Thursday, November 30, 2023

ज्ञान की प्यास

 उन दिनों महादेव गोविंद रानडे हाई कोर्ट के जज थे। उन्हें भाषाएँ सीखने का बड़ा शौक था। अपने इस शौक के कारण उन्होंने अनेक भाषाएँ सीख ली थीं; किंतु बँगला भाषा अभी तक नहीं सीख पाए थे। अंत में उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने एक बंगाली नाई से हजामत बनवानी शुरू कर दी। नाई जितनी देर तक उनकी हजामत बनाता, वे उससे बँगला भाषा सीखते रहते।

रानडे की पत्नी को यह बुरा लगा। उन्होंने अपने पति से कहा, ‘‘आप हाई कोर्ट के जज होकर एक नाई से भाषा सीखते हैं। कोई देखेगा तो क्या इज्जत रह जाएगी ! आपको बँगला सीखनी ही है तो किसी विद्वान से सीखिए।’’

रानडे ने हँसते हुए उत्तर दिया, ‘‘मैं तो ज्ञान का प्यासा हूँ। मुझे जाति-पाँत से क्या लेना-देना ?’’

यह उत्तर सुन पत्नी फिर कुछ न बोलीं।

ज्ञान ऊँच-नीच की किसी पिटारी में बंद नहीं रहता।

गिलहरी और बुद्ध (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 भगवान बुद्ध आत्मज्ञान की खोज में तपस्या कर रहे थे। उनके मन में विभिन्न प्रकार के प्रश्न उमड़ रहे थे। उन्हें प्रश्नों का उत्तर चाहिए था लेकिन अनेक प्रयासों के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिली।


वे आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगे। अनेक कष्ट सहन किए, कई स्थानों की यात्राएं कीं परंतु जो समाधान उन्हें चाहिए था, वह उन्हें मिला नहीं।


एक दिन उनके मन में कुछ निराशा का संचार हुआ। सोचने लगे, धन, माया, मोह और संसार की समस्त वस्तुओं का भी त्याग कर दिया। फिर भी आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। क्या मैं कभी आत्मज्ञान प्राप्त कर सकूंगा ? मुझे आगे क्या करना चाहिए ?


इसी प्रकार के अनेक प्रश्न बुद्ध के मन में उठ रहे थे। तपस्या में सफलता की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही थी और इधर बुद्ध ने प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। वे उदास मन से इन्हीं प्रश्नों पर मंथन कर रहे थे।


इसी दौरान उन्हें प्यास लगी। वे अपने आसन से उठे और जल पीने के लिए सरोवर के पास गए। वहां उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा।


एक गिलहरी मुंह में कोई फल लिए सरोवर के पास आई। फल उससे छूटकर सरोवर में गिर गया। गिलहरी ने देखा, फल पानी की गहराई में जा रहा है।


गिलहरी ने पानी में छलांग लगी दी। उसने अपना शरीर पानी मे भिगोया और बाहर आ गई। बाहर आकर उसने अपने शरीर पर लगा पानी झाड़ दिया और पुनः सरोवर में कूद गई।


उसने यह क्रम जारी रखा। बुद्ध उसे देख रहे थे लेकिन गिलहरी इस बात से अनजान थी। वह लगातार अपने काम में जुटी रही। बुद्ध सोचने लगे, ये कैसी गिलहरी है! सरोवर का जल यह कभी नहीं सुखा सकेगी लेकिन इसने हिम्मत नहीं हारी। यह पूरी शक्ति लगाकर सरोवर को खाली करने में जुटी है।


अचानक बुद्ध के मन में एक विचार का उदय हुआ- यह तो गिलहरी है, फिर भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में जुटी है। मैं तो मनुष्य हूं। आत्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ तो मन में निराशा के भाव आने लगे। मैं पुनः तपस्या में जुट जाऊंगा।


इस प्रकार महात्मा बुद्ध ने गिलहरी से भी शिक्षा प्राप्त की और तपस्या में जुट गए। एक दिन उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया और वे भगवान बुद्ध हो गए।

कन्या अछूत नहीं (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 एक बार वैशाली के बाहर जाते धम्म प्रचार के लिए जाते हुए गौतम बुद्ध ने देखा कि कुछ सैनिक तेजी से भागती हुयी एक लड़की का पीछा कर रहे हैं । वह डरी हुई लड़की एक कुएं के पास जाकर खड़ी हो गई। वह हांफ रही थी और प्यासी भी थी। बुद्ध ने उस बालिका को अपने पास बुलाया और कहा कि वह उनके लिए कुएं से पानी निकाले, स्वयं भी पिए और उन्हें भी पिलाये। इतनी देर में सैनिक भी वहां पहुँच गये। बुद्ध ने उन सैनिकों को हाथ के संकेत से रुकने को कहा। उनकी बात पर वह कन्या कुछ झेंपती हुई बोली ‘महाराज! मै एक अछूत कन्या हूँ। मेरे कुएं से पानी निकालने पर जल दूषित हो जायेगा।’


बुद्ध ने उस से फिर कहा ‘पुत्री, बहुत जोर की प्यास लगी है, पहले तुम पानी पिलाओ।’



इतने में वैशाली नरेश भी वहां आ पहुंचे। उन्हें बुद्ध को नमन किया और सोने के बर्तन में केवड़े और गुलाब का सुगन्धित पानी पानी पेश किया। बुद्ध ने उसे लेने से इंकार कर दिया। बुद्ध ने एक बार फिर बालिका से अपनी बात कही। इस बार बालिका ने साहस बटोरकर कुएं से पानी निकल कर स्वयं भी पिया और गौतम बुद्ध को भी पिलाया। पानी पीने के बाद बुद्ध ने बालिका से भय का कारण पूछा। कन्या ने बताया मुझे संयोग से राजा के दरबार में गाने का अवसर मिला था। राजा ने मेरा गीत सुन मुझे अपने गले की माला पुरस्कार में दी। लेकिन उन्हें किसी ने बताया कि मै अछूत कन्या हूँ। यह जानते ही उन्होंने अपने सिपाहियों को मुझे कैद खाने में डाल देने का आदेश दिया । मै किसी तरह उनसे बचकर यहाँ तक पहुंची थी ।


इस पर बुद्ध ने कहा, सुनो राजन! यह कन्या अछूत नहीं है, आप अछूत हैं। जिस बालिका के मधुर कंठ से निकले गीत का आपने आनंद उठाया, उसे पुरस्कार दिया, वह अछूत हो ही नहीं सकती। गौतम बुद्ध के सामने वह राजा लज्जित ही हो सकते थे।

Wednesday, November 29, 2023

सबसे बड़ा गरीब

 एक महात्मा भ्रमण करते हुए नगर में से जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक रुपया मिला। महात्मा तो विरक्त और संतोषी व्यक्ति थे। वे भला उसका क्या करते? अतः उन्होंने किसी दरिद्र को यह रुपया देने का विचार किया। कई दिन तक वे तलाश करते रहे, लेकिन उन्हें कोई दरिद्र नहीं मिला।


एक दिन उन्होंने देखा कि एक राजा अपनी सेना सहित दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा है। साधु ने वह रुपया राजा के ऊपर फेंक दिया। इस पर राजा को नाराजगी भी हुई और आश्चर्य भी। क्योंकि, रुपया एक साधु ने फेंका था इसलिए उसने साधु से ऐसा करने का कारण पूछा।


साधु ने धैर्य के साथ कहा- ‘राजन्! मैंने एक रुपया पाया, उसे किसी दरिद्र को देने का निश्चय किया। लेकिन मुझे तुम्हारे बराबर कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला, क्योंकि जो इतने बड़े राज्य का अधिपति होकर भी दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा हो और इसके लिए युद्ध में अपार संहार करने को उद्यत हो रहा हो, उससे ज्यादा दरिद्र कौन होगा?’


राजा का क्रोध शान्त हुआ और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए उसने वापिस अपने देश को प्रस्थान किया।


प्रेरणाः- हमें सदैव संतोषी वृत्ति रखनी चाहिए। संतोषी व्यक्ति को अपने पास जो साधन होते हैं, वे ही पर्याप्त लगते हैं। उसे और अधिक की भूख नहीं सताती।

उपकार

 अफ्रीका बहुत बड़ा देश है। उस देश में बहुत घने वन हैं और उन वनों में सिंह, भालू, गैंडा आदि भयानक पशु बहुत होते हैं। बहुत से लोग सिंह का चमड़ा पाने के लिये उसे मारते हैं।


गरमी के दिनों में हाथी जिस रास्ते झरने पर पानी पीने जाते हैं, उस रास्ते में लोग बड़ा और गहरा गड्ढा खोद देते हैं, उस गड्ढे के चारों ओर भाले के समान नोंकवाली लकड़ियों को गाड़ देते हैं। फिर गड्ढे को पतली लकड़ियों और पत्तों से ढक देते हैं। जब हाथी पानी पीने निकलते हैं तो उनके दल में सबसे आगे- आगे चल रहा हाथी गड्ढे के ऊपर बिछी टहनियों के कारण गड्ढे को देख नहीं पाता और जैसे ही टहनियों पर पैर रखता है, टहनियाँ टूट जाती हैं और हाथी गड्ढे में गिर जाता है।


हाथी पकड़ने वाले उस हाथी को लाकर पहले कई दिनों भूखा रखते हैं। गड्ढे में भी हाथी कई दिन भूखा रखा जाता है, जिससे कमजोर हो जाने के कारण निकलते समय बहुत उधम न मचाए। भूख के मारे हाथी जब छटपटाने लगता है, तब एक आदमी उसे चारा देने जाता है। चारा देने के बहाने वह आदमी हाथी से धीरे- धीरे जान- पहचान कर लेता है और फिर हाथी को वही सिखाता है। शिक्षा देने के बाद हाथी को लोग बेच देते हैं।


कई बार हाथी पकड़ने के लिये जो गड्ढा बनाया जाता है, उसमें रात को धोखे से हिरन, नीलगाय, चीते या जंगल के दूसरे पशु भी गिर जाते हैं। गड्ढा बनाने वाले उन्हें भी निकाल लाते हैं। हाथी पकड़ने वालों ने अफ्रीका के जंगल में एक बार हाथी फँसाने के लिये गड्ढा बनाया और ढक दिया। रात में एक सिंह उस गड्ढे में गिर पड़ा। सिंह किसी छोटे पशु को पकड़ने दौड़ा होगा और भूल से गड्ढे में जा पड़ा होगा।


एक शिकारी उधर से निकला। उसने सिंह को गड्ढे में गिरा देखा। वीर पुरुष किसी को दुःख में देखकर उसे मारते नहीं, उसकी सहायता करते हैं। सिंह बार- बार उछलता था, परन्तु गड्ढे के चारों ओर गड़ी नोक वाली लकड़ियों से उसे चोट लगती थी और वह फिर गड्ढे में गिर जाता था। शिकारी ने एक रस्सी में दो लकड़ियों को बाँधा और पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ पर रस्सी खींचकर उसने लकड़ियाँ उखाड़ दी। शिकारी ने नीचे से लकड़ियाँ इसलिये नहीं उखाड़ी कि कहीं गड्ढे से निकलने पर सिंह उसे मार न डाले। दो लकड़ियाँ उखाड़ने से सिंह को रास्ता मिल गया। वह उछलकर गड्ढे से बाहर निकल आया और जंगल में चला गया।


वही शिकारी एक दिन एक झरने के किनारे पानी पीकर बंदूक रखकर बैठा था। वह बहुत थका था, इसलिये लेट गया और उसे नींद आ गयी। इतने में वहाँ एक चीता आया और शिकारी को मारने के लिये उस पर चढ़ बैठा, बेचारा शिकारी डर के मारे चिल्ला भी न सका।


इतने में एक भारी सिंह जोर से गर्जा। उसकी गर्जना सुनकर चीता पूँछ दबाकर भागने लगा; पर सिंह चीते के ऊपर कूद पड़ा और उसने चीते को मार डाला।


शिकारी समझता था कि चीते को मारकर सिंह अब उसे मारेगा; लेकिन सिंह आया और शिकारी के सामने बैठकर पूँछ हिलाने लगा। शिकारी ने पहचान लिया कि यह वही सिंह है, जिसे गड्ढे में से निकलने में शिकारी ने सहायता की थी।


सिंह जैसा भयंकर पशु भी अपने उपकार करने वाले को नहीं भूला था। तुम मनुष्य हो, तुम्हें तो कोई थोड़ा भी उपकार करे तो उसे नहीं भूलना चाहिये और उस परोपकारी की सेवा- सहायता करने के लिये सदा तैयार रहना चाहिये।

दो सिर वाला पक्षी : पंचतंत्र की कहानी

 एक तालाब में भारण्ड नाम का एक विचित्र पक्षी रहता था । इसके मुख दो थे, किन्तु पेट एक ही था । एक दिन समुद्र के किनारे घूमते हुए उसे एक अमृतसमान मधुर फल मिला । यह फल समुद्र की लहरों ने किनारे पर फैंक दिया था । उसे खाते हुए एक मुख बोला- "ओः, कितना मीठा है यह फल ! आज तक मैंने अनेक फल खाये, लेकिन इतना स्वादु कोई नहीं था । न जाने किस अमृत बेल का यह फल है ।"


दूसरा मुख उससे वंचित रह गया था । उसने भी जब उसकी महिमा सुनी तो पहले मुख से कहा- -"मुझे भी थोड़ा सा चखने को देदे ।"


पहला मुख हँसकर बोला- -"तुझे क्या करना है ? हमारा पेट तो एक ही है, उसमें वह चला ही गया है । तृप्ति तो हो ही गई है ।"


यह कहने के बाद उसने शेष फल अपनी प्रिया को दे दिया । उसे खाकर उसकी प्रेयसी बहुत प्रसन्न हुई ।


दूसरा मुख उसी दिन से विरक्त हो गया और इस तिरस्कार का बदला लेने के उपाय सोचने लगा ।


अन्त में, एक दिन उसे एक उपाय सूझ गया । वह कहीं से एक विषफल ले आया । प्रथम मुख को दिखाते हुए उसने कहा- "देख ! यह विषफल मुझे मिला है । मैं इसे खाने लगा हूँ ।"


प्रथम मुख ने रोकते हुए आग्रह किया- "मूर्ख ! ऐसा मत कर, इसके खाने से हम दोनों मर जायंगे ।"


द्वितीय मुख ने प्रथम मुख के निषेध करते-करते, अपने अपमान का बदला लेने के लिये विषफल खा लिया । परिणाम यह हुआ कि दोनों मुखों वाला पक्षी मर गया ।


सच ही कहा गया है कि संसार में कुछ काम ऐसे हैं, जो एकाकी नहीं करने चाहियें । अकेले स्वादु भोजन नहीं खाना चाहिये, सोने वालों के बीच अकेले जागना ठीक नहीं, मार्ग पर अकेले चलना संकटापन्न है; जटिल विषयों पर अकेले सोचना नहीं चाहिये।


(सीख : मिलकर काम करो।)

.............

सुवर्णसिद्धि ने कहा- “इसी पर मैंने कहा कि एक पेट और दो कंठ वाले...इत्यादि।” चक्रधर ने कहा--“भाई! सच है। तुम घर जा सकते हो, परन्तु अकेले मत जाना। कहा गया है कि--


अकेले कोई स्वाद नहीं लेना चाहिए, अकेले सोकर जागना नहीं चाहिए, अकेले रास्ता नहीं चलना चाहिए तथा अकेले अर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिए; और भी--


दूसरा कायर पुरुष ही क्‍यों न हो पर साथी होने से वह भी कल्याण कारक होता. है। केकड़े ने भी दुसरा साथी बनकर जीवन की रक्षा की।”


सुवर्णसिद्धि बोला--“यह कैसे ?”


उसने कहा--

हंस और राजकुमारी (बाल कहानी

 एक हंस था। वह नीलमणि तालाब में रहता था। तालाब निर्मल पानी से भरा था। वहाँ बड़े सुन्दर-सुन्दर कमल खिले रहते थे। हंस कमलों के बीच तैरता हुआ, न मालूम क्या, सोचा करता था। एक बार पूरब की राजकुमारी तालाब में नहाने आई। हंस को देखकर वह मुग्ध हो गई। उसने सखियों से कहा, 'कितना सुंदर हंस है यह! क्या मैं इसे घर नहीं ले जा सकती?'


कमलों से आवाज़ आई, ‘नहीं, नहीं, ऐसा मत करना। यह परियों की रानी का है।'


राजकुमारी ने पूछा, 'कहाँ रहती हैं परियों की रानी?'


कमल बोले, ‘आओ, चाहती हो, तो तुम्हें मिला दें।' वे उसे तालाब के बीचोंबीच ले गए। पलक झपकते ही वह परियों के महल में पहुँच गई। परियों ने उसे घेर लिया। फिर अपनी रानी के पास ले आईं। परियों की रानी ने पूछा, 'तुम कौन हो?'


राजकुमारी ने उत्तर दिया, 'मैं पूरब की राजकुमारी हूँ। आपके हंस को अपने घर ले जाना चाहती हूँ। जो कमल के फूल आपके दरवाजे पर पहरा दे रहे थे, वही मुझे आपके पास लाए हैं।'


परियों की रानी ने कहा, 'तुम हंस ले जाना चाहो, तो ले जा सकती हो, किंतु एक शर्त है।'


‘क्या?' पूरब की राजकुमारी ने चौंकते हुए पूछा।


'तुम अपनी सहेलियों को यहाँ छोड़ जाओ,' रानी बोली ।


'नहीं, नहीं, यह कैसे होगा? मैं सहेलियों के बिना कैसे रहूँगी?' राजकुमारी ने कहा ।


‘तब हंस भी हंसिनी के बिना कैसे रहेगा? वह भी मर जाएगा।' परियों की रानी ने कहा।


यह सुनकर राजकुमारी सोच में पड़ गई। उसे पता ही नहीं था कि पशु-पक्षी भी आपस में मिल-जुलकर रहते हैं। हंस के मरने की बात से उसे बहुत दुःख हुआ। वह बोली, 'हंसिनी के बिना क्या हंस सचमुच ही मर जाएगा? नहीं, नहीं, यह नहीं होगा । तब मैं हंस को नहीं ले जाऊँगी।' कहते हुए पूरब की राजकुमारी वापस जाने लगी।


चारों ओर पानी ही पानी था। जाती कैसे? उसे तैरना भी नहीं आता था। उसे सोच में डूबा हुआ देख परियों की रानी सब समझ गई। उसने अपनी सीपियों की सुंदर नाव मंगवाई। राजकुमारी को भेंट में बहुत से सुगंधित फूल और मीठे फल दे, विदा कर दिया। पूरब की राजकुमारी नाव में बैठकर तालाब से बाहर आ गई।

बुद्धि का बल

 विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां एक ज्योतिषी आ पहुंचा।


वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला, “मैं ज्ञानी हूँ ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?”

सभी शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे।

सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।


अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा।

सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे, बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी।


ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, “तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….”


ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा।

पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।


ज्योतिषी बोला, “तुम्हारे बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम लालची हो, और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।”

इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया। शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा, “गुरूजी, आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहा वो सब गलत है ?”


“नहीं पुत्रो, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है, उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है, क्रोध है, और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है, पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया, उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वश में किये रहता हूँ, बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया !” सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।

अछूत कौन ? (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 महात्मा बुद्ध प्रवचन सभा में आकर मौन बैठ गये। शिष्य समुदाय उनके इस मौन के कारण चिंतित हुए कि कहीं वे अस्वस्थ तो नहीं है। आखिर एक शिष्य ने पूछ ही लिया, "भन्‍ते ! आप आज इस तरह मौन क्‍यों हैं?” वे नहीं बोले तो दूसरे शिष्य ने फिर पूछा -"गुरुदेव ! आप स्वस्थ तो हैं?” बुद्ध फिर भी मौन ही बैठे रहे।


इतने में बाहर से एक व्यक्ति ने जोर से पूछा -“आज आपने मुझे धर्मसभा में आने की अनुमति क्‍यों नहीं दी?"


बुद्ध ने कोई उत्तर नहीं दिया और आंखें बन्द कर ध्यानमग्न हो गये। वह बाहर खड़ा व्यक्ति और जोर से बोला- "मुझे धर्मसभा में क्यों नहीं आने दिया जा रहा है?”


धर्मसभा में बैठे बुद्ध के शिष्यों में से एक ने उसका समर्थन करते हुए कहा- “भन्ते! उसे धर्मसभा में आने की अनुमति प्रदान कीजिये।”


महात्मा बुद्ध ने आंखें खोलीं और बोले- "नहीं, उसे अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि वह अछूत है।”


“अछूत ! मगर क्यों?” सारे शिष्य सुनकर आश्चर्य में पड़ गये कि भन्ते यह छुआछूत कब से मानने लग गये?


महात्मा बुद्ध ने शिष्य समुदाय के मन के भावों को ताड़ते हुए कहा "हां, वह अछूत है। वह आज अपनी पत्नी से लड़ कर आया है। क्रोध से जीवन की शांति भंग होती है। क्रोधी व्यक्ति मानसिक हिंसा करता है। इस क्रोध के कारण ही शारीरिक हिंसा होती है। क्रोध करने वाला अछूत होता है क्योंकि उसकी विचार तरंगें दूसरों को भी प्रभावित करती हैं। उसे आज धर्मसभा से बाहर ही रहना चाहिए। उसे वहां खड़े रह कर पश्चाताप की अग्नि में तप कर शुद्ध होना चाहिए।”

शिष्यगण समझ गये कि अस्पृश्यता क्या है और अछूत कौन है?


उस व्यक्ति को भी बहुत पश्चाताप हुआ । उसने कभी भी क्रोध न करने का प्रण लिया। बुद्ध ने उसे धर्मसभा में आने की अनुमति प्रदान की।

धैर्य (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 महात्मा बुद्ध को एक सभा में भाषण करना था । जब समय हो गया तो महात्मा बुद्ध आए और बिना कुछ बोले ही वहाँ से चल गए । तकरीबन एक सौ पचास के करीब श्रोता थे । दूसरे दिन तकरीबन सौ लोग थे पर फिर उन्होंने ऐसा ही किया बिना बोले चले गए ।इस बार पचास कम हो गए ।


तीसरा दिन हुआ साठ के करीब लोग थे महात्मा बुद्ध आए, इधर – उधर देखा और बिना कुछ कहे वापिस चले गए । चौथा दिन हुआ तो कुछ लोग और कम हो गए तब भी नहीं बोले । जब पांचवां दिन हुआ तो देखा सिर्फ़ चौदह लोग थे । महात्मा बुद्ध उस दिन बोले और चौदोहों लोग उनके साथ हो गए ।


किसी ने महात्मा बुद्ध को पूछा आपने चार दिन कुछ नहीं बोला । इसका क्या कारण था । तब बुद्ध ने कहा मुझे भीड़ नहीं काम करने वाले चाहिए थे । यहाँ वो ही टिक सकेगा जिसमें धैर्य हो । जिसमें धैर्य था वो रह गए।


केवल भीड़ ज्यादा होने से कोई धर्म नहीं फैलता है । समझने वाले चाहिए, तमाशा देखने वाले रोज इधर – उधर ताक-झाक करते है । समझने वाला धीरज रखता है । कई लोगों को दुनिया का तमाशा अच्छा लगता है । समझने वाला शायद एक हजार में एक ही हो ऐसा ही देखा जाता है ।

सुबह का सपना (कहानी) :

 बात असल में यों हुई। उन दिनों शहर में प्रदर्शनी चल रही थी। जाने की कभी तबीयत न हुई। आखिर एक दिन मेरे मित्र मुझे घर से पकड़ ले गए। शायद आखिरी दिन था उसका। चला गया, पर ऐसे जमघटों में अब मन नहीं जमता। वही चिर पहचाने चेहरे ...वही मस्ती और दिखावटी लापरवाही, जो नुमायश में घूमते वक़्त लोगों पर आ जाती है। उसे खूब देख चुका हूँ; देखते-देखते अभ्यस्त हो गया हूँ। सब कुछ साधारण हो गया है। इस नुमायशी जिन्दगी में कोई उतार चढ़ाव नहीं दीखता, सो जाकर सीधा एक पुस्तक-भण्डार पर खड़ा हो गया। मित्र कुछ अँगरेजी की पुस्तकें उलटने-पलटने लगे। मैंने सामने रखी एक पत्रिका उठा ली, उसे खोलने ही जा रहा था कि मित्र ने फुसफुसाकर कहा, “वाह-वाह, क्‍या चीज़ है!”


मैंने उनकी पसन्द-भरी आँखों की ओर देखा, तो जैसे पानी को दिशा मिल जाती है, वैसे ही मेरी दृष्टि अनायास उधर घूम गई, जिधर वह देख रहा था। यह एक कलेण्डर था, जिसमें दो स्वस्थ बच्चे, रुई सा सफेद कबतूर पकड़े थे। मन आपसे-आप खिल उठा। उन बच्चों की सारी मासूमियत और कोमलता जैसे हृदय में उतर गई। लगता था अभी यह लड़का अपने दोनों हाथों को झटका देकर कबूतर को आकाश की ओर छोड़ देगा। फिर दोनों-लड़का और लड़की-खिलखिला कर हँस उठेंगे। और तब इनकी आँखें और भी छोटी हो जाएँगी। गालों पर लाली दौड़ जाएगी। “वी लव पीस,” मित्र बड़बड़ाया। ध्यान भंग हो गया। तसवीर के नीचे दृष्टि रुकी। उन अक्षरों पर पड़ी जो मित्र ने पढ़े थे-“हमें शान्ति प्यारी है।' मेरा मन फिर भटक गया। शान्ति की बातें भी बहुत नई नहीं रह गई थीं। तस्वीर में एक अजीब-सी ताजगी जरूर थी।


मैंने जो पत्रिका उठाई थी, उसे देखने लगा। ऊपर किसी वनखण्ड का सुरम्य दृश्य छपा था। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर। और पलटा, गदराई फसलों की झूमती हुई बालियों की तसवीरें थीं। फिर कुछ सुख-बिलास की वस्तुओं के चित्र और उनके विज्ञापन। आगे कुछ आलीशान इमारतों के फोटो और उसके बाद युद्धस्थल की भयंकर तस्वीरें ! बारूद के उठते हुए गुबार, चील की तरह उड़ते हुए हवाई जहाज, धराशायी इमारतें, उजड़े हुए खेत, जिनमें सैनिक संगीनें आगे किए फसल रौंदते बढ़े जा रहे थे। वे भी अच्छे नहीं लगे पत्रिका बन्द कर दी। अन्तिम कवर का दृश्य फिर सामने था-युद्ध का महाभयंकर दृश्य। तबीयत अकुला उठी। सैनिकों की लाशों के ढेर, कटे हुए हाथ और टाँगें ! धरती की सतह से पृष्ठभूमि में उठता हुआ धुएँ का समुद्र | जैसे धरती के नीचे दबे किसी सुप्त जवालामुखी ने मुँह खोल दिया हो, अभी धुआँ है फिर लावा बह निकलेगा और...और इस बची हुई कुचली-त्रस्त घास और कटे-पंगु शरीर को भी ढक लेगा !

मित्र ने कहा, “चलो।"

मैं चल दिया।


नुमायश से कुछ तो खरीदना चाहिए, इसीलिए उसने औरों की देखा-देखी एक बहुत बड़ा -गुब्बारा ख़रीदकर मेरे हाथ में थमा दिया था। मुझे हँसी आ गई कि क्या खरीदारी का दिखावा जरूरी था ? वह अपनी साइकिल पर चढ़कर चला गया। गुब्बारा मेरे पास ही रह गया।


टहलता हुआ घर पहुँचा तो रात काफी जा चुकी थी। विचारों का कोई मजबूत सिलसिला नहीं था। जब कुछ समझ में नहीं आया तो उस गुब्बारे को ही सीने पर रखकर उँगलियों से धीरे-धीरे बजाकर तुप...तुप की आवाज पैदा करता रहा। गुब्बारे से कुछ हलकी बदबू आ रही थी,

जैसे कोई विषैली गैस।


धीरे-धीरे मैं उस तुप...तुप की आवाज़ में डूबता गया। एक अजीब मधुर संगीत था उसमें । बस केवल संगीत रह गया--और मैंने देखा, एक टिन के खाली डिब्बे पर दो नन्‍हें-नन्‍हें हाथ थापें दे रहे थे। वह मेरे पड़ोस की बेबी थी। अपनी गुदारी हथेलियों से उस डिब्बे को बजा रही थी। अनोखा समाँ बाँध रखा था उसने। बड़ी मौज में बजाए जा रही थी, तभी रानी आकर उससे बोली, “बुलउआ तो दे आई।”

अपनी ढोलक बजाना छोड़ बेबी बोली, “तब तो मेहमान आते होंगे, मेरी गुड़िया नहायी भी नहीं।”

रानी बोली, “नहीं, पहले घर की सफाई कर लो!”


बेबी ने परेशानी दिखाते हुए कहा, “तुम्हें क्या, तुम लड़के वाली बन कर बैठ गई, हमें हज़ार काम हैं, लड़की का ब्याह है, घर की सफाई-दावत...सभी तो अकेले करना है।” और इतना कहकर चप्पल वाले दफ़्ती के डिब्बे से गुड़िया की साड़ी निकालने लगी। एक रेशमी कतरन दिखाते हुए बोली, “ये गुड़िया की बनारसी साड़ी, है, सितारेदार।”

“मैंने तो गुड्डे के कपड़े दिल्ली से मँगवाए हैं ।” रानी ने शान दिखाते हुए कहा।


“बहुत-कुछ,” बेबी डींग सुनकर बड़बड़ाई, “राधा अम्मा की गठरी में से चुराए हैं। हमने देखा था।” और बेबी ने रानी की तरफ मुँह बिचका दिया।


“हमने तो माँगे थे, तू चोट्टिन है, तूने राधा की पेन्सिल चुराई थी...चोट्टिन...चोट्टिन ।” रानी ने बेबी की पोल खोलते हुए ताली बजाकर कहा।


बेबी ने तैश में आकर रानी के कपड़ों का डिब्बा फेंक दिया, झल्लाकर बोली, “हम नहीं खेलते, तू चोर...गुड्डा चोर...गुड्डे के घर वाले चोर।”

रानी ने कपड़े बटोरते हुए समझदारी से कहा, “ऐसे हम नहीं खेलते।”


...फिर न जाने क्या, जैसे जल में पड़ती परछाइयाँ हिलकर मिट गई हों। कुछ हलचल। अजीब-सा शोर, जिसमें वे स्वर डूब गए थे, दृश्य धुंधले पड़ने लगे। कुहरा-सा छाने लगा। उस कूहरे के बीच से सिर्फ़ रानी का मुख दिखाई दिया। वह कह रही थी, “बेबी, खेलो न !”

“सच्ची-सच्ची बोलो तो खेलूँगी...हूँ...” बेबी ने उठाया हुआ सामान जमीन पर रखते हुए कहा।

“अच्छा भाई, सच्ची-सच्ची गुड्डे के कपड़े दिल्ली से नहीं, यहीं से ख़रीदे थे, बस !” रानी ने समझौता कर लिया।



दोनों दफ़्ती के बनाए घरों के पास बैठ गईं। एक दूसरे के सहारे खड़े थे दोनों के घर। बस, दोनों की सीमाएँ नीम की सींकें रखकर अलग कर ली गई थीं। रानी के घर की चौखट से लगा गुड्डा खड़ा था, पर बेबी की गुड़िया शरम के मारे घर के भीतर बैठी थी। दियलियों का बना तराजू एक ओर रखा था और पालकी मकान के पीछे पड़ी थी। रानी के घर के सामने टीन की मोटर बारात के लिए तैयार थी।


“बहू, जरा खाना देख लेतीं।” बेबी खुद बोली और स्वयं ही जवाब भी दे दिया, “अच्छा भाई आयी, फुरसत मिले तब तो, एक काम हो ।” फिर रानी के घर सब तैयारी देखकर बोली, “रानी, धीरे-धीरे करो भाई, तुम तो जल्दी मचाए हो।”

“अरे अभी बारात चल थोड़े ही रही है।” रानी ने कहा।

“हमने नहाया तक नहीं, चलो नहा लें।” बेबी ने कहा और थोड़ा खिसक कर बैठ गई।


दोनों नहाने लगीं। सिर पर हाथ ले जाकर गुदगुदी-सी बाँह मुड़ी और कलाई मुड़ते ही मुट्ठी से पानी गिर गया...शू...शू की आवाज़...और दोनों हाथ-पैर रगड़ने लगीं। नहाना ख़त्म हुआ तो कपड़े बदले। पैर तक दोनों हाथ गए, फिर कमर पर आकर हवा में गाँठ लगाई। कन्धे पर इधर-उधर हाथ चलाकर दुपट्टा डाला और दोनों तैयार हो गईं। अब रानी का गुड्डा तैयार था। बेबी की गुड़िया भी तैयार थी। पर बेबी खाना बनाने में लगी थी। मिट्टी की पूरी, कचौरी, लड्डू और बरफी।


रानी के घर बैण्ड बज उठा। रानी मुँह में कागज की तुरही लगाए आवाज करती जा रही थी। बीच-बीच में झूमती हुई बोलती, “कुड़म-कुडुम की झइयम-झइयम...” और बेबी भी अपने घर बैठी मुस्करा-मुस्करा कर दूल्हे के घर के बाजों की आवाज़ पर मटकती जा रही थी।


पर बाजों की आवाज एकदम तेज हो गई...गड़गड़ाहट में बदल गई...घोर गर्जन। विषैली-सी महक उड़ने लगी और धुएँ के गहरे बादल चारों तरफ उभरने लगे। हवाई जहाजों की गन्‍नाहट और भगदड़ का मिला-जुला शोर। दूर खड़ी फसलों को रौंदकर बढ़ते हुए खूँखार सिपाहियों के दस्ते...बरदीधारी...मारी बूट और बन्दूकों में लगी संगीनें। क्षण-भर में ही वे सारे सिपाही अपनी लाल-लाल आँखें चमकाते, नथुने फड़काते एकाकार हो गए। वह सिर्फ एक सैनिक था। दैत्य की तरह ! जमीन पर टैंकों की तरह बड़े-बड़े पैर गड़ाए आसमान तक की ऊँचाई में खड़ा था। उसकी आँखों में ज्वालामुखी थे, नथुनों से विषैले धुएँ के गुब्बार निकल रहे थे। फिर वह चला और आगे बढ़ते-बढ़ते उसका आकार छोटा होता गया, वह सादा-सा आदमी रह गया। अरे, यह तो जैकब साहब का लड़का था। वह कमर पर हाथ रखे बहुत तेज नजरों से इधर-उधर पेड़ की शाख्रों को देख रहा था। जिधर किसी पक्षी के उड़ने की सरसराहट सुनाई पड़ती, उधर ही उसकी नज़र घूम जाती। इस पेड़ से उस पेड़, जैसे कोई पक्षी खो गया हो। आखिर उसकी दृष्टि कोठी के रोशनदान और कार्निस की मेड़ के बीच बैठे एक जंगली कबूतर पर पड़ी। बहुत तेज नजरों से उसने उसे देखा। रानी और बेबी भी सकपकायी-सी उसे देख रही थीं। उसने अपनी चौड़ी पेटी को थोड़ा कमर पर कसा और कोठी के भीतर चला गया।


रानी ने एक सन्देह-भरी दृष्टि बेबी की ओर डाली। बेबी ने जैसे सब कुछ समझते हर चुपचाप ख़ामोश नजरों से उत्तर दे दिया। दोनों की दृष्टि कार्निस की मेड़ और रोशनदान बीच बैठे उस जंगली कबूतर पर टिक गई जो बैठा सुस्ता रहा धा-सिलेटी-सा नरम पंखदार पक्षी, रेशम-से पंख, सेमल की रुई-से नरम और चिकने। बेबी और रानी असमंजस-भरी दृष्टि से ताकती रहीं। वह कबूतर आँखें बन्द कर लेता तो ज्वार के दाने की तरह सफेदी चमक उठतीं।


दोनों ने उधर ताका जिधर कोठी में वह आदमी घुस गया था। वहाँ कोई नहीं था। उन्होंने फिर अपना खेल शुरू कर दिया। रानी ने टीन की कार में गुड्डे को बैठाया। घुर्र-घुर्र की आवाज के बाद कार चल पड़ी। बेबी और रानी दोनों, मुँह से कागज की फुकनियाँ बजा रही थीं। इधर-उधर घुमाकर कार गुड़िया के दरवाज़े पर खड़ी कर दी गई। रौनक छा गई। फूल बरसाए गए। बाजे बजे। आखिर नीशा को कार से उतारकर लड़की के दरवाजे पर बिछी दियासलाई की खाट पर बैठा दिया गया। क्षण-भर में भाँवरें पड़ीं। ढोलक बजी। रानी ने जल्दी मचाई। बोली, “भाई जल्दी करो, नहीं तो गाड़ी छूट जाएगी।”


बेबी बनारसी साड़ी तह कर रही थी। पालकी बाहर आ गई। रानी ने उस पर रेशमी ओढ़नी डाल दी। काफी फुरती से तैयारी हो रही थी। दूल्हा बाहर दियासलाई के पलंग पर दीवार से टेक लगाए खड़ा था।

तभी उधर बूटों की आवाज हुई। आहट सुनकर रानी सतर्क हो गई। उन्होंने कबूतर की तरफ देखा। रानी बोली, “ढेला मार दो।”


“हाँ-हाँ, मार दो, जल्दी से,” बेबी ने खड़े होते हुए फुरती से कहा, “बहुत जल्दी, जल्दी...” और रानी ने अपनी बाँह पीछे करके एक ढेला कबूतर की तरफ फेंका। जैकब साहब का लड़का निशाना लगा रहा था। वह कंकड़ रोशनदान की लकड़ी पर भट्‌ से लगा। कबूतर ने गरदन घुमाई और हलकी सरसराहट के साथ उड़ चला।


रानी और बेबी कूदती हुई तालियाँ बजा-बजाकर शोर मचा रही थीं, “कित्ता अच्छा हुआ...हो...हो ।” उनकी तालियों में अजीब-सा संगीत था। उनके थिरकते पैरों में अनोखी लय थी।


इधर जैकब साहब का लड़का आग्नेय नेत्रों से इनको ताक रहा था। गुस्से से उसकी आँखों में आग-सी दहक उठी, नथुने फूल उठे। उसने जलती आँखों से दोनों को देखा। वे हँस रही थीं। शोर मचा रही थीं। तालियाँ पीटे जा रही थीं। खामोश करने के लिए उसने अपनी राइफिल से उधर ऊपर की ओर हवाई फायर कर दिया। रानी और बेबी सहमीं, दोनों ने एक दूसरे की बाँहें भींच लीं तो जैसे साहस आ गया, अपार साहस !


धड़ाके की गूँज हुई और सब-कुछ बदल गया। जैकब का लड़का खो गया था। एक क्षण को वही राक्षसी रूप उभरा...धुएँ के बादल उमड़े और सब शान्त हो गया...चारों ओर से हँसी की हल्की खिलखिलाहट की आवाज आ रही थी।

मेरी साँस की रफ़्तार बहुत तेज़ हो गई थी। नाक में विषैली गैस की महक भर रही थी।


क्षण-भर बाद ही चौंककर मेरी आँखें खुल गईं। देखा, वह बड़ा-सा गुब्बारा फूट गया था, उसकी खाल मेरे पंजे में थी और उसमें से बदबू आ रही थी। मुस्करा कर रह गया। सुबह काफी निखर आई थी।

“हाइड्रोजन बम पर प्रतिबन्ध की माँग! आज की ताजा ख़बर !”

चीख़ता हुआ अख़बार वाला नीचे सड़क से गुजर रहा था !

Tuesday, November 28, 2023

संतोष का फल

 एक बार एक देश में अकाल पड़ा। लोग भूखों मरने लगे। नगर में एक धनी दयालु पुरुष थे। उन्होंने सब छोटे बच्चों को प्रतिदिन एक रोटी देने की घोषणा कर दी। दूसरे दिन सबेरे बगीचे में सब बच्चे इकट्ठे हुए। उन्हें रोटियाँ बँटने लगीं।


रोटियाँ छोटी- बड़ी थीं। सब बच्चे एक- दूसरे को धक्का देकर बड़ी रोटी पाने का प्रयत्न कर रहे थे। केवल एक छोटी लड़की एक ओर चुपचाप खड़ी थी। वह सबसे अन्त में आगे बढ़ी। टोकरे में सबसे छोटी अन्तिम रोटी बची थी। उसने उसे प्रसन्नता से ले लिया और वह घर चली गयी।


दूसरे दिन फिर रोटियाँ बाँटी गयीं। उस लड़की को आज भी सबसे छोटी रोटी मिली। लड़की ने जब घर लौट कर रोटी तोड़ी तो रोटी में से सोने की एक मुहर निकली। उसकी माता ने कहा कि- ‘मुहरउस धनी को दे आओ।’ लड़की दौड़ी -दौड़ी धनी के घर गयी।’’


धनी ने उसे देखकर पूछा- ‘तुम क्यों आयी हो?’


लड़की ने कहा- ‘मेरी रोटी में यह मुहर निकली है। आटे में गिर गयी होगी। देने आयी हूँ। आप अपनी मुहर ले लें।’


धनी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसे अपनी धर्मपुत्री बना लिया और उसकी माता के लिये मासिक वेतन निश्चित कर दिया। बड़ी होने पर वही लड़की उस धनी की उत्तराधिकारिणी बनी।

घंटी की कीमत

 रामदास एक ग्वाले का बेटा था। रोज सुबह वह अपनी गायों को चराने जंगल में ले जाता। हर गाय के गले में एक-एक घंटी बँधी थी। जो गाय सबसे अधिक सुंदर थी उसके गले में घंटी भी अधिक कीमती बँधी थी।

एक दिन एक अजनबी जंगल से गुजर रहा था। वह उस गाय को देखकर रामदास के पास आया, ‘‘यह घंटी बड़ी प्यारी है ! क्या कीमत है इसकी ?’’

‘‘बीस रुपये।’’ रामदास ने उत्तर दिया।

‘‘बस, सिर्फ बीस रुपये ! मैं तुम्हें इस घंटी के चालीस रुपये दे सकता हूँ।’’


सुनकर रामदास प्रसन्न हो उठा। झट से उसने घंटी उतारकर उस अजनबी के हाथ में थमा दी और पैसे अपनी जेब में रख लिये। अब गाय के गले में कोई घंटी नहीं थी। घंटी की टुनक से उसे अन्दाजा हो जाया करता था। अतः अब इसका अन्दाजा लगाना रामदास के लिए मुश्किल हो गया कि गाय इस वक्त कहाँ चर रही है। जब चरते-चरते गाय दूर निकल आई तो अजनबी को मौका मिल गया। वह गाय को अपने साथ लेकर चल पड़ा।

तभी रामदास ने उसे देखा। वह रोता हुआ घर पहुँचा और सारी घटना अपने पिता को सुनाई। उसने कहा, ‘‘मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि वह अजनबी मुझे घंटी के इतने अच्छे पैसे देकर ठग ले जाएगा।’’

पिता ने, ‘‘ठगी का सुख बड़ा खतरनाक होता है। पहले वह हमें प्रसन्नता देता है, फिर दुःख। अतः हमें पहले ही से उसका सुख नहीं उठाना चाहिए।’’

लालच से कभी सुख नहीं मिलता।

सफलता का रहस्य

 सफलता का रहस्य क्या है? जब यह प्रश्न एक युवक ने युनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से किया तो इस प्रश्न के उत्तर में सुकरात ने उस युवक को कल सुबह नदी किनारे मिलने के लिए कहा।


अगले दिन सुबह के समय वह युवक और सुकरात दोनों नदी किनारे पहुंच गए। सुकरात ने नौजवान युवक से उनके साथ पानी में आगे बढ़ने को कहा। युवक सुकरात के साथ नदी में पानी की ओर बढ़ता चला गया। जब आगे बढ़ते- बढ़ते पानी गले तक आ गया। तब अचानक सुकरात ने उस युवक का सिर पानी में डुबो दिया। नौजवान युवक अपना सिर बाहर निकालने के लिए छटपटाने लगा। सुकरात ताकतवर थे इसलिए युवक का पानी से बाहर निकलने का हर प्रयास विफल होता जा रहा था।


जब शरीर नीला पड़ने लगा तब जाकर सुकरात ने उस युवक का सिर पानी से बाहर निकाला और बाहर निकलते ही जो काम नौजवान ने सबसे पहले किया वो था हाँफते हुए जल्दी-जल्दी सांस लेना।

सुकरात ने उस युवक से पूछा -जब तुम्हारा सिर पानी के भीतर था तब तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे।

नौजवान युवक ने उत्तर दिया - सांस लेना।


सुकरात ने कहा - बस, यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतना ही ज्यादा चाहोगे जितना कि तुम उस वक्त सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हें जरूर मिल जाएगी।

सुकरात और आईना

 दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।


तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा । वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, “मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?”

शिष्य कुछ नहीं बोला, उसका सिर शर्म से झुक गया।

सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया, “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ”

“नहीं”, शिष्य बोला ।


गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं”। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।”


शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी । परंतु उसने एक शंका प्रकट की- “तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए ?”


“ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले ,“उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ध्यान रहे कि वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें, कहीं बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना लें और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दें ।

शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो गया।

गालियों का प्रभाव (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 महात्मा बुद्ध एक बार एक गांव से गुजरे। वहां के कुछ लोग उनसे शत्रुता रखते थे। उन्होंने उन्हें रास्ते में घेर लिया। बेतहाशा गालियां देकर अपमानित करने लगे। बुद्ध सुनते रहे। जब वे थक गए तो बोले, आपकी बात पूरी हो गई हो, तो मैं जाऊं। वे लोग बड़े हैरान हुए। उन्होंने कहा- हमने तो तुम्हें गालियां दीं, तुम क्रोध क्यों नहीं करते?


बुद्ध बोले- तुमने देर कर दी। अगर दस साल पहले आए होते, तो मैं भी तुम्हें गालियां देता। तुम बेशक मुझे गालियां दो, लेकिन मैं अब गालियां लेने में असमर्थ हूं। सिर्फ देने से नहीं होता, लेने वाला भी तो चाहिए। जब मैं पहले गांव से निकला था, तो वहां के लोग भेंट करने मिठाइयां लाए थे, लेकिन मैंने नहीं लीं, क्योंकि मेरा पेट भरा था। वे उन्हें वापस ले गए।


बुद्ध ने थोड़ा रुककर कहा- जो लोग मिठाइयां ले गए, उन्होंने मिठाइयों का क्या किया होगा? एक व्यक्ति बोला - अपने बच्चों, परिवार और चाहने वालों में बांटी होंगी। बुद्ध बोले- तुम जो गालियां लाए हो, उन्हें मैंने नहीं लिया। क्या तुम इन्हें भी अपने परिवार और चाहने वालों में बांटोगे..?

बुद्ध के सारे विरोधी शर्मिदा हुए और वे बुद्ध के शिष्य बन गए।

सुख (कहानी) :

 यह किस्सा मुझे वरसोवा के एक मछुआरे ने सुनाया था। तब मैं अपने वीक-एण्ड घर 'पराग' में आकर रुकता था और सागर तट पर घूमता और डूबते सूरज को देखा करता था। तब मेरी जिन्दगी को अफ़वाहों का पिटारा बना दिया गया था। यहाँ तक कि जब मैं सोलह-सत्रह साल की अपनी बेटी मानू को रात के दस-ग्यारह बजे लेकर सन-एण्ड सैण्ड होटल से घर जाने के लिए निकला, तो एक अंग्रेजी अखबार ने छापा--कमलेश्वर को कमसिन लड़कियाँ पसन्द हैं।


ऐसे थपेड़ों को बर्दाश्त कर सकना आसान नहीं है। ऐसा ही एक और हादसा मेरी माली (आर्थिक) हालत को लेकर हुआ। फिल्‍मी लेखन के शुरुआती दौर में मैं ब्लैक-मनी नहीं लेता था, पर मेरी लिखी फिल्में जब चल निकलीं तो इनकमटैक्स वालों ने मुझे घेरा। इनकमटैक्स अफसर ने अपने दफ्तर बुलाकर सवाल किया-मि. कमलेश्वर! आपकी आमदनी तो अब प्रति फिल्‍म चार-पाँच लाख होगी क्योंकि फिल्म सफल होते ही लेखक की प्राइस बढ़ जाती है...पर आप फिल्‍मी आमदनी में लाख-सवा लाल से ऊपर नहीं दिखाते; इस पर कैसे विश्वास किया जाए?

मैंने कहा-मैं ब्लैक मनी नहीं लेता!

सवाल था-यह कैसे मुमकिन है?

मैं-क्योंकि मैं जो कुछ कमाता हूँ उसमें खुश हूँ...मेरी खुशी का यही राज़-रहस्य है!


हालाँकि बाद में मैं ब्लैक मनी लेने लगा था पर मैं उन नैतिकता- भरे दिनों में ज्यादा सन्तुष्ट था। तभी वरसोवा के मछुआरे ने मुझे यह किस्सा सुनाया था।


: साब! जमनालाल बजाज की जुहूवाली कोठी में गांधी जी आकर ठहरते थे....जमनालाल जी टहलने निकलते थे। एक दिन नाव की छाया में लेटा, बीड़ी पीता एक मछुआरा उन्हें मिला। वह आराम से लेटा हुआ था।

बजाज जी ने सवाल किया :

-तुम मछलियाँ पकड़ते हो।

जी!

-तो कितनी मछलियाँ पकड़ते हो?

-जी, कभी कम, कभी ज्यादा! पर जो मिल जाती हैं, वो मेरे लिए काफी हैं!

-तो ज्यादा मछलियाँ पकड़ कर तुम अपनी आमदनी क्‍यों नहीं बढ़ाते?

-उससे क्या होगा?

-तुम अमीरी की तरफ बढ़ोगे, इस गई-गुजरी नाव की जगह तुम मोटर बोट खरीद सकोगे!

-तो?

-तुम नायलन के जाल खरीद सकोगे....और ज्यादा मछलियाँ पकड़ कर अपनी आमदनी दस-पन्द्रह गुना बढ़ा सकोगे!

-फिर?

-फिर तुम बेफिक्र होकर ख़ुशी से अपनी जिन्दगी जी सकोगे!


लेकिन मैं यह क्‍यों करूं? मैं तो अब भी अपनी नाव की छाया में लेटकर बीड़ी पीते हुए बेफिक्र होकर खुशी की जिन्दगी जीता हूँ! मेरी खुशी मेरे पास है।

-पर जो मैं तुम्हें बताता हूँ, सुख उसी में है!

-जी नहीं, आप अपना सुख मुझे न दें। मेरा अपना सुख मेरे पास है! मैं इसी में आपसे ज्यादा सुखी हूँ!

Monday, November 27, 2023

ब्रह्मा जी के थैले

 इस संसार को बनाने वाले ब्रह्माजी ने एक बार मनुष्य को अपने पास बुलाकर पूछा- ‘तुम क्या चाहते हो?’


मनुष्य ने कहा- ‘मैं उन्नति करना चाहता हूँ, सुख- शान्ति चाहता हूँ और चाहता हूँ कि सब लोग मेरी प्रशंसा करें।’


ब्रह्माजी ने मनुष्य के सामने दो थैले धर दिये। वे बोले- ‘इन थैलों को ले लो। इनमें से एक थैले में तुम्हारे पड़ोसी की बुराइयाँ भरी हैं। उसे पीठ पर लाद लो। उसे सदा बंद रखना। न तुम देखना, न दूसरों को दिखाना। दूसरे थैले में तुम्हारे दोष भरे हैं। उसे सामने लटका लो और बार- बार खोलकर देखा करो।’


मनुष्य ने दोनों थैले उठा लिये। लेकिन उससे एक भूल हो गयी। उसने अपनी बुराइयों का थैला पीठ पर लाद लिया और उसका मुँह कसकर बंद कर दिया। अपने पड़ोसी की बुराइयों से भरा थैला उसने सामने लटका लिया। उसका मुँह खोल कर वह उसे देखता रहता है और दूसरों को भी दिखाता रहता है। इससे उसने जो वरदान माँगे थे, वे भी उलटे हो गये। वह अवनति करने लगा। उसे दुःख और अशान्ति मिलने लगी।


तुम मनुष्य की वह भूल सुधार लो तो तुम्हारी उन्नति होगी। तुम्हें सुख- शान्ति मिलेगी। जगत् में तुम्हारी प्रशंसा होगी। तुम्हें करना यह है कि अपने पड़ोसी और परिचितों के दोष देखना बंद कर दो और अपने दोषों पर सदा दृष्टि रखो।

सूअर और लड़के

 दो शहरी लड़के रास्ता भूल गए। अँधेरा बढ़ रहा था, अतः मजबूरन उन्हें एक सराय में रुकना पड़ा।

आधी रात को एकाएक उनकी नींद उचट गई। उन्होंने पास के कमरे से आती हुई एक आवाज को सुना—‘कल सुबह एक हंडे में पानी खौला देना। मैं उन दोनों बच्चों का वध करना चाहता हूँ।’’

दोनों लड़कों का खून जम गया।

‘हे भगवान !’ वे बुदबुदाए, ‘इस सराय का मालिक तो हत्यारा है !’’ तुरंत उन्होंने वहाँ से भाग जाने का निश्चय किया। कमरे की खिड़की से वे बाहर कूद गए। पर बार पहुँचकर उन्होंने पाया कि बाहर दरवाजे पर ताला लगा हुआ है। अंत में उन्होंने सुअरों के बाड़े में छिपने का निर्णय किया।


रात भर उन्होंने जागते हुए बिताई। सुबह सराय का मालिक सुअरों के बाड़े में आया। बड़ा सा छुरा तेज किया और पुकारा—‘‘आ जाओ मेरे प्यारे बच्चों, तुम्हारा आखिरी वक्त आ पहुँचा है !’’

दोनों लड़के भय से काँपते हुए सराय के मालिक के पैरों पर गिर पड़े और गिड़गिड़ाने लगे।

सराय का मालिक यह देखकर चकित रह गया। फिर पूछा, ‘‘बात क्या है ?’’

‘‘हमने रात में आपको किसी से कहते सुना था कि सुबह आप हमें मौत के घाट उतारने वाले हैं।’’ लड़कों ने जवाब दिया।

सराय का मालिक यह सुनकर हँसा, ‘‘बेवकूफ लड़कों ! मैं तुम लोगों के बारे में नहीं कह रहा था। मैंने तो दो नन्हें सूअरों के बारे में कहा था, जिन्हें मैं इसी तरह पुकारता हूँ।’’

पूरी बात जाने बिना दूसरों की बातों पर कभी कान नहीं देने चाहिए।

बिजली और तूफान की कहानी

 बहुत समय पहले बिजली और तूफान धरती पर मनुष्यों के बीच रहा करते थे। राजा ने उन्हें मनुष्यों की बस्ती से दूर रखा था।

बिजली तूफान की बेटी थी। जब कभी किसी बात पर बिजली नाराज हो उठती, वह तड़प कर किसी के घर पर गिरती और उसे जला देती या किसी पेड़ को राख कर देती, या खेत की फसल नष्ट कर देती। मनुष्य को भी वह अपनी आग से जला देती थी।

जब-जब बिजली ऐसा करती, उसके पिता तूफान गरज-गरजकर उसे रोकने की चेष्टा करते। किंतु बिजली बड़ी ढीठ थी। वह पिता का कहना बिलकुल नहीं मानती थी। यहाँ तक कि तूफान का लगातार गरजना मनुष्यों के लिए सिरदर्द हो उठा। उसने जाकर राजा से इसकी शिकायत की।


राजा को उसकी शिकायत वाजिब लगी। उन्होंने तूफान और उसकी बेटी बिजली को तुरंत शहर छोड़ देने की आज्ञा दी और बहुत दूर जंगलों में जाकर रहने को कहा।

किंतु इससे भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। बिजली जब नाराज होती, जंगल के पेड़ जला डालती। कभी-कभी पास के खेतों का भी नुकसान कर डालती। मनुष्य को यह भी सहन न हुआ। उसने फिर राजा से शिकायत की।

राजा बेहद नाराज हो उठा। उसने तूफान और बिजली को धरती से निकाल दिया और उन्हें आकाश में रहने की आज्ञा दी, जहाँ से वे मनुष्य का उतना नुकसान नहीं कर सकते थे जितना की धरती पर रहकर करते थे।

क्रोध का फल बुरा होता है।

नीलकेतु और तेनालीराम : तेनालीराम की कहानी

 एक बार राज दरबार में नीलकेतु नाम का यात्री राजा कृष्णदेव राय से मिलने आया। पहरेदारों ने राजा को उसके आने की सूचना दी। राजा ने नीलकेतु को मिलने की अनुमति दे दी।


यात्री एकदम दुबला-पतला था। वह राजा के सामने आया और बोला- महाराज, मैं नीलदेश का नीलकेतु हूं और इस समय मैं विश्व भ्रमण की यात्रा पर निकला हूं। सभी जगहों का भ्रमण करने के पश्चात आपके दरबार में पहुंचा हूं।


राजा ने उसका स्वागत करते हुए उसे शाही अतिथि घोषित किया। राजा से मिले सम्‍मान से खुश होकर वह बोला- महाराज! मैं उस जगह को जानता हूं, जहां पर खूब सुंदर-सुंदर परियां रहती हैं। मैं अपनी जादुई शक्ति से उन्हें यहां बुला सकता हूं।

नीलकेतु की बात सुन राजा खुश होकर बोले - इसके लिए मुझे क्‍या करना चाहिए?


उसने राजा कृष्‍णदेव को रा‍त्रि में तालाब के पास आने के लिए कहा और बोला कि उस जगह मैं परियों को नृत्‍य के लिए बुला भी सकता हूं। नीलकेतु की बात मान कर राजा रात्रि में घोड़े पर बैठकर तालाब की ओर निकल गए।

तालाब के किनारे पहुंचने पर पुराने किले के पास नीलकेतु ने राजा कृष्‍णदेव का स्‍वागत किया और बोला- महाराज! मैंने सारी व्‍यवस्‍था कर दी है। वह सब परियां किले के अंदर हैं।


राजा अपने घोड़े से उतर नीलकेतु के साथ अंदर जाने लगे। उसी समय राजा को शोर सुनाई दिया। देखा तो राजा की सेना ने नीलकेतु को पकड़ कर बांध दिया था।

यह सब देख राजा ने पूछा- यह क्‍या हो रहा है?

तभी किले के अंदर से तेनालीराम बाहर निकलते हुए बोले - महाराज! मैं आपको बताता हूं?


तेनालीराम ने राजा को बताया- यह नीलकेतु एक रक्षा मंत्री है और महाराज...., किले के अंदर कुछ भी नहीं है। यह नीलकेतु तो आपको जान से मारने की तैयारी कर रहा है।

राजा ने तेनालीराम को अपनी रक्षा के लिए धन्यवाद दिया और कहा- तेनालीराम यह बताओं, तुम्हें यह सब पता कैसे चला ?


तेनालीराम ने राजा को सच्‍चाई बताते हुए कहा- महाराज आपके दरबार में जब नीलकेतु आया था, तभी मैं समझ गया था। फिर मैंने अपने साथियों से इसका पीछा करने को कहा था, जहां पर नीलकेतु आपको मारने की योजना बना रहा था। तेनालीराम की समझदारी पर राजा कृष्‍णदेव ने खुश होकर उन्हें धन्‍यवाद दिया।

मौत की सजा : तेनालीराम की कहानी

 बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह को डर था कि राजा कृष्णदेव राय अपने प्रदेश रायचूर और मदकल को वापस लेने के लिए हम पर हमला करेंगे। उसने सुन रखा था कि वैसे राजा ने अपनी वीरता से कोडीवडु, कोंडपल्ली, उदयगिरि, श्रीरंगपत्तिनम, उमत्तूर और शिवसमुद्रम को जीत लिया था।


सुलतान ने सोचा कि इन दो नगरों को बचाने का एक ही उपाय है कि राजा कृष्णदेव राय की हत्या करवा दी जाए। उसने बड़े इनाम का लालच देकर तेनालीराम के पुराने सहपाठी और उसके मामा के संबंधी कनकराजू को इस काम के लिए राजी कर लिया।


कनकराजू तेनालीराम के घर पहुंचा। तेनालीराम ने अपने मित्र का खुले दिल से स्वागत किया। उसकी खूब आवभगत की और अपने घर में उसे ठहराया।


एक दिन जब तेनालीराम काम से कहीं बाहर गया हुआ था, कनकराजू ने राजा को तेनालीराम की तरफ से संदेश भेजा- ‘आप इसी समय मेरे घर आएं तो आपको ऐसी अनोखी बात दिखाऊं, जो आपने जीवनभर न देखी हो।'


राजा बिना किसी हथियार के तेनालीराम के घर पहुंचे। अचानक कनकराजू ने छुरे से उन पर वार कर दिया। इससे पहले कि छुरे का वार राजा को लगता, उन्होंने कसकर उसकी कलाई पकड़ ली। उसी समय राजा के अंगरक्षकों के सरदार ने कनकराजू को पकड़ लिया और वहीं उसे ढेर कर दिया।


कानून के अनुसार, राजा को मारने की कोशिश करने वाले को जो व्यक्ति आश्रय देता था, उसे मृत्युदंड दिया जाता था। तेनालीराम को भी मृत्युदंड सुनाया गया। उसने राजा से दया की प्रार्थना की।


राजा ने कहा, ‘मैं राज्य के नियम के विरुद्ध जाकर तुम्हें क्षमा नहीं कर सकता। तुमने उस दुष्ट को अपने यहां आश्रय दिया। तुम कैसे मुझसे क्षमा की आशा कर सकते हो? हां, यह हो सकता है कि तुम स्वयं फैसला कर लो, तुम्हें किस प्रकार की मृत्यु चाहिए?’

‘मुझे बुढ़ापे की मृत्यु चाहिए, महाराज।’ तेनालीराम ने कहा।


सभी आश्चर्यचकित थे। राजा हंसकर बोले, ‘इस बार भी बच निकले तेनालीराम।’

बेशकीमती फूलदान : तेनालीराम की कहानी

 विजयनगर का वार्षिक उत्सव बहुत ही धूमधाम से बनाया जाता था। जिसमें आसपास के राज्यों के राजा भी महाराज के लिए बेशकीमती उपहार लेकर सम्मिलित होते थे। हर बार की तरह इस बार भी महाराज को बहुत से उपहार मिले। सारे उपहार में महाराज को रत्नजड़ित रंग – बिरंगे चार फूलदान बहुत ही पसंद आए। महाराज ने उन फूलदानों को अपने विशेष कक्ष में रखवाया और उन फूलदानों की रखवाली के लिए एक सेवक भी रख लिया। सेवक रमैया बहुत ही ध्यान से उन फूलदानों की रखवाली करता था क्योंकि उसे ये काम सौंपने से पहले ही बता दिया गया था कि अगर उन फूलदानों को कोई भी नुकसान पहुंचा तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।


एक दिन रमैया बहुत ही सावधानी से उन फूलदानों की सफाई कर रहा था कि अचानक उसके हाथ से एक फूलदान छूटकर ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। जैसे ही महाराज को ये बात पता चली तो उन्होंने चार दिन बाद रमैया को फांसी देना का आदेश सुना डाला। महाराज का ये आदेश सुनते ही तेनालीराम महाराज के पास आया और बोला, “महाराज एक फूलदान के टूट जाने पर आप अपने इतने पुराने सेवक को मृत्युदंड कैसे दे सकते हैं ? ये तो सरासर नाइंसाफी है।”


परन्तु महाराज उस समय बहुत ही गुस्से में थे इसलिए उन्होंने तेनालीराम की बात पर विचार करना ज़रूरी नहीं समझा। जब महाराज नहीं समझे तो तेनालीराम रमैया के पास गया और उससे बोला, “ तुम चिंता मत करो।अब मैं जो कहूँ तुम उसे ध्यान से सुनना और फांसी से पहले तुम वैसा ही करना। मैं यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कुछ नहीं होगा।” रमैया ने तेनालीराम की सारी बात बड़े ही ध्यान से सुनी और बोला ,“मैं ऐसा ही करूँगा।” फांसी का दिन आ गया। फांसी के समय महाराज भी वहाँ उपस्थित थे। फांसी देने से पहले रमैया से उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई। तब रमैया बोला,” मैं एक बार बचे हुए तीन फूलदानों को एक बार देखना चाहता हूँ जनकी वजह से मुझे फांसी पर लटकाया जा रहा है।” रमैया की अंतिम इच्छा के अनुसार महाराज ने उन तीन फूलदानों को लाने का आदेश दिया।


अब जैसे ही फूलदान रमैया के सामने आए तो उसने तेनालीराम के कहे अनुसार तीनों फूलदानों को ज़मीन पर गिराकर तोड़ दिया। रमैया के फूलदान तोड़ते ही महाराज गुस्से से आग-बबूला हो गए और चिल्लाकर बोले, “ ये तुमने क्या किया आखिर तुमने इन्हें क्यों तोड़ डाला।” रमैया बोला, “महाराज आज एक फूलदान टूटा है तो मुझे फांसी दी जा रही है। ऐसे ही जब ये तीनों भी टूटेंगे तो तीन और लोगों को मृत्युदंड दिया जाएगा। मैंने इन्हें तोडकर तीन लोगों की जान बचा ली है क्योंकि फूलदान इंसानों की जान से ज्यादा कीमती कुछ नहीं हो सकता।”


रमैया की बात सुनकर महाराज का गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने रमैया को भी छोड़ दिया। फिर उन्होंने रमैया से पूछा, “ तुमने ये सब किसके कहने पर किया था।” रमैया ने सब सच-सच बता दिया। तब महाराज ने तेनालीराम को अपने पास बुलाया और बोले, “आज तुमने एक निर्दोष की जान बचा ली और हमें भी यह बतला दिया कि गुस्से में लिए गए फैसले हमेशा गलत होते हैं। तेनालीराम तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया।”

कल्याण मित्र (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 भगवान बुद्ध देव और मनुष्यों के शास्ता थे, परन्तु सबसे पहले वह मनुष्य थे। मनुष्य बढ़कर देवता बनता है, यह प्राचीन मान्यता थी, आज भी हम मनुष्यत्व के ऊपर देवत्तव की बात करते है, परन्तु बुद्ध ने इस क्रम को पलट दिया। उन्होंने कहा,


“यह जो मनुष्यता है, वही देवताओं का सुगति प्राप्त करना कहलाती है।”


देवता जब सुगति प्राप्त करता है, तब वह मनुष्य बनता है। देवताओं में विलास है, राग, द्वेष,ईर्ष्या और मोह भी वहां है। निर्वाण की साधना वहां नहीं हो सकती। इसके लिए देवताओं को मनुष्य बनना पड़ता है। मनुष्यों में ही देव पुरुष का आविर्भाव होता है, जिनको देवता नमस्कार करते है। मानवता धर्म का उपदेश देने वाले बुद्ध स्वयं मानवता के जीते जागते रुप थे। यहां उनके जीवन से संबंधित कुद प्रसंग दिये जाते हैं, जिनसे उनके व्यक्तित्व में बैठी हुई गहरी मानवता का दर्शन होता है।


भगवान का परिनिर्वाण होने वाला है। रात का पिछला पहर है। भिक्षु उनकी शैया को घेरे बैठे हैं। बुद्ध उन्हें उपदेश दे रहे हैं।


कह रहे हैं,


“भिक्षुओ, बुद्ध धर्म और संघ के विषय में कुछ शंका हो तो पूछ लो, पीछे मलाल मत करना कि भगवान हमारे सामने थे, पर हम उनसे कुछ पूछ न सके।”


कोई शिष्य नहीं बोलता। भगवान तीन बार कहते हैं, पर कोई भिक्षु कुछ पूछने को नहीं उठता। भगवान को शंका होती है कि कहीं वे उनके गौरव का विचार करके पूछने में संकोच तो नहीं कर रहे! इसलिए वह कहते हैं,


“शायद भिक्षुओं, तुम मेरे गौरव के कारण नहीं पूछ रहे। जैसे मित्र मित्र से पूछता है, वैसे तुम मुझसे पूछो।”


बुद्ध अपने शिष्यों की समान भूमिका पर आ जाते है। उनकी यह विनम्रता। मनुष्य-धर्म की आधर-भूमि है। बुद्ध ने अपने को भिक्षुओं का ‘कल्याण मित्र’ कहा है, जो उनकी मानवीय सहदयता और विनम्रता को सूचित करता है।


एक दूसरा दृश्य भी उसी समय का है। चन्द कर्मारपुत्र के यहां बुद्ध ने अंतिम भोजन किया था। उसके बाद ही उन्हें खून गिरने की कड़ी बीमारी हो गई थी, जो उनके शरीरांत का कारण बनी। बुद्ध को उसके ह्रदय का बड़ा ध्यान था। भक्त उपासक को यह अफसोस हो सकता था कि उसका भोजन करके ही भगवान का शरीर छूट गया। इसलिए आखिरी सांस लेने से पहले उन्होंने आनंद को आदेश दिया,


“आनंद, चन्द कर्मारपुत्र की इस चिन्ता को दूर करना और कहना, आयुष्मन तूने बड़ा लाभ कमाया कि मेरे भोजन को करके तथागत परिनिर्वाण को प्राप्त हुए।”


जिसके ह्रदय में अगाध करुणा थी, वह ऐसा क्यों न कहता?

पत्थर की आँख (कहानी) :

 यह दो दोस्तों की कहानी है। एक दोस्त अमेरिका चला गया। बीस-बाईस बरस बाद वह पैसा कमाके भारत लौट आया। दूसरा भारत में ही रहा। वह गरीब से और ज्यादा गरीब होता चला गया। अमीर ने बहुत बड़ी कोठी बनवाई। उसने अपने पुराने दोस्तों को भी याद किया। गरीब दोस्त मिलने गया। बातें हुईं।


गरीब ने कहा-तुमने बहुत अच्छा किया दोस्त, अमेरिका दुनिया- भर के हम गरीबों को लूटता है, तुम अमेरिका को लूट लाए।

अमीर दोस्त यह सुनकर खुश हुआ।


काफी दिन गुजर गए। गरीब दोस्त के दिन परेशानियों में गुज़र रहे थे। वह कुछ मदद-इमदाद के लिए अमीर दोस्त से मिलना भी चाहता था। तभी अमीर दोस्त की पत्नी का देहान्त अमेरिका में हो गया। वह अपने पति के साथ भारत नहीं लौटी थी। वह भारत में नहीं रहना चाहती थी। दोस्त की पत्नी के स्वर्गवास की ख़बर पाकर गरीब दोस्त मातम-पुर्सी के लिए गया। उसने गहरी शोक-संवेदना प्रकट की। अमीर दोस्त ने कहा-वैसे इतना शोक प्रकट करने की जरूरत नहीं है दोस्त, क्योंकि वह अमेरिका में बहुत खुश थी...वहीं खुशियों के बीच उसने अन्तिम साँस ली। वह यहाँ होती और यहाँ उसकी मौत होती तो मुझे ज्यादा दुःख होता. ..क्योंकि वह दुःखी मरती...पर फिर भी वह मेरी बीवी थी, इसलिए आँख में आँसू आ ही गए....कह कर अमीर दोस्त ने आँख पोंछ ली...


गरीब दोस्त दुःख की इस कमी-बेशी वाली बात को समझ नहीं पाया था। लेकिन वह चुप रहा।

-और क्या हाल हैं तुम्हारे?-अमीर ने पूछा।

-हाल तो अच्छे नहीं हैं!

"क्यों, क्या हुआ?

-अब क्‍या बताऊँ, यह ऐसा मौका भी नहीं है!

-बताओ. ..बताओ. ...ऐसी भी क्‍या बात है....

-अब रहने दो....

“अरे बोलो न...

-वो दोस्त...बात यह है कि मुझे पाँच हजार रुपए की सख्त जरूरत है।


अमीर दोस्त एक पल के लिए खामोश हो गया। गरीब दोस्त को अपनी गलती का एहसास-सा हुआ। वह बोला-मैं माफी चाहता हूँ...यह मौका ऐसा नहीं था कि मैं...

अमीर दोस्त ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए कहा-नहीं, नहीं....ऐसी कोई बात नहीं, मैं कुछ और सोच रहा था।

क्या?

-यही कि तुम्हें माँगना ही था तो कुछ मेरी इज्जत-औकात को देख के माँगते!

गरीब को बात लग गई। उसने थोड़ी तल्खी से कहा-तो पचास हजार दे दो!


-तो दोस्त, बेहतर होता, तुम अपनी औकात देखकर माँगते!- अमीर दोस्त ने कह तो दिया पर अपनी बदतमीजियों को हल्का बनाने के लिए वे कभी-कभी कुछ शगल भी कर डालते हैं, उसी शगल के मूड में अमीर बोला-दोस्त, एक बात अगर बता सको तो मैं तुम्हें पचास हजार भी दे दूँगा!

-कौन सी बात!


-देखो...मेरी आँखों की तरफ देखो! मेरी एक आँख पत्थर की है। मैंने अमेरिका में बनवाई थी...अगर तुम बता सको कि मेरी कौन सी आँख पत्थर की है तो मैं पचास हजार अभी दे दूँगा।

-तुम्हारी दाहिनी आँख पत्थर की है! गरीब दोस्त ने फौरन कहा।

-तुमने कैसे पहचानी?


-अभी दो मिनट पहले तुम्हारी दाहिनी आँख में आँसू आया था.... आज के जमाने में असली आँखों में आँसू नहीं आते। पत्थर की आँख में ही आ सकते हैं।

Sunday, November 26, 2023

पेट भरा भरा लगना का कारण

 पेट भरा हुआ महसूस करने के कई कारण होते हैं, और यह अक्सर आपके खाने की आदतों और पूरे स्वास्थ्य से संबंधित होता है। यहां कुछ सामान्य कारण दिए गए हैं जो पेट भरा हुआ महसूस करने में योगदान देते हैं:


अधिक भोजन का सेवन: ज़रुरत से अधिक मात्रा में भोजन करने या बहुत जल्दी-जल्दी खाने से पेट भरे होने का एहसास होता है। यह अनुभूति तब होती है जब आपका पेट भोजन को समायोजित करने के लिए फैलता है।

डिहाइड्रेशन: कभी-कभी, डिहाइड्रेशन को भूख समझ लिया जाता है। भोजन से पहले और भोजन के दौरान पानी पीने से भूख को नियंत्रित करने और तृप्ति की भावना को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।

फाइबर का सेवन: हाई फाइबर वाले खाद्य पदार्थ, जैसे कि फल, सब्जियां और साबुत अनाज, तृप्ति की भावना पैदा करते हैं क्योंकि वे पचने में अधिक समय लेते हैं और संतुष्टि की भावना प्रदान करते हैं।

पोषक तत्व डेंसिटी: विटामिन और खनिजों से भरपूर, पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों का चयन आपको कम कैलोरी के साथ पूर्ण और संतुष्ट महसूस करने में मदद करता है।

चिकित्सीय स्थितियाँ: कुछ चिकित्सीय स्थितियाँ, जैसे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिसऑर्डर्स या डायबिटीज, आपके शरीर के भोजन को प्रोसेस करने के तरीके और आपको तृप्ति का एहसास कैसे होता है, को प्रभावित करती हैं।

हार्मोन: लेप्टिन और घ्रेलिन जैसे हार्मोन भूख और परिपूर्णता को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं। हार्मोनल असंतुलन इन संवेदनाओं को प्रभावित करता है।

भावनात्मक कारक: तनाव, चिंता और भावनाएं अधिक खाने या कम खाने का कारण बनती हैं, जिससे आप भरा हुआ महसूस करते हैं।

पेट में भारीपन के लक्षण

पेट में भारीपन के लक्षण उसके कारणों के आधार पर भिन्न-भिन्न होते हैं। यहां पेट में भारीपन से जुड़े कुछ सामान्य लक्षण दिए गए हैं:


भरा-भरा लगना: आपको ऐसा महसूस होता है कि आपका पेट भरा हुआ है, भले ही आपने बहुत अधिक नहीं खाया हो या हाल ही में खाया हो।

अपच: पेट में भारीपन अपच से जुड़ा होता है, जिसमें सीने में जलन, डकार या एसिड रिफ्लक्स जैसे लक्षण शामिल होते हैं।

मतली: कुछ लोगों को पेट में भारीपन के साथ-साथ मतली या मतली की अनुभूति भी होती है।

सूजन: सूजन के कारण आपका पेट कड़ा और सूजा हुआ महसूस होता है। इसके साथ गैस और असुविधा भी होती है।

कब्ज: यदि आपको कब्ज है, तो इससे पेट के निचले हिस्से में भारीपन महसूस होता है।

बेचैनी या दर्द: आपको बेचैनी, हल्का दर्द या पेट में हल्का दर्द महसूस होता है।

थकान: पेट में भारीपन महसूस होना थकान या थकावट की सामान्य भावना से भी जुड़ा होता है।

दस्त: कुछ मामलों में, दस्त या दस्त के कारण पेट में भारीपन महसूस होता है।



पेट में भारीपन का घरेलू इलाज

यहां कुछ उपचार दिए गए हैं जो आपके पेट में भारीपन का घरेलू इलाज करने में मदद करते हैं:


अदरक की चाय: अदरक पाचन में सहायता के लिए जाना जाता है और पेट की परेशानी से राहत दिलाने में मदद करता है। ताजे अदरक के टुकड़ों को गर्म पानी में उबालकर अदरक की चाय बना कर पिएं।

सौंफ के बीज: भोजन के बाद सौंफ के बीज चबाने से पाचन को बढ़ावा मिलता है और सूजन कम हो जाती है।

पुदीना: ताजी पुदीने की पत्तियों को चबाने से पेट के भारीपन से राहत मिलती है। पुदीना पेट की ख़राबी को शांत करता है और भारीपन की भावना को कम करता है। एक कप पुदीने की चाय बनाएं और धीरे-धीरे घूंट-घूंट करके पिएं।

बेकिंग सोडा: एक गिलास पानी में एक चम्मच बेकिंग सोडा का मिश्रण अपच और गैस से राहत दिलाने में मदद करता है। हालाँकि, इस उपाय का प्रयोग संयमित ढंग से करें।

गर्म पानी: पूरे दिन गर्म पानी पीने से पेट की मांसपेशियों को आराम मिलता है और असुविधा कम होती है।

कैमोमाइल चाय: कैमोमाइल में एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। कैमोमाइल चाय पीने से आपके पेट को शांत करने में मदद मिलती है।

नींबू पानी: नींबू का रस पाचन एंजाइमों को उत्तेजित करता है। भोजन से पहले एक गिलास गर्म पानी में आधा नींबू का रस मिलाएं और पिएं।

जीरा: भुना हुआ जीरा या जीरा चाय पाचन में सहायता करती है और सूजन को कम करती है।

दही: प्रोबायोटिक दही में लाभकारी बैक्टीरिया होते हैं जो स्वस्थ पाचन को बढ़ावा देते हैं।

एप्पल साइडर विनेगर: एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच कच्चा, बिना फ़िल्टर किया हुआ एप्पल साइडर विनेगर मिलाकर पीने से पाचन में सुधार होता है और पेट की परेशानी कम होती है।

गर्म सेक: अपने पेट पर गर्म सेक लगाने से मांसपेशियों को आराम मिलता है और असुविधा से राहत मिलती है।

निष्कर्ष

अपने पेट का ख्याल रखना वास्तव में महत्वपूर्ण है ताकि आप अच्छा और आरामदायक महसूस करें। पेट में भारीपन विभिन्न कारकों के कारण होता है। इस असुविधा के पीछे के कारणों को समझकर, आप इसे कम करने और रोकने के लिए सूचित निर्णय ले सकते हैं। सरल लेकिन प्रभावी घरेलू उपचारों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना आपकी डाईजेसटिव हेल्थ के लिए गेम-चेंजर होता है। ऐसे कई प्राकृतिक उपचार हैं जो आपके पेट में भारीपन की भावना को कम करने में मदद करते हैं। 


यदि आप लगातार या गंभीर लक्षणों का अनुभव करते हैं तो पेशेवर चिकित्सा सलाह लेने की सलाह दी जाती है। अपने डाईजेसटिव हेल्थ पर नियंत्रण रखना एक ऐसी यात्रा है जिसके लिए धैर्य और निरंतरता की आवश्यकता होती है। इन घरेलू उपचारों को लागू करके और अपनी जीवनशैली में सोच-समझकर विकल्प चुनकर, आप एक स्वस्थ डाईजेसटिव सिस्टम को बढ़ावा दे सकते हैं और अधिक आरामदायक और संतुलित जीवन का आनंद ले सकते हैं।

हींग के फायदे

 हींग, जिसे “हिंग” भी कहा जाता है, भारतीय और मिडिल ईस्ट में खाना पकाने में इस्तेमाल किया जाने वाला एक लोकप्रिय मसाला है। यह स्वाद और संभावित स्वास्थ्य गुणों दोनों के संदर्भ में कई लाभ प्रदान करता है:


स्वाद बढ़ाने वाला: हींग में तेज़ और तीखी सुगंध होती है। इसका उपयोग विभिन्न व्यंजनों का स्वाद बढ़ाने के लिए, विशेषकर शाकाहारी खाना पकाने में, कम मात्रा में किया जाता है।

एंटीमाइक्रोबियल: हींग का उपयोग माइक्रोबियल संक्रमण से लड़ने के लिए एक प्राकृतिक उपचार के रूप में किया गया है। यह छोटे घावों या कीड़े के काटने के इलाज में मदद करता है।

रेस्पिरेटरी हेल्थ: ऐसा माना जाता है कि इसके संभावित एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण यह अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी रेस्पिरेटरी हेल्थ के लिए लाभकारी है।

अरोमाथेरेपी: हींग की तेज़ गंध का उपयोग अरोमाथेरेपी में आराम लाने और तनाव कम करने के लिए किया जाता है।

खाली पेट हींग खाने के फायदे

हींग ईरान और अफगानिस्तान के मूल निवासी पौधे की रेसिन से प्राप्त होता है। खाली पेट हींग का सेवन करने से कुछ संभावित लाभ जुड़े हुए हैं, लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध सीमित है, और व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं। खाली पेट हींग का सेवन करने के कुछ संभावित फायदे इस प्रकार हैं:


पाचन स्वास्थ्य: हींग का उपयोग पारंपरिक रूप से पाचन में सहायता के लिए किया जाता रहा है। यह गैस, सूजन और अपच से राहत दिलाने में मदद करता है, जिससे खाली पेट लेने पर यह फायदेमंद हो जाता है। यह पाचन एंजाइमों के उत्पादन को बढ़ावा देता है।

ब्लड प्रेशर रेगुलेशन: कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि खाली पेट लेने पर हींग ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करता है और हृदय स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

एंटी इंफ्लेमेटरी: हींग में संभावित एंटी इंफ्लेमेटरी वाले कंपाउंड होते हैं। खाली पेट इसका सेवन करने से दाईजेस्टिव सिस्टम में सूजन को कम करने में मदद मिलती है, जो गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं वाले व्यक्तियों के लिए फायदेमंद होता है।

मासिक धर्म के दर्द से राहत: हींग का उपयोग मासिक धर्म के दर्द को कम करने के लिए किया जाता है। मासिक धर्म के दौरान खाली पेट इसका सेवन करने से ऐंठन और परेशानी को कम करने में मदद मिल ती है।

हींग कैसे खाएं

हींग, को आमतौर पर व्यंजनों का स्वाद बढ़ाने के लिए कम मात्रा में मिलाया जाता है। यहां बताया गया है कि अपने खाना पकाने में हींग का उपयोग कैसे करें:


इसे उचित तरीके से स्टोर करें: अपनी रसोई में तेज गंध को फैलने से रोकने के लिए अपने हींग को एक एयरटाइट कंटेनर में रखें।

इसे पतला करें: हींग बहुत गुणकारी है, और थोड़ी सी मात्रा बहुत काम आती है। अधिकांश व्यंजनों में बस एक चुटकी की आवश्यकता होती है, आमतौर पर एक मानक व्यंजन के लिए लगभग 1/8 से 1/4 चम्मच। इसे संभालना आसान बनाने के लिए, आप पेस्ट बनाने के लिए पाउडर को थोड़ी मात्रा में पानी या किसी तेल (जैसे वनस्पति तेल) के साथ मिला सकते हैं।

सही समय पर डालें: अधिकांश भारतीय व्यंजनों में, आप खाना पकाने की प्रक्रिया के शुरू में हींग डालेंगे, आमतौर पर पैन में तेल गर्म करने के बाद लेकिन अन्य मसाले डालने से पहले। यह पूरे व्यंजन को स्वादिष्ट बनाने की अनुमति देता है।

गर्मी का ध्यान रखें: सावधान रहें कि हींग को ज़्यादा गर्म न करें या जलाएं नहीं, क्योंकि इससे इसका स्वाद कड़वा हो जाता है। अन्य सामग्रियों को शामिल करने से पहले इसे आमतौर पर कुछ सेकंड के लिए गर्म तेल में डाला जाता है।

व्यंजनों के साथ प्रयोग: हींग दाल, बीन्स, सब्जियों और चावल के व्यंजनों के साथ अच्छी तरह से मेल खाती है। यह दाल (दाल करी) और विभिन्न सब्जी स्टिर-फ्राई जैसे व्यंजनों में एक प्रमुख कॉम्पोनेन्ट है।

स्वाद के अनुसार एडजस्ट करें: थोड़ी मात्रा से शुरू करें, और यदि आप तेज़ स्वाद चाहते हैं तो आप हमेशा अधिक मिला सकते हैं। लक्ष्य पकवान के स्वाद को हींग की तेज़ सुगंध से प्रभावित किए बिना बढ़ाना है।

स्वाद का आनंद लें: हींग में एक अनोखा, तीखा स्वाद होता है जो पकने के साथ-साथ नरम और अधिक सूक्ष्म हो जाता है। 



अंतिम शब्द 

हींग एक शक्तिशाली औषधि है जिसमें कई स्वास्थ्यवर्धक गुण मौजूद हैं। खाली पेट हींग खाने से शरीर को विभिन्न फायदे मिलते हैं, क्योंकि इस समय में हींग के गुण प्रभावी ढंग से शरीर में समाविष्ट हो जाते हैं। हींग खाने के फायदों के बारे में बात करने से पहले, हमें ध्यान देने योग्य बातें और संदेशों के बारे में जानना आवश्यक है। हींग एक बहुत ही ख़ास औषधीय गुणों से भरपूर मसाला है, जिसे बहुत ही कम मात्रा में खाना चाहिए। हींग के प्रति अलग-अलग लोगों मे प्रतिक्रियाएं अलग-अलग होती हैं, और कुछ लोगों को इसका तेज़ स्वाद और गंध अरुचिकर लगती है। इसके अतिरिक्त, यदि आपको कोई अंतर्निहित स्वास्थ्य समस्या है या आप गर्भवती हैं, तो सलाह दी जाती है कि हींग को अपने आहार में शामिल करने से पहले किसी स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर से परामर्श लें। 

सोते समय मुंह से लार क्यों निकलती है

 लार का उत्पादन एक सतत प्रक्रिया है जो पूरे दिन और रात में मुंह में होती है। जब आप जाग रहे होते हैं, तो निगलने और अन्य मौखिक गतिविधियाँ लार के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन जब आप सो रहे होते हैं, तो ये मैकेनिज्म रिलैक्स्ड हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, कभी-कभी आपके मुंह में लार जमा हो जाती है और बाहर निकलने लगती है, जिसे आमतौर पर नींद के दौरान “लार आना” के रूप में जाना जाता है। यह एक प्राकृतिक और सामान्य घटना है, और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लार और निगलने को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियां और नर्व्स नींद के दौरान कम सक्रिय हो जाती हैं।


नींद के दौरान लार का प्रवाह बढ़ने में कई कारक योगदान देते हैं:


स्थिति: पीठ के बाल सोने की स्थिति में सोने से मुंह में लार जमा होने की संभावना बढ़ जाती है। पीठ के बल सोते समय यह अधिक आम है।

नींद की अवस्था: नींद की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान लार का प्रवाह भिन्न-भिन्न होता है। आरईएम (रैपिड आई मूवमेंट) नींद के दौरान इसके होने की अधिक संभावना हो जाती है।

मुंह से सांस लेना: कुछ लोग सोते समय स्वाभाविक रूप से अपने मुंह से सांस लेते हैं, जिससे लार जमा होने और लार गिरने की संभावना बढ़ जाती है।

दवाएँ या मेडिकल कंडीशंस: कुछ दवाएँ या मेडिकल कंडीशंस लार उत्पादन को प्रभावित करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप कुछ मामलों में नींद के दौरान लार गिरती है।

मुंह से लार बंद करने के उपाय

मुंह में अत्यधिक लार कुछ लोगों के लिए एक आम समस्या होती है। लार उत्पादन को कम करने या इसे प्रबंधित करने में मदद करने के कई तरीके हैं:


हाइड्रेटेड रहें: कभी-कभी अत्यधिक लार डिहाइड्रेशन का परिणाम होता है। पूरे दिन पर्याप्त पानी पीने से लार का सही संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।

शुगर फ़्री गम चबाएं: च्यूइंग गम लार उत्पादन को उत्तेजित करती है, इसलिए शुगर फ़्री गम का चयन अच्छे मौखिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के साथ-साथ लार को प्रबंधित करने में मदद करता है।

अच्छी ओरल हेल्थ अपनाएं: अपने दांतों और मसूड़ों को नियमित रूप से ब्रश करें और अपना मुंह साफ रखने के लिए माउथवॉश का उपयोग करें। यह बैक्टीरिया की उपस्थिति को कम करने में मदद करता है जो अतिरिक्त लार को ट्रिगर करता है।

कुछ खाद्य पदार्थों से बचें: मसालेदार और खट्टे खाद्य पदार्थ लार उत्पादन को उत्तेजित करते हैं। इन खाद्य पदार्थों के सेवन से बचने या कम करने से मदद मिलती है।

कैफीन और अल्कोहल को सीमित करें: कैफीन और अल्कोहल दोनों लार उत्पादन को बढ़ाते हैं। इन पदार्थों का सेवन कम करने से समस्या को प्रबंधित करने में मदद मिलती है।

एलर्जी को मैनेज करें: एलर्जी के कारण अतिरिक्त बलगम पैदा होता है, जिससे अधिक लार बनती है। एंटीहिस्टामाइन या अन्य दवाओं से एलर्जी को मैनेज करना सहायक होता है।

अपनी नाक से सांस लें: मुंह से सांस लेने से मुंह सूख जाता है, जिससे शरीर अधिक लार का उत्पादन करता है। अपनी नाक से सांस लेने की कोशिश करें, खासकर जब आप सोते हैं।

तनाव को मैनेज करें: तनाव और चिंता के कारण अत्यधिक लार निकलती है। रिलैक्सेशन टैकनीक्स, जैसे गहरी साँस लेना या ध्यान, मदद करती हैं।

एक हेल्थ केयर स्पेशलिस्ट से परामर्श लें: यदि अतिरिक्त लार एक लगातार समस्या है और आपके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है, तो एक हेल्थ केयर स्पेशलिस्ट या दंत चिकित्सक से परामर्श करना एक अच्छा विचार है। वे अंतर्निहित कारण निर्धारित करने में मदद करते हैं और उचित उपचार विकल्प सुझाते हैं।



मुंह से लार क्यों आती है

लार एक प्राकृतिक शारीरिक क्रिया के रूप में मुंह से आती है जिसके कई महत्वपूर्ण उद्देश्य होते हैं:


पाचन: लार में एमाइलेज जैसे एंजाइम होते हैं जो भोजन को तोड़ने और पचाने में मदद करते हैं। यह मुंह में कार्बोहाइड्रेट को तोड़कर पाचन की प्रक्रिया शुरू करता है, जिससे शरीर के लिए पोषक तत्वों को अब्सोर्ब करना आसान हो जाता है।

नमी: लार मुंह को नम रखने में मदद करती है, जो बोलने, निगलने और सूखापन और असुविधा को रोकने के लिए आवश्यक है।

स्वाद: लार स्वाद अणुओं को टेस्ट रिसेप्टर्स तक ले जाती है, जिससे हमें अपने भोजन में विभिन्न स्वादों का अनुभव करने की अनुमति मिलती है।

ओरल हेल्थ: लार भोजन के कणों और बैक्टीरिया को धोकर मुंह को साफ करने में मदद करती है, जिससे ओरल हेल्थ में योगदान होता है।

एंटी-बैक्टीरियल गुण: इसमें एंजाइम और प्रोटीन होते हैं जो हानिकारक बैक्टीरिया के विकास को रोक सकते हैं, मौखिक माइक्रोबायोम के संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं।

सुरक्षा: लार में म्यूसिन होता है, जो मुंह में म्यूकस मेम्ब्रेन को ढंकने और जलन और चोट से बचाने में मदद करता है।

पीएच रेगुलेशन: लार मुंह में एक न्यूट्रल पीएच स्तर बनाए रखने में मदद करती है, जो दाँतों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। यह एसिड को बफर करता है और दांतों की सड़न से बचाता है।

अंतिम शब्द 

सोते समय मुंह से लार निकलना एक आम समस्या है जो कई लोगों को प्रभावित करती है। यह एक साधारण प्रक्रिया है जो हर रोज़ाना हमारे शरीर में होती है। मुंह से लार का निकलना शरीर के सामान्य कार्यों का हिस्सा है, जिसमें ख़ाली पेट होने के कारण आक्सीजन के स्तर में गिरावट होती है और इसके परिणामस्वरूप लार का निर्माण होता है। मौखिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए लार आवश्यक है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि लार के उत्पादन को पूरी तरह से बंद न करें, बल्कि जब यह अत्यधिक हो जाए तो इसे मैनेज करें। यदि यह एक लगातार समस्या बन जाती है या यदि आपको दिन के दौरान ड्राई माउथ जैसे अन्य लक्षण होते हैं, तो आपको किसी अंतर्निहित मेडिकल कंडीशंस या दवा के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए एक डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।


बाबापुर की रामलीला : तेनालीराम की कहानी

 हर वर्ष दशहरे से पूर्व काशी की नाटक मंडली विजयनगर आती थी। सामान्यतः वे राजा कृष्णदेव राय तथा विजयनगर की प्रजा के लिए रामलीला किया करते थे। परंतु एक बार राजा को सूचना मिली कि नाटक मंडली विजयनगर नहीं आ रही है। इसका कारण यह था कि नाटक मंडली के कई सदस्य बीमार हो गए थे।


यह सूचना पाकर राजा बहुत दुःखी हुए, क्योंकि दशहरे में अब कुछ ही दिन बाकी थे। इतने कम दिनों में दूसरी नाटक मंडली की भी व्यवस्था नहीं की जा सकती थी। पास में दूसरी कोई नाटक मंडली नहीं होने के कारण इस वर्ष रामलीला होने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे जबकि दशहरे से पूर्व रामलीला होना विजयनगर की पुरानी संस्कृति थी। महाराज को इस तरह दुःखी देखकर राजगुरु बोले, 'महाराज, यदि चाहें तो हम रामपुर के कलाकारों को संदेश भेज सकते हैं?'

'परंतु, इसमें तो कुछ सप्ताह का समय लगेगा', राजा ने निराश स्वर में कहा।

इस पर तेनालीराम बोले, 'महाराज, मैं पास ही की एक मंडली को जानता हूं, वे यहां दो दिन में आ जाएंगे और मुझे विश्वास है कि वे रामलीला का अच्छा प्रदशन करेंगे।


यह सुनकर राजा प्रसन्न हो गए और तेनालीराम को मंडली को बुलाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई, साथ ही मंडली के रहने व खाने-पीने की व्यवस्था का भार भी तेनाली के ही सुपुर्द कर दिया गया। शीघ्र ही रामलीला के लिए सारी व्यवस्था होनी शुरू हो गई। रामलीला मैदान को साफ किया गया। एक बड़ा-सा मंच बनाया गया। नवरात्र के लिए नगर को सजाया गया।


रामलीला देखने के लिए लोग बहुत उत्सुक थे, क्योंकि इसके पूर्व काशी की नाटक मंडली के न आने की सूचना से वे काफी दुःखी थे, परंतु अब नई नाटक मंडली के आने की सूचना से उनका उत्साह् दोगुना हो गया था। महल के निकट एक मेला भी लगाया गया था।


कुछ ही दिनों में मंडली रामलीला के लिए तैयार हो गई। राजा, दरबारी, मंत्री व प्रजा प्रतिदिन रामलीला देखने आते। दशहरे के दिन की अंतिम कड़ी तो बहुत ही सराहनीय थी। मंडली में अधिकतर कलाकार बच्चे थे। उनकी कलाकारी देखकर लोगों की आंखों में आंसू तक आ गए।


दशहरे के पश्चात राजा ने कुछ मंत्रियों तथा मंडली के सदस्यों को महल में भोजन के लिए बुलाया। भोजन के पश्चात राजा ने मंडली के सदस्यों को पुरस्कार दिया। फिर वे तेनालीराम से बोले, 'तुम्हें इतनी अच्छी मंडली कैसे मिली?'

'बाबापुर से महाराज,' तेनालीराम ने उत्तर दिया। 

'बाबापुर! यह कहां है? मैंने इसके विषय में कभी नहीं सुना', राजा ने आश्चर्य से पूछा।

'बाबापुर विजयनगर के पास ही है, महाराज।' तेनालीराम बोला।


तेनालीराम की बात सुनकर मंडली के कलाकार मुस्करा दिए। राजा ने उनसे उनके इस प्रकार मुस्कराने का कारण पूछा तो मंडली का एक छोटा बालक सदस्य बोला, 'महाराज, वास्तव में हम लोग विजयनगर से ही आए हैं। तेनाली बाबा ने तीन दिन में हमें यह नाटक करना सिखाया था इसलिए इसे हम बाबापुर की रामलीला कहते हैं।'

यह सुनकर राजा भी खिलखिलाकर हंस पड़े। अब उन्हें भी बाबापुर के रहस्य का पता चल गया था।

कुछ नहीं : तेनालीराम की कहानी

 तेनालीराम राजा कृष्ण देव राय के निकट होने के कारण बहुत से लोग उनसे जलते थे। उनमे से एक था रघु नाम का ईर्ष्यालु फल व्यापारी। उसने एक बार तेनालीराम को षड्यंत्र में फसाने की युक्ति बनाई। उसने तेनालीराम को फल खरीदने के लिए बुलाया। जब तेनालीराम ने उनका दाम पूछा तो रघु मुस्कुराते हुए बोला,

“आपके लिए तो इनका दाम ‘कुछ नहीं’ है।”

यह बात सुन कर तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोका और कहा कि मेरे फल के दाम तो देते जाओ।


तेनालीराम रघु के इस सवाल से हैरान हुए, वह बोले कि अभी तो तुमने कहा की फल के दाम ‘कुछ नहीं’ है। तो अब क्यों अपनी बात से पलट रहे हो। तब रघु बोला की, मेरे फल मुफ्त नहीं है। मैंने साफ-साफ बताया था की मेरे फलों का दाम कुछ नहीं है। अब सीधी तरह मुझे ‘कुछ नहीं’ दे दो, वरना मै राजा कृष्ण देव राय के पास फरियाद ले कर जाऊंगा और तुम्हें कठोर दंड दिलाऊँगा।

तेनालीराम सिर खुझाने लगे। और यह सोचते-सोचते वहाँ से अपने घर चले गए।

उनके मन में एक ही सवाल चल रहा था कि इस पागल फल वाले के अजीब षड्यंत्र का तोड़ कैसे खोजूँ। इसे कुछ नहीं कहाँ से लाकर दूँ।


अगले ही दिन फल वाला राजा कृष्ण देव राय के दरबार में आ गया और फरियाद करने लगा। वह बोला की तेनाली ने मेरे फलों का दाम ‘कुछ नहीं’ मुझे नहीं दिया है।


राजा कृष्ण देव राय ने तुरंत तेनालीराम को हाज़िर किया और उससे सफाई मांगी। तेनालीराम पहले से तैयार थे उन्होंने एक रत्न-जड़ित संदूक लाकर रघु फल वाले के सामने रख दिया और कहा ये लो तुम्हारे फलों का दाम।


उसे देखते ही रघु की आँखें चौंधिया, उसने अनुमान लगाया कि इस संदूक में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात होंगे… वह रातों-रात अमीर बनने के ख्वाब देखने लगा। और इन्ही ख़यालों में खोये-खोये उसने संदूक खोला।


संदूक खोलते ही मानो उसका खाब टूट गया, वह जोर से चीखा, “ये क्या? इसमें तो ‘कुछ नहीं’ है!”

तब तेनालीराम बोले, “बिलकुल सही, अब तुम इसमें से अपना ‘कुछ नहीं’ निकाल लो और यहाँ से चलते बनो।”


वहां मौजूद महाराज और सभी दरबारी ठहाका लगा कर हंसने लगे। और रघु को अपना सा मुंह लेकर वापस जाना पड़ा। एक बार फिर तेनालीराम ने अपने बुद्धि चातुर्य से महाराज का मन जीत लिया था।

जादूगर का घमंड : तेनालीराम की कहानी

 एक बार राजा कृष्ण देव राय के दरबार में एक जादूगर आया। उसने बहुत देर तक हैरतअंगेज़ जादू करतब दिखा कर पूरे दरबार का मनोरंजन किया। फिर जाते समय राजा से ढेर सारे उपहार ले कर अपनी कला के घमंड में सबको चुनौती दे डाली-


क्या कोई व्यक्ति मेरे जैसे अद्भुत करतब दिखा सकता है। क्या कोई मुझे यहाँ टक्कर दे सकता है?


इस खुली चुनौती को सुन कर सारे दरबारी चुप हो गए। परंतु तेनालीराम को इस जादूगर का यह अभिमान अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत उठ खड़े हुए और बोले कि हाँ मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि जो करतब मैं अपनी आँखें बंद कर के दिखा दूंगा वह तुम खुली आंखो से भी नहीं कर पाओगे। अब बताओ क्या तुम मेरी चुनौती स्वीकार करते हो?

जादूगर अपने अहम में अंध था। उसने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।


तेनालीराम ने रसोइये को बुला कर उस के साथ मिर्ची का पाउडर मंगवाया। अब तेनालीराम ने अपनी आँखें बंद की और उनपर एक मुट्ठी मिर्ची पाउडर डाल दिया। फिर थोड़ी देर में उन्होंने मिर्ची पाउडर झटक कर कपड़े से आँखें पोंछ कर शीतल जल से अपना चेहरा धो लिया। और फिर जादूगर से कहा कि अब तुम खुली आँखों से यह करतब करके अपनी जादूगरी का नमूना दिखाओ।

घमंडी जादूगर को अपनी गलती समझ आ गयी। उसने माफी मांगी और हाथ जोड़ कर राजा के दरबार से चला गया।


राजा कृष्ण देव राय अपने चतुर मंत्री तेनालीराम की इस युक्ति से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होने तुरंत तेनालीराम को पुरस्कार दे कर सम्मानित किया और राज्य की इज्जत रखने के लिए धन्यवाद दिया।

अंगूठी चोर : तेनालीराम की कहानी

 महाराजा कृष्ण देव राय एक कीमती रत्न जड़ित अंगूठी पहना करते थे। जब भी वह दरबार में उपस्थित होते तो अक्सर उनकी नज़र अपनी सुंदर अंगूठी पर जाकर टिक जाती थी। राजमहल में आने वाले मेहमानों और मंत्रीगणों से भी वह बार-बार अपनी उस अंगूठी का ज़िक्र किया करते थे।


एक बार राजा कृष्ण देव राय उदास हो कर अपने सिंहासन पर बैठे थे। तभी तेनालीराम वहाँ आ पहुंचे। उन्होने राजा की उदासी का कारण पूछा। तब राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, और उन्हे पक्का शक है कि उसे उनके बारह अंग रक्षकों में से किसी एक ने चुराया है।


चूँकि राजा कृष्ण देव राय का सुरक्षा घेरा इतना चुस्त होता था की कोई चोर-उचक्का या सामान्य व्यक्ति उनके नज़दीक नहीं जा सकता था। तेनालीराम ने तुरंत महाराज से कहा कि-

मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूँगा।

यह बात सुन कर राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने तुरंत अपने अंगरक्षकों को बुलवा लिया।


तेनालीराम बोले, “राजा की अंगूठी आप बारह अंगरक्षकों में से किसी एक ने की है। लेकिन मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूँगा। जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं और जो चोर है वह कठोर दण्ड भोगने के लिए तैयार हो जाए।”

तेनालीराम ने बोलना जारी रखा, “आप सब मेरे साथ आइये हम सबको काली माँ के मंदिर जाना है।”

राजा बोले, ” ये कर रहे हो तेनालीराम हमें चोर का पता लगाना है मंदिर के दर्शन नहीं कराने हैं!”

“महाराज, आप धैर्य रखिये जल्द ही चोर का पता चल जाएगा।”, तेनालीराम ने राजा को सब्र रखने को कहा।


मंदिर पहुँच कर तेनालीराम पुजारी के पास गए और उन्हें कुछ निर्देश दिए। इसके बाद उन्होंने अंगरक्षकों से कहा, ” आप सबको बारी-बारी से मंदिर में जा कर माँ काली की मूर्ति के पैर छूने हैं और फ़ौरन बाहर निकल आना है। ऐसा करने से माँ काली आज रात स्वप्न में मुझे उस चोर का नाम बता देंगी।


अब सारे अंगरक्षक बारी-बारी से मंदिर में जा कर माता के पैर छूने लगे। जैसे ही कोई अंगरक्षक पैर छू कर बाहर निकलता तेनालीराम उसका हाथ सूंघते आर एक कतार में खड़ा कर देते। कुछ ही देर में सभी अंगरक्षक एक कतार में खड़े हो गए।

महाराज बोले, “चोर का पता तो कल सुबह लगेगा, तब तक इनका क्या किया जाए?”

नहीं महाराज, चोर का पता तो ला चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।

ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे धर दबोचा, और कारागार में डाल दिया.

राजा और बाकी सभी लोग आशार्यचाकित थे कि तेनालीराम ने बिना स्वप्न देखे कैसे पता कर लिया कि चोर वही है।


तेनालीराम सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले,”मैंने पुजारी जी से कह कर काली माँ के पैरों पर तेज सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था। जिस कारण जिसने भी माँ के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी। लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक के हाथ महके तो उनमे कोई खुशबु नहीं थी… उसने पकड़े जाने के डर से माँ काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं। इसलिए यह साबित हो गया की उसी के मन में पाप था और वही चोर है।”

राजा कृष्ण देव राय एक बार फिर तेनालीराम की बुद्धिमत्ता के कायल हो गए। और उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से सम्मानित किया।

पड़ोसी राजा : तेनालीराम की कहानी

 विजयनगर राज्य का अपने पड़ोसी राज्य से मनमुटाव चल रहा था। तेनाली राम के विरोधियों को तेनाली राम के खिलाफ राजा कृष्णदेव राय को भड़काने का यह बड़ा ही सुन्दर अवसर जान पड़ा।


एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने बगीचे में अकेले बैठे पड़ोसी राज्य की समस्या के बारे में ही सोच रहे थे कि तभी एक दरबारी उनके पास पहुंचा और बड़ी होशियारी से इधर उधर झांकता हुआ राजा के कान के पास मुंह ले जाकर बोला, ‘‘महाराज, कुछ सुना आपने ?’’

‘‘नहीं तो..क्या हुआ ?’’ राजा चौंके।

‘‘महाराज, क्षमा करें। पहले जान बख्श देने का वचन दें तो कुछ कहूं।’’

‘‘जो भी कहना हो, निस्संकोच कहो, डरने की कोई बात नहीं है।’’ राजा ने दरबारी को अभय दान देते हुए कहा।

‘‘महाराज, तेनाली राम पड़ोसी राजा से मिले हुए हैं। वे हमारे पड़ोसी राजा के साथ हमारे सम्बन्ध बिगाड़ना चाहते हैं।’’

‘‘क्या बकते हो ?’’ राजा गरज कर बोले।

मैं तो पहले ही समझ गया था महाराज। तेनाली राम ने आप के ऊपर ऐसा जादू किया हुआ है कि आप उसकी शिकायत सुन ही नहीं सकते, या यूं कहिए कि तेनाली राम की शिकायत आपके कानों को सहन नहीं होती।’’

‘‘तेनाली राम राज्य का सच्चा वफादार है। वह कभी राजद्रोह नहीं कर सकता। तुम्हें कहीं से अवश्य ही गलत सूचना मिली है।’’ राजा कृष्णदेव राय ने उस दरबारी से कहा।

‘‘महाराज, आपको जितना विश्वास तेनाली राम की सच्चाई पर है, उससे कहीं अधिक विश्वास मुझे अपनी इस सूचना पर है। पूरी तरह जांच व परख करके ही मैंने आप तक यह सूचना पहुंचाई।’’


जब उस दरबारी ने खूब जोर देकर अपनी बात कही तो राजा को सोचने पर मजबूर होना पड़ा।


राजा ने कहा, ‘‘ठीक है। मैं इस बात की जांच करूंगा और अगर तेनाली राम दोषी पाया गया तो उसे अवश्य ही कठोर दण्ड दिया जाएगा।’’

राजा की इस बात से प्रसन्न होकर दरबारी अपने घर चला गया।

दूसरे दिन कृष्णदेव राय ने तेनाली राम को एकान्त में बुलवाया और बोले, ‘‘तेनाली राम, हमें सूचना मिली है कि तुम हमारे शत्रु राजा से मिलकर हमारे विजयनगर राज्य को दूसरे के अधीन कराना चाहते हो ?’’

तेनाली राम ने जब अपने ऊपर लगाया गया यह आरोप सुना तो वह सिर से पैर तक कांप गया। वह राजा को इस बात का क्या उत्तर दे, उसे एकाएक यह भी सुझाई नहीं पड़ रहा था।

राजा ने जब तेनाली राम को चुप देखा तो वह क्रोध से भभक उठे और बोले, ‘‘तो तुम्हारे चुप रहने का यही अर्थ लगाया जाए कि तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो ?’’

यह सुनकर तेनाली राम की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला, ‘‘महाराज की बात काटने का साहस न तो मैंने अब तक किया है और न ही कभी भविष्य में कर सकूंगा।’’

राजा तो क्रोध से भरे हुए थे। तेनाली राम के इस उत्तर से वे और भी भड़क उठे। बोले, ‘‘तुमने जिस पड़ोसी राजा से सांठ-गांठ की है अब उसी के राज्य में जाकर रहो, मेरा राज्य कल ही छोड़ दो।’’

‘‘इतने बड़े अपराध की इतना मामूली सजा ?’’ तेनाली राम ने राजा से कहा।

‘‘तुम्हारी अब तक की सेवा को देखते हुए, मेरे तुम्हारे मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को देखते हुए तथा तुम्हारे पद की गरिमा को देखते हुए मैं तुम्हें इतना ही दण्ड देना उचित समझता हूं। यदि कहीं अपराध किसी और ने किया होता तो मैं उसकी बोटी-बोटी नुचवा लेता।’’ राजा ने क्रोध में बिफरते हुए कहा।


तेनाली राम ने राजा का फैसला सुना और अपनी सफाई में एक भी शब्द नहीं कहा। बेचारा चुपचाप सिर झुकाकर राजा के सामने से चला गया।




दूसरे दिन जब तेनाली राम के विरोधियों ने यह सुना कि तेनाली राम राज्य छोड़कर चला गया है तो उनकी खुशी की सीमा न रही। वह सब राजा पर अपना प्रभाव बढ़ाने के उपाय सोचने लगे और अपनी पदोन्नति के मंसूबे बांधने लगे।

तेनाली राम विजयनगर राज्य के शत्रु राज्य की राजधानी पहुंचा और वहां के राजा से मिला। उसने उस राजा के गुणों का वर्णन छन्दबद्ध करके उसे सुनाया।

राजा अपनी प्रशंसा सुनकर खुशी से झूम उठा। उसने तेनाली राम से उसका परिचय पूछा।

तेनाली राम ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय का निजी सचिव तेनाली राम हूं।’’

उस राजा ने तेनाली राम की बहुत प्रशंसा पहले ही सुन रखी थी लेकिन तेनाली राम से भेंट का यह पहला अवसर था। उस राजा ने तेनाली राम का भरपूर स्वागत किया।

तेनाली राम ने इस स्वागत के लिए राजा को धन्यवाद दिया।

राजा बोला, ‘‘तेनाली राम, राजा कृष्णदेव राय हमें अपना शत्रु मानते हैं, फिर भी तुम हमारे दरबार में निडर होकर कैसे चले आए ? तुम तो राजा कृष्णदेव राय के निजी सचिव हो। यहां शत्रु के राज्य में तुम्हारा कोई भी अनिष्ट हो सकता है ?’’


राजा ने हालांकि सच कहा था। फिर भी तेनाली राम ने मुस्करा कर कहा, ‘‘राजन् ! आप विद्वान हैं, आपके पास अपार शक्ति है। आप सुयोग्य प्रशासक हैं और प्रजा की भलाई चाहने वाले हैं। बिल्कुल ऐसे ही गुण हमारे महाराज में भी हैं। वे आपको अपना शत्रु नहीं, मित्र मानते हैं। आपकी इसी भ्रान्ति के निवारण के लिए महाराज ने मुझे आपके पास भेजा है।’’


‘‘हैं ! महाराज हमारे दुश्मन नहीं, दोस्त हैं।’ आश्चर्य से चौंकता हुआ राजा बोला, ‘‘लेकिन हमारे जासूसों ने तो हमें यह खबर दी थी कि राजा कृष्णदेव राय हमारे राज्य पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं।’’


‘‘हां राजन, हमारे गुप्तचरों ने हमारे महाराज से यही बात आपके लिए भी कही थी। तभी हमारे महाराज ने मुझे आपके पास भेजा है। युद्ध कभी किसी के लिए लाभकारी हुआ है, जो आप जैसे दो विद्वान् राजाओं को लाभकारी होगा ?’’ तेनाली राम ने कहा।


उस राजा पर तेनाली राम की बातों का असर हुआ। वह बोला, ‘‘लड़ाई तो मैं भी नहीं चाहता लेकिन यह बात साबित कैसे हो कि राजा कृष्णदेव राय सच्चे दिल से सुलह के इच्छुक हैं ?’’

‘‘आप कल ही कुछ उपहार व सन्धि पत्र देकर अपना एक दूत विजयनगर भेज दें। उस दूत को मैं भी अपना एक पत्र दूंगा। यदि महाराज कृष्णदेव राय आपका उपहार स्वीकार कर लें तो मित्रता समझी जाए और यदि वे उपहार लौटा दें तो आप मुझे जो चाहें दण्ड दे दें।’’

‘‘लेकिन यह तो मेरी तरफ से सुलह का पैगाम हुआ। यह तो मेरी हेठी मानी जाएगी।’’ राजा ने कहा।

‘‘लेकिन सन्धि प्रस्ताव लेकर तो मैं स्वयं आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूं। पहल तो हमारे राज्य की ओर से है।’’

राजा की समझ में यह बात आ गई।

उसने दूसरे ही दिन अपना एक विशेष दूत कुछ उपहार साथ देकर विजयनगर भेज दिया।

उधर राजा कृष्णदेव राय को भी यह पता चल चुका था कि तेनाली राम बेकसूर था। उसके विरुद्ध दरबारियों ने आपस में मिलकर झूठी चाल चली थी।

इधर जैसे ही शत्रु राजा का दूत बहुमूल्य उपहार लेकर राजा कृष्णदेव राय के पास पहुंचा तो राजा प्रसन्नता से भर उठे।

उन्होंने मन ही मन तेनाली राम की बुद्धिमानी की प्रशंसा की और उस दूत के साथ ही, अपना मंत्री भी उस राजा के लिए उपहार देकर भेज दिया। राजा कृष्णदेव राय ने अपना एक विशेष पत्र भी उस राजा के नाम लिखा कि तेनाली राम को तुरन्त वापस भेज दिया जाए।

और जब तेनाली राम वापस विजयनगर पहुंचा तो राजा कृष्णदेव राय ने उसका विशेष स्वागत किया और उसे ढेरों पुरस्कार दिए।

जिन दरबारियों ने तेनाली राम के विरुद्ध षड्यंत्र रचा था, वे दरबारी शर्म से पानी-पानी हो गए।

महामूर्ख : तेनालीराम की कहानी

 राजा कृष्णदेव राय होली का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाते थे। होली के दिन मनोविनोद के अनेक कार्यक्रम विजयनगर में होते थे। प्रत्येक कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार देने की व्यवस्था भी होती थी। सबसे बड़ा तथा सबसे मूल्यवान पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था।

तेनाली राम को हर साल सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का पुरस्कार तो मिलता ही था। अपनी चतुराई और बुद्धिमानी के बल पर प्रतिवर्ष ‘महामूर्ख’ भी वही चुना जाता था।

इस तरह तेनाली राम हर वर्ष दो-दो पुरस्कार अकेले हड़प लेता था।

इसी कारण अन्य दरबारियों को प्रतिवर्ष ईर्ष्या की आग में झुलसना पड़ता था।

इस साल अन्य दरबारियों ने फैसला कर लिया था कि इस बार होली के उत्सव पर तेनाली राम का पत्ता ही साफ कर दिया जाए। उसके लिए उन्होंने एक तरकीब भी खोज ली थी।


तेनाली राम के प्रमुख सेवक को पढ़ा-सिखाकर उसके द्वारा तेनाली राम को छककर भंग पिलवा दी गई। होली के दिन इसी कारण तेनाली भंग के नशे की तरंग में घर पर ही पड़ा रहा।


दोपहर बाद जब तेनाली राम की नींद खुली तो वह घबरा गया और इसी घबराहट में भागता-भागता दरबार में पहुंच गया।


जब वह दरबार में पहुंचा, तब तक उत्सव में आधे से अधिक कार्यक्रम सम्पन्न हो चुके थे।

राजा कृष्णदेव राय उसे देखते ही डपटकर बोले-‘‘अरे मूर्ख तेनाली राम जी, आज के दिन भी भंग छानकर सो गये ?’’

राजा ने तेनाली राम को मूर्ख कहा तो सारे दरबारी प्रसन्न हो उठे। उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और बोले, ‘‘आपने बिल्कुल सत्य ही कहा महाराज। तेनाली राम मूर्ख ही नहीं बल्कि महामूर्ख है।’’


जब तेनाली राम ने सब लोगों के मुंह से यह सुना तो मुस्कराता हुआ महाराज से बोला, ‘धन्यवाद महाराज, आपने अपने श्रीमुख से मुझे महामूर्ख घोषित करके आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार तो मेरे लिए सुरक्षित कर ही दिया है।’’


तेनाली राम के मुख से यह सुनते ही दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया।

किन्तु वे अब कर भी क्या सकते थे ? क्योंकि वे स्वयं ही अपने मुख से तेनाली राम को महामूर्ख बता चुके थे।

होली के अवसर पर ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार तेनाली राम हर साल की तरह फिर झपट ले गया।

घरेलु उपाए: नाखून बढ़ाने का तरीका

 नीचे दिए गए घरेलु नुस्के आपके नाखून बढ़ाने में करेंगे मदद –


1. नारियल का तेल

एक कटोरी में थोड़ा अतिरिक्त कुंवारी नारियल का तेल लें और इससे अपने नाखूनों और उंगलियों की मालिश करें। मालिश करते समय, गोलाकार गति का उपयोग करें क्योंकि यह रक्त प्रवाह में सुधार करने में सहायता करेगा और इस प्रकार नाखून के विकास को बढ़ावा देगा। इसे रोज रात को सोने से पहले करें।


2. जैतून का तेल

गुनगुने जैतून के तेल से अपने नाखूनों और क्यूटिकल्स की लगभग 5 मिनट तक मालिश करें। अपने हाथों को ढकने के लिए दस्ताने पहनें और रात भर ऐसे ही छोड़ दें। इसे दिन में एक बार करें।


3. ऑरेंज जूस

एक कटोरी में संतरे का रस लें और इसमें अपने नाखूनों को लगभग 10 मिनट तक डुबोकर रखें। गर्म पानी का उपयोग करके अपने नाख़ून धो लें और अच्छी तरह से मॉइस्चराइज़ करें। ऐसा आपको दिन में कम से कम एक बार जरूर करना चाहिए।


4. नींबू का रस

हम जानते हैं कि नींबू में उच्च विटामिन सी होता है जो स्वस्थ नाखूनों के विकास के लिए अच्छा होता है। नाखूनों पर नींबू लगाने से ब्लीचिंग प्रभाव के कारण नाखूनों के दाग से छुटकारा मिल सकता है। प्रत्येक दिन, आपको लगभग 5 मिनट के लिए अपनी उंगलियों और पैर की उंगलियों पर एक टुकड़ा घिसना चाहिए। इसके बाद इसे गर्म पानी से धो लें।


नाखून काटने का तरीका  

नाखूनों की नियमित ट्रिमिंग वास्तव में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वे साफ और अच्छी तरह से तैयार दिखते हैं। यदि उन्हें ठीक से नहीं काटा गया है, तो उनके नीचे जमी हुई मैल या रत्न जमा हो सकते हैं और इसके परिणामस्वरूप संक्रमण हो सकता है।


यदि आपके नाखून लंबे हैं, तो आप उन्हें काटने की अधिक संभावना रखते हैं। इसके परिणामस्वरूप भी संक्रमण हो सकता है।


नाखून काटने की प्रक्रिया सरल लग सकती है, लेकिन नाखूनों को काटने का आदर्श तरीका सुनिश्चित करने के लिए आपको कुछ चरणों का पालन करने की आवश्यकता है।


1. ट्रिमिंग के लिए नाखून तैयार करें                                   

आपको अपने नाखूनों को नरम करने के बाद ट्रिम करना चाहिए। ट्रिम करने का सही समय नहाने या शॉवर के ठीक बाद का है। इसके अलावा, आप उन्हें थोड़ी देर के लिए गुनगुने पानी में भीगो सकते हैं ताकि काटने से पहले वे नरम हो जाएं।


2. सही उपकरण उठाओ

काटने के लिए नेल कैंची या नेल क्लिपर्स जैसे उपकरणों का उपयोग करें। पैर के नाखून और हाथ के नाखून दोनों के लिए अलग-अलग प्रकार के क्लिपर्स उपलब्ध हैं। नाखूनों के लिए नियमित नाखून कैंची या नाखून क्लिपर और पैर के नाखून के लिए टोनेल निप्पर प्राप्त करें। यदि आपके पैर के नाखून बहुत मोटे हैं और एक नियमित पैर की अंगुली क्लिपर के साथ छंटनी नहीं की जा सकती है, तो टोनेल निप्पर का उपयोग करें। कैंची या नेल क्लिपर का उपयोग करने से पहले उन्हें साफ या कीटाणुरहित करना न भूलें।



3. अपने नाखूनों को सीधी दिशा में काटें

कोशिश करें कि अपने नाखूनों को “वी” आकार में न काटें और न ही उनके किनारों को गोल करें। सतह के समानांतर काटें ताकि नाखून के कोनों के किनारों को नुकसान न पहुंचे। इस प्रकार की कटिंग अंतर्वर्धित टोनेल्स को रोकने में मदद कर सकती है। जब आपके पैर का नाखून अंतर्वर्धित होता है, तो नाखून का कोना त्वचा में धंस जाता है। इससे दर्द और कभी-कभी संक्रमण भी हो जाता है।


 4. मॉइस्चराइज़  

ट्रिमिंग पूरी होने के बाद मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करना बहुत ज़रूरी है। मॉइश्चराइजर के इस्तेमाल से आप नाखूनों को लचीला रख सकते हैं। अगर नाखून बहुत ज्यादा रूखे हो जाते हैं तो वे आसानी से टूट सकते हैं। इसलिए, नाखूनों के साथ-साथ क्यूटिकल्स पर भी मॉइस्चराइज करना बेहतर होता है।


स्वस्थ नाखून विकास के लिए आपको क्या खाना चाहिए?

यहां उन खाद्य पदार्थों की सूची दी गई है, जिन पर आपको नाखूनों के विकास के लिए अपने आहार में शामिल करने पर विचार करना चाहिए:


सरसों के बीज

ब्लू बैरीज़

जई

अंडे

सैमन

फलियाँ

काले नाखून का इलाज

नीचे हमने काले नाखून का देसी इलाज व नुस्खेंसूचीबद्ध किए हैं:


टी ट्री आयल

स्नेकरूट का अर्क

सिरका

लहसुन

जैतून का पत्ता निकालने

कन्क्लूज़न

आपके नाखून बताते हैं कि आप कितने स्वस्थ हैं। किसी तरह की चिकित्सीय समस्या, अत्यधिक तनाव, या पोषण की कमी, नाखून के विकास में व्यवधान के संकेत हो सकते हैं। यदि आप अपने नाखूनों में हाल ही में हुए परिवर्तनों के बारे में सोचके चिंतित हैं, तो उपरोक्त सभी सुझावों का पालन करें।

लाल मोर : तेनालीराम की कहानी

 विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय को अद्भुत व विलक्षण चीजें संग्रह करने का बहुत शौक था।


हर दरबारी उन्हें खुश रखने के लिए ऐसी ही दुर्लभ वस्तुओं की खोज में रहता था ताकि वह चीज महाराज को देकर उनका शुभचिंतक बन सके तथा रुपये भी ऐंठ सके।


एक बार एक दरबारी ने एक अनोखी चाल चली। उसने एक मोर को रंगों के एक विशेषज्ञ से लाल रंगवा लिया और उस लाल मोर को लेकर वह सीधा राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुंचा और राजा से बोला-‘‘महाराज ! मैंने मध्य प्रदेश के घने जंगलों से आपके लिए एक अद्भुत व अनोखा मोर मंगाया है।’’


राजा कृष्णदेव राय ने उस मोर को बड़े गौर से देखा। उन्हें बड़ा ताज्जुब हो रहा था...‘‘लाल मोर...वास्तव में आपने हमारे लिए अद्भुत चीज मंगाई है। हम इसे राष्ट्रीय उद्यान में बड़ी हिफाजत से रखवाएंगे। अच्छा...यह तो बताओ कि इस मोर को मंगाने में तुम्हें कितना रुपया खर्च करना पड़ा ?’’


दरबारी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो वह प्रसन्न हो उठा। बड़े ही विनम्र भाव से वह राजा से बोला, ‘‘महाराज, आपके लिए यह अनोखी वस्तु लाने के लिए मैंने अपने दो सेवक पूरे देश की यात्रा पर भेज रखे थे। वे वर्षों तक किसी अद्भुत वस्तु की खोज में लगे रहे। तब कहीं जाकर, मध्य प्रदेश के जंगलों में यह अनोखा लाल रंग का मोर मिला। मैंने अपने उन सेवकों पर करीब पच्चीस हजार रुपये खर्च किये हैं।’’


उस दरबारी की बात सुनकर राजा कृष्णदेव राय ने तुरन्त मंत्री को आज्ञा दी, ‘‘मंत्री जी, इन सज्जन को पच्चीस हजार रुपये राज-कोश से दे दिए जाएं।’’


मंत्री को यह आज्ञा देकर राजा ने दोबारा उस दरबारी से कहा, ‘‘यह तो आपको वह रुपया दिया जाता है, जो आपने खर्च किया है। इसके अलावा एक सप्ताह बाद आपको उचित पुरस्कार भी दिया जाएगा।’’

दरबारी को भला और क्या चाहिए था ? वह तेनाली राम की ओर कुटिल भाव से देखकर मुस्कराने लगा।


तेनाली राम उसके मुस्कराने का मतलब समझ गया, लेकिन समय को देखते हुए उसने चुप रहना ही उचित समझा।

तेनाली राम यह भी समझ गया कि लाल रंग का मोर किसी भी देश में नहीं होता। कहीं भी नहीं पाया जाता।

उसे लगा, यह सब अवश्य ही इस दरबारी की कोई चाल है।

बस फिर क्या था। तेनाली राम ने दूसरे ही दिन उस रंग विशेषज्ञ को खोज निकाला जिसने लाल मोर तैयार किया था।

तेनाली राम चार और मोर लेकर उस चित्रकार के पास पहुँचा। उसने उन्हें लाल रंग से रंगवा कर तैयार कराया और उसी दिन उन्हें दरबार में ले जाकर राजा से कहा, ‘‘महाराज हमारे मित्र दरबारी ने पच्चीस हजार से केवल एक लाल मोर ही मंगवाया था और मैं सिर्फ पचास हजार में उससे भी अधिक सुन्दर चार लाल मोर ले आया हूं।’’

राजा ने देखा। सचमुच तेनाली राम के चारों मोर उस दरबारी वाले मोर से कहीं अधिक सुन्दर और सुर्ख लाल रंग के थे।

राजा को आज्ञा देनी पड़ी, ‘‘तेनाली राम को राजकोष से पचास हजार रुपये फौरन दे दिए जाएं।’’



राजा कृष्णदेव राय की यह आज्ञा सुनते ही तेनाली राम ने एक आदमी की ओर इशारा करते हुए राजा से कहा, ‘‘महाराज, पुरस्कार का सही अधिकारी यही कलाकार है, मैं नहीं हूं। यह आदमी एक अनोखा चित्रकार है। यह किसी भी वस्तु का रंग बदलने की कला में निपुण है। इसी ने नीले मोरों का रंग लाल करने की कला दिखाई है।’’

अब राजा को सारा गोरखधन्धा समझते देर नहीं लगी। वह समझ गए कि पहले दिन दरबारी ने उन्हें मूर्ख बनाकर रुपये ठगे थे।

राजा ने फौरन ही उस दरबारी पर पच्चीस हजार लौटाने के साथ ही पांच हजार रुपये जुर्माने का आदेश दिया और चित्रकार को पुरस्कृत किया।


दरबारी बेचारा क्या करता ! वह अपना-सा मुंह लेकर रह गया।

राजा कृष्णदेव राय को खुश करने की सनक के चक्कर में पांच हजार रुपये भी गंवाने पड़े।

ब्राह्मण किसकी पूजा करे : तेनालीराम की कहानी

 एक दिन महाराज कृष्णदेव राय ने कहा ‘‘सभी दरबारी तथा मंत्रीगणों को यह आभास तो हो ही गया होगा कि आज दरबार में कोई विशेष कार्य नहीं और ईश्वर की कृपा से किसी की कोई समस्या भी हमारे सम्मुख नहीं। अतः क्यों न किसी विषय पर चर्चा की जाए।

क्या आप जैसे योग्य मंत्रियों व दरबारियों में से कोई सुझा सकता है ऐसा विषय, जिस पर चर्चा कराई जा सके ।’’

तभी तेनालीराम बोला, ‘‘महाराज, विषय का निर्णय आप ही करें तो अच्छा होगा।’’

महाराज ने कुछ सोचा और फिर बोले, ‘‘जैसा कि आप सभी जानते हैं कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-तीनों वर्ग ब्राह्मण को पूजनीय मानें ?’’

सभी दरबारियों व मन्त्रियों को महाराज का यह प्रश्न बेहद सरल प्रतीत हुआ। ‘‘इसमें कठिनाई क्या है महाराज ? ब्राह्मण गाय को पवित्र मानते हैं... गाय जो कामधेनु का प्रतीक है।’’ एक मंत्री ने उत्तर दिया।


दरबार में उपस्थित सभी लोग उससे सहमत लगे।

तभी महाराज बोले, ‘‘तेनालीराम, क्या तुम भी इस उत्तर से संतुष्ट हो या तुम्हारी कुछ अगल राय है।’’

तेनालीराम हाथ जोड़ते हुए विनम्र भाव से बोला, ‘‘महाराज ! गाय को तो सभी पवित्र मानते हैं, चाहे मानव हो या देवता। और ऐसा मानने वाला मैं अकेला नहीं, हमारे विद्वान की राय भी कुछ ऐसी ही है।’’

‘‘यदि ऐसा है तो ब्राह्मण गौ-चर्म (गाय की खाल) से बने जूते-चप्पल क्यों पहनते हैं ?’’ महाराज ने फिर पूछा। दरबार में चहुं ओर चुप्पी छा गई।


दरअसल महाराज ने जो कुछ भी कहा था, वह बिल्कुल सच था। इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास न था। सबको चुप देख महाराज ने घोषणा की जो भी उनके इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर देगा, उसे एक हजार स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार स्वरूप दी जाएंगी।


हजार स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार दरबार में उपस्थित हर कोई लेना चाहता था लेकिन प्रश्न का उत्तर कोई नहीं जानता था।

सभी को चुप बैठा देख तेनालीराम अपने आसन से उठते हुए बोला, ‘‘महाराज ! ब्राह्मण के चरण (पैर) बेहद पवित्र माने जाते हैं। उतने ही पवित्र, जितना कि किसी तीर्थ धाम की यात्रा। अतः गौ-चर्म से बने जूते-चप्पल पहनने से गायों को मोक्ष मिल जाता है।’’


‘‘गलत तो हर हाल में गलत है।’’ महाराज बोले, ‘‘गौ-चर्म से बने जूते-चप्पल पहनना जायज नहीं कहा जा सकता, फिर चाहे पहनने वाला ब्राह्मण हो या किसी अन्य वर्ग का।

    • लेकिन मुझे खुशी इस बात की है कि तेनालीराम ने उत्तर देने का साहस तो किया। चतुराई भरा उसका उत्तर उसे हजार स्वर्ण मुद्राएं दिलाने के लिए काफी है।’’

Saturday, November 25, 2023

सुब्बा शास्त्री को सबक मिला :

 एक बार फारस देश से घोड़ों का एक व्यापारी कुछ बेहद उत्तम नस्ल के घोड़े लेकर विजय नगर आया। सभी जानते थे कि महाराज कृष्णदेव राय घोड़ों के उत्तम पारखी हैं। उनके अस्तबल में चुनी हुई नस्लों के उत्तम घोड़े थे। महाराज ने फारस के व्यापारी द्वारा लाए गए घोड़ों का निरीक्षण किया तो पाया कि वे घोड़े दुर्लभ नस्ल के हैं। उन्होंने व्यापारी से सभी घोड़े खरीद लिए, क्योंकि वे अपनी घुड़सवारी सेना को और मजबूत व सुसज्जित करना चाहते थे।


जब घोड़ों का व्यापारी चला गया तो महाराज ने अपनी घुड़सवार सेना के चुने हुए सैनिकों को बुलाया और एक-एक घोड़ा देते हुए उसकी अच्छी तरह देखभाल और उसे भलीभांति प्रशिक्षित करने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि घोड़ों के प्रशिक्षण व भोजनादि का सारा खर्च राजकोष वहन करेगा।


तेनालीराम को जब पता चला तो वह भी महाराज के पास पहुंचा और एक घोड़ा अपने लिए भी माँगा। उसे भी एक घोड़ा दे दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को घर लाकर अस्तबल में बाँध दिया। लेकिन उसे न जाने क्या सूझा कि उसने अस्तबल के सामने की ओर भी दीवार उठवा दी।

अब अस्तबल की स्थिति कुछ ऐसी हो गई थी कि न तो वह घोड़ा कहीं बाहर जा सकता था। और न ही कोई उस अस्तबल में प्रवेश ही कर सकता था।


तेनालीराम ने अस्तबल की दीवार में एक छोटी सी खिड़की छुड़वा दी थी, जहाँ से घोड़े को दाना-पानी दिया जा सके।

उसी खिड़की से तेनालीराम घोड़े को हरी घास दाना-पानी देता और घोड़ा भी खिड़की से अपना मुंह बाहर निकालकर उसे मुंह में दबाता और भीतर खींच लेता। घोड़े को पानी भी इसी खिड़की द्वारा पहुंचाया जाता।


करीब एक महीने बाद महाराज ने घोड़े की सुध-बुध ली और यह जानने की कोशिश की किस प्रकार उसकी देखभाल व प्रशिक्षण का काम चल रहा है। तब सभी सैनिक अपने-अपने घोड़े लेकर महाराज के सम्मुख आ पहुंचे। हृष्ट-पुष्ट व भली भांति प्रशिक्षित घोड़ों को देख महाराज बेहद प्रसन्न हुए।

लेकिन तभी उन्होंने पाया कि तेनालीराम और उसका घोड़ा कहीं दिखाई नहीं दे रहे। इधर-उधर निगाहें दौड़ाते महराज ने पूछा, ‘‘तेनालीराम कहाँ है ? जाओ, उससे कहो कि अपने घोड़े के साथ हमारे सामने जल्दी पेश हो।’’

एक सैनिक तेनालीराम के घर की ओर दौड़ा और उसे महाराज का संदेश दिया कि जल्दी से जल्दी घोड़े को लेकर उनके सामने हाजिर हो जाए। लेकिन तेनालीराम अकेला ही चल दिया।


उसे अकेला आया देख महाराज बोले, ‘‘तुम्हारा घोड़ा कहां है ? आज मैं सभी घोड़ों का मुआयना कर रहा हूं कि उनकी कैसी देखरेख की गई है। जाओ, अपना घोड़ा लेकर आओ।’’

‘‘क्षमा करें महाराज !’’ तेनालीराम बोला, ‘‘आपने मुझे जो घोड़ा दिया वह घोड़ा गुस्सैल है और अड़ियल है। मैं तो उसे अपने साथ यहाँ लाना चाहता था लेकिन मेरे लिए यह संभव नहीं हो पाया।’’ कहकर तेनालीराम चुप हो गया।

‘‘यदि ऐसा है तो मैं कुछ बहादुर सैनिकों को तुम्हारे साथ भेज देता हूं, जो तुम्हारे साथ जाकर घोड़ा ले आएंगे।’’ महाराज ने कहा।

‘‘नहीं-नहीं महाराज ! ऐसा हरगिज न करिएगा । अब तक घोड़े की देखभाल मैंने की है और मैं ब्राह्माण हूं। इसलिए अच्छा तो यह होगा कि आप किसी पंडित या पुरोहित को घोड़ा लाने के लिए मेरे साथ भेजें।’’ होठों पर रहस्मय मुस्कान लाते हुए तेनालीराम बोला।


संयोगवश राजपुरोहित उस दरबार में उपस्थित था। वह राजपरिवार में कुछ पूजा-पाठ के कर्मकांड करवाने वहाँ आया था।

सुब्बा शास्त्री नाम था राजपुरोहित का।

‘‘क्या तुम तेनालीराम के साथ जाकर उसके अस्तबल से घोड़ा यहाँ ला सकते हो ?’’ महाराज ने उससे पूछा।

तेनालीराम और सुब्बा की निकटता देख सुब्बा शास्त्री जला-भुना करता था और तेनालीरम को नीचा दिखाने का कोई मौका चूकना नहीं चाहता था। वह बोला, ‘‘क्यों नहीं महाराज ! मैं अभी जाकर घोड़ा ले आता हूं। ऐसे एक घोड़े की तो बात ही क्या, मैं दस बिगड़ैल-गुस्सैल घोड़ों को साथ ला सकता हूं।’’


‘‘ठीक है ! यदि ऐसा है तो आइए मेरे साथ।’’ तेनालीराम बोला।

जब सुब्बा शास्त्री और तेनालीराम जा रहे थे तो रास्ते में तेनालीराम बोला, ‘‘शास्त्री जी मैं जानता हूं कि आप विद्वान हैं और मैं यह भी जानता हूं कि आपने अश्व-शास्त्र का अध्ययन भी किया है।’’


कुछ ही देर में जब तेनालीराम के घर पहुंचे तो सुब्बा शास्त्री अपनी लंबी दाढ़ी को उंगलियों से सहलाते हुए अहंकार भरे स्वर में बोला, ‘‘हाथ कंगन और आरसी क्या...! आखिर तुम्हें मेरी योग्यता पर विश्वास हो ही गया।’’

‘‘लेकिन शास्त्री जी, मेरा घोड़ा कोई साधारण घोड़ा नहीं है। इसलिए मेरा कहना मानें तो पहले खिड़की से झांककर देख लें। इसके बाद अस्तबल की दीवार तोड़कर घोड़े को बाहर निकालने की सोचना !’’ अपने होठों पर कुटिल मुस्कान लाते हुए बोला तेनालीराम।

तेनालीराम ने भी जैसे उस दिन सुब्बा शास्त्री से पुराना हिसाब-किताब चुकता करने की ठान ली थी।


इधर जैसे ही सुब्बा शास्त्री ने दीवार में बनी खिड़की में अपना हाथ डाला, तुरंत घोड़े ने उसकी दाढ़ी पकड़ ली।

दरअसल, वह उसकी दाढ़ी को भूसे का ढेर समझ बैठा था। सुब्बा शास्त्री की दाढ़ी को अपने मुंह में दबाए घोड़ा इतनी जोर से खींच रहा था कि उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह दर्द के मारे जोर-जोर से चिल्लाने लगा।


अंततः अस्तबल की सभी दीवारे तोड़कर वह बाहर निकाला गया। मगर घोड़ा भी कुछ ऐसा हठीला था कि सुब्बा शास्त्री की दाढ़ी अब भी दबाये था।

कोई और रास्ता न देख, उन्हें उसी अवस्था में राजमहल की ओर जाना पड़ा।

अब तक सुब्बा शास्त्री को यह बात समझ में आ चुकी थी कि पूर्व में जो वह तेनालीराम को नीचा दिखाने की फिराक में लगा रहता था, उसी का बदला तेनालीराम ले रहा है। वह तो बस मौके की तलाश में था, जो उसे आज मिल गया था।


इधर महाराज और अन्य घुड़सवार सैनिक बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे थे। तभी तेनालीराम और सुब्बा शास्त्री की दाढ़ी मुंह में दबाए वह घोड़ा वहाँ आ पहुंचा। सुब्बा शास्त्री को इस हास्यास्पद स्थिति में देख सभी उपस्थित जन ठहाके मारकर हंसने लगे। यहाँ तक की महाराज भी अपनी हंसी पर काबू न कर सके और बेतहाशा लगातार हंसते ही चले गए।


लोगों को इस प्रकार हंसते देख वहाँ मौजूद घोड़े भी तरंग में आकर हिनहिनाने लगे।

तेनालीराम का घोड़ा, जो सुब्बा शास्त्री की दाढ़ी मुंह में दबाए था, भी यह देख हिनहिनाने लगा। जैसे ही घोड़े ने अपना मुंह खोला, दाढ़ी मुक्त हो गई।

सुब्बा शास्त्री ने चैन की सांस ली।

तभी एकाएक अपनी हंसी को रोक महाराज गंभीर हो गए और बोले, ‘‘तेनालीराम ! मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं कि लोगों को हंसाने के लिए हास-परिहास किया जाए। बल्कि यह तो अच्छा ही है, क्योंकि हंसना स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है। लेकिन ऐसा परिहास मुझे स्वीकार्य नहीं, जिसमें दूसरे को पीड़ा या कष्ट होता हो।

तुमने सुब्बा शास्त्री जैसे विद्वान के साथ जो सुलूक किया है वह कतई शोभा नहीं देता। यह सरासर शास्त्री जी का अपमान है। मैंने तुम्हारे दिमाग में छिपी किसी खुराफात का अंदाजा उसी समय लगा लिया था, जब तुमने मुझसे घोड़ा मांगा था। वरना तुम्हें घोड़े से क्या लेना-देना।


चलो, अपनी गलती के लिए शास्त्री जी से क्षमा-याचना करो।’

लेकिन इससे पहले कि तेनालीराम क्षमा-याचना करता, सुब्बा शास्त्री आगे बढ़कर बोला,

‘‘महाराज ! तेनालीराम का कोई दोष नहीं, यह निर्दोष है। दोषी यदि कोई है तो मैं हूं।

मैं तो हमेशा तेनालीराम को नीचा दिखाने की फिराक में लगा रहता था और कई बार तो मैंने इसका अपमान भी किया। लेकिन मेरे दुर्व्यवहार को यह बेचारा चुपचाप सहन कर गया, एक शब्द तक मुंह से नहीं निकला कभी। यह सब मैंने ईर्ष्यावश किया।

इसने जो कुछ भी मेरे साथ किया अच्छा ही किया। दरअसल, आज जो कुछ भी हुआ, उससे मेरी आँखें खुल गई हैं। तेनालीराम ने मुझे सदराह दिखाई है।’’


अपनी बात समाप्त करते हुए सुब्बा शास्त्री ने आगे बढ़कर तेनालीराम को गले से लगा लिया।

वहाँ उपस्थित महाराज और अन्य सभी उन दोनों को गले मिलना देख बेहद प्रसन्न

 हुए।



हीरों का सच

 एक बार राजा कृष्णदेवराय दरबार में बैठे मंत्रियों के साथ विचार विमर्श कर रहे थे कि तभी एक व्यक्ति उनके सामने आकर कहने लगा,”महाराज मेरे साथ न्याय करें। मेरे मालिक ने मुझे धोखा दिया है। इतना सुनते ही महाराज ने उससे पूछा, तुम कौन हो? और तुम्हारे साथ क्या हुआ है।”


“अन्नदाता मेरा नाम नामदेव है। कल मैं अपने मालिक के साथ किसी काम से एक गाँव में जा रहा था। गर्मी की वजह से चलते-चलते हम थक गए और पास में स्थित एक मंदिर की छाया में बैठ गए। तभी मेरी नज़र एक लाल रंग की थैली पर पड़ी जो की मंदिर के एक कोने में पड़ी हुई थी। मालिक की आज्ञा लेकर मैंने वो थैली उठा ली उसे खोलने पर पता चला कि उसके अंदर बेर के आकार के दो हीरे चमक रहे थे। हीरे मंदिर में पाए गए थे इसलिए उन पर राज्य का अधिकार था। परन्तु मेरे मालिक ने मुझसे ये बात किसी को भी बताने से मना कर दिया और कहा कि हम दोनों इसमें से एक-एक हीरा रख लेंगे। मैं अपने मालिक की गुलामी से परेशान था इसलिए मैं अपना काम करना चाहता था जिसके कारण मेरे मन में लालच आ गया।हवेली आते ही मालिक ने हीरे देने से साफ़ इनकार कर दिया।यही कारण है कि मुझे इन्साफ चाहिए।


महाराज ने तुरंत कोतवाल को भेजकर नामदेव के मालिक को महल में पेश होने का आदेश दिया। नामदेव के मालिक को जल्द ही राजा के सामने लाया गया । राजा ने उससे हीरों के बारे में पूछा तो वह बोला, “महाराज ये बात सच है कि मंदिर में हीरे मिले थे लेकिन मैंने वो हीरे नामदेव को देकर उन्हें राजकोष में जमा करने को कहा था। जब वह वापस लौटा तो मैंने उससे राजकोष की रशीद मांगी तो वह आनाकानी करने लगा। मैंने जब इसे धमकाया तो ये आपके पास आकर मनगढ़त कहानी सुनाने लगा।” “अच्छा, तो ये बात है।” महाराज ने कुछ सोचते हुए कहा – “क्या तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत है कि तुम सच बोल रहे हो?” “अन्नदाता अगर आपको मेरी बात पर यकीं नहीं तो आप मेरे दूसरे तीनों नौकरों से पूछ सकते हो। वो उस वक़्त वहीं थे ।”


उसके बाद तीनों नौकरों को राजा के सामने लाया गया। तीनों ने नामदेव के खिलाफ गवाही दी। महारज तीनों नौकरों और मालिक को वही बिठा कर अपने विश्राम कक्ष में चले गए और सेनापति.तेनालीराम, महामंत्री को भी इस विषय में बात करने के लिया वहाँ बुलवा लिया। उनके पहुँचने पर महाराज ने महामंत्री से पूछा, “आपको क्या लगता है ? क्या नामदेव झूठ बोल रहा है ?”


“जी महाराज! नामदेव ही झूठा है। उसके मन में लालच आ गया होगा और उसने हीरे अपने पास ही रख लिए होंगे।” सेनापति ने गवाहों को झूठा बताया। उसके हिसाब से नामदेव सच बोल रहा था। तेनालीराम चुपचाप खड़ा सब की बातें सुन रहा था। तब महाराज ने उसकी ओर देखते हुए उसकी राय मांगी। तेनालीराम बोला , “महाराज कौन झूठा है और कौन सच्चा इस बात का अभी पता लग जायेगा परन्तु आप लोगों को कुछ समय के लिए पर्दे के पीछे छुपना होगा।” महाराज इस बात से सहमत हो गए क्योंकि वो जल्दी से जल्दी इस मसले को सुलझाना चाहते थे इसीलिए पर्दे के पीछे जाकर छुप गए।महामंत्री और सेनापति मुंह सिकोड़ते हुए पर्दे के पीछे

 चले गए।



अब विश्राम कक्ष में केवल तेनालीराम ही दिखाई दे रहा था। अब उसने सेवक से कहकर पहले गवाह को बुलाया। गवाह के आने पर तेनालीराम ने पूछा,“क्या तुम्हारे मालिक ने तुम्हारे सामने नामदेव को हीरे दिए थे।”

“जी हाँ।”


फिर तो तुम्हें हीरे के रंग और आकार के बारे में भी पता होगा। तेनालीराम ने एक कागज़ और कलम गवाह के सामने करते हुए उससे कहा लो मुझे इस पर हीरे का चित्र बनाकर दिखाओ । इतना सुनते ही उसकी सिट्टी -पिट्टी गुल हो गयी और बोला,“मैंने हीरे नहीं देखे क्योंकि वो लाल रंग की थैली में थे।” “अच्छा अब चुपचाप वहाँ जाकर खड़े हो जाओ ।” अब दूसरे गवाह को बुलाकर उससे भी यही प्रश्न पूछा गया।उसने हीरो के रंग के बारे में बताकर कागज़ पर दो गोल -गोल आकृतियाँ बनाकर अपनी बात साबित की। फिर उसे भी पहले गवाह के पास खड़ा कर दिया गया और तीसरे गवाह को बुलाया गया।


उसने बताया कि हीरे भोजपत्र की थैली में थे। इस वजह से वह उन्हें देख नहीं पाया। इतना सुनते ही महाराज पर्दे के पीछे से सामने आ गए ।महाराज को देखते ही तीनों घबरा गए और समझ गए कि अब सच बोलने में ही उनकी भलाई है। तीनों महाराज के पैरों को पकड़कर माफ़ी मांगने लगे और बोले हमें झूठ बोलने के लिए हमारे मालिक ने धमकाया था और नौकरी से निकालने की धमकी दी थी इसीलिए हमें झूठ बोलना पड़ा। महाराज ने तुरंत मालिक के घर की तालाशी के आदेश दे दिए। तालाशी लेने पर दोनों हीरे बरामद कर लिए गए। सजा के तौर पर मालिक को दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएं नामदेव को देनी पड़ी और बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएं जुर्माने के तौर पर भरनी पड़ी जबकि बरामद हुए दोनों हीरे राजकोष में जमा कर लिए गए। इस प्रकार तेनालीराम की मदद से महाराज ने नामदेव के हक में फैसला सुनाया।

महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...