Wednesday, October 2, 2024

अथ श्रीबैल कथा (कहानी) : गोनू झा

 "अरे वाह, पंडित जी ! बहुत शानदार बैल लिए जा रहे हैं ! कितने में मिला ?" गोनू झा अभी पशु मेले से निकले ही थे कि एक व्यक्ति ने उनसे पूछा ।


गोनू झा ने उस व्यक्ति की ओर देखा किन्तु उसे पहचान नहीं पाए। फिर भी अपने चेहरे पर औपचारिक मुस्कान लाकर बोले -" बस, संयोग से मिल गया-दस रुपए में । अच्छा लगा सो ले लिया । जरूरत भी थी ।"


“आइसा । लेकिन पंडित जी, आपको बैल मिला बहुत शानदार मगर एक ही क्यों, कम से कम एक जोड़ी बैल लेते...” उस अजनबी ने गोनू झा से पूछा ।


गोनू झा भी उससे बात करते हुए चल रहे थे – “अरे, क्या बताएँ भाई, मेरे पास एक जोड़ी बैल था । दस दिन हुए एक बैल बीमार पड़ा । दवा-दारू की मगर बचा नहीं पाया मर गया । इसीलिए एक बैल की जरूरत थी । ठीक-ठाक मिल गया इसलिए ले लिया । मेरे पास एक बैल इसी कद-काठी का है।"


कुछ दूर चलने के बाद वह व्यक्ति अपनी राह चला गया । गोनू झा सोचते रहे कि यह व्यक्ति कौन था, लेकिन वे उस व्यक्ति को याद नहीं कर पाए । राजदरबार में होने के कारण गोनू झा की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी । उन्हें जानने-पहचानने वाले लोग भी बहुत थे। उन्होंने सोचा-छोड़ो, रहा होगा कोई। अभी वे कुछ दूर ही चल पाए थे कि रास्ते में एक पगड़ीधारी व्यक्ति ने उन्हें कहा -" पा लागूं महोपाध्याय जी !"


गोनू झा संस्कृत के विद्वान थे और संस्कृत शिक्षा की श्रेष्ठतम उपाधि महोपाध्याय से विभूषित थे। उन्होंने जब अपने लिए 'महोपाध्याय' का सम्बोधन सुना तो वे चौंके । उन्होंने उस व्यक्ति की तरफ देखा तो एक झलक में ही पहचान गए-यह व्यक्ति उनके संस्कृत के आचार्य के यहाँ काम किया करता था । नाम था गोनउरा । गोनू झा ने उसका हालचाल पूछा। अन्ततः बातचीत पुनः बैल पर आ गई । गोनू झा ने पुनः बैल वृतान्त सुनाकर उसकी जिज्ञासा शान्त की । कुछ दूर चलकर गोनउरा भी गोनू झा से विदा लेकर अपने गाँव की ओर मुड़ गया ।


और अपने गाँव तक पहुँचते- पहुँचते गोनू झा को रास्ते में कम से कम पच्चीस लोग ऐसे मिले जिन्होंने उनसे बैल के बारे में पूछा और जिन्हें गोनू झा ने बैल के मरने से लेकर बैल के खरीदे जाने तक का वृतान्त कह सुनाया । अपने गाँव में गोनू झा सड़क से गुजर रहे हों और उन्हें टोकने वाला न मिले, ऐसा भला कैसे हो सकता था ! अब गाँव की राह में भी वही सिलसिला शुरू हो गया । बैल के बारे में हर दस-बीस कदम पर गोनू झा से कोई न कोई पूछ ही देता कि पंडित जी, यह बैल कितने में खरीदा ?


गोनू झा घर पहुँचते-पहुँचते इस प्रश्न से खीज -से गए। उन्हें लगने लगा कि यदि उनकी झल्लाहट बढ़ी तो हो सकता है कि बैल के बारे में पूछने वाले की वे ऐसी की तैसी कर दें । गोनू झा विवेकी तो थे ही । घर पहुँचकर बथान में बैल को खूँटे से बाँधा और उसे सानी पानी देकर, सहला -पुचकारकर अपने कमरे में गए।



पंडिताइन यानी कि उनकी पत्नी और उनका भाई भोनू झा, दोनों को बुलाकर उन्होंने कहा -" पशु मेले में दस रुपए में बैल खरीदकर लाया हूँ। दूसरे बैल के जोड़ का बैल है । जाकर बथान में बैल देख लो और अब इस बैल के बारे में मुझसे कुछ मत पूछना । थक गया हूँ, अब आराम करूँगा ।" कहते-कहते गोनू झा चौकी पर पसर गए ।


उन्होंने सोचा यदि कोई उपाय नहीं किया तो गाँव का हर आदमी आ-आकर बैल के बारे में पूछेगा ही । कोई बैल की नस्ल जानना चाहेगा तो कोई बैल की कीमत । कोई उन्हें बताएगा कि बैल की सानी में सरसों और तीसी की खली जरूर मिलाएँ तो कोई कहेगा कि हफ्ते में एक बार बैल को पाव भर नमक चटाएँ । किस -किसको वे बैल की कीमत और जाति बताते फिरेंगे और किस -किसको बताएँगे कि किस कारण से बैल खरीदना पड़ा । किस किससे नसीहत लेते रहेंगे कि बैल को कैसे पाला जाता है, क्या-क्या खिलाया जाता है । फिर कुछ मन ही मन तय कर लेने के बाद वे चौकी से उठे । हाथ-मुँह धोया । पंडिताइन ने उनके और भोनू झा के लिए भोजन परोस दिया । खा -पीकर गोनू झा सो गए ।


दूसरे दिन सबेरे-सबेरे गोनू झा बैल को बथान से निकालकर गाँव के बीच वाले हिस्से में ले गए और बैल को एक खेत में घुसा दिया जहाँ बैल मस्ती में चरने लगा । गोनू झा खुद एक पेड़ पर चढ़कर चिल्लाने लगे -" दौड़ो भाइयों, जल्दी आओ! आओ गाँववालो, जल्दी आओ! खेत में बाघ घुसा है, जल्दी आओ!"


उनकी चीख सुनकर गाँव के लोग अपने हाथ में लाठी, भाला, फरसा, तलवार आदि लिए दौड़ते आए। उन लोगों ने देखा, गोनू झा एक पेड़ पर चढ़े आवाज लगा रहे हैं । गोनू झा का चिल्लाना जारी था । जब उन्हें विश्वास हो गया कि पेड़ के नीचे गाँव के तमाम लोग जमा हो गए हैं तब उन्होंने चिल्लाना बंद किया ।


गाँववालों ने पूछा “कहाँ पंडित जी, कहाँ है बाघ ?"


गोनू झा ने पेड़ से उतरकर गाँववालों को खेत में चर रहे बैल को दिखाया-“वहाँ देखिए, दिखा आप लोगों को ?”


गाँव वाले बोले “नहीं, पंडित जी वहाँ तो बैल दिख रहा है बाघ नहीं।"


हाँ, ठीक दिख रहा है-बैल ही है, बाघ नहीं। और यह बैल मैंने कल दस रुपए में खरीदा है । मेरे पास पहले एक जोड़ा बैल था । दस-एक दिन पहले उसमें से एक बैल मर गया इसलिए मुझे यह बैल खरीदना पड़ा । अगर आप लोगों को बैल के बारे में कुछ और जानना-समझना हो तो पूछ लीजिए । कल शाम से मैं पचासों लोगों को जवाब देते-देते आजिज आ चुका हूँ । और अगर किसी को कुछ नहीं पूछना है तब सब लोग अपने-अपने काम में लग जाइए। मुझे आप लोगों को यही बताना था कि मैंने बैल खरीदा है । गाँव के जिन लोगों को यह बात नहीं मालूम हो उन्हें भी आप लोग बता दीजिए । मगर मेरी विनती है कि अब मुझसे इस बैल के बारे में कुछ मत पूछिए ।"


गाँव वाले अपने-अपने हरबा- हथियार के साथ लौट गए। कहाँ तो वे आए थे बाघ का शिकार करने, कहाँ गोनू झा के बैल का दर्शन करके अपना सा मुँह लिए लौट रहे थे।


गोनू झा अपनी मस्ती में मूंछों पर ताव देते हुए अपने घर पहुँचे। घर पहुँचने पर उनकी पत्नी ने पूछा -"इतने सबेरे कहाँ चले गए थे?"


गोनू झा ने खूटे से बैल बाँधते हुए कहा -"गाँव वालों को 'अथ श्रीबैल कथा' बाँचने गया था भाग्यवान !" इतना कहकर गोनू झा मुस्कुराने लगे ।

अन्धों की सूची में महाराज (कहानी)

 गोनू झा के साथ एक दिन मिथिला नरेश अपने बाग में टहल रहे थे। उन्होंने यूँ ही गोनू झा से पूछा कि देखना और दृष्टि-सम्पन्न होना एक ही बात है या अलग-अलग अर्थ रखते हैं ?


गोनू झा में बातें करने की अद्भुत सूझ थी । उन्होंने कहा-“महाराज, देखना एक क्रिया भर है, जैसे आप मुझे देख रहे हैं किन्तु दृष्टि में सूझ भी होती है जिससे भविष्य के लिए मार्गदर्शन मिल सकता है ।"


मिथिला नरेश को गोनू झा की बात पसन्द आई। उन्होंने गोनू झा से फिर पूछा-“मिथिला में दृष्टि-सम्पन्न कितने लोग होंगे ?"


गोनू झा ने तत्परता से कहा-“महाराज ! दृष्टिवान् व्यक्ति विरल होते हैं । आसानी से मिलते कहाँ हैं ?"


लेकिन महाराज का जिज्ञासु भाव बना रहा। उन्होंने पूछा-“फिर भी, कुछ तो होंगे ?"


गोनू झा ने महाराज से कहा-“मुझे कुछ दिनों की मोहलत दें तो मैं आपको ठीक -ठीक बता सकूँगा कि मिथिला में दृष्टि-सम्पन्न हैं भी या नहीं।"


महाराज शान्त हो गए । दूसरे दिन महाराज घोड़े पर सवार होकर गोनू झा के गाँववाले मार्ग से गुजर रहे थे। उन्होंने एक अजीब माजरा देखा । उन्होंने देखा कि सड़क के बीचोबीच कुछ लोग एक व्यक्ति को घेरे खड़े हैं । वे घोड़े से उतरकर भीड़ में गए यह देखने कि आखिर वहाँ हो क्या रहा है । भीड़ में शामिल होते ही उन्होंने पूछा-“यहाँ क्या हो रहा है ? मार्ग अवरुद्ध क्यों है ?"


तभी भीड़ के बीच में बैठे व्यक्ति ने उनसे कहा -" अपना नाम बताओ।"


महाराज ने देखा नाम बताने के लिए कहने वाला व्यक्ति कोई और नहीं, गोनू झा हैं जो सड़क के मध्य में एक खाट बुनने में लगे हैं और पास में ही एक कॉपी रखी है । जैसे ही उनसे कोई कुछ पूछता है, वैसे ही वे उससे उसका नाम पूछकर उस कॉपी में दर्ज कर लेते हैं ।


मिथिला नरेश को कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर गोनू झा यह क्या कर रहे हैं । उन्होंने गोनू झा से पूछ ही लिया-“यह क्या पंडित जी ? आप यहाँ इस हाल में, बीच सड़क पर बैठकर यह क्या कर रहे हैं ?"


उनकी ओर देखकर गोनू झा ने कॉपी उठाई और उसमें कुछ लिखने लगे ।


महाराज ने फिर पूछा – “अरे पंडित जी, कुछ तो बोलिए यह क्या लिख रहे हैं ?"



गोनू झा अपने स्थान से उठे और महाराज के कान में धीरे से फुसफुसाए -" खाते में आपका नाम दर्ज कर रहा था । “ “खाते में ? किस तरह के खाते में ?” महाराज ने पूछा। गोनू झा बोले-“आपने ही तो मिथिला के दृष्टि-सम्पन्न लोगों की संख्या बताने को कहा है, तो मैंने अपने गाँव से ही पड़ताल आरम्भ कर दी है । जल्दी ही पूरे मिथिला का आँकड़ा तैयार हो जाएगा ।"


महाराज ने जिज्ञासावश पूछा-“आपने खाते में मेरा नाम दर्ज किया है, वह कैसा खाता है ? मैं कुछ समझ नहीं पाया ?" गोनू झा ने कहा-“महाराज, यह खाता दृष्टिहीनों का है । इसमें उन्हीं लोगों का नाम शामिल है जिन्होंने मुझे खाट बुनते देखकर भी पूछा-आप क्या कर रहे हैं ? और क्षमा करें महाराज, आप भी अपवाद नहीं हैं ।"


महाराज को गोनू झा के कहने का अर्थ समझ में आ गया और उन्होंने गोनू झा से कहा -"बस, पंडित जी ! अब मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया । अब आप यह खाता पोथी बंद करें और अपनी सामान्य दिनचर्या में लगें ।"


महाराज की बातें सुनकर गोनू झा अनायास ही मुस्कुरा दिए ।

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