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज करना है।”


“मालूम नहीं हुजूर !” बुढ़िया बोली ।


“उहँ जाने दो। अच्छा उधर वाले मरीज से पूछो ?”


उधर वाला मरीज बोला ही नहीं। नर्स ने डाँटकर पूछा तब भी उसने जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह मर चुका था और मुरदों को मजहब की पहचान नहीं होती क्योंकि वे ईश्वर के समीप पहुँच जाते हैं।


डाक्टर एक और नया मुरदा देखकर चिन्तित हुआ। उसने स्टेथेस्कोप लेकर जाँच करनी शुरू की। लगभग इक्कीस भुखमरे मर चुके थे ।


डाक्टर ने अपने सहकारी को बुलाया और कहा – “देखो इन बचे हुए भुखमरों को एक-एक तेज इंजेक्शन देकर निकाल दो। वरना ये भी मर जायँगे ।”


“यदि यहाँ नहीं तो बाहर मर जायँगे ! सहकारी ने उत्तर दिया। “बाहर मरने की परवाह नहीं । यहाँ मरेंगे तो सरकार की बदनामी होगी। और देखो – अखबार को रिपोर्ट दो कि कुल 7 की मौत हुई। बाकी यहाँ लाने के पहले ही मर चुके थे। समझे।” और थोड़ी देर बाद बाकी भुखमरे निकाल दिये गये ।


बुढ़िया बेहद कमजोर थी। वह पाँच कदम चली और बैठ गयी। पेट में जब भूख आँतों को मरोड़ने लगी तब वह फिर उठी और किसी तरह घसिटती हुई आगे बढ़ी।


बगल में एक साबुन की कम्पनी थी जिसके दरवाजे पर एक मोटा पंजाबी दरबान बैठा था । बुढ़िया उसके सामने गयी और हाथ फैला दिये। लेकिन कुछ बोल न पायी। गले में आत्मसम्मान आकर रुँध गया। पंजाबी ने देखा और एक क्रूर हँसी हँसकर बोला- “चल ! चल ! आगे बढ़, अगर तू जवान होती तो इज्जत बेचने पर शायद 8-10 पैसे मिल भी जाते- अब किस बिरते पर भीख माँगने आयी है। I चल हट ?”


बुढ़िया की झुर्रीदार पलकों में दो बेहया आँसू झलक गये ।


वह चलने को मुड़ी कि पंजाबी बोला- “तुझे खैरात चाहिए । यहाँ खैरात की कमी नहीं। हिन्दुस्तानी तो अपने बाप के मरने पर खैरात करते हैं, फिर जिन्दा लाशों के लिए क्यों न खैरात करेंगे। उधर जा, वहाँ सेठों ने धाबा खोल रक्खा है।”


बुढ़िया उधर की ओर चली। भोजनालय के द्वार पर बेहद भीड़ थी । हड्डियों के अनगिनत कंकाल प्रेतों की भाँति सूखे हाथ फैलाकर बैठे थे। उबले हुए ज्वार की महक हवा में फैल रही थी। बुढ़िया ने एक गहरी साँस ली जैसे साँसों के सहारे पेट भरने की कोशिश कर रही हो ।


कार्यकर्ताओं ने जुआर की खिचड़ी से भरी हुई एक देग लाकर सामने रक्खी और करछुल से निकालकर जुआर बाँटने लगे। एक हंगामा-सा मच गया। बुढ़िया उठी और कुत्ते को भगाकर देग खिसकाने का व्यर्थ प्रयास करने लगी ।


इतने में एक कार्यकर्त्ता चीखा- “देखो ! देखो उसने देग छू ली।” “देग छू ली ! हिन्दू है या मुसलमान ?”


“मुसलमान मालूम देती है।”


” निकाल दो कमबख्त को ?”


बुढ़िया लाञ्छना से पीड़ित होकर उठ गयी। उसका कसूर क्या था ? क्या मुसलमान कुत्तों से भी बदतर होते हैं ?


वह उठी और सर झुकाकर चल दी।


सामने ही एक दूसरा धाबा था। उसकी हिम्मत न हुई वहाँ जाने की, लेकिन उस पर चाँद-तारे का एक हरा झण्डा लगा हुआ था । उसको कुछ सान्त्वना हुई और वह वहाँ चली गयी। सामने एक वालन्टियर था । उसने रोका – “यहाँ सिर्फ मुसलमानों को खाना मिलता है ।


“मैं भी मुस्लिम हूँ” बुढ़िया ने जवाब दिया । “सामने के धाबे से खाकर आयी है, काफिर है; साफ काफिर, शक्ल से नहीं देखते।” दूसरा वालन्टियर बोला-


“भाग ! भाग ! यहाँ काफिरों की गुजर नहीं चल हट ?”


बुढ़िया का चेहरा तमतमा गया और चीखकर बोली-


“खुदा के बन्दो ! अल्लाह ने अनाज के दानों पर मजहब की छाप लगाकर नहीं भेजा है। तुम्हारी ओछी बात सुनकर मुझे अपने मुसलमान होने में शरम आती है । “


“पागल है ?” एक बोला-


“भूख से दिमाग खराब हो गया है।”


“अल्लाह काफिरों को ऐसी ही सजा देता है।”


बुढ़िया कहती ही गयी – “तुम काफिरों को खाना नहीं देते, मत दो। मत दो कमबख्तो ! वह धरती अभी कहीं नहीं गयी जिसने हम सब को बिना मजहब के ख्याल के पैदा किया है। तुम्हारा अनाज लेने के बजाय उसी धरती पर मर जाना मैं ज्यादा पसन्द करूँगी। खुदा तुम्हारा भला करे ।”


और वह हाँफती हुई एक ओर चली गयी।


दूसरे दिन कलकत्ते के एक प्रमुख दैनिक में छपा था-


“बंगाल के इस अकाल में समस्त भारत, प्रान्त और धर्म का भेद-भाव भुलाकर सहायता कर रहा है। मारवाड़ियों और इस्फहानियों, दोनों ने सार्वजनिक भोजनालय खोले हैं। इस सम्बन्ध में हम सरकारी अस्पतालों की मूल्यवान सहायता भी नहीं भुला सकते। हम इन सबके हृदय से कृतज्ञ हैं।”


इसके नीचे एक छोटी-सी नगण्य और महत्त्वहीन खबर छपी थी ।


“यद्यपि सरकारी अस्पतालों के कार्य से भुखमरों की संख्या में भारी कमी है, फिर भी अभी मौतें बराबर हो रही हैं। मुस्लिम धाबे के नजदीक एक बुढ़िया की लाश पायी गयी है जो ठीक वक्त से अस्पताल न पहुँच पाने के कारण मर गयी। यह नहीं समझ में आता कि लाश जलायी जाय या दफनाई जाय, क्योंकि यह पहचान नहीं हो पायी है कि बुढ़िया हिन्दू थी या मुसलमान… ।”


**समाप्त**

सत्संग की सही शिक्षा - प्रेरक कहानी (Prerak Kahani: Satsang Ki Sahi Shiksha)

 एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो डिब्बों में मूँग के दाने दिये और कहाः ये मूँग हमारी अमानत हैं


ये सड़े गले नहीं बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आयेंगे तो इन्हें ले लेंगे।


संत तो तीर्थयात्रा के लिए चले गये। इधर एक शिष्य ने मूँग के डिब्बे को पूजा के स्थान पर रखा और रोज उसकी पूजा करने लगा।


दूसरे शिष्य ने मूँग के दानों को खेत में बो दिया। इस तरह दो साल में उसके पास बहुत मूँग जमा हो गये।


दो साल बाद संत वापस आये और पहले शिष्य से अमानत वापस माँगी तो वह अपने घर से डिब्बा उठा लाया और संत को थमाते हुए बोलाः


गुरूजी ! आपकी अमानत को मैंने अपने प्राणों की तरह सँभाला है। इसे पालने में झुलाया, आरती उतारी, पूजा- अर्चना की...


संत बोलेः अच्छा ! जरा देखूँ तो सही कि अन्दर के माल का क्या हाल है ?


संत ने ढक्कन खोलकर देखा तो मूँग में घुन लगे पड़े थे। आधे मूँग की तो वे चटनी बना गये, बाकी बचे-खुचे भी बेकार हो गये।


संत ने शिष्य को मूँग दिखाते हुए कहाः क्यों बेटा! इन्ही घुनों की पूजा अर्चना करते रहे इतने समय तक !


शिष्य बेचारा शर्म से सिर झुकाये चुप चाप खड़ा रहा।


इतने में संत ने दूसरे शिष्य को बुलवाकर उससे कहाः अब तुम भी हमारी अमानत लाओ।


थोड़ी देर में दूसरा शिष्य मूँग लादकर आया और संत के सामने रखकर हाथ जोड़कर बोलाः गुरूजी ! यह रही आपकी अमानत।


संत बहुत प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद देते हुए बोलेः बेटा ! तुम्हारी परीक्षा के लिए मैंने यह सब किया था।


मैं तुम्हें वर्षों से जो सत्संग सुना रहा हूँ, उसको यदि तुम आचरण में नहीं लाओगे, अनुभव में नहीं उतारोगे तो उसका भी हाल इस डिब्बे में पड़े मूँग जैसा हो जायेगा।

My Dream Leo Tolstoy Story In English , Russian Story In English Read Online My Dream Leo Tolstoy Story In English

 As a daughter she no longer exists for me. Can’t you understand? She simply doesn’t exist. Still, I cannot possibly leave her to the charity of strangers. I will arrange things so that she can live as she pleases, but I do not wish to hear of her. Who would ever have thought . . . the horror of it, the horror of it.”


He shrugged his shoulders, shook his head, and raised his eyes. These words were spoken by Prince Michael Ivanovich to his brother Peter, who was governor of a province in Central Russia. Prince Peter was a man of fifty, Michael’s junior by ten years.




On discovering that his daughter, who had left his house a year before, had settled here with her child, the elder brother had come from St. Petersburg to the provincial town, where the above conversation took place.


Prince Michael Ivanovich was a tall, handsome, white-haired, fresh coloured man, proud and attractive in appearance and bearing. His family consisted of a vulgar, irritable wife, who wrangled with him continually over every petty detail, a son, a ne’er-do-well, spendthrift and roue–yet a “gentleman,” according to his father’s code, two daughters, of whom the elder had married well, and was living in St. Petersburg; and the younger, Lisa–his favourite, who had disappeared from home a year before. Only a short while ago he had found her with her child in this provincial town.



Prince Peter wanted to ask his brother how, and under what circumstances, Lisa had left home, and who could possibly be the father of her child. But he could not make up his mind to enquire.



That very morning, when his wife had attempted to condole with her brother-in-law, Prince Peter had observed a look of pain on his brother’s face. The look had at once been masked by an expression of unapproachable pride, and he had begun to question her about their flat, and the price she paid. At luncheon, before the family and guests, he had been witty and sarcastic as usual. Towards every one, excepting the children, whom he treated with almost reverent tenderness, he adopted an attitude of distant hauteur. And yet it was so natural to him that every one somehow acknowledged his right to be haughty.



In the evening his brother arranged a game of whist. When he retired to the room which had been made ready for him, and was just beginning to take out his artificial teeth, some one tapped lightly on the door with two fingers.


“Who is that?”


“C’est moi, Michael.”


Prince Michael Ivanovich recognised the voice of his sister-in-law, frowned, replaced his teeth, and said to himself, “What does she want?” Aloud he said, “Entrez.”


His sister-in-law was a quiet, gentle creature, who bowed in submission to her husband’s will. But to many she seemed a crank, and some did not hesitate to call her a fool. She was pretty, but her hair was always carelessly dressed, and she herself was untidy and absent-minded. She had, also, the strangest, most un-aristocratic ideas, by no means fitting in the wife of a high official. These ideas she would express most unexpectedly, to everybody’s astonishment, her husband’s no less than her friends’.



“Fous pouvez me renvoyer, mais je ne m’en irai pas, je vous le dis d’avance,” she began, in her characteristic, indifferent way.


“Dieu preserve,” answered her brother-in-law, with his usual somewhat exaggerated politeness, and brought forward a chair for her.


Ca ne vous derange pas?” she asked, taking out a cigarette. “I’m not going to say anything unpleasant, Michael. I only wanted to say something about Lisochka.”


Michael Ivanovich sighed–the word pained him; but mastering himself at once, he answered with a tired smile. “Our conversation can only be on one subject, and that is the subject you wish to discuss.” He spoke without looking at her, and avoided even naming the subject. But his plump, pretty little sister-in-law was unabashed. She continued to regard him with the same gentle, imploring look in her blue eyes, sighing even more deeply.


“Michael, mon bon ami, have pity on her. She is only human.”


“I never doubted that,” said Michael Ivanovich with a bitter smile.


“She is your daughter.”


“She was–but my dear Aline, why talk about this?”


“Michael, dear, won’t you see her? I only wanted to say, that the one who is to blame–“


Prince Michael Ivanovich flushed; his face became cruel.


“For heaven’s sake, let us stop. I have suffered enough. I have now but one desire, and that is to put her in such a position that she will be independent of others, and that she shall have no further need of communicating with me. Then she can live her own life, and my family and I need know nothing more about her. That is all I can do.”


“Michael, you say nothing but ‘I’! She, too, is ‘I.'”


“No doubt; but, dear Aline, please let us drop the matter. I feel it too deeply.”


Alexandra Dmitrievna remained silent for a few moments, shaking her head. “And Masha, your wife, thinks as you do?”


“Yes, quite.”


Alexandra Dmitrievna made an inarticulate sound.


“Brisons la dessus et bonne nuit,” said he. But she did not go. She stood silent a moment. Then,–“Peter tells me you intend to leave the money with the woman where she lives. Have you the address?”


“I have.”


“Don’t leave it with the woman, Michael! Go yourself. Just see how she lives. If you don’t want to see her, you need not. HE isn’t there; there is no one there.”


Michael Ivanovich shuddered violently.


“Why do you torture me so? It’s a sin against hospitality!”


Alexandra Dmitrievna rose, and almost in tears, being touched by her own pleading, said, “She is so miserable, but she is such a dear.”


He got up, and stood waiting for her to finish. She held out her hand.


“Michael, you do wrong,” said she, and left him.


For a long while after she had gone Michael Ivanovich walked to and fro on the square of carpet. He frowned and shivered, and exclaimed, “Oh, oh!” And then the sound of his own voice frightened him, and he was silent.


His wounded pride tortured him. His daughter–his–brought up in the house of her mother, the famous Avdotia Borisovna, whom the Empress honoured with her visits, and acquaintance with whom was an honour for all the world! His daughter–; and he had lived his life as a knight of old, knowing neither fear nor blame. The fact that he had a natural son born of a Frenchwoman, whom he had settled abroad, did not lower his own self-esteem. And now this daughter, for whom he had not only done everything that a father could and should do; this daughter to whom he had given a splendid education and every opportunity to make a match in the best Russian society– this daughter to whom he had not only given all that a girl could desire, but whom he had really LOVED; whom he had admired, been proud of–this daughter had repaid him with such disgrace, that he was ashamed and could not face the eyes of men!


He recalled the time when she was not merely his child, and a member of his family, but his darling, his joy and his pride. He saw her again, a little thing of eight or nine, bright, intelligent, lively, impetuous, graceful, with brilliant black eyes and flowing auburn hair. He remembered how she used to jump up on his knees and hug him, and tickle his neck; and how she would laugh, regardless of his protests, and continue to tickle him, and kiss his lips, his eyes, and his cheeks. He was naturally opposed to all demonstration, but this impetuous love moved him, and he often submitted to her petting. He remembered also how sweet it was to caress her. To remember all this, when that sweet child had become what she now was, a creature of whom he could not think without loathing.


He also recalled the time when she was growing into womanhood, and the curious feeling of fear and anger that he experienced when he became aware that men regarded her as a woman. He thought of his jealous love when she came coquettishly to him dressed for a ball, and knowing that she was pretty. He dreaded the passionate glances which fell upon her, that she not only did not understand but rejoiced in. “Yes,” thought he, “that superstition of woman’s purity! Quite the contrary, they do not know shame–they lack this sense.” He remembered how, quite inexplicably to him, she had refused two very good suitors. She had become more and more fascinated by her own success in the round of gaieties she lived in.


But this success could not last long. A year passed, then two, then three. She was a familiar figure, beautiful–but her first youth had passed, and she had become somehow part of the ball-room furniture. Michael Ivanovich remembered how he had realised that she was on the road to spinsterhood, and desired but one thing for her. He must get her married off as quickly as possible, perhaps not quite so well as might have been arranged earlier, but still a respectable match.


But it seemed to him she had behaved with a pride that bordered on insolence. Remembering this, his anger rose more and more fiercely against her. To think of her refusing so many decent men, only to end in this disgrace. “Oh, oh!” he groaned again.


Then stopping, he lit a cigarette, and tried to think of other things. He would send her money, without ever letting her see him. But memories came again. He remembered–it was not so very long ago, for she was more than twenty then–her beginning a flirtation with a boy of fourteen, a cadet of the Corps of Pages who had been staying with them in the country. She had driven the boy half crazy; he had wept in his distraction. Then how she had rebuked her father severely, coldly, and even rudely, when, to put an end to this stupid affair, he had sent the boy away. She seemed somehow to consider herself insulted. Since then father and daughter had drifted into undisguised hostility.


“I was right,” he said to himself. “She is a wicked and shameless woman.”


And then, as a last ghastly memory, there was the letter from Moscow, in which she wrote that she could not return home; that she was a miserable, abandoned woman, asking only to be forgiven and forgotten. Then the horrid recollection of the scene with his wife came to him; their surmises and their suspicions, which became a certainty. The calamity had happened in Finland, where they had let her visit her aunt; and the culprit was an insignificant Swede, a student, an empty-headed, worthless creature–and married.


All this came back to him now as he paced backwards and forwards on the bedroom carpet, recollecting his former love for her, his pride in her. He recoiled with terror before the incomprehensible fact of her downfall, and he hated her for the agony she was causing him. He remembered the conversation with his sister-in-law, and tried to imagine how he might forgive her. But as soon as the thought of “him” arose, there surged up in his heart horror, disgust, and wounded pride. He groaned aloud, and tried to think of something else.


“No, it is impossible; I will hand over the money to Peter to give her monthly. And as for me, I have no longer a daughter.”


And again a curious feeling overpowered him: a mixture of self-pity at the recollection of his love for her, and of fury against her for causing him this anguish.


II


DURING the last year Lisa had without doubt lived through more than in all the preceding twenty-five. Suddenly she had realised the emptiness of her whole life. It rose before her, base and sordid– this life at home and among the rich set in St. Petersburg– this animal existence that never sounded the depths, but only touched the shallows of life.


It was well enough for a year or two, or perhaps even three. But when it went on for seven or eight years, with its parties, balls, concerts, and suppers; with its costumes and coiffures to display the charms of the body; with its adorers old and young, all alike seemingly possessed of some unaccountable right to have everything, to laugh at everything; and with its summer months spent in the same way, everything yielding but a superficial pleasure, even music and reading merely touching upon life’s problems, but never solving them–all this holding out no promise of change, and losing its charm more and more–she began to despair. She had desperate moods when she longed to die.


Her friends directed her thoughts to charity. On the one hand, she saw poverty which was real and repulsive, and a sham poverty even more repulsive and pitiable; on the other, she saw the terrible indifference of the lady patronesses who came in carriages and gowns worth thousands. Life became to her more and more unbearable. She yearned for something real, for life itself–not this playing at living, not this skimming life of its cream. Of real life there was none. The best of her memories was her love for the little cadet Koko. That had been a good, honest, straight-forward impulse, and now there was nothing like it. There could not be. She grew more and more depressed, and in this gloomy mood she went to visit an aunt in Finland. The fresh scenery and surroundings, the people strangely different to her own, appealed to her at any rate as a new experience.


How and when it all began she could not clearly remember. Her aunt had another guest, a Swede. He talked of his work, his people, the latest Swedish novel. Somehow, she herself did not know how that terrible fascination of glances and smiles began, the meaning of which cannot be put into words.


These smiles and glances seemed to reveal to each, not only the soul of the other, but some vital and universal mystery. Every word they spoke was invested by these smiles with a profound and wonderful significance. Music, too, when they were listening together, or when they sang duets, became full of the same deep meaning. So, also, the words in the books they read aloud. Sometimes they would argue, but the moment their eyes met, or a smile flashed between them, the discussion remained far behind. They soared beyond it to some higher plane consecrated to themselves.


How it had come about, how and when the devil, who had seized hold of them both, first appeared behind these smiles and glances, she could not say. But, when terror first seized her, the invisible threads that bound them were already so interwoven that she had no power to tear herself free. She could only count on him and on his honour. She hoped that he would not make use of his power; yet all the while she vaguely desired it.


Her weakness was the greater, because she had nothing to support her in the struggle. She was weary of society life and she had no affection for her mother. Her father, so she thought, had cast her away from him, and she longed passionately to live and to have done with play. Love, the perfect love of a woman for a man, held the promise of life for her. Her strong, passionate nature, too, was dragging her thither. In the tall, strong figure of this man, with his fair hair and light upturned moustache, under which shone a smile attractive and compelling, she saw the promise of that life for which she longed. And then the smiles and glances, the hope of something so incredibly beautiful, led, as they were bound to lead, to that which she feared but unconsciously awaited.


Suddenly all that was beautiful, joyous, spiritual, and full of promise for the future, became animal and sordid, sad and despairing.


She looked into his eyes and tried to smile, pretending that she feared nothing, that everything was as it should be; but deep down in her soul she knew it was all over. She understood that she had not found in him what she had sought; that which she had once known in herself and in Koko. She told him that he must write to her father asking her hand in marriage. This he promised to do; but when she met him next he said it was impossible for him to write just then. She saw something vague and furtive in his eyes, and her distrust of him grew. The following day he wrote to her, telling her that he was already married, though his wife had left him long since; that he knew she would despise him for the wrong he had done her, and implored her forgiveness. She made him come to see her. She said she loved him; that she felt herself bound to him for ever whether he was married or not, and would never leave him. The next time they met he told her that he and his parents were so poor that he could only offer her the meanest existence. She answered that she needed nothing, and was ready to go with him at once wherever he wished. He endeavoured to dissuade her, advising her to wait; and so she waited. But to live on with this secret, with occasional meetings, and merely corresponding with him, all hidden from her family, was agonising, and she insisted again that he must take her away. At first, when she returned to St. Petersburg, be wrote promising to come, and then letters ceased and she knew no more of him.


She tried to lead her old life, but it was impossible. She fell ill, and the efforts of the doctors were unavailing; in her hopelessness she resolved to kill herself. But how was she to do this, so that her death might seem natural? She really desired to take her life, and imagined that she had irrevocably decided on the step. So, obtaining some poison, she poured it into a glass, and in another instant would have drunk it, had not her sister’s little son of five at that very moment run in to show her a toy his grandmother had given him. She caressed the child, and, suddenly stopping short, burst into tears.


The thought overpowered her that she, too, might have been a mother had he not been married, and this vision of motherhood made her look into her own soul for the first time. She began to think not of what others would say of her, but of her own life. To kill oneself because of what the world might say was easy; but the moment she saw her own life dissociated from the world, to take that life was out of the question. She threw away the poison, and ceased to think of suicide.


Then her life within began. It was real life, and despite the torture of it, had the possibility been given her, she would not have turned back from it. She began to pray, but there was no comfort in prayer; and her suffering was less for herself than for her father, whose grief she foresaw and understood.


Thus months dragged along, and then something happened which entirely transformed her life. One day, when she was at work upon a quilt, she suddenly experienced a strange sensation. No–it seemed impossible. Motionless she sat with her work in hand. Was it possible that this was IT. Forgetting everything, his baseness and deceit, her mother’s querulousness, and her father’s sorrow, she smiled. She shuddered at the recollection that she was on the point of killing it, together with herself.


She now directed all her thoughts to getting away–somewhere where she could bear her child–and become a miserable, pitiful mother, but a mother withal. Somehow she planned and arranged it all, leaving her home and settling in a distant provincial town, where no one could find her, and where she thought she would be far from her people. But, unfortunately, her father’s brother received an appointment there, a thing she could not possibly foresee. For four months she had been living in the house of a midwife– one Maria Ivanovna; and, on learning that her uncle had come to the town, she was preparing to fly to a still remoter hiding-place.


III


MICHAEL IVANOVICH awoke early next morning. He entered his brother’s study, and handed him the cheque, filled in for a sum which he asked him to pay in monthly instalments to his daughter. He inquired when the express left for St. Petersburg. The train left at seven in the evening, giving him time for an early dinner before leaving. He breakfasted with his sister-in-law, who refrained from mentioning the subject which was so painful to him, but only looked at him timidly; and after breakfast he went out for his regular morning walk.


Alexandra Dmitrievna followed him into the hall.


“Go into the public gardens, Michael–it is very charming there, and quite near to Everything,” said she, meeting his sombre looks with a pathetic glance.


Michael Ivanovich followed her advice and went to the public gardens, which were so near to Everything, and meditated with annoyance on the stupidity, the obstinacy, and heartlessness of women.


“She is not in the very least sorry for me,” he thought of his sister-in-law. “She cannot even understand my sorrow. And what of her?” He was thinking of his daughter. “She knows what all this means to me–the torture. What a blow in one’s old age! My days will be shortened by it! But I’d rather have it over than endure this agony. And all that ‘pour les beaux yeux d’un chenapan’–oh!” he moaned; and a wave of hatred and fury arose in him as he thought of what would be said in the town when every one knew. (And no doubt every one knew already.) Such a feeling of rage possessed him that he would have liked to beat it into her head, and make her understand what she had done. These women never understand. “It is quite near Everything,” suddenly came to his mind, and getting out his notebook, he found her address. Vera Ivanovna Silvestrova, Kukonskaya Street, Abromov’s house. She was living under this name. He left the gardens and called a cab.


“Whom do you wish to see, sir?” asked the midwife, Maria Ivanovna, when he stepped on the narrow landing of the steep, stuffy staircase.


“Does Madame Silvestrova live here?”


“Vera Ivanovna? Yes; please come in. She has gone out; she’s gone to the shop round the corner. But she’ll be back in a minute.”


Michael Ivanovich followed the stout figure of Maria Ivanovna into a tiny parlour, and from the next room came the screams of a baby, sounding cross and peevish, which filled him with disgust. They cut him like a knife.


Maria Ivanovna apologised, and went into the room, and he could hear her soothing the child. The child became quiet, and she returned.


“That is her baby; she’ll be back in a minute. You are a friend of hers, I suppose?”


“Yes–a friend–but I think I had better come back later on,” said Michael Ivanovich, preparing to go. It was too unbearable, this preparation to meet her, and any explanation seemed impossible.


He had just turned to leave, when he heard quick, light steps on the stairs, and he recognised Lisa’s voice.


“Maria Ivanovna–has he been crying while I’ve been gone–I was–“


Then she saw her father. The parcel she was carrying fell from her hands.


“Father!” she cried, and stopped in the doorway, white and trembling.


He remained motionless, staring at her. She had grown so thin. Her eyes were larger, her nose sharper, her hands worn and bony. He neither knew what to do, nor what to say. He forgot all his grief about his dishonour. He only felt sorrow, infinite sorrow for her; sorrow for her thinness, and for her miserable rough clothing; and most of all, for her pitiful face and imploring eyes.


“Father–forgive,” she said, moving towards him.


“Forgive–forgive me,” he murmured; and he began to sob like a child, kissing her face and hands, and wetting them with his tears.


In his pity for her he understood himself. And when he saw himself as he was, he realised how he had wronged her, how guilty he had been in his pride, in his coldness, even in his anger towards her. He was glad that it was he who was guilty, and that he had nothing to forgive, but that he himself needed forgiveness. She took him to her tiny room, and told him how she lived; but she did not show him the child, nor did she mention the past, knowing how painful it would be to him.


He told her that she must live differently.


“Yes; if I could only live in the country,” said she.


“We will talk it over,” he said. Suddenly the child began to wail and to scream. She opened her eyes very wide; and, not taking them from her father’s face, remained hesitating and motionless.


“Well–I suppose you must feed him,” said Michael Ivanovich, and frowned with the obvious effort.


She got up, and suddenly the wild idea seized her to show him whom she loved so deeply the thing she now loved best of all in the world. But first she looked at her father’s face. Would he be angry or not? His face revealed no anger, only suffering.


“Yes, go, go,” said he; “God bless you. Yes. I’ll come again to-morrow, and we will decide. Good-bye, my darling– good-bye.” Again he found it hard to swallow the lump in his throat.


When Michael Ivanovich returned to his brother’s house, Alexandra Dmitrievna immediately rushed to him.


Well?”


“Well? Nothing.”


“Have you seen?” she asked, guessing from his expression that something had happened.


“Yes,” he answered shortly, and began to cry. “I’m getting old and stupid,” said he, mastering his emotion.


“No; you are growing wise–very wise.”


**The End**

महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...