Friday, April 26, 2024

कृतघ्न प्राणी (कहानी) : गोनू झा

 मिथिला नरेश की जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी, वैसे-वैसे वे मनमौजी होते जा रहे थे। कई बार तो दरबारी उनके व्यवहार से चकित हो जाते और आपस में बतियाते कि महाराज तो इन दिनों सनकी होते जा रहे हैं । जब देखो तब बेतुकी बातें करने लगते हैं ।


एक दिन ऐसे ही मिथिला नरेश दरबार में बहक गए और दरबारियों से पूछा -" आप में से कोई बता सकता है कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन है?"


दरबारी अटकलें लगाने लगे। एक ने कहा -" शेर महाराज, शेर। शेर से बड़ा कृतघ्न प्राणी भला कौन होगा ? बड़े से बड़ा जानवर उससे घबराता है । खरगोश हो या हाथी, सबको चटकर जाता है। एक बार पेट भर जाए तो पन्द्रह दिनों तक हिलता-डुलता नहीं। अघाया हुआ पड़ा रहता है।"


दूसरे ने कहा “अरे महाराज ! यही आदत तो बाघ, चीता, तेंदुआ आदि में भी है। आखिर यह कैसे तय होगा कि इनमें से कौन कृतघ्न है ?"


तीसरे ने कहा -" महाराज, सबसे कृतघ्न प्राणी लकड़बग्घा होता है । शरीर से कुछ और सिर से कुछ और दिखता है । छोटे जीवों और कमजोर बच्चों को अपना आहार बनाता है ।"


मतलब यह कि दरबार में बतकही का दौर चला तो चलता ही रहा । गोनू झा इन बातों में रुचि नहीं ले रहे थे। उन्हें अनमना देखकर महाराज ने उनसे कहा -" क्या बात है पंडित जी ? आप चुप क्यों हैं ? आप भी कुछ बताइए।"


गोनू झा ने महाराज से विनीत -स्वरों में कहा-“महाराज ! मैं आज नहीं, कल बताऊँगा कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन होता है।“ फिर महाराज से आज्ञा लेकर अपने आसन पर बैठ गए।


दरबार के समापन के बाद गोनू झा अपने घर आए। उन दिनों उनके घर एक सम्बन्धी आया हुआ था । दूर का सम्बन्ध था, वह भी दामाद का । गोनू झा ने उससे कहा -” मेहमान ! कल दरबार चलना । इतने दिन हुए तुम्हें आए, कहीं कुछ देखा नहीं-न मैंने तुम्हें दिखाया । कल तुम्हें दरबार ले चलूँगा । वहाँ काम-काज देखना। शाम को तुम्हें महाराज की फुलवारी दिखाने ले चलूँगा। तरह-तरह के फूल हैं वहाँ। बहुत ही सुन्दर फव्वारा है। उद्यान ऐसा जैसा आस -पास किसी राज्य में नहीं है । एक बार यहाँ अंगदेश के महाराज आए थे तो अधिकांश समय उसी उद्यान में व्यतीत करते थे। उन्हें वहाँ इतनी शान्ति मिलती थी कि कहते थे यहाँ से जाने का मन ही नहीं करता । वापसी के समय फुलवारी में लगे तरह-तरह के फूलों के बीज अपने साथ लेते गए । देखोगे तो मन हर्षित होगा।"




दूसरे दिन उनका दामाद बन -ठनकर तैयार हुआ । उसने रेशमी धवल वस्त्र धारण किए । युवा और आकर्षक तो वह था ही । गोनू झा के साथ दरबार में पहुँचने के बाद उसने दरबार की शोभा देखी । अभिभूत हुआ ।


दरबार में जब महाराज आए तो उन्हें देखकर दरबारी समझ गए कि महाराज आज भी हास -परिहास और बतकही में दिन गुजार देंगे । हुआ भी वैसा ही । देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। अचानक महाराज की नजर गोनू झा पर पड़ी तो उन्हें स्मरण हो आया कि आज गोनू झा को बताना था कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन है।


महाराज ने गोनू झा से पूछा" पंडित जी ! आज तो आप बताएँगे कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन है?"


गोनू झा अपने आसन से उठे और अपने दामाद की ओर इंगित करते हुए कहा -”महाराज ! यह युवक, जो मेरे पास बैठा है मेरा दामाद है । संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी दामाद होता है । दामाद को उसका ससुर अपनी पुत्री सौंपता है। उसके साथ सौगात के रूप में उसकी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हर तरह की वस्तु देता है। यथा सामर्थ्य धन भी देता है । मगर दामाद कभी सन्तुष्ट नहीं होता । उसकी इच्छा रहती है कि ससुराल से उसे और धन मिले । वह कभी यह नहीं सोचता कि उसकी पत्नी बनकर उसके घर में आई कन्या ने उससे सम्बन्ध बनाने के लिए अपना सब कुछ छोड़ा है माता -पिता, भाई-बहन, सगे सम्बन्धी, सहेली -मित्र-सब कुछ, फिर भी दामाद तो दामाद है-उसकी लोलुप दृष्टि ससुराल के धन पर बनी रहती है।"


महाराज ने जब गोनू झा की बातें सुनीं तो तैश में आ गए और बोले -" सच कहते हैं पंडित जी, ऐसे प्राणी को कृतघ्न तो क्या, कृतघ्नतम् प्राणी कहेंगे।" उन्होंने तुरन्त आज्ञा दी -" इस अधम प्राणी को कारागार में डाल दिया जाए ।"


गोनू झा ने विनम्रता से कहा-”महाराज ! यह ठीक है कि दामाद को मैंने कृतघ्न कहा, लेकिन महाराज ! हम सभी किसी न किसी के दामाद हैं । हम सबमें यह दुर्गुण मौजूद है । सोच के देखें महाराज, तो आपको मेरी बात ठीक लगेगी। हम सभी अपनी पत्नियों को अपनी जागीर समझते हैं । कभी यह नहीं सोचते कि उसे भी अपने बचपन के दिनों की स्मृति हो आती होगी । उसका भी जी करता होगा अपने सगे- सम्बन्धियों से मिलने का ।... मैंने यह तो कहा नहीं कि मेरा दामाद ही कृतघ्न प्राणी है।"


दामाद, जिसके हलक तक आ गए थे -प्राण और जो भरे दरबार में अपने को अपमानित हुआ महसूस कर रहा था अब थोड़ा संयत हुआ । महाराज को भी बात समझ में आ गई ।


दरबार के समापन के बाद गोनू झा अपने दामाद को लेकर महाराज के पास पहुँचे और बोले-“महाराज, मैं मेहमान को फुलवारी घुमाने लाया हूँ।"



महाराज बोले-”पंडित जी ! आप इस तरह की औपचारिकताओं से ऊपर हैं । यह फुलवारी आप की ही है ।"


"अरे मैं तो भूल ही गया था आपका दामाद । मेरा भी तो कुछ होता है ।" उन्होंने अपने गले से मोतियों की माला उतारकर गोनू झा के दामाद के गले में डाल दी और बोले-“पुत्र ! यह तो तुम्हारा अधिकार है। इसे धारण करो। इससे तुम कृतघ्न नहीं हो जाओगे । पंडित जी ने तो उस प्रथा पर चोट की है जिससे बेटी के बाप को अपना सबकुछ लुटाकर दामाद की लोलुपता की तुष्टि करनी पड़ती है।"


गोनू झा के दामाद ने जब महाराज के चरण छुए तब महाराज ने उसे अपने गले से लगा लिया ।


बाद में गोनू झा ने अपने दामाद को महराज की फुलवारी घुमाई और अपने घर की ओर चल पड़े ।


उनका दामाद गद्गद मन से गोनू झा के साथ चल रहा था ।


ठग उन्मूलन अभियान (कहानी) : गोनू झा

 मिथिला में चोर -उचक्कों और ठगों का कभी बहुत जोर था । चोर-उचक्कों के इस जोर के कारण ही कोई अजनबी न तो मिथिला जाना चाहता था और न वहाँ के लोगों से मेल -जोल बढ़ाने का ही साहस कर पाता था । मिथिलांचल नरेश ने चोरी और ठगी रोकने के कई उपाय किए लेकिन सारे विफल रहे ।


एक दिन उन्होंने गोनू झा से कहा -" अब आप ही कोई उपाय करें पंडित जी ! राज्य में चोरी और ठगी की घटनाएँ इतनी बढ़ गई हैं कि पड़ोस के राज्यों से कोई मिथिला भ्रमण के लिए आना ही नहीं चाहता । मिथिला की कलात्मक तस्वीरों के लिए पहले यहाँ पर्यटकों की भीड़ लगी रहती थी । मिथिला अपने प्राकृतिक रंग-निर्माण के लिए अपनी प्रसिद्धि के कारण व्यापारियों को भी आकर्षित करता था । मखाने की खेती में यह क्षेत्र अव्वल है लेकिन चोरों और ठगों के उत्पात के कारण अब मखाने के व्यापार पर भी असर पड़ने लगा है । मिथिला की मछलियाँ दूर-दराज तक के खरीददार ले जाया करते थे लेकिन मछलियों की माँग भी कम होती जा रही है । यदि यही हाल रहा तो राजस्व में कमी आएगी और हमें नए कर लगाने होंगे। इससे हमारी प्रजा पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव आएगा । यह उचित नहीं होगा । मुझे विश्वास है पंडित जी आप ही कोई ऐसा रास्ता निकालेंगे जिससे मिथिला की प्रजा को इन ठगों-चोरों और लुटेरों से निजात मिल सकेगी।"


गोनू झा मिथिला नरेश की बातों को स्पष्ट आदेश के रूप में लेते थे। प्रखर बुद्धि और त्वरित सूझ के अपने विशिष्ट गुणों के कारण गोनू झा मिथिला नरेश के दरबार में सभी दरबारियों से भिन्न थे। उनकी इस विशेषता के कारण ही मिथिला नरेश उनका सम्मान करते थे। मिथिला नरेश की बातें सुनकर गोनू झा ने कहा -” महाराज! आपका आदेश सिर आँखों पर । बस, मुझे राज्य के सुरक्षा- प्रहरियों में से कुछ प्रहरियों का चुनाव कर उनसे मनचाहा काम लेने की सुविधा प्रदान करें ।"


महाराज ने गोनू झा को यह सुविधा प्रदान कर दी ।


गोनू झा ने सुरक्षा प्रहरियों में से अपनी पसन्द के जवानों का चुनाव किया और उन्हें अपने गाँव में ग्रामीणों जैसे लिबास में बुलवाया । तीन-चार दिनों तक वे उन्हें समझाते रहे कि उन्हें क्या करना है । इसके बाद वे महाराज के पास गए तथा कहा -" महाराज, अब मैं ठगी चोरी निषेध अभियान पर लग गया हूँ । न तो अगले तीन माह तक मैं दरबार में आऊँगा और न यह बताऊँगा कि मैं और मेरे प्रहरी क्या कर रहे हैं और न यह बात आप किसी भी कारण से मुझसे पूछेगे।"


महाराज ने स्वीकृति दे दी ।



गोनू झा ने इन सुरक्षा प्रहरियों को पर्यटकों के वेश में विभिन्न क्षेत्रों के धर्मशालाओं में ठहर जाने का निर्देश दिया तथा राजकोष से मँगाकर सबको कुछ- कुछ धन भी प्रदान किया । जवानों के चयन में गोनू झा ने एक विशेष नीति अपनाई थी । उन्होंने ऐसे जवानों का चयन किया था जो देखने में मूर्ख लगते थे। तीन दिनों के प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने इन जवानों को मूर्खतापूर्णढंग से देखने, बोलने आदि की कला भी सिखाई थी ।


गोनू झा के गाँव से थोड़ी दूरी पर एक मवेशी मंडी थी जहाँ रविवार को मवेशियों का बाजार लगा करता था । एक सुरक्षा प्रहरी किसान के वेश में उस हाट में भेजा गया । वह दिन भर हाट में घूमता रहा और मूर्खों के से हाव-भाव के साथ मवेशियों के पास जाता, उन्हें निहारता और फिर उसके मालिक से उसकी कीमत पूछता फिर अपनी अंटी से पैसे निकालकर उन्हें सबके सामने गिनने बैठ जाता । फिर कहता कि उसके पास पैसे कम हैं । लगभग चार -पाँच चक्कर वह पूरे हाट का लगा चुका था । अब वह किसी भी मवेशी के पास रुकता तो मवेशी का मालिक उसे दुत्कार कर भगा देता – “जा-जा, आगे बढ़ । लेना न देना आ गया फिर मगज चाटने !"


हाट में घूम-घूमकर थक जाने के बाद वह जवान एक जगह पर बैठ गया । उसने महसूस किया कि उसके आस-पास, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चार लोग बैठ गए हैं । चुपचाप ! सब की पीठ उसकी तरफ थी । जवान ने फिर अपनी अंटी से पैसों की थैली निकाली और वहाँ बैठकर उन्हें गिनने लगा । पैसे गिनकर उसने थैली में डाले और थैली अपनी अंटी में रखकर वह फिर से मंडी के चक्कर लगाने लगा । चक्कर लगाते-लगाते उसकी नजर एक छोटे से बछड़े पर पड़ी । वह बछड़े के मालिक से उसका मोल पूछा । पहले तो बछड़े का मालिक उस पर नाराज हुआ मगर जब उसने अपनी अंटी से रुपए निकालकर दिखाए तो उसने उसकी कीमत दो सौ रुपए बताई । मोल-तोल करने के बाद डेढ़ सौ रुपए में बछड़ा खरीदकर वह जवान उस बछड़े को अपने कंधे पर लाद लिया और गोनू झा के गाँव की ओर चलने को हुआ तो जिसने बछड़ा बेचा था, वह उसकी मूर्खता पर हँसते हुए पूछा-“बड़े मजबूत जवान हो ! किस गाँव से आए हो ?"


जवान ने चलते हुए कहा-" भड़ौरा गाँव है मेरा । भड़वारा जानते हो न ? वही।"



इतने में चार लोग उसके पास से लगभग दौड़ते हुए निकल गए। जवान ने देखा, ये वही चार लोग थे जो कुछ देर पहले उसके आस- पास आकर बैठ गए थे। जवान ने उन्हें देखकर अनदेखा कर दिया और धीमी चाल से वह आगे की ओर चल पड़ा । मवेशी मंडी से थोड़ी दूर निकल जाने के बाद एक मोड़ पर उसने देखा कि एक आदमी उसे रुकने का इशारा कर रहा है, मगर वह उस पर बिना ध्यान दिए धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा । उसे इशारा करनेवाला आदमी तेज कदमों से चलकर उसके पास आ गया और कहने लगा-“का गणेशी भाई! नाराज छी की ? अतेक आवाज देलौं, इशारो कैलो, अहाँ ध्यानो न देलौं ? किऐक ?" ( क्यों गणेशी भाई, नाराज हैं क्या ? इतनी आवाज दी, इशारा भी किया मगर आपने ध्यान ही नहीं दिया, क्यों ? )


जवान अपनी धीमी गति से चलता रहा। उस आदमी ने फिर कहा-“की बात छई, बोलवे नहिं करई छी ?” ( क्या बात है ? बोलते ही नहीं हैं ? )


तब जवान ने बिना उसकी ओर देखे कहा -”मेरा नाम गणेशी नहीं, माधो है। माधो! माधव झा ! मुकुंद माधव झा !"


" हाँ यौ झा जी । ई बताऊ कि ई बकरा कतेक में भेटल ? ( हाँ ! झा जी । यह बताइए कि यह बकरा कितने में मिला ? )


“ई बकरा?"...माधो झुंझलाया और बोला-“तुम्हें यह बकरा दिख रहा है?"


" त आउर का ?"( तो और क्या ? )


माधो चलते हुए बोल रहा था – “भाई, इ बकरा नहीं है।


बाछा है बाछा।” “बाछा ? कौन कहता है ? अरे बकरा और बाछा में अन्तर नहीं समझता क्या ? क्या मेरे पास आँखें नहीं हं ? क्यों मूर्ख बना रहे हो ?" वह आदमी अब रोष में बोल रहा था ।


माधो ने भी उत्तेजित होकर जवाब दिया-“हाँ, बाछा है, बाछा... बाछा... बाछा...। एक नहीं, सौ बार बाछा।”


उस आदमी ने माधो से भी ऊँची आवाज में कहा, " बकरा- बकरा-बकरा !" माधो फिर चीखा – “बाछा...बाछा...बाछा!”


ऐसे ही चीखते-चीखते दोनों गाँव के मोड़ तक पहुँच गए । वहाँ उन्हें तीन आदमी दिखे। उनमें से एक ने उन्हें टोका -" अरे ! क्यों चीख रहे हो दोनों ?"


माधो ने रुआँसा होकर कहा-“यह आदमी मेरे बाछा को बकरा बता रहा है।"


“बाछा?" चौंककर उस टोकनेवाले आदमी ने पूछा-“कहाँ है बाछा?"


माधो ने मासूमियत से जवाब दिया-“मेरे कंधे पर।"


वह आदमी ठठाकर हँस पड़ा। फिर हँसते-हँसते बोला-“अच्छा मजाक कर लेते हो ।"



“मजाक ? मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ । मेरे कंधे पर बाछा है और यह आदमी मुझे तब से तंग कर रहा है-बाछा नहीं, बकरा है कह- कहकर मुझे आजिज कर चुका है।"


“अरे भाई! है बकरा तो बाछा कैसे कह दे कोई? अब तुमको बाछा को बकरा कहना हो तो कहो।” उस आदमी ने कहा।


उसकी बात सुनकर माधो ने अपने कंधे से बाछा को उतारा और उसे देखने लगा । फिर बोला-“यह बाछा ही है। क्यों मुझे परेशान कर रहे हो ? जाओ, अपना रास्ता देखो ।"


अभी ये बातें हो ही रही थीं कि गाँव के मोड़ पर खड़े दो आदमी माधो की तरफ आ गए । माधो ने उन्हें देखा-उसे याद आया -जब वह मंडी में सुस्ताने के लिए बैठा था तब यही चारों उसके आजू -बाजू आकर बैठ गए थे ।


उन दोनों ने बाछा को सहलाया, फिर बोले-“वाह! क्या बात है! बहुत मस्त बकरा है तुम्हारा । बोलो, बेचोगे?"


माधो उनकी बात सुनकर हताश-सा दिखने लगा। उनमें से एक ने फिर कहा-“बताओ कितने में बेचोगे ? मुझे पसन्द आ गया है । बहुत शानदार बकरा है।"


माधो बारी-बारी से चारों को देख रहा था । उसे चुप देखकर उन चारों में से एक ने कहा -" अरे भाई, तुम तो बाछा खरीदने गए थे। मतलब कि तुम्हें तो बाछा की जरूरत है, बकरे की नहीं । ऐसे में ई बकरा तो तुम्हारे लिए बेकार हुआ न ? ऐसे ... तुम्हारी मर्जी। तुम्हारे लिए जो फालतू चीज है-उसकी हमें जरूरत है । तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि जो चीज तुम्हारे लिए फालतू है उसका खरीददार तुम्हें राह चलते मिल गया । बेचना चाहो तो बेच दो । जितने में लाए हो उतनी रकम तुम्हें हम दे देंगे । बोलो, कितने में खरीदा था ?"


माधो ने मायूसी-भरे शब्दों में बोला -" डेढ़ सौ में ।"


“डेढ़ सौ यानी एक सौ पचास रुपए। एक सौ पचास रुपए मतलब-150 रुपए । है न भाई?” एक आदमी ने माधो से पूछा।


माधो ने सिर हिलाकर हामी भर दी ।


फिर उनमें से एक ने माधो का कन्धा थपथपाकर कहा, “भाई मेरे। एक पाँच शून्य रुपए में एक और पाँच का तो मतलब है मगर हिसाब -किताब में शून्य का तो कोई मानी होता ही नहीं है। बताओ, होता है क्या ?"


माधो ने फिर सिर हिलाकर न कहा। उसके चेहरे पर उस समय मूर्खता बरस रही थी ।


" तो एक पाँच शून्य में से, शून्य हटा दो तो बचे एक और पाँच यानी एक पर पाँच-पन्द्रह ! ये लो पन्द्रह रुपए। “उनमें से एक ने माधो के हाथ में पन्द्रह रुपए रखते हुए कहा-“अब यह बकरा हमारा हुआ ।”


माधो हाथ में पन्द्रह रुपए थामे उन लोगों को देखता रहा और वे लोग बाछा लेकर एक साथ मुड़ गए और तेज गति वे वहाँ से जाने लगे ।




माधो उन लोगों को जाते हुए देखता रहा । जब वे लोग उसकी आँखों से ओझल हो गए तब माधो ने गोनू झा के गाँव की तरफ अपना रुख किया । उस समय सूरज डूब रहा था । गाँव की पगडंडियों के आस-पास के पेड़ों पर चिड़ियों की चहचहाहट का शोर था । हवा मंथर वेग से बह रही थी । माधो धीरे-धीरे चलते हुए गोनू झा के घर आया । उस समय आसमान में सितारे टिमटिमाने लगे थे। आसमान में चाँद की मद्धिम रोशनी फैल चुकी थी । चाँदनी रात में गोनू झा अपने दरवाजे पर खटिया रखकर उस पर अधलेटे से पड़े थे। वह माधो को आता देख खटिया से उठ गए और टहलते हुए माधो के पास पहुँच गए । माधो ने उन्हें सारी घटना बता दी । गोनू झा मुस्कुराते हुए माधो की बातें सुनते रहे । फिर उन्होंने माधो का कंधा थपथपाते हुए कहा-“तुमने बहुत बुद्धिमानी से काम किया । ठीक ऐसा ही काम मैं चाहता था । अब अगले हफ्ते हाट के दिन हम लोग अलग-अलग मवेशी मंडी पहुँचेंगे । मुझे विश्वास है, उस दिन ये चारों उस बाछा को बेचने आएंगे । अब सात दिनों तक तुम मस्ती करो ।


माधो के जाने के बाद गोनू झा ने अन्य रंगरूटों को बुलवाया और उनसे जानकारी ली ।


वे लोग भी अन्य ग्रामीण मंडियों में इसी तरह ठगी के शिकार हुए थे। गोनू झा मुस्कुराते हुए उनकी बातें सुनते रहे और अगले मंडी के दिन मंडी में ही मिलने की बात कहकर उन लोगों को विदा किया और फिर सोने चले गए ।


अपने गाँव के पास लगने वाली मवेशी मंडी में अगले सप्ताह गोनू झा मंडी लगने से पहले ही पहुँच गए और एक पेड़ के नीचे बोरा बिछाकर बैठ गए। उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वे मिथिला नरेश के दरबार के नामचीन दरबारी हैं । साधारण कृषक के लिबास में गोनू झा ठेठ ग्रामीण लग रहे थे। गोनू झा के मंडी में पहुँच जाने के बाद धीरे-धीरे मवेशी बाजार जमने लगा। दो घंटे में बाजार पूरी तरह सज गया । गोनू झा की आँखें माधो को तलाश रही थीं । एक पेड़ के नीचे बैठा माधो उन्हें दिख गया । वह पोटली से रुपए बार बार निकाल उन्हें गिनने में लगा हुआ था । लगभग डेढ़-दो घंटे बाद माधो अचानक अपनी जगह से उठा और तेजी से मवेशी मंडी के पूर्वी कोने की ओर जाने लगा। गोनू झा भी उठे और धीमी गति से माधो की तरफ जाने लगे ।


माधो चलते हुए जिस जगह पर रुक गया था, उस जगह पर चार आदमी एक सफेद और शानदार बछड़े के साथ खड़े थे। माधो ने उनके पास पहुँचकर बछड़े को सहलाना शुरू किया । शायद उन चारों ने माधो को पहचाना नहीं था या फिर पहचानकर भी अनजान बन रहे थे। माधो को प्यार से बछड़े को सहलाते देखकर उनमें से एक ने कहा-“क्या बात है, पसन्द आ गया ?... पूरे बाजार में ऐसा बाछा तुम्हें देखने को नहीं मिलेगा। बोलो, लेना है ?"



माधो ने गर्दन हिलाकर हामी भरी । फिर पूछा-"कितने में दोगे?"


" दो सौ रुपए। एक दाम।" उसने जवाब दिया ।


अभी बातों का सिलसिला शुरू ही हुआ था कि गोनू झा वहाँ पहुँच गए और ऊँची आवाज में पूछा-“अरे यह बकरा किसका है ?"


चारों के चेहरे का रंग इस सवाल पर उड़ गया । ठीक उसी समय माधो ने कहा-“अरे ! लगता है मेरा ही दिमाग खराब हो गया है कि बकरा मुझे बाछा सा दिखता है। पिछले हफ्ते भी मैंने एक बकरा को बाछा समझकर खरीद लिया था ।"


गोनू झा ने फिर जोर से, लगभग चीखते हुए पूछा -" अरे बकरे का दाम कौन बताएगा ? बता जल्दी!


गोनू झा की इस आवाज को सुनकर चार-पाँच हट्टे- कट्टे ग्रामीण दौड़कर उस स्थान पर पहुँच गए और बछड़े के साथ आए चारों ठगों के आजू-बाजू में जाकर खड़े हो गए ।


गोनू झा के चीखकर पूछने पर उन चारों में से एक ने कहा-“दो सौ का बाछा है हुजूर । यह बकरा नहीं, बाछा है ।"


गोनू झा मुस्कुराए, फिर बोले -" जो भी हो, मैं तो बकरा ही कहूँगा... “गोनू झा थोड़ी देर बारी -बारी से उन चारों को देखते रहे फिर मुस्कुराते हुए धीमी आवाज में बोले – “दो सौ दाम बताया न ? दो सौ रुपए। है न ?”


उन चारों ने गर्दन हिलाकर हामी भरी।


गोनू झा ने अपनी आवाज को और धीमा किया और लगभग फुसफुसाते हुए बोले, “दो सौ रुपए मतलब-200, है न ? और दो सौ रुपए का मतलब दो शून्य शून्य ।” इतना कहने के बाद वे उन चारों में से एक के पास पहुँचे और उसके कानों के पास फुसफुसाते हुए बोले -" और हिसाब-किताब में शून्य का कोई मतलब नहीं होता । है न ? तो दो शून्य हटे बच गया दो । यह लो दो रुपए और यह बकरा मेरा हुआ ।"


गोनू झा की बात सुनकर चारों आदमी ने भागने की कोशिश की लेकिन उनके आजू- बाजू खड़े लोगों ने उन्हें धर दबोचा और उनकी मुश्कें चढ़ाकर उन्हें बाँध दिया गया । मंडी में रौनक होने के कारण वहाँ भीड़ लग गई । तब गोनू झा ने भीड़ में शामिल लोगों से पूरा वृत्तान्त कह सुनाया कि कैसे इन लोगों ने माधो को असमंजस में डालकर उसका बाछा पन्द्रह रुपयों में ले गए थे ।


फिर गोनू झा ने उन लोगों से जिन्होंने इन चारों की मुश्कें चढ़ा दी थीं, कहा-“जाओ, इन्हें ले जाकर हवालात में बन्द कर दो । कल फिर मुकाम पर तैनात रहो।"


जब ये लोग उन चारों को लेकर जाने लगे तो गोनू झा ने हँसते हुए कहा-“जाओ भाइयो, ये लोग तुम्हें हिसाब-किताब में शून्य का प्रयोग कैसे होता है, बता देंगे।” इसके बाद गोनू झा और माधो वह बाछा लेकर घर आ गए ।




दूसरे दिन, दूसरे गाँव की मंडी में छह और तीसरे दिन तीसरे गाँव की मंडी में दस लोगों को इसी तरह गोनू झा की सूझ-बूझ से रंगरूटों ने धर दबोचा । सात दिनों के अभियान में ही पूरे मिथिलांचल में छोटी-बड़ी ठगी करते पचास से अधिक लोग पकड़ में आ गए । इसके बाद उनकी पिटाई कर रंगरूटों ने कुछ और ठगी करनेवालों का नाम- पता हासिल किया और जाल बिछाकर उन्हें ठगी करते रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया ।


तीन माह व्यतीत हो गए । गोनू झा के ठग उन्मूलन अभियान को मिथिलांचल में अपार सफलता मिली। तकरीबन पौने दो सौ ठगों को रंगरूटों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया ।


तीन माह पूरा होते ही गोनू झा मिथिला दरबार में उपस्थित हुए और महाराज को अपनी सफलता का पूरा वृत्तान्त कह सुनाया । महाराज खुश हुए तथा गोनू झा की सफलता से प्रसन्न होकर विशेष दरबार का आयोजन किया। दरबारियों के सामने उन ठगों को पेश किया गया जिन्हें गोनू झा की सूझ-बूझ के कारण पकड़ा गया था । महाराज ने दरबार में गोनू झा की मुक्त कंठ से प्रशंसा की । गोनू झा से जलने वाले दरबारी नाक-भौं सिकोड़ने लगे । काना नाई तो इस घोषणा से इतना व्यथित हुआ कि दरबार से ही बाहर चला गया । महाराज उसे जाते हुए देखते रहे । वे जानते थे कि उनका यह दरबारी गोनू झा से ईष्या करता है ।


दरबार समाप्त हो जाने के बाद महाराज, गोनू झा को अपने साथ महल में लेकर आ गए और उन्हें उचित आसन पर बैठाकर पूछा कि आखिर मिथिला के सभी ठगों को इस तरह दबोचने में उन्हें सफलता कैसे मिली ?


गोनू झा मानो इस प्रश्न के लिए तैयार थे । उन्होंने छूटते ही कहा -" महाराज ! मैंने आपकी आज्ञा से, सुरक्षा प्रहरियों में से ऐसे जवान छाँटे जो देखने में मूर्ख या बेअक्ल प्रतीत होते थे। इन जवानों को मैंने राजकोष से कुछ रुपए दिलाए जिसकी सहायता से ये जवान ग्रामीण-पर्यटक के रूप में घूम सकते थे और कुछ खरीददारियाँ कर सकते थे। तीन दिनों तक मैंने इन्हें मूर्ख दिखने और मूर्खतापूर्ण आचरण करने का प्रशिक्षण दिया । पूरे मिथिलाँचल को मैंने सात क्षेत्रों में बाँटा और इन सात क्षेत्रों के लिए सात केन्द्र स्थापित किए। इन जवानों के साथ ही मैंने गाँवों में लगनेवाली मंडियों में ग्रामीण वेशधारी रंगरूटों को तैनात किया । जवानों को मैंने खुला निर्देश दिया कि जब कोई उन्हें ठगने की कोशिश करे तो वे ऐसा दिखाएँ कि वे उसके झाँसे में आ गए हैं और ठगे जाएँ। रंगरूटों को निर्देश था कि जब कोई जवान ठगा जाए तो वे उसे ठगनेवालों को भनक तक लगे बिना, उसके घर तक पीछा करें । नाम-पता आदि की सूची तैयार कर लें । सच कहें महाराज, मैंने तो अँधेरे में तीर चलाया था जो ठीक निशाने पर लगा।"


गोनू झा की, महराज ने खूब आवभगत की और उन्हें महल के दरवाजे तक छोड़ने आए । गोनू झा को विदा करते समय गद्गद कंठ से महाराज बोले -" तो पंडित जी आज से मिथिलांचल ठग-मुक्त क्षेत्र घोषित किया जा सकता है न !"


गोनू झा ने उन्हें नमस्कार करते हुए कहा -" क्यों नहीं महाराज !"



Tuesday, April 23, 2024

मिथिला से चोरों का सफाया (कहानी)

 मिथिलाँचल जिस तरह मछली और मखाने के लिए प्रसिद्ध रहा है, कभी यह चोरों के उत्पात के लिए भी उतना ही बदनाम था । मिथिला नरेश चोरों के उत्पात से तंग आ चुके थे । चोरी की घटनाओं में लगातार वृद्धि से राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था के आगे सवालिया निशान आ खड़ा हुआ था । बाजार, गली, मुहल्ला, कोई स्थान सुरक्षित नहीं था । किसी ने बाजार में कुछ खरीदा और उस सामान को बगल में रखकर प्याऊ पर पानी पीने लगा । पानी पीकर बगल से सामान उठाने लगा तो देखा, उसका सामान गायब । रोज दरबार में महाराज के सामने कोई न कोई फरियादी अपनी ऐसी ही शिकायत के साथ उपस्थित होता । महाराज को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वे चोरी की घटनाओं पर काबू पाने के लिए आखिर कौन सा कदम उठाएँ। अपने खुफिया-तंत्र के शीर्ष अधिकारी से इस प्रसंग में कई बार बातें कर चुके थे लेकिन कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया था ।


एक दिन दरबार के समापन पर, महाराज ने गोनू झा को रोक लिया । सभी दरबारियों के चले जाने के बाद महाराज गोनू झा के साथ राजमहल की फुलवारी की ओर निकल गए । गोनू झा समझ रहे थे कि महाराज किसी गम्भीर समस्या पर विचारमग्न हैं । वे महाराज के साथ मूक बने फुलवारी में टहलते रहे । इसी तरह कुछ समय व्यतीत हुआ। एक स्थान पर महाराज रुके और गोनू झा से बोले-“पंडित जी ! मिथिलांचल में चोरों का उत्पात बढ़ता ही जा रहा है जिससे राज्य की बदनामी हो रही है। चोरों का मनोबल लगातार बढ़ रहा है । मेरे निर्देशों के बावजूद राज्य का खुफिया तंत्र पूरे मिथिलांचल में फैले चोरों के संगठित गिरोह का उद्भेदन करने में विफल रहा है । आप समझ सकते हैं कि जिस राज्य में प्रजा की जान-माल की सुरक्षा नहीं, उस राज्य के राजा के प्रति प्रजा की निष्ठा की कल्पना भी नहीं की जा सकती । आपने एक बार मिथिलांचल को ठगों की चपेट से कुशलता पूर्वक उबारा है । अब आप ही कोई ऐसा उपाय करें कि मिथिलांचल से चोरों का आतंक सदा के लिए मिट जाए।"


गोनू झा ने पूरी गम्भीरता से महाराज की बातें सुनीं। कुछ देर सोचते रहे, फिर उन्होंने महाराज से कहा-“महाराज, आपका आदेश -पालन मेरा कर्तव्य है । आपने अभी- अभी कहा है कि पूरे मिथिलंचल में चोरों का संगठित गिरोह सक्रिय है। आप इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचे, कृपा कर बताएँ।”


महाराज ने गोनू झा से मिथिलांचल में हो रही चोरी की घटनाओं के बारे में खुफिया जाँच के निष्कर्षों का जिक्र करते हुए कहा-“अधिकांश चोरी की घटनाएँ एक जैसी हैं । ये घटनाएँ रात के प्रथम प्रहर में या चौथे प्रहर में घटित हो रही हैं । रात के प्रथम प्रहर में आम घरों के पुरुष चौपाल आदि में व्यस्त रहते हैं और महिलाएँ बर्तन -वासन, चूल्हा- चौका में व्यस्त रहती हैं । चोर इसी व्यस्तता का लाभ उठाकर घरों से कीमती चीजें उड़ा लेते हैं । मिथिलांचल के अनेक गाँवों में रात के चौथे प्रहर में भी चोरी की घटनाएँ दर्ज की गई हैं । यह ऐसा समय है जब घरों में लोग गहरी नींद में सोए होते हैं । चोर घर के दरवाजे की कुण्डी न जाने कैसे खोल लेते हैं और घर में प्रवेश कर माल- असबाब उठाकर ले जाते हैं । ये चोरियाँ इतनी चालाकी से की जाती हैं कि किसी के हाथ कोई सुराग नहीं आता कि चोरियाँ कैसे की गईं । चोरों-उच्चकों का मन इतना बढ़ गया है कि अब राज्य के कई इलाकों से राहजनी की घटनाओं की खबर भी आ रही है। यदि अब भी हम सचेत नहीं हुए और प्रजा को चोरों के कहर से निजात दिलाने के लिए ठोस उपाय नहीं किया तो प्रजा का हम पर भरोसा उठ जाएगा ।"



महाराज की बात सुनकर गोनू झा गम्भीर हो गए और उन्होंने महाराज से कहा-“महाराज ! मुझे सोचने का कुछ मौका दीजिए।"


मगर महाराज ने गोनू झा की बात अनसुनी करते हुए कहा-“पंडित जी ! मौका -चौका का वक्त नहीं है । वक्त है कुछ करने का । क्या करेंगे-कैसे करेंगे, यह आप सोचिए । मुझसे अथवा राजकोष से आपको जैसी भी सहायता चाहिए, मिलेगी। आप अभी से चोरों के उत्पात से राज्य को बचाने का काम प्रारम्भ कर दें । मैं अभी महामंत्री से कहकर यह आदेश निर्गत करवा देता हूँ कि गोनू झा जिस किसी भी अधिकारी से किसी तरह की सहायता माँगें तो उन्हें वह सहायता अविलम्ब मिलनी चाहिए।"


गोनू झा के लिए अब कुछ भी बोलना असंगत था । वे महाराज से आज्ञा लेकर अपने गाँव की ओर चल पड़े ।


चलते- चलते गोनू झा सोच रहे थे, इतने बड़े मिथिलांचल में चोरों के संगठित गिरोह का उद्भेदन कोई साधारण बात तो है नहीं । जो काम राज्य का प्रशिक्षित और संगठित खुफिया तंत्र कर पाने में असमर्थ रहा, उस काम को मैं अकेले कैसे अंजाम दूंगा । महाराज ने कह तो दिया है कि राज्य का कोई भी अधिकारी किसी भी तरह के सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहेगा... मगर जब कोई सूत्र हाथ लगे तब न किसी तरह के सहयोग की बात उठेगी ?


इसी गुन-धुन में गोनू झा लगे हुए थे कि एक आदमी कुछ लम्बे डग भरता हुआ उनके पास से गुजर गया । इस आदमी ने घुटने के ऊपर धोती बाँध रखी थी लेकिन उसका शरीर नंगा था । उसके शरीर पर शायद तेल लगा हुआ था जो नीम-अँधेरे में चमचमा रहा था ।


उस आदमी का यह हुलिया गोनू झा को कुछ अजीब सा लगा । अब तक वह आदमी बाजार जाने वाली राह पर मुड़ गया था । लगभग दो फर्लांग की दूरी पर बाजार था, जहाँ फल, सब्जियाँ, मछली, चावल, दाल, मसाले आदि रोजमरे की चीजों की दुकानें थीं । एक दो दुकानें सुनारों ने भी खोल रखी थीं जो सोने और चाँदी के आभूषण बेचा करते थे।


अचानक गोनू झा के दिमाग में सन्देह पैदा हुआ कि अभी- अभी जो व्यक्ति उनके पास से तेज कदमों से गुजरा है वह चोर हो सकता है । इस संदेह के पैदा होते ही उनके कदम बाजार वाली सड़क की ओर बढ़ गए ।


गोनू झा अभी बाजार में प्रवेश भी नहीं कर पाए थे कि अचानक 'पकड़ो-पकड़ो, जाने न पाए' का शोर बाजार की एक दुकान से उभरा। कई लोग बाजार की सड़क पर दौड़ लगाने लगे। एक-दो दुकानदार लाठी लेकर अपनी-अपनी दुकानों से निकल आए। गोनू झा जब उस स्थान पर पहुँचे जहाँ इस तरह का हंगामा हो रहा था । वहाँ गोनू झा को पता चला कि एक आदमी बाजार में तेज कदमों से चलता हुआ आया और एक महिला के गले से सोने की मटरमाला झटककर भागने लगा । महिला के शोर मचाने से एक राहगीर ने उस भागते हुए आदमी को पकड़ना चाहा लेकिन उस आदमी के शरीर पर इतना अधिक तेल चुपड़ा हुआ था कि वह फिसलकर निकल भागा ।



अभी गोनू झा महिला से मटरमाला छीने जाने की घटना के बारे में सुन ही रहे थे कि पूरे बाजार में सनसनी-सी फैल गई । चोरों ने कई दुकानों के गल्ले से सारे पैसे बटोर लिए थे।


गोनू झा को यह समझते देर नहीं लगी कि योजनाबद्ध तरीके से चोरों के संगठित गिरोह के सदस्यों ने बाजार के कई दुकानों में चोरी की घटना को अंजाम देकर वे वहाँ से चलते बने । यह चोरों के बढ़े मनोबल का प्रतीक था । पूरे बाजार में चहल-पहल और सैकड़ों लोगों की आवाजाही के बीच एक चोर, एक महिला के गले से, सोने का आभूषण झटक लेता है । इस अप्रत्याशित घटना से लोगों का ध्यान बँटता है। बाजार में खलबली मचती है । दुकानदारों का भी ध्यान बँटता है। सबके-सब उस महिला के साथ हुए वारदात के बारे में जानने के लिए उत्सुक होते हैं । इस मानवीय कमजोरी का अनुमान चोर-गिरोह के सदस्यों को पहले से था । जैसे ही दुकानदारों का ध्यान बँटता है, घात लगाए चोर बिना अवसर गँवाए दुकानदारों के गल्ले पर हाथ साफ करके, बाजार में मची अफरा-तफरी का लाभ उठाकर आराम से निकल जाते हैं ।


गोनू झा बाजार में घूमते हुए हर उस दुकान के पास रुकते हैं जहाँ चोरों ने 'आँख बन्द, डिब्बा गायब' का खेल खेला । उनका दिमाग स्थितियों को समझने और चोरों को सबक सिखाने के उद्देश्य से लगातार सक्रिय रहता है ... इस उम्मीद में कि कहीं कोई सुराग मिल जाए । चलते-टहलते, लोगों से बतियाते गोनू झा थक गए । बाजार की अफरा-तफरी समाप्त हुई । उस घटना के बाद से जैसे बाजार बेनूर हो गया । अन्ततः थके -हारे गोनू झा अपने घर लौट आए । हमेशा ताजा दम दिखने वाले गोनू झा को हताश और परेशान-सा देखकर पंडिताइन बेचैन हो गई मगर गोनू झा की गम्भीर मुखमुद्रा देखकर वह कुछ पूछने का साहस नहीं कर पाई । गोनू झा हाथ-मुँह धोकर पीढ़ा पर बैठ गए और पंडिताइन ने भोजन परोस दिया । दो-चार निवाला अनमने ढंग से खाकर गोनू झा उठ गए और बिस्तर पर जाकर लेट गए।


पंडिताइन ने उन्हें देखा मगर गोनू झा के चिन्तन की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । पंडिताइन को अपनी ओर ममता भरी दृष्टि से ताकते देखकर गोनू झा की तन्द्रा भंग हुई । उन्होंने पंडिताइन से कहा-दीया बुझा दो और सो जाओ थक गई होगी। मैं कुछ देर बाद सोऊँगा।" पंडिताइन ने कुछ पूछने के लिए मुँह खोला ही था कि गोनू झा ने मुँह पर उँगली रखकर चुप रहने का संकेत करते हुए कहा -” सो जाओ। बाद में बात करेंगे ।"




बेचारी पंडिताइन करती भी क्या ? गोनू झा के निर्देश के अनुसार दीया बुझाया और गोनू झा के बगल में आकर सो गई दिन भर की थकी-मांदी होने के कारण पंडिताइन को जल्दी ही नींद आ गई मगर गोनू झा की आँखों में नींद कहाँ ? बाजार में घटित हुई क्रमबद्ध चोरी की घटना उनकी चेतना पर आच्छादित थी और महाराज का यह अनुनय कि वे कुछ भी करें मगर राज्य में चोरों का सफाया होना चाहिए ... बार-बार उनके दिमाग में कौंध रहा था । अजीब इत्तिफाक की बात थी कि महाराज ने उनसे राज्य में चोरों के उत्पात का जिक्र किया और उसके कुछ देर बाद ही चोरों की आततायी हरकत गोनू झा की आँखों के सामने आ गई । चोरों के उत्पात की समस्या कितनी गम्भीर है, इस बात से गोनू झा काफी उद्वेलित थे लेकिन उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि चोरों पर काबू कैसे पाया जाए ।


चोरों पर काबू पाने की तरकीबें सोचते- सोचते गोनू झा ने करवटों में रात गुजार दी । सुबह में खिड़की से आती ठंडी हवा के झोंको ने उनके शरीर को सहलाना शुरू किया तब उन्हें नींद आ गई ।


चिड़ियों के कलरव के स्वरों से पंडिताइन की नींद खुली। गोनू झा को बेसुध सोया देख पंडिताइन ने समझ लिया कि गोनू झा देर रात तक जगे रहे हैं वरना इस समय तो वे प्रभात फेरी के लिए निकल जाते और शौच-मैदान करके पोखरी में डुबकी लगाकर लौट आते । पंडिताइन ने उन्हें जगाया नहीं और अपनी दिनचर्या में लग गई ।


सूरज ने पूरब का कोना छोड़ा । खुली खिड़की से आती धूप की गर्मी के कारण गोनू झा की नींद खुली । उन्होंने खिड़की के पल्लों को सटा दिया और बिस्तर पर पड़े रहे । पंडिताइन ने उन्हें जगा देखकर पूछा -" दरबार नहीं जाना क्या ?"


गोनू झा ने कहा -" अभी नहीं। मन थका- सा है। तबीयत ठीक रही तो शाम को महल चला जाऊँगा और महाराज के दर्शन करके लौट आऊँगा ।"


पंडिताइन गोनू झा के पास आई और उनके शरीर को तलहथी से स्पर्श कर जानना चाहा कि कहीं उन्हें बुखार तो नहीं है लेकिन शरीर का तापमान सामान्य देखकर वह आश्वस्त हो गई और बोली -" लगता है, हरारत है । बहुत दिन हो गए दरबार से घर करते हुए...ठीक ही है, थोड़ा आराम कर लीजिए।"


गोनू झा पत्नी की बात सुनकर मुस्कुरा दिए। कुछ बोले नहीं ।


बिस्तर पर पड़े- पड़े ही गोनू झा को याद आया कि एक बार एक चोर को उन्होंने गच्चा दिया था घर के तमाम जेवर पेड़ पर टंगे होने की बात कहकर । पेड़ पर ततैये के छत्ते को ही चोर ने जेवर की पोटली समझ लिया और पेड़ पर चढ़कर पोटली झटकने की कोशिश में ततैये के दंश का शिकार हुआ जिससे पेड़ पर वह अपना सन्तुलन बनाए नहीं रख सका और गिर पड़ा । ऊँचाई से गिरने के कारण उसके एक पैर की हड्डी टूट गई । गोनू झा ने पड़ोसियों को बुलाकर पहले तो उसकी धुनाई कराई, बाद में हवालात भिजवा दिया ।




इस घटना की याद आते ही गोनू झा बला की फुर्ती से बिस्तर से उठे । नहा- धोकर तैयार हुए और जल्दी- जल्दी जलपान करके तेज कदमों से दरबार की ओर चल दिए।


रास्ते में गोनू झा चोरों को काबू में करने के उपाय के बारे में सोचते रहे ।


दरबार में पहुँचकर गोनू झा अपने आसन पर चुपचाप बैठे रहे । सभा की कार्यवाही में उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। महाराज ने उन्हें एक-दो बार उचटती निगाहों से देखा भी मगर विचारमग्न देखकर उन्हें टोका नहीं । गोनू झा की मुद्रा देखकर महाराज भाँप गए कि पंडित जी निश्चित रूप से उनसे कुछ परामर्श करना चाहते हैं ।


सभा की कार्यवाही के समापन के बाद महाराज अपने कक्ष में चले गए और और एक प्यादे को भेजकर गोनू झा को अपने कक्ष में बुलवा लिया ।


महाराज ने गोनू झा को अपने पास बैठाया और पूछा-“क्या बात है पंडित जी, बहुत गम्भीर हैं ?"


गोन झा ने बिना किसी भूमिका के महाराज से कहा-“महाराज! तीन साल पहले मेरे घर से एक चोर पकड़ा गया था । उसे ग्रामीणों ने हवालात भिजवा दिया था । मैं जानना चाहता हूँ कि वह चोर अब कहाँ है ?"


गोनू झा के सवाल से महाराज मन-ही-मन प्रसन्न हुए । उन्हें लगा कि गोनू झा मिथिलांचल को चोरों से निजात दिलाने के काम में जुट गए हैं । मन में यह खयाल आते ही महाराज ने द्वारपाल को आज्ञा दी -”नगर कोतवाल को अविलम्ब मेरे समक्ष उपस्थित होने के लिए कहो ।"


थोड़ी ही देर में नगर कोतवाल घबराया- सा महाराज के समक्ष उपस्थित हुआ । वह भयभीत था कि बीती रात उसके क्षेत्र के बड़ा बाजार में चोरों के गिरोह ने मिलकर अभूतपूर्व उत्पात मचाया और दुकानदारों की लाखों की नगदी लेकर चम्पत हो गया ...जरूर महाराज उस घटना के बारे में उससे दरियाफ्त करेंगे ।


मगर कक्ष में उसके प्रवेश करते ही महाराज ने उससे कहा -"पंडित जी जो पूछें-बताओ। जो कहें वह करो। अभी से तुम इनके मातहत हो ।" यह कहते हुए महाराज कक्ष से बाहर चले गए ।


अब गोनू झा के सामने नगर कोतवाल हाथ जोड़े खड़ा था । उसकी भयभीत मुद्रा देखकर गोनू झा ने उससे कहा -" अभी तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है, बस जो पूछूँ, सच- सच बताना। “ इतना कहकर गोनू झा ने अपनी बात का प्रभाव देखने के लिए कोतवाल को ऊपर से नीचे तक निहारा । उनकी दृष्टि और भंगिमा से कोतवाल भीतर ही भीतर काँप गया ।


गोनू झा ने पूछा-“कल रात तुम कहाँ थे?"


थर-थर काँपते हुए कोतवाल ने कहा-“पंडित जी, मुझे माफ करें । अब ऐसी गलती नहीं होगी । कल मैं सुरक्षा प्रहरियों को काम बताकर नौटंकी देखने चला गया था कि बड़ा बाजार में वह कांड हो गया । मुझे अवसर दें । तमाम उचक्कों की नाक में नकेल डालकर आपके कदमों में ला पटकूँगा । मुझे माफ कर दें । फिर कभी काम में ऐसी लापरवाही नहीं करूँगा।"



कोतवाल की बात सुनकर गोनू झा मन-ही-मन मुस्कुराए, लेकिन प्रकट रूप में उन्होंने कहा-" काम में लापरवाही करने वाले लोग तुम्हारी तरह ही लम्बे-चौड़े वादे करते हैं ..."


वे कुछ और बोलते कि कोतवाल ने गोनू झा के पाँव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाते हुए कहने लगा "पंडित जी ! एक मौका दें । मेरे बाल-बच्चों के लिए ही सही। फिर कभी कोई लापरवाही नहीं होगी । जीवन-भर आपका ऋणी रहूँगा।"


गोनू झा ऐसा प्रकट कर रहे थे कि वे 'बड़ा बाजार' में हुई श्रृंखलाबद्ध चोरी के बाबत ही कोतवाल से पूछ-ताछ कर रहे हैं ।


गोनू झा की भंगिमा से कोतवाल समझ रहा था कि गोनू झा को मालूम है कि कल वह बड़ा बाजार में सुरक्षा-व्यवस्था का काम अपने मातहतों पर छोड़कर खुद मौज-मस्ती करने के लिए निकल गया था ।


कोतवाल को भयभीत देखकर गोनू झा ने उससे कहा -"ठीक है, जो हुआ सो हुआ । अब काम के प्रति थोड़ी भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए ।"


नगर कोतवाल की जान में जान आ गई । उसे संयत होने का अवसर देने के बाद गोनू झा ने उससे कहा -"तीन साल पहले भड़ौरा स्थित मेरे आवास से एक चोर पकड़ा गया था । उसकी टाँग की हड्डी टूट गई थी । मुझे उसके बारे में जानकारी चाहिए कि अब वह कहाँ है । बड़ा बाजार चूंकि भड़ौरा तहसील में पड़ता है और वह उस इलाके का पुराना खिलाड़ी है, इसलिए तुम्हें कल रात 'बड़ा बाजार' में हुई चोरी की घटना की तफ्तीश में भी उससे कुछ सुराग मिल जाएगा ।"


गोन झा का निर्देश मिलते ही नगर कोतवाल वहाँ से चला गया ।


इसके बाद गोनू झा महाराज के कक्ष से बाहर निकल गए लेकिन द्वार पर ही एक प्रहरी ने विनम्रता से अभिवादन करते हुए उनसे कहा-“महाराज फुलवारी में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।"


गोनू झा फुलवारी की ओर मुड़ गए । महाराज वहाँ चिन्तित मुद्रा में टहल रहे थे। गोनू झा को देखकर उन्होंने कहा-“कल रात की घटना के बारे में तो आपको जानकारी मिल ही गई होगी ?"


गोनू झा ने महाराज से कहा “संयोग की बात है कि बड़ा बाजार की घटना मेरी आँखों के सामने घटित हुई । मैंने चोरों के संगठित गिरोह की सक्रियता का पता लगाने के लिए अपने ढंग से काम करना शुरू कर दिया है । मुझे विश्वास है कि मैं इस घटना में संलिप्त चोरों को खोज निकालूँगा।”


"केवल इस घटना ?” महाराज ने पूछा ।


"महाराज, यह तो शुरुआत होगी । कहीं से तो शुरू करना ही होगा । उद्देश्य तो आपके आदेश का अनुपालन ही है।" गोनू झा ने उत्तर दिया ।


गोनू झा के इस उत्तर से महाराज आश्वस्त हुए ।


गोनू झा महाराज से विदा लेकर वापस अपने घर लौट आए ।



दूसरे दिन पौ फटते ही कोतवाल गोनू झा के घर पहुँच गया । उस समय न गोनू झा जगे थे और न उनकी पत्नी । थोड़ी देर कोतवाल गोनू झा के दरवाजे के आसपास चहल-कदमी करता रहा । फिर एक पेड़ के नीचे रखी चौकी पर बैठ गया और गोनू झा के जगने की प्रतीक्षा करता रहा ।


लगभग घंटे भर बाद गोनू झा जगे । हाथ में लोटा लिए और कंधे पर गमछा रखे गोनू झा शौच के लिए निकले तो दरवाजे पर नगर-कोतवाल को बैठा देखकर उन्होंने समझ लिया कि चोर के बारे में जानकारी कोतवाल को मिल गई है। कोतवाल ने गोनू झा को आते देखा तो चौकी से उठकर खड़ा हो गया और नमस्कार किया । गोनू झा उसे बैठे रहने का इशारा करते हुए वहाँ से शौच के लिए निकल गए ।


शौच से निवृत होकर गोनू झा घर पहुँचे। स्नान -ध्यान के बाद नगर कोतवाल को अपने कमरे में बुलवा लिया । और पूछा -" तो पता चल गया उस चोर का ?"


कोतवाल ने हर्षित होते हुए बताया “हाँ, पंडित जी । तीन महीने पहले वह चोर कारागार से मुक्त किया गया है।"


“और कुछ?" गोनू झा ने पूछा ।


“जी, बस इतना ही ।” कोतवाल ने कहा ।


कोतवाल का यह उत्तर सुनकर गोनू झा आवेश में आ गए और क्रोधित स्वर में बोले, “अरे तुम कोतवाल हो या भरभूजे ? तुम्हारे इलाके में बिलकुल सुनियोजित ढंग से श्रृंखलाबद्ध चोरी हुई । चोर आनन-फानन में बड़ा-बाजार के बड़े दुकानदारों का सारा माल-असबाब उड़ाकर ले गए । उस घटना के बारे में सुराग खोजने की कोई उत्सुकता तुममें नहीं है ?"


नगर कोतवाल गोनू झा को आवेश में पहली बार देख रहा था । अब तक उसके मन में गोनू झा की छवि एक मसखरे की थी । मगर गोनू झा का यह रूप देखकर उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले ।


गोनू झा ने कहा “सुनो कोतवाल, मुझे शाम तक पूरी तफ्तीश से बताओ कि कारागार में उस चोर का आचरण कैसा था, उसके साथ और कौन-कौन लोग बन्द थे, कारागार में उसकी किस -किस कैदी से बातचीत होती थी, उसका आम कैदियों से कैसा व्यवहार था, कारागार से निकलने के बाद वह कहाँ गया, वह मूलतः कहाँ का रहने वला था, कारावास से निकलने के बाद वह क्या-क्या कर रहा है।” कोतवाल सिर झुकाए गोनू झा की बातें सुनता रहा और जब नमस्कार कर जाने लगा तभी गोनू झा ने उसे टोका – “और सुनो, सादे लिबास में कुछ सिपाहियों को आस-पास के गाँवों के बाजारों में तैनात कर दो । उन्हें यह निर्देश दो कि वे दुकानों के आस- पास की गतिविधियों पर नजर रखें क्योंकि चोरों का मनोबल बढ़ा हुआ है वे कहीं भी इस तरह की घटना को अंजाम दे सकते हैं।"


नगर कोतवाल वहाँ से चला गया ।


गोनू झा दरबार गए और महाराज से मिलकर उन्होंने उन्हें सूचना दी कि वे अब कुछ दिनों तक दरबार नहीं आएँगे । और न बताएँगे कि वे क्या कर रहे हैं । महाराज ने उन्हें

 स्वीकृति दे दी ।



इसके बाद गोनू झा ने उन सुरक्षा- प्रहरियों से सम्पर्क साधा जिनका उपयोग उन्होंने ठग उन्मूलन अभियान के दौरान किया था । कोषागार से उन्हें आवश्यक धन उपलब्ध कराकर गोनू झा ने उनमें से कुछ को मिथिलांचल के विभिन्न क्षेत्रों में छोटी दुकानें खोलकर बैठ जाने को कहा और कुछ को, प्याऊ बनाकर बैठ जाने का निर्देश दिया । उन्होंने उन्हें यह निर्देश भी दिया कि इन कार्यों की व्यवस्था करके दो दिनों के बाद वे उनके आवास पर आ जाएँ ।


इस पूरी प्रक्रिया से निबटकर गोनू झा अपने घर लौट आए। बिस्तर पर लेट गए । थोड़े विश्राम के बाद वे गाँव की तरफ निकल गए। अपने पुराने परिचितों से मिलते रहे । गोनू झा को अपने दरवाजे पर आया देख उनसे जलनेवाले भी प्रसन्न हो रहे थे। गाँव में गोनू झा जिससे भी मिले, उसने 'बड़ा बाजार' हादसे का जिक्र उनसे जरूर किया । गोनू झा को समझते देर नहीं लगी कि गाँववाले चोरों की सक्रियता के प्रति सतर्क हैं । वे शाम तक घर वापस आए और बाहर ही चौकी पर बैठे-बैठे नगर कोतवाल के आने की प्रतीक्षा करने लगे ।


शाम ढले नगर कोतवाल आया और गोनू झा को बताया कि उनके आवास से पकड़ा गया चोर कारावास में लंगड़ू उस्ताद के नाम से प्रसिद्ध हो गया था । उसके साथ तीन और अपराधी उसकी कोठरी में रखे गए थे-हरखू, बसावन और विसनाथ । ये तीनों राहजनी के छोटे-मोटे मामले में पकड़े गए थे। कारागार में लंगड़ू उस्ताद की पहचान दो बड़े अपराधियों से भी हुई थी । भोजन के समय ये दोनों उसके आस-पास ही बैठते थे। इनमें से एक लुटेरा ऐसा था जो लूट के दौरान घातक-पैने हथियारों का प्रयोग करता था । सीमान्त क्षेत्र में एक व्यापारी को लूटने के क्रम में वह पकड़ा गया था । तीन माह पहले जब लंगड़ू उस्ताद कारागार से छोड़ा गया, उसके दो हफ्तों के अन्तराल पर ये लोग भी छोड़े गए । चाकूबाज लूटेरा उस दिन ही छोड़ा गया जिस दिन 'बड़ा बाजार' वाली घटना घटित हुई । कोतवाल ने गोनू झा को उन सबों के नाम-पता ठिकाना आदि की सूची भी सौंप दी ।


गोनू झा ने नगर कोतवाल की पीठ थपथपाई और कहा -" अब तुमने नगर कोतवाल की तरह काम किया है । जाओ, अपने ढंग से बड़ा बाजार कांड की जाँच शुरू करो। जैसे ही कोई सुराग हाथ लगे, मुझे खबर करना।"


दो दिन शान्ति से गुजरे। कहीं कोई घटना नहीं हुई । गोनू झा इन दो दिनों में गाँव में घूमते रहे और गाँव वालों से कहते रहे कि वे एक बड़ा जलसा करने वाले हैं । महाराज के दरबार में विदूषक बनाए जाने के बाद वे सीधे दरबार के काम से जुड़ गए । गाँव के लोगों से मिल नहीं पाए । अब महाराज से छुट्टी माँगकर वे अपने-लोगों से मिलने -जुलने का काम कर रहे हैं । जल्दी ही गाँव भर को भोज कराएँगे। शुभ मुहूर्त देखने के बाद तिथि की घोषणा करेंगे ।


इसी दौरान उनके चुनिंदे सुरक्षा प्रहरी और विशेष प्रशिक्षित रूंगरूट उनके घर आते और अपने काम की जानकारी उन्हें देते । गाँव के लोगों को गोनू झा बताते कि बहुत बड़ा जलसा होगा । महाराज भी इस जलसे में आएँगे ।



फिर एक दिन गाँव में अचानक खबर फैली कि दरअसल गोनू झा को अशर्फियों से भरा गागर मिला है हजारों अशर्फियों से भरा गागर । लक्ष्मी की इसी अनुकम्पा के कारण गोनू झा जैसे निष्ठावान और सूझ-बूझवाला आदमी महाराज की नजर में कोई दूसरा नहीं है । लक्ष्मी कृपा के कारण ही गोनू झा बड़ा जलसा करने की सोच रहे हैं और महाराज इस जलसे में इसलिए शामिल होंगे कि वे गोनू झा को सिर्फ दरबारी नहीं, अपना मित्र भी मानते हैं । इसके बाद तो हर रोज नई -नई खबरें फैलतीं। गोनू झा के पास रंगरूटों का आना जाना बढ़ गया ।


एक दिन गाँववालों ने देखा, गोनू झा रेशम का कुर्ता- धोती पहने सफेद घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे हैं । गोनू झा घोड़े पर सवार होकर पड़ोस के गाँव के बाजार में गए और वहाँ एक सादे लिबास में सुरक्षा प्रहरी की दुकान में काफी देर तक ग्राहक के रूप में बैठे । इसी तरह दूसरे दिन दूसरे बाजार में, तीसरे दिन तीसरे बाजार में गोनू झा दुकानदार बने सुरक्षा- प्रहरियों की दुकानों में जाते, बैठते और वापस लौट आते । अचानक ही गोनू झा के रहन-सहन में बदलाव देखा जाने लगा और हफ्ता भर में ही पूरे मिथिलांचल में चर्चा होने लगी कि गोनू झा के पास अकूत दौलत आ गई है ।


गोनू झा के दरवाजे पर सफेद, अरबी नस्ल का घोड़ा बँधा था । ऐसा घोड़ा महाराज के घुड़साल में भी नहीं था । फिर एक दिन गोनू झा के घर के सामने वाले खेत में बड़ा सा पंडाल बनने लगा। कनात लगने लगे। मिथिलांचल के विभिन्न बाजारों में तैनात उनके दुकानदारों द्वारा विभिन्न तरह की खरीददारियाँ की गईं और खूबसूरत डिब्बों और थैलियों में इन चीजों को ऐसे रखा गया मानो इनमें कोई बहुमूल्य वस्तु हो ! ये डिब्बे गोनू झा के दरवाजे पर रखी चौकी पर रखे जाते जहाँ उनकी फेहरिश्त बनती । फिर इस काम में इतना विलम्ब किया जाता कि घंटों ये चीजें चौकी पर ही पड़ी रहतीं । इस बीच गाँव के लोग उधर से गुजरते और उन चीजों को देखने के लिए गोनू झा के दरवाजे पर मजमा-सा लगा लेते । जब भीड़ बढ़ती तब गोनू झा बाहर निकलते और चीखते-“अरे मूर्खो! दरवाजे पर इन चीजों की प्रदर्शनी लगाना जरूरी है क्या ? उठाओ यह सब –मेरी कोठरी में ले जाकर रखो। वहीं हिसाब -किताब किया करो।" फिर ग्रामीणों से बोलते -" अरे भाई लोगो ! ये चकमक करते डिब्बे मँगवाए हैं । यहाँ जो जलसा होगा न, उसमें बाहर से कई महत्त्वपूर्ण, नामी -गिरामी लोग भी आएँगे। उन्हें इन डिब्बों में मिठाई दी जाएगी । भेंट के रूप में थैलियों में मिथिलाँचल का उपहार-मखाना भरा जाएगा । जाइए आप लोग, जलसे के दिन तो आप सब यहाँ आमंत्रित हैं ही । जो होगा, वह देख ही लीजिएगा । जाइए, अपने काम-धाम में लगिए।"



और गाँव के लोग आपस में बतियाते हुए लौटते कि जड़ाऊ थैली में मखाना ? अरे उस छोटी थैली में मखाना कितना आएगा ? पाव भर भी समा जाए तो गनीमत है। गोनू झा के पास दौलत क्या आ गई कि पूरा गाँव को मूर्ख समझने लगे।


रंगरूटों का दस्ता गोनू झा के निर्देश पर लंगड़ू उस्ताद और उसके साथियों के गाँवों में मटरगश्ती करता रहता था । इन गाँवों में गोनू झा के जलसे की तैयारी, अचानक अशर्फियों का अकूत भंडार मिलने, शानदार कपड़ों में घुड़सवारी करने आदि की खबरें फैल चुकी थीं ।


चर्चा लंगड़ू उस्ताद के कानों में पड़ी । वह गोनू झा को भूला नहीं था । भूलता भी कैसे । उनके कारण उसे अपनी एक टाँग गँवानी पड़ी और तीन साल कारावास में रहना पड़ा।


लंगड़ू उस्ताद ने अपने साथियों से सम्पर्क साधा और उन सबको गोनू झा के पास जाकर जलसे की तैयारी के सिलसिले में काम माँगने के लिए कहा। गोनू झा के पास जब कुछ अजनबी काम माँगने आए तब गोनू झा ने उन्हें गौर से देखा । ऐसा पहली बार हो रहा था कि कोई उनके पास बाँस-कनात लगाने का काम माँगने आया था । मन-ही-मन गोनू झा ने कुछ विचार किया और उन लोगों को बाँस खड़ा करने के लिए मिट्टी खोदने के काम में लगा दिया । इसके थोड़ी ही देर बाद रंगरूटों ने आकर खबर दी कि कल रात से ही लंगड़ू उस्ताद के पाँच साथी अपने घरों से लापता हैं । गोनू झा इस सूचना पर मुस्कुरा दिए और उन रंगरूटों को जहाँ कनात लगाए जाने की व्यवस्था हुई थी उस ओर संकेत करते हुए कहा -" तुम लोग वहाँ मिट्टी खोदने के काम में लगे लोगों पर नजर रखो । ध्यान रहे, उनसे कोई बातचीत नहीं करोगे मगर उनकी प्रत्येक हरकत तुम लोगों की नजर में होनी चाहिए।"


सूरज अस्त हो चुका था । गोनू झा मुस्तैदी से कनात लगाने की तैयारियों का जायजा ले रहे थे । एक आदमी, माथे पर पगड़ी बाँधे लंगड़ाता हुआ गोनू झा के पास आया और नमस्कार करके बोला -”मालिक, सुना है कि आपके यहाँ कोई बड़ा भोज-भात होने वाला है । मैं हलवाई हूँ। यदि भासन-भात बनाने का काम मिल जाता..."


गोनू झा ने उसे देखा और उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी और कोई नहीं, लंगड़ू उस्ताद ही है । उन्होंने हँसते हुए कहा-“अब मेरे दरवाजे से कोई निराश नहीं लौटेगा । यह बताओ कि दो-ढाई हजार आदमी के लिए छप्पन पकवान बनाने के लिए कितने चूल्हों की जरूरत होगी और यह कितने दिनों में तैयार हो जाएगा ?"


लंगड़ू उस्ताद गोनू झा के सवाल से सकपका गया । बोला-“मालिक, कभी इतना बड़ा जलसा के लिए काम नहीं किया है। कैसे बताएँ ? भात, दाल, भुजिया, पापड़, अचार, दही, तरकारी, लड्डू, बुनिया बनाने का काम जानते हैं ...।"



गोनू झा ने दरियादिली दिखाते हुए कहा-“कोई बात नहीं। आज से तुम पहले छप्पन चूल्हे बनाने के लिए मिट्टी खोदो । अकेले न कर सको तो बाँस के लिए मिट्टी खोदने के काम में लगे लोगों को साथ में ले लो ।" फिर उन्होंने बाँस लगाने के काम में लगे लोगों से कहा -" अरे तुम सब सुन लो, यह हलवाई तुम्हें जो कहे, वह करना । काम अच्छा होना चाहिए । मजदूरी के साथ ही भोजन और इनाम दोनों मिलेगा। समझ गए?"


सभी ने हामी भरी ।


गोनू झा मुस्कुराते हुए वहाँ से लौट आए। थोड़ी ही देर में लंगड़ू उस्ताद के गाँव में तैनात रूंगरूट भागते हुए गोनू झा के पास पहुंचे।


गोनू झा पहले ही समझ चुके थे कि क्या बताने आए हैं । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा-“तुम्हारा 'असामी' मिट्टी खोदने के काम में लगा है। जाओ, उन पर नजर रखो।" गोनू झा बहुत खुश थे। उन्हें अपनी कामयाबी का पूरा भरोसा हो गया था । एक रंगरूट को भेजकर उन्होंने नगर कोतवाल को तलब किया । नगर कोतवाल के आने पर उन्होंने निर्देश दिया कि सादे लिबास में आज रात अपने सभी सिपाहियों के साथ वह उनके घर के आस -पास चक्कर लगाता रहे । काम मुस्तैदी से होना चाहिए, और पूरी गोपनीयता बरती जाए।


कोतवाल को निर्देश देकर वे घर में गए और पंडिताइन को सोलह श्रृंगार करने को कहा । पंडिताइन कुछ बोलती, इससे पहले ही गोनू झा ने कहा कि समय नहीं है सवाल-जवाब करने का । खुद वे कपड़ा बदलने लगे। रेशम का कुर्ता। उसमें नगीने जड़े सोने के बटन । मलमल की धोती। पाँव में जूता ।


पंडिताइन भी सज-धजकर तैयार हो गई । उसको कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि इन दिनों गोनू झा क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं । गोनू झा के तेवर और मुख-मुद्रा से यही लग रहा था कि वे कुछ सुनेंगे नहीं । इसलिए पतिव्रता नारी की तरह पंडिताइन दूसरे आदेश की प्रतीक्षा में खड़ी हो गई।


गोनू झा ने कहा-"हाय ! इस रूप को देख लोग गश खा जाएँगे। जरा घूँघट निकाल लो ।" खुद हाथ बढ़ाकर उन्होंने पंडिताइन का घूँघट तैयार किया जिसमें पंडिताइन का चेहरा दिखे भी और यह भी लगे कि उन्होंने घूँघट निकाल रखा है । फिर उन्होंने पंडिताइन का हाथ थामा और घर से बाहर आए। बाहर आकर उन्होंने पंडिताइन का हाथ छोड़ा और साथ-साथ चलते हुए वहाँ पहुँचे जहाँ पंडाल बनाने की तैयारी चल रही थी । प्रायः हर मजदूर के पास रुककर गोनू झा पंडिताइन से कुछ- कुछ बताते रहे । गाँव वालों की जब उन दोनों पर नजर पड़ी तब धीरे- धीरे वहाँ भीड़ जुटने लगी । घंटे-डेढ़ घंटे के बाद पंडिताइन को लेकर गोनू झा अपने घर में चले आए।



सूरज ढलने के बाद काम बन्द हुआ । मजदूर और रंगरूट काम बंद कर हाथ-मुँह धोने के लिए तालाब की ओर निकल गए । गोनू झा अपने चुनिन्दा सुरक्षाकर्मियों के साथ अपने घर के बाहर वाले कमरे में चले गए। यह वही कमरा था जिसमें खूबसूरत डिब्बे और थैलियाँ सजाकर रखी गई थीं ।


रात को गोनू झा के दरवाजे पर छोटे भोज का दृश्य था । रंगरूट, सुरक्षा प्रहरी और मजदूर के वेश में आए लोग भोजन कर रहे थे।


जब सोने की तैयारी शुरू हुई तब गोनू झा ने लंगड़ाकर चलने वाले हलवाई से कहा -" भाई, तुम ईमानदार, मेहनती और निष्ठावान व्यक्ति लगते हो । जमाना बहुत खराब है । इधर आओ।" डिब्बे और थैलियों वाले कक्ष में ले जाकर उसे खड़ा किया और कहा -" देखो, इस कक्ष में लाखों का सामान पड़ा है। “दीवार के किनारे एक के ऊपर एक बोरे रखे हुए थे । उन्हें दिखाते हुए गोनू झा ने लंगड़ू से कहा -" भोज की तैयारी के लिए इन बोरों में चावल, दाल, आलू, प्याज आदि रखा हुआ है । इतने लोगों में तुम ही एक ऐसे आदमी हो जिसे मैं यह दिखा रहा हूँ । तुम बरामदे में सोना और इस कमरे पर नजर रखना। जमाना खराब है। क्या पता, कब किसकी नियत में खोट आ जाए!"


लंगड़ा हलवाई ने गोनू झा की बातें सुनी तो उसके मन में लड्डू फूटने लगे । उसने कहा-“मालिक, हुक्म हो तो कुछ लोगों को और साथ ले लूँ? लाखों की रखवाली की बात है । हम रात भर जगकर पहरा देंगे । क्या मजाल कि चिड़िया भी पर मार सके ! गोनू झा ने कहा-“जैसा तुम ठीक समझो । वे लोग कैसे हैं, जो तुम्हारे साथ मिट्टी खोदने का काम कर रहे थे ?"


“जी, मालिक, बहुत होशियार लोग हैं । अब तो दोस्ती भी हो गई है। कहें तो उन्हें ही बुला लूँ?" लंगड़ा हलवाई ने पूछा ।


" हाँ-हाँ, क्यों नहीं! उन्हें ही बुला लो । लेकिन ध्यान रखना, दरवाजे का ताला कमजोर है। एक झटके में खुल जाता है । काम की भीड़ में ताला मँगवाना भूल गया । कल मँगा लूँगा। आज रात की ही बात है ।... देखो, तुम पर भरोसा करके यह जिम्मेदारी तुम्हें सौंप रहा हूँ ।"


गोनू झा वहाँ से मुस्कुराते हुए अपने घर में चले गए। दो प्रहर रात बीतने तक सन्नाटा छाया रहा । रात का तीसरा प्रहर शुरू होते ही गोनू झा के दरवाजे से धप्प ! धड़ाम !! जैसी आवाजों के साथ किसी की घुटी-घुटी चीखों की आवाजें आने लगीं । पंडिताइन की नींद खुली और वे गोनू झा को जगाने के उद्देश्य से गोनू झा का कंधा पकड़कर हिलाने लगी। गोनू झा सोए नहीं थे। पंडिताइन बोली-“ बाहर सुन नहीं रहे कि कैसी आवाजें आ रही हैं ?"


गोनू झा बोलने लगे – “अरे कोई बात नहीं है जलसे की तैयारी चल रही है न, तो थोड़ी आवाजें तो आएँगी ही ।”


पंडिताइन फिर बोली-“पंडित जी, लग रहा है कि दुअरा पर मार -पीट हो रही है । आपको कुछ बुझाता नहीं है कि कब क्या करें ? बाहर धमाचौकड़ी की आवाजें आ रही हैं । ऐसा लग रहा है कि बहुत से लोग आपस में मारपीट कर रहे हैं ।"



पत्नी की झुँझलाहट का आनन्द लेते हुए गोनू झा बिस्तर से उठे । कुर्ता पहना और बोले -" हाँ, तो भाग्यवान अब तुम्हें ले ही चलूँ बाहर जलसा दिखाने । अब पौ फटने ही वाला है । गाँव के लोग तमाशा देखने पहुँच गए होंगे । सुबह तक महाराज भी आ ही जाएँगे ।”


अभी उनकी बातें खत्म भी नहीं हुई थीं कि दरवाजे पर दस्तक होने लगी। पंडिताइन ने प्रश्नवाचक दृष्टि से गोनू झा की ओर देखा तो गोनू झा मुस्कुराए और बोले-“सिर पर पल्लू रख लो । शुभ मुहूर्त की सूचना आ गई है। हम पति-पत्नी एक साथ निकलेंगे और जलसे के खास मेहमानों का स्वागत करेंगे ।"


पंडिताइन कुछ समझ पाती, उससे पहले ही गोनू झा ने उसका एक हाथ अपने हाथ में लिया और दरवाजे की तरफ बढ़ गए ।


गोनू झा के दरवाजे पर बड़ी भीड़ थी । गाँव में हल्ला हो गया था कि गोनू झा के घर डाका डालने के लिए डकैतों का गिरोह आया हुआ था जिसको मजदूरों ने पकड़ लिया है । नगर कोतवाल न जाने कहाँ से पूरे दल -बल के साथ वहाँ पहुँच गया और सारे डाकू गिरफ्तार कर लिए गए।


गोनू झा अपनी पत्नी के साथ घर से बाहर आए तो ग्रामीणों में उत्सुकता जगी । वे उनकी ओर आने लगे । गोनू झा ने ऊँची आवाज में कहा-“अरे कोई नहीं है क्या-हमारे गाँव के लोग जलसा का मजा लेने आए हैं और यहाँ रोशनी का इंतजाम तक नहीं है ?"


आनन-फानन में कुछ मशालें जला ली गईं । गोनू झा ने कोतवाल को बुलाया और पूछा -" क्यों भाई, नगर कोतवाल, जलसा का उद्घाटन भी हो गया और न हमें खबर दी, न गाँववालों को ? महाराज को खबर दी या नहीं ?"


कोतवाला बोला “जी हाँ, हुजूर ! महाराज जैसे ही जगेंगे, उन्हें सूचना मिल जाएगी ।"


गाँववालों को इशारा करते हुए गोनू झा ने कहा-“आओ भाइयो ! जब तक महाराज पहुँचें तब- तक जलसा का मजा ले लो । क्या करें, अचानक शुभ मुहूर्त निकल आया इसलिए आप लोगों के पास बुलावा भेज नहीं पाया । अब इसे ही हमारा सादर आमन्त्रण समझिए ।"


गाँववाले गोनू झा और पंडिताइन के पास पहुंच गए ।


पंडिताइन कुछ समझ नहीं पा रही थी कि माजरा क्या है? गाँववालों के साथ- साथ वह भी चकित, भरमाई-सी खड़ी रही ।


गोनू झा लंगड़ा हलवाई के पास पहुंचे और उसका कंधा थपथपाते हुए कहने लगे -" क्यों भाई, यह तुम्हारा हाथ-पाँव किसने बाँध दिया ? कोई बात नहीं, अब तुम्हारा हाथ -पाँव जब खुलेगा, तब भात, दाल, भुजिया, तरकारी बनाने का काम ही करना । मैं इन्तजाम कर दूंगा । गम न करो । जो हुआ, सो हुआ ।“ बाकी चोरों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा-“तुम चाहते थे कि ये लोग तुम्हारे साथ रहें । दोस्ती हो गई थी न ! कोई बात नहीं । ऐसा ही इन्तजाम करवा दूंगा कि तुम सब साथ- साथ रहो । रात भर जागकर बातें करते रहना। ठीक है न ? यही इच्छा जताई थी न तुमने ?"


गोनू झा ने रंगरूटों को इशारे से बुलाया और ग्रामीणों के बैठने का इन्तजाम करने को कहा । दरी-जाजिम आई। बिछाई गई । मशाल की रोशनी में गोनू झा का दरवाजा आलोकित हो रहा था, जैसे वहाँ वाकई कोई जलसा हो रहा हो ! गाँव की महिलाएँ भी वहाँ जमा हो गईं । बच्चे भी । गोनू झा बीच -बीच में कह उठते -" भाइयो, उकताना नहीं। यह ऐसा जलसा है, ऐसा तमाशा जैसा तुम लोगों ने कभी देखा न होगा ।"


इसी तरह समय बीतता रहा।



पूरब के आकाश में लालिमा छा चुकी थी । पक्षियों की चहचहाहट से दिशाएँ अनुगुंजित होने लगीं । मन्द शीतल समीर के साथ उजास फैलने लगा । मशालें बुझा दी गईं । रंगरूटों ने ग्रामीणों को शर्बत पिलाया । ग्रामीण इस आस में बैठे थे कि सच में वहाँ कोई जलसा होगा और उसके बाद गोनू झा इन 'डकैतों' की खबर लेंगे। महाराज वहाँ खुद पधारनेवाले हैं, यह सुनकर भी गाँव के लोगों की भीड़ जमी हुई थी । दरी-जाजिम बिछ जाने से उनको सुविधा हो गई थी-बैठने की । अब शर्बत भी बँट रहा था । ग्रामीण उत्सुकता से बँधे बैठे थे। गोनू झा के चुनिन्दा लोग सक्रिय थे। गोनू झा के दरवाजे पर बने चबूतरे पर एक आसन रखा गया । फिर दो छोटे आसन उस बड़े आसन के आजू-बाजू रखे गए। इन आसनों पर मखमल के खोलवाले गद्दे बिछाए गए...।


अब पूरी तरह से उजाला हो चुका था । तभी कुछ रंगरूट दौड़ते हुए आए और गोनू झा के कान में कुछ फुस- फुसाकर लौट गए । गोनू झा ने अपनी-पत्नी की कलाई पकड़ी और ग्रामीणों से कहा-“आओ भाइयो, महाराज पधारनेवाले हैं ! एक बार इस खुशी में जयकारा लगाओ।" गोनू झा जयकारा लगाने लगे -" महाराज की ..." ग्रामीणों ने ऊँचे स्वर में कहा " जय हो !"


कुछ देर में ही महाराज की सवारी गोनू झा के दरवाजे पर पहुँची और जयनाद से उनका स्वागत हुआ। मुदित मन से महाराज ने आसन -ग्रहण किया । उनके आजू-बाजू गोनू झा और पंडिताइन बैठे । ग्रामीण भी अपने स्थान पर बैठ गए।


महाराज ने धीरे से कहा-“यह क्या पंडित जी, आपने तो अच्छा मजमा लगा लिया । इतनी भीड़ तो किसी सभा में भी नहीं जुटती । लगता है, पूरा गाँव यहाँ जमा है।"


गोनू झा ने भी धीमे स्वर में कहा “महाराज ! मजमा तो अनायास लग गया है। मैंने तो मिथिलांचल को चोरों के उत्पात से छुटकारा दिलाने के प्रयोजन से अपने ढंग से अभियान चलाया था और मुझे इस अभियान की ऐसी सफलता का भरोसा भी नहीं था लेकिन संयोग कुछ ऐसे जुटते गए कि अपने आप चोरों का एक शातिर गिरोह फंदे में आ गया । जल्दी ही अन्य चोरों की गिरफ्तारी हो जाएगी ।"


महाराज ने मुदित मन से पूछा -”मुझे बताइए पंडित जी, क्या हुआ और कैसे हुआ ?" गोनू झा ने कहा-“महाराज, मैं सो रहा था । जो भी कुछ हुआ, वह इन जवानों से मुझे भी पूछना है । यदि आज्ञा दें, तो ग्रामीणों के सामने इन रंगरूटों से सारी कहानी सुनी जाए । इससे ग्रामीणों को भरोसा होगा कि आप प्रजावत्सल हैं और उनकी सुरक्षा के लिए मिथिलांचल की शासन व्यवस्था चाक-चौबन्द है ।"


एक विश्वस्त रंगरूट को गोनू झा ने बुलाया और आज्ञा दी कि वह सारी घटना का विवरण दे ।



रंगरूट ने चोरों को जाल में फंसाने के लिए किए गए सभी यत्नों का ब्यौरा दिया फिर बताया कि जिस कमरे में बहुमूल्य सामग्री और लाखों का सामान होने की बात कही गई थी उस कमरे में बोरों में घुसकर रंगरूट बैठे थे। किसी को इस बात की भनक तक नहीं थी । यह बात या तो गोनू झा जानते थे या फिर वही रंगरूट जो बोरे में बन्द थे। आधी रात के बाद चोरों ने दरवाजे का ताला झटका मारकर खोल लिया और कमरे में प्रवेश कर भीतर से कुंडी लगा ली । ये लोग उन डिब्बों को समेटने में लग गए जिनमें कीमती उपहार होने का अंदेशा था । उसी समय बोरों में बन्द सभी रंगरूट झटके से बाहर आए और उन चोरों को दबोच लिया ।


महाराज ने मुक्त कंठ से गोनू झा की प्रशंसा की ।


गोनू झा ने महाराज से कहा-“महाराज, अब इस कार्य में जिन जवानों के सहयोग से सफलता मिली है, उन्हें अपने हाथों से पुरस्कार प्रदान करें ।"


नक्शीदार डिब्बे मँगाए गए और एक-एक रंगरूट और सुरक्षा प्रहरी को वे डिब्बे दिए गए । फिर बारी आई ग्रामीणों की तो उन्हें थैलियाँ भेंट की गईं। सचमुच थैलियों में मखाना और बताशा ही थे। मगर ग्रामीण खुश थे कि महाराज के हाथों उन्हें यह उपहार मिला। महाराज वहाँ से विदा हुए । नगर कोतवाल सभी चोरों को लेकर हवालात पहुँचा जहाँ से उन्हें कारागार भेज दिया गया । उनसे पूछताछ के आधार पर मिथिलाँचल के बाजारों में सक्रिय चोरों के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिलीं जिससे हफ्ते भर में ही बड़े पैमाने पर चोरों की गिरफ्तारी हुई। इस तरह चोरों की गिरफ्तारी होने से अन्य चोर या तो मिथिला से भाग गए या फिर भूमिगत हो गए।


जब महीने-दो महीने तक मिथिला में चोरी की कोई घटना नहीं हुई तब एक दिन महाराज ने दरबार में बताया कि किस तरह गोनू झा की सूझ-बूझ से मिथिला से चोरों का सफाया हो पाया ।


गोनू झा के लिए यही बहुत बड़ा पुरस्कार था ।







Saturday, April 20, 2024

कंजूस राजा को नसीहत (कहानी) : गोनू झा

 मिथिला नरेश के दरबार में गोनू झा के बुद्धिकौशल और वाक्चातुर्य का जो जादू चल रहा था उसकी कीर्ति मिथिलांचल के आस -पास के क्षेत्रों में भी फैल चुकी थी । मिथिला के पड़ोसी राज्य अंग देश के राजा ने राज्योत्सव के कई अवसरों पर गोनू झा को विशेष रूप से आमंत्रित किया था तथा उन्हें पुरस्कार-अलंकरण आदि से सम्मानित किया था ।


अंग देश के राजा में उदारता थी लेकिन युवराज अपने पिता के ठीक विपरीत प्रवृत्ति के थे। हद से ज्यादा मितव्ययी । राजा के जीवनकाल में ही युवराज की कंजूसी की कथाएँ पूरे प्रदेश में मशहूर हो चुकी थीं । राजा ने युवराज को बहुत समझाया कि प्रजा -पालन के लिए उदारता, करुणा, सहानुभूति आदि की भी जरूरत होती है । इन गुणों को राजा का आभूषण माना जाता है। परम्परा से चली आ रही रीतियों का निर्वाह भी राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है । ब्राह्मण, चारण आदि को राज्याश्रय मिलना चाहिए। कलाकारों और साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य की ओर से प्रतियोगिताओं का आयोजन और पुरस्कारों की व्यवस्था राजधर्म है । खिलाडियों के मनोबल को बढ़ाने के लिए भी राजकोष का उपयोग किया जाना चाहिए । जैसे सैनिकों को तरोताजा बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उसकी कवायद पर राजकोष से व्यय किया जाता है, वैसे ही खिलाड़ियों और कलाकारों के लिए रंगशालाओं के निर्माण और उनके रख -रखाव की व्यवस्था करना राजधर्म है । मगर युवराज को अपने पिता की ये बातें प्रभावित नहीं करतीं । उसे लगता कि इस तरह के आयोजनों से धन और समय दोनों का अपव्यय होता है। चारण और ब्राह्मण तो युवराज को मिथ्याभाषी और लोलुप लगते थे। यदि राजा का भय नहीं होता तो वह अपने महल में चारण और ब्राह्मणों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगा देता ।


एक बार अंग देश के राजा बीमार पड़े । राज वैद्य ने अपने अनुभव से समझ लिया कि राजा अब बचनेवाले नहीं हैं । उचित औषधि राजा को देकर उसने महामंत्री को परामर्श दिया कि युवराज के राज्याभिषेक की व्यवस्था कराएँ।


महामंत्री समझ गए कि राजा अब स्वस्थ नहीं हो सकेंगे। राज्य ज्योतिषी से परामर्श कर युवराज के राज्याभिषेक के लिए शुभ मुहूर्त और शुभ तिथि निर्धारित की गई । इस व्यवस्था के बाद राज वैद्य ने राजा को पूर्णविश्राम में रहने तथा राज्य संचालन की जिम्मेदारी पुत्र को सौंप देने की सलाह दी ।


वार्द्धक्य के कारण राजा भी अब राज-काज से मुक्त होना चाहते थे, ऊपर से बीमारी ने उन्हें अशक्त कर रखा था । राजवैद्य की सलाह उन्हें पसन्द आई। निर्धारित तिथि को शुभ मुहूर्त में युवराज का राज्याभिषेक हुआ । राजा ने अपने पुत्र को स्वयं राज सिंहासन पर बैठाया और विश्राम करने के लिए अपने कक्ष में चले गए ।



युवराज अपने पिता की बीमारी से दुखी था । अपने पिता की हालत से व्यथित युवराज को राजा बनने से कोई प्रसन्नता नहीं हुई। राज सिंहासन पर बैठे नए राजा के स्तुति गान के लिए चारण आए और नए राजा को आशीष देने ब्राह्मण मगर राजा ने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया । चारण स्तुति गान और ब्राह्मण मंत्रोच्चार करने के बाद नए राजा की ओर आशा -भरी दृष्टि से देखते हुए अपने स्थान पर खड़े रहे, मगर नए राजा ने उनकी ओर देखा तक नहीं।


महामंत्री ने राजा का ध्यान जब चारण और ब्राह्मणों की ओर आकर्षित किया तो नए राजा ने कहा, “महामंत्री जी ! मेरे पिता मरणासन्न हैं । ऐसे राज-काज सँभालना मेरा दायित्व था इसलिए यह मेरे लिए कोई प्रसन्नता की बात नहीं । राजगद्दी मुझे मिलनी ही थी, सो मिली । नया क्या हुआ ? अब से मेरे दरबार में इस तरह के 'याचकों' का प्रवेश वर्जित है । राज-काज इनकी स्तुति और मंत्रोच्चार से नहीं, राजनीतिक कौशल से चलता है । मुझमें मेरे पिता वाली उदारता नहीं है कि इन निखटू-चापलूसों पर धन जाया करूँ – इन्हें अभी इसी क्षण दरबार से निकल जाने को कहें ।”


नए राजा के इस व्यवहार से ब्राह्मण और चारण दुखी हुए । राज्य के कलाकारों और कवि साहित्यकारों को उम्मीद थी कि युवराज के राजा बनने पर राजमहल में कोई रंगारंग कार्यक्रम होगा जिसमें उन्हें अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । हद तो तब हो गई जब राजा बनने के बाद नए राजा ने विद्वत्जनों की बैठक नहीं बुलाई । अंग देश में नए राजा की आलोचना होने लगी। जिधर सुनो, बस यही चर्चा कि नया राजा दंभी और स्वेच्छाचारी है। प्रजा के दुःख- सुख से इसे कुछ भी लेना-देना नहीं ।


ब्राह्मणों, चारणों और कलाकारों ने सोचा कि बिना राज्याश्रय के उनके लिए जीविकोपार्जन कठिन है । उनके पास दो ही रास्ते हैं या तो नए राजा को राजमहल की परम्पराओं के निर्वाह के लिए समझाया जाए या फिर वे राज छोड़कर कहीं किसी अन्य राज्य में आश्रय लें । अन्ततः अंग देश के विद्वत्जनों, ब्राह्मणों, चारणों एवं कलाकारों को गोनू झा की याद आई तथा तय हुआ कि इस मुश्किल की घड़ी में गोनू झा से परामर्श करना उचित होगा । इस निश्चय के बाद ये तमाम लोग मिथिला आए और गोनू झा के आवास पर पहुँचे।


गोनू झा अंग देश के प्रसिद्ध लोगों के समूह को अपने दरवाजे पर देखकर आश्चर्यचकित रह गए । उन्होंने आगंतुक अतिथियों का स्वागत किया तथा सम्मानपूर्वक उन्हें बैठाया । फिर उनसे कुशल- क्षेम पूछते हुए मिथिला पधारने का प्रयोजन पूछा ।



उन लोगों ने जब अंग देश के नए राजा के व्यवहार के बारे में गोनू झा को जानकारी दी तब गोनू झा को भी लगा कि नए राजा के व्यवहार से पड़ोसी राज्य में असंतोष पैदा होगा और इसका प्रभाव मिथिलाँचल पर भी पड़ेगा। गोनू झा को अंग देश के वृद्ध महाराज के रुग्ण होने के समाचार ने भी व्यथित किया और उन्होंने तय कर लिया कि वे इन लोगों के साथ अंग देश जाएँगे । नए राजा को राज्यानुकूल आचरण सिखाएँगे तथा वृद्ध महाराज का दर्शन कर उन्हें आरोग्य लाभ के लिए शुभकामनाएँ देंगे । गोनू झा ने यह निर्णय इसलिए लिया कि अंग देश के विद्वत्जनों ने उनके पास आकर उनके प्रति आस्था जताई थी तथा मिथिलांचल की परम्परा रही है कि दरवाजे पर आए अतिथियों की क्षमता भर इच्छापूर्ति का उपाय किया जाना चाहिए । गोनू झा के प्रति अंग देश के वृद्ध महाराज का स्नेह भाव प्रारम्भ से ही बना हुआ था । प्रायः प्रत्येक राज्योत्सव में उन्होंने गोनू झा को अवश्य बुलाया था और उचित सम्मान व उपहार देकर उन्हें विदा किया था । वृद्ध महाराज के रुग्ण होने की सूचना पर गोनू झा उद्वेलित न होते तो कैसे ?


गोनू झा अंग देश को विद्वत्जनों के साथ चल दिए। रास्ते में उन्होंने नए राजा के आचरण व्यवहार आदि की पूरी जानकारी प्राप्त की फिर उन्होंने उन लोगों को सलाह दी कि जब वे नए राजा से मिलने दरबार में जाएँ तो कोई कुछ भी नहीं बोले । बस, वे जैसा करें, वैसा ही वे सब भी करते जाएँ। लोगों ने उन्हें अपनी सहमति दे दी ।


गोनू झा ने दरबार में खबर भिजवाई कि मिथिला से गोनू झा आए हैं और वे अपने अंग देश के मित्रों के साथ नए राजा के दर्शन के लिए दरबार में उपस्थित होना चाहते हैं ।


नए राजा को जब सूचना मिली कि गोनू झा आए हैं तो उसने ससम्मान दरबार में बुलाने का निर्देश दिया । नए राजा को गोनू झा के बारे में इतना तो पता ही था कि उसके पिता गोनू झा को प्रायः बुलाया करते थे। गोनू झा की विद्वता और विनोदप्रियता की चर्चा भी उसने सुन रखी थी लेकिन उनके साथ अंग देश के विद्वत्जनों को आते देख उसकी पेशानियों पर बल पड़ गए मगर उसने कुछ कहा नहीं। गोनू झा के अभिवादन के लिए नया राजा सिंहासन से उतरकर खड़ा हो गया । गोनू झा ने उसे नमस्कार करने के लिए अपने हाथ जोड़े तब उनके साथ आए अंग देश के विद्वत्जनों ने भी अपने हाथ जोड़े और फिर गोनू झा ने अपने हाथ फैलाकर मुँह खोल लिया और उसी मुद्रा में मूर्तिवत् खड़े हो गए। उनके साथ दरबार में उपस्थित विद्वत्जनों ने भी ऐसा ही किया । गोनू झा सहित इतने सारे लोगों को हाथ फैलाए और मुँह बाये खड़े देखकर नया राजा कुछ समझ नहीं पाया । दरबारी भी इस कौतुक को विस्मय से देख रहे थे।


काफी देर तक नया राजा उन्हें चकित-सा देखता रहा फिर उसके सब्र का बाँध टूट गया । उसने विस्मित भाव से पूछा -" क्या आप लोग मेरे राज्याभिषेक पर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं 

? "



गोनू झा ने पूर्व की भाँति ही एक हाथ की अँगुलियों को नचाया और मुँह बाए अपनी पूर्व की मुद्रा में आ गए।


इस तरह की विचित्र स्थिति की कल्पना न नए राजा ने कभी की थी और न उसके दरबारियों ने । अन्ततः नए राजा ने महामंत्री से धीरे से पूछा कि वह क्या करे ?


महामंत्री भी उलझन में थे कि पता नहीं गोनू झा क्या कहना चाह रहे हैं । फिर उन्होंने गोनू झा के साथ आए लोगों को देखा तो पाया कि ये लोग वृद्ध महाराज के राज में दरबार में विशेष सम्मान के अधिकारी थे। इनमें चारण और ब्राह्मण भी थे जिन्हें नये राजा ने कोई तरजीह नहीं दी थी ।


महामंत्री ने नए राजा से अपने अनुमान के आधार पर कहा -” राजन् सम्भवतः ये लोग आपसे कुछ दान-दक्षिणा की प्रत्याशा रखते प्रतीत होते हैं । इन्हें कुछ उपहार प्रदान करें और यथायोग्य आसन प्रदान करें तो सम्भवतः गोनू झा के यहाँ पधारने का प्रयोजन स्पष्ट हो पाए।


नये राजा ने ऐसा ही किया । मिथिला से आए गोनू झा जैसे विद्वान ब्राह्मण का आदर करना नए राजा ने राजनीतिक आवश्यकता के रूप में लिया तथा उनके साथ आए लोगों को भी उसने इसी दृष्टि से सम्मानित किया ।


उचित आसन एवं उपहार मिलने के बाद गोनू झा ने सहज मुद्रा अपना ली । उनके साथ आए लोगों ने भी ऐसा ही किया । फिर गोनू झा ने नए राजा से कहा -" राजन! मैं यहाँ आपके पिता के दर्शन के लिए उपस्थित हुआ हूँ । मेरे साथ जो लोग हैं, वे आपके राज्य की विभूतियाँ हैं । इनके मुँह से अमृत वचन निकला करते थे । उस सिंहासन पर जहाँ आज आप विराजमान हैं, वहाँ वृद्ध महाराज विराजमान हुआ करते थे। राजन्, जब विद्वानों, ब्राह्मणों, चारणों और कलाकारों की जिह्वा से शब्द प्रकट नहीं हो तो भरे दरबार में किस तरह की किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति उपस्थित हो जाती है यह आपने कुछ ही पल पहले देखा और अनुभव किया । अब मेरी प्रार्थना है कि आप स्वयं निर्णय करें कि वृद्ध महाराज के शासनकाल में सरस्वती के इन साधकों के प्रति जो राज -व्यवहार था, उसे जारी रखा जाए या नहीं। राजन् ! जब विद्वान चुप हो जाएगा, कलाकार मौन हो जाएगा तब राज्य में निष्ठा की कमी आएगी और लोग शुष्क वृत्ति की ओर प्रवृत होंगे । राजधर्म है कि जनजीवन में सरसता बनी रहे । इसके लिए ही वृद्ध महाराज इन लोगों को महत्त्व दिया करते थे।"


नए राजा को गोनू झा की बातें समझ में आईं और उसने विनम्रतापूर्वक अंग देश के विद्वत्जनों से अपने व्यवहार के प्रति क्षमा माँगी तथा बताया कि अपने वृद्ध पिता के आरोग्य के लिए चिन्तित रहने के कारण उसने उनके साथ शुष्क व्यवहार किया था जो किसी भी राजा के लिए शोभनीय नहीं था ।


गोनू झा नए राजा की इस आत्म-स्वीकृति से प्रसन्न हुए और कहा -" राजन्! हम सभी वृद्ध महाराज से मिलकर उनके आरोग्य लाभ की कामना करने के इच्छुक हैं । यदि आप इसकी आज्ञा दें तो हम कृतार्थ होंगे ।




गोनू झा ने जान- बूझकर बहुत औपचारिक भाषा का प्रयोग किया था क्योंकि वे नए राजा को सन्देश देना चाहते थे कि राज्य-संचालन के लिए केवल अपने संवेगों, संवेदनाओं और भावनाओं का ही नहीं बल्कि परम्परा से चली आ रही औपचारिकताओं का भी निर्वाह किया जाना चाहिए।


नए राजा ने गोनू झा की विनम्रता की मन ही मन सराहना की और उन्हें लेकर अपने पिता के कक्ष में पहुँचे। उनके साथ अंग देश के विद्वत्जनों का जत्था भी था ।


गोनू झा और अपने राज्य के विभूतियों को अपने कक्ष में आया देख वृद्ध महाराज बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने गोनू झा से कुछ दिनों तक राज-अतिथि के रूप में अंग देश में रहने का आग्रह किया जिसे गोनू झा ने मान लिया ।


गोनू झा ने वृद्ध महाराज से मिलकर यह महसूस किया कि महाराज का एकाकीपन भी उनके आरोग्य लाभ में बाधक है। उन्होंने राज वैद्य से इस सम्बन्ध में परामर्श किया और उनकी अनुमति से वृद्ध महाराज के कक्ष में प्रतिदिन किसी न किसी कलाकार को बुलाकर उसका गायन, वादन आदि का आयोजन कराते रहे । चारण तो वे खुद थे। वे इस बात का ध्यान रखते थे कि महाराज उदास और एकाकी न हों ।


वृद्ध महाराज का कक्ष कलाकारों के आने- जाने से जीवंत हो उठा और देखते ही देखते वृद्ध महाराज के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा । राज वैद्य ने भी वृद्ध महाराज के स्वास्थ्य में तेजी से हो रहे सुधार को स्वीकार किया तथा घोषणा की कि वृद्ध महाराज अब खतरे से बाहर हैं ।


नए राजा ने जब अपने पिता के स्वास्थ्य में आए इस परिवर्तन को देखा तब वे गोनू झा के प्रति आभार-बोध से भर गया । मगर गोनू झा ने नए राजा को समझाया कि कलाकारों की संगति से महाराज के स्वास्थ्य में यह सुधार हुआ है । वृद्ध महाराज का एकाकी जीवन उनके स्वास्थ्य की राह में अड़चन था । उनके साथ राज वैद्य से लेकर सेवक तक ऐसा व्यवहार कर रहा था कि वे बहुत बीमार हैं तथा उनका बचना मुश्किल है । दरअसल, ऐसा व्यवहार तो किसी स्वस्थ व्यक्ति को भी रोगी बना देगा । कलाकार संवेदनशील होते हैं । वे महाराज के मनोभावों को समझते हुए उनके साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे थे जिसकी आवश्यकता महाराज को थी । इस कारण वृद्ध महाराज के स्वास्थ्य में तीव्रता के साथ सुधार हुआ । नए राजा को अब समझ में आया कि जिन्हें वे निखटू और याचक की संज्ञा दे रहे थे, उनकी उपयोगिता राज्य के लिए कितनी अहम है ।


जब गोनू झा अंग देश से विदा होने को हुए तो नए राजा ने राजमहल में एक रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें राज्य के प्रायः सभी कलाकारों की कला का प्रदर्शन हुआ। इस आयोजन में वृद्ध महाराज भी उपस्थित हुए । नए राजा ने गोनू झा को विदाई से पहले ढेर सारे उपहार दिए और अंग देश के विद्वत्जन गोनू झा को मिथिला तक पहुँचाने आए। वे सभी गोनू झा के प्रति कृतज्ञता-बोध से भरे हुए थे ।

Tuesday, April 16, 2024

खेत की सिंचाई (कहानी) : गोनू झा

 शातिर चोरों को हवालात की सैर करवाने के कारण गोनू झा पूरे मिथिलांचल के चोरों की आँखों की किरकिरी बन गए। मिथिला में ठग और चोर गोनू झा से बदला लेने की ताक में रहने लगे। ठगों और चोरों की नाक में नकेल डालने के कारण मिथिला नरेश की दृष्टि में गोनू झा का सम्मान और बढ़ गया ।


लंगडू उस्ताद के गिरोह के कुछ लोग कारावास से सजा काटकर बाहर आए। कारावास से छूटने से पहले उन्होंने लंगडू उस्ताद के सामने शपथ ली कि जब तक गोनू झा से बदला नहीं ले लेंगे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।


गोनू झा इस स्थिति का अनुमान उस दिन ही लगा चुके थे जिस दिन उनके दरवाजे पर लंगडू उस्ताद का गिरोह गिरफ्त में आया था इसलिए उन्होंने कोतवाल को कुछ आवश्यक निर्देश दिए थे।


कोतवाल गोनू झा का अहसानमंद था क्योंकि चोर गिरोह की गिरफ्तारी के बाद गोनू झा की अनुशंसा पर महाराज ने उसकी पगार बढ़ा दी थी । एक तरह से पूरी मिथिला से अपराधियों का सफाया हो चुका था जिसके कारण कोतवाल भी निश्चिन्त था । रसिक प्रवृत्ति का कोतवाल मौज-मस्ती में डूबा रहने लगा ।


उन दिनों मिथिला में भाँग और ताड़ी का नशा प्रचलन में था लेकिन रसिक कोतवाल अपने लिए पश्चिम बंगाल से मदिरा मँगाया करता था । उसके कुछ आसामी उसके लिए खास मनोरंजन की व्यवस्था करते थे जिसमें पीना -पिलाना तो होता ही था रास -रंग के भी अवसर थे। मखाना और मछली के व्यापारी कोतवाल को प्रसन्न रखने के लिए वह सब व्यवस्था करते जिसकी ललक एक रसिक व्यक्ति को रहती है ।


कोतवाल अपने आवास के बाहरी कमरे में बैठा था । उसके हाथ में मदिरा थी । सामने थाल में भूनी हुई मछलियाँ रखी थीं । एक मांसल शरीर की बाला ठुमका लगा-लगाकर कुछ गा रही थी ।


तभी किसी ने द्वार पर दस्तक दी । कोतवाल ने बुरा-सा मुँह बनाया और झल्लाते हुए उठा । उसने नर्तकी को इशारा किया । नर्तकी पर्दे की ओट में चली गई । कोतवाल कक्ष से बाहर आया । द्वार पर उसका मुख्य मुखबीर खड़ा था । उसने कोतवाल को फुसफुसाते हुए कुछ कहा और वहाँ से वापस चला गया ।


कोतवाल वापस अपने कमरे में आया । उसने नर्तकी की ओर हसरत-भरी निगाहों से देखा-थोड़ी देर तक उस रूपसी को निहारने के बाद कोतवाल ने कहा -" मुझे अभी निकलना पड़ेगा प्रिये ! अभी, और इसी समय ..."


नर्तकी ने आँखों की भंगिमा बदली, मानो पूछ रही हो -ऐसी भी क्या जल्दी है? लेकिन कोतवाल ने सिर पर पगड़ी डाली और नर्तकी को कुछ मुद्राएँ थमाते हुए कहा -"जल्दी ही मिलेंगे... इस प्यासी शाम की कसम ! अभी तुम्हें जाना ही पड़ेगा।" कहकर कोतवाल कमरे से बाहर निकल गया ।


नर्तकी भी मुद्राएँ अपने बटुए में डालते हुए ठुमकती हुई कमरे से निकल गयी ।


कोतवाल तेज गति से कहीं जाने लगा । उसकी मुखमुद्रा गम्भीर थी ।


गोनू झा अपने दरवाजे पर टहल रहे थे। शाम ढल चुकी थी लेकिन हल्का उजाला फैला हुआ था । तभी गोनू झा को घोड़े की टापों की आवाज सुनाई पड़ी । उन्होंने मन ही मन सोचा कि इस समय भड़ौरा जैसे गाँव से कौन घुड़सवार गुजर सकता है ?


उन दिनों जमींदार, राजा -महाराजा या राजदरबार का कोई ऊँचा ओहदेदार ही घोड़े की सवारी करता था । नगर कोतवाल, सेनापति और रंगरूट प्रमुख को राज्य की ओर से घोड़े मिले हुए थे जिनका उपयोग वे विशेष परिस्थितियों में करते थे।


गोनू झा कुछ सोच पाते, तभी दूर से आते घुड़सवार पर उनकी नजर पड़ गई। शाम ढल चुकने के कारण नीम-अँधेरे में घुड़सवार की आकृति तो समझ में आ रही थी किन्तु वे उसे पहचान नहीं पा रहे थे। उत्सुकता बनी हुई थी कि घुड़सवार कौन है इसलिए वे उधर ही देखते रहे । थोड़ी ही देर में घुड़सवार उनके पास ही आकर रुक गया । वह कोई और नहीं नगर कोतवाल था । गोनू झा का अभिवादन करने के बाद कोतवाल ने लंगडू उस्ताद के गिरोह के कुछ चोरों के कारावास से मुक्त होने की खबर दी ।


गोनू झा ने कोतवाल से कहा -" तीन साल तक तुमने खूब मौज-मस्ती कर ली, अब कर्त्तव्य के प्रति सतर्क और तत्पर हो जाओ। आगे तुम जानते हो कि तुम्हें क्या करना है ।" कोतवाल वहाँ से चला गया । गोनू झा अपने घर की ओर चल दिए।


इस घटना को कई दिन बीत गए। फिर महीने और साल भी बीता । मिथिलांचल में अमन चैन रहा। कहीं कोई चोरी की घटना नहीं घटित हुई। एक शाम गोनू झा दरबार से वापस आ रहे थे कि अचानक उनकी नजर चार -पाँच लोगों पर पड़ी । वे सभी हट्टे- कट्टे थे-घुटने के ऊपर धोती समेटकर बाँधे हुए और नंगे बदन । उनके नंगे बदन पर अजीब-सी चमक थी, जैसे तेल चुपड़ा हुआ हो !


गोनू झा इस तरह की अस्वाभाविक बातों को नजरअन्दाज नहीं करते थे। उनका दिमाग तुरन्त सक्रिय हो गया । वे एक पेड़ की ओट में खड़े हो गए और उन लोगों पर नजर रखने लगे।


वे चारों गोनू झा के घर के आस -पास ही चहल-कदमी करते रहे फिर उनमें से तीन उनके बगान की ओर चले गए । एक आदमी उनके घर के आस- पास बना रहा ।


गोनू झा को इन चारों का व्यवहार बहुत असामान्य लगा। अन्ततः कुछ सोचकर गोनू झा सामान्य चाल से चलते हुए अपने घर पहुँच गए। थोड़ी देर बाद हाथ में मशाल लिए वे बाहर निकले और मशाल की रोशनी में घर के दरवाजे से लेकर घर तक आने की राह तक वह झुक-झुककर कुछ तलाशते रहे । थोड़ी-थोड़ी देर पर वे कमर सीधी करने के लिए खड़े होते और फिर कुछ खोजने लगते ।



थोड़ी देर के बाद एक व्यक्ति उनके पास आया और पूछने लगा, “क्या खोज रहे हैं पंडित जी ?"


“अरे, क्या बताएं भाई ! आज ही महाराज ने मुझे सौ स्वर्ण- मुद्राएँ उपहारस्वरूप प्रदान की थीं । उनमें से पाँच स्वर्ण-मुद्राएँ कहीं गिर गईं । मेरी पत्नी इससे इतनी कुपित है कि क्या कहूँ ! कहती है, जब तक पाँचों स्वर्ण-मुद्राएँ मिल न जाएँ तब तक मुँह मत दिखाना।"


स्वर्ण- मुद्राओं की बात सुनकर वह व्यक्ति उत्सुक हुआ और गोनू झा के साथ झुककर स्वर्ण मुद्राएँ खोजने में उनकी मदद करने लगा ।


अचानक एक स्थान पर गोनू झा जल्दी से लपके, झुककर एक मुद्रा जमीन से उठाई और बोले-“चलो भाई! एक तो मिला।"


उस व्यक्ति ने देखा, गोनू झा की दो अंगुलियों के बीच एक स्वर्ण -मुद्रा चमचमा रही थी । इसी तरह गोनू झा इधर-उधर मशाल लिए मुद्राएँ तलाशते रहे और एक-एक कर पाँच स्वर्ण -मुद्राएँ उन्हें अपने घर के आस- पास ही मिल गईं। उन्होंने राहत की साँस लेते हुए उस आदमी से कहा-“अरे भाई! तुम्हारा आना बहुत शुभ रहा। मेरी पाँचों स्वर्ण- मुद्राएँ मिल गईं । अब जाकर अपनी पत्नी के सामने इन्हें पटक दूंगा और कहूँगा लो, गिन लो, पूरी सौ स्वर्ण- मुद्राएँ । जाओ भाई, तुम भी अपनी राह लो ।" इतना कहकर वे अपने घर की ओर चल दिए।


वह व्यक्ति गोनू झा के जाने के बाद उनके बगान में घुस गया जहाँ उसके चार साथी इन्तजार कर रहे थे। गोनू झा के हाथों में चमचमाते सिक्के उसने देखे थे और उसे विश्वास हो गया था कि गोनू झा के घर में अभी सौ सोने के सिक्के हैं । चारों थोड़ी देर तक गुपचुप मंत्रणा करते रहे । फिर उन्होंने देखा कि गोनू झा कहीं जा रहे हैं शायद बाजार । घंटे भर बाद गोनू झा लौटे ।


वे चारों कोई और नहीं, साल भर पहले कारावास से मुक्त हुए लंगडू उस्ताद के गिरोह के सदस्य थे। गोनू झा के घर चोरी करके उनसे बदला लेने का संकल्प पूरा करने आए थे। चूंकि चोर पहले भी गोनू झा से गच्चा खा चुके थे इसलिए इस बार वे फूंक-फूंककर कदम रखना चाहते थे। उनके बीच फुसफुसाहटों में ही बात हुई । कोई मानने को तैयार नहीं था कि जिसके पास स्वर्ण- मुद्राएँ होंगी, वह उसकी चर्चा सरेआम किसी अजनबी के साथ करता फिरेगा ।


जब गोनू झा बाजार से लौटकर आए तब वे चारों चोर गोनू झा की खिड़की के पास पहुँचे और भीतर क्या हो रहा है, उसका आहट से लेने लगे । भीतर गोनू झा अपनी पत्नी से कह रहे थे – “अरे भाग्यवान, समझा करो। ये स्वर्ण-मुद्राएँ घर में रखना ठीक नहीं है। मुझ पर विश्वास करो मैं इन्हें ऐसी जगह रख दूँगा जहाँ से चोर तो क्या, चोर का बाप भी इन्हें नहीं चुरा सकता । जमाना खराब है। कब किसकी नीयत बदल जाए, कौन जानता है-लाओ, थैली मुझे दे दो, मैं इन्हें कुएँ में डाल आता हूँ।"



फिर पंडिताइन की आवाज उभरी -" और जब जरूरत होगी तब आप इसे निकालेंगे कैसे ?"


“तुम भी बच्चों जैसी बातें कर रही हो ? कुआँ अपने दरवाजे पर है। कोई बाहर का आदमी इससे पानी लेने आता नहीं है । जब जरूरत होगी तो कुएँ का पानी बाहर निकाल लेंगे। कितना समय लगेगा ? दो घड़ी, न चार घड़ी। एक पहर, न दोपहर... और क्या ? कितने जन लगेंगे? दो जन नहीं, तो चार जन । चलो, बाल्टी अभी ही निकालकर रस्सी समेत कुएँ पर रख देता हूँ । जब तेरी इच्छा हो मैं रहूँ न रहूँ-तुम भी चाहो तो जन-मजदूर लगाकर कुएँ का पानी निकलवा लेना...लाओ, अब स्वर्ण-मुद्राओं की थैली मुझे दे दो ।"


थोड़ी देर बाद एक आवाज उभरी-छपाक! जैसे कोई भारी वस्तु पानी में फेंकी गई हो ! चोरों ने आवाज सुनी । अब वे गोनू झा और उनकी पत्नी के सोने का इन्तजार करने लगे ।


रात गहरा रही थी । चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था । कभी -कभी सियार की आवाज इस सन्नाटे को तोड़ती थी । जब चोरों को विश्वास हो गया कि गोनू झा सपत्नीक सो चुके हैं वे पाँव दबाए कुएँ तक आए। यह देखकर उनकी बाँछे खिल गईं कि सचमुच कुएँ पर चार बाल्टियाँ रस्सी सहित रखी हुई हैं । वे पानी खींचने में लग गए। कोई कुछ बोल नहीं रहा था । कुएँ में बाल्टी भी इतनी धीमी गति से डाली जाती कि कोई आवाज नहीं उभरे ।


सबेरा होने को आया । चारों चोर तन्मयता से अपने काम में लगे थे। अचानक उनमें से एक ने कहा -"कुएँ में अब पानी कम ही बचा है । हममें से एक आदमी कुएँ में रस्सी के सहारे उतरकर पानी से वह थैली निकाल सकता है।"


यह विचार आते ही वे इस बहस में पड़ गए कि पानी में कौन उतरेगा। तभी एक साथ कई लोग बागान से निकले और उन चोरों पर झपट पड़े।


बाहर से उठा-पटक की आवाज आने से गोनू झा की नींद खुल गई। उन्होंने पत्नी को जगाया । दोनों उठकर बाहर आए। सामने देखा-कुएँ के पास चारों चोर बँधे पड़े थे। नगर कोतवाल अपने जवानों को कुछ समझा रहा था । गोनू झा पर नजर पड़ते ही उसने उनका अभिवादन किया ।


इस बार गोनू झा से पहले उनकी पत्नी बोली-" अरे ! इन लोगों को बाँध क्यों दिया ? रात भर इन लोगों ने हमारे बगान में पानी पटाया है । ऐसी सिंचाई तो हम पैसा देकर भी नहीं करा पाते । पेड़ों की प्यास बुझानेवालों के साथ ऐसा व्यवहार ठीक नहीं। इन लोगों को ले जाइए और इतनी आवभगत कीजिए कि इनका मेहनताना वसूल हो जाए।"


दरअसल, रात को ही गोनू झा को सन्देह हो गया था कि चोर उनके घर धावा बोल सकते हैं इसलिए बाजार जाकर एक सुरक्षाकर्मी के मार्फत उन्होंने कोतवाल को खबर कर दी थी । सुरक्षाकर्मी उन्हें पकड़कर ले गए।

चोरों ने तौबा कर ली (कहानी)

 गोनू झा और चोरों के बीच आँख -मिचौली बरसों चलती रही। गोनू झा महाराज को वचन दे चुके थे कि उनके रहते मिथिला में चोरों का मनोबल बढ़ने नहीं दिया जाएगा । संयोग ऐसा रहा कि हमेशा चोरों को गोनू झा से मुँह की खानी पड़ी ।


दूसरी तरफ चोर बिरादरी के लोग लंगडू उस्ताद से वचनबद्ध थे कि जब भी मौका मिलेगा, वे गोनू झा के घर ऐसी चोरी करेंगे जिसे उनके सात पुश्त स्मरण रखेंगे।


घात-प्रतिघात की यह बात गोनू झा समझते थे और हमेशा सतर्क रहते थे। एक बार की बात है । गोनू झा दरबार से लौटकर अपने दरवाजे पर टहल रहे थे। सतर्क रहने की आदत ने गोनू झा को थोड़ा शंकालु बना दिया था । वे टहलते समय भी इतने चौकन्ने रहते, जितना कि बाज रहता है । अचानक उन्होंने कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनी । सोचने लगे, कुत्ता इस समय इस तरह नहीं भौंकता है। उन्होंने ध्यान देकर सुना-यह पड़ोसी मदन झा के कुत्ते के भौंकने की आवाज थी ।


मदन झा ने हाल में ही गोनू झा के अहाते के बगल में जमीन खरीदी थी और वहाँ अपना मकान बना लिया था । बहुत शौकीन आदमी था मदन झा । दिलेर और उत्साही भी । उसके आजू-बाजू उसके दो रिश्तेदारों ने भी मकान बनाया था । देर रात उनके घरों की महिलाएँ एक जगह एकत्रित होकर गीत गातीं-सोना-चकवा के गीत । पंडिताइन से भी वे काफी हिल -मिल गई थीं । कई बार वे अपने साथ पंडिताइन को भी ले गई थीं गीत गाने ।


मदन झा के दोनों सम्बन्धी लखन झा और सुमन झा भी मिलनसार थे। गोनू झा का सम्मान करते थे । घर -प्रवेश के अवसर पर उन्होंने गोनू झा को विशेष रूप से आमन्त्रिात किया था ।


कुत्ते के भौंकने की आवाज कभी धीमी पड़ती और फिर कभी तेज हो जाती। गोनू झा सशंकित मन से मदन झा के घर की ओर टहलते हुए बढ़े। उन्होंने एक आदमी को उसी समय उधर से गुजरते हुए देखा । आदमी की चाल उन्हें ठीक नहीं लगी। मदन झा उन्हें अपने दरवाजे पर ही मिल गए । थोड़ी देर तक उनसे इधर-उधर की बातें करके गोनू झा अपने घर की ओर लौटने लगे तभी लखन झा और सुमन झा उन्हें रास्ते में मिल गए। गोनू झा का उन्होंने अभिवादन किया और अनुनय करके गोनू झा को अपने घर ले आए । शर्बत पिलाया । इधर -उधर की बातें होती रहीं । थोड़ी देर के बाद गोनू झा ने उनसे विदा ली । विदा होते होते उन्होंने कहा -" आजकल गाँव में अजनबी चेहरे फिर दिखने लगे हैं । कहीं फिर से चोर उचक्कों का उत्पात न शुरू हो जाए । आप लोग भी सावधान रहा करिए । एक समय इस गाँव में चोरों के उत्पात से त्राहि- त्राहि की स्थिति रही है।"


उनसे विदा लेने के बाद गोनू झा के दिमाग में उस आदमी की चाल बार -बार कौंध जाती थी ... थोड़ा उचक -उचककर चलता यह हट्टा-कट्टा आदमी... उन्हें लगा कि कहीं उसे देखा है । दिमाग पर जोर डाला तो कुछ याद नहीं आया ।


रात को भोजन करने के बाद वे फिर टहलने के लिए निकल गए। अपने दरवाजे से निकलकर वे गाँव की मुख्य सड़क पर आ गए और टहलते हुए मदन झा के घर से थोड़ी दूर आगे तक निकल गए । अचानक मदन झा का कुत्ता जोर-जोर से भौंकने लगा । गोनू झा जहाँ थे वहीं एक पेड़ की ओट में खड़े हो गए और मदन झा के घर की ओर देखने लगे । चाँदनी रात थी इसलिए सब- कुछ साफ दिख रहा था । उन्होंने उचक-उचककर चलने वाले आदमी को सड़क से गुजरते देखा ।...थोड़ी दूर चलकर वह आदमी गोनू झा के बगान की ओर मुड़ गया ।


गोनू झा घर लौट आए। गोनू झा का ध्यान बाहर था । खट्- खट् की आवाज पिछवाड़े की दीवार से आ रही थी । गोनू झा को समझते देर न लगी कि पीछे की दीवार में संध लगाई जा रही है।


गोनू झा से अचानक पंडिताइन ने कहा -" अँगनावाला दरवाजा खुला रह गया है... बन्द कर आऊँ।"


इसी समय एक साया उस दरवाजे से घुटने के बल सरकता हुआ कमरे में आ गया और सरकता हुआ गोनू झा के पलंग के नीचे घुस गया। गोनू झा अपनी पत्नी को बोलने लगे – “पंडिताइन, मैं सोच रहा हूँ कि जब हमारे बच्चे होंगे..."


“धत्! “पंडिताइन ने नारी सुलभ लज्जा के साथ कहा।


" धत् कहती हो ! मैं भविष्य के लिए कल्पनाएँ सँजो रहा हूँ। तुम हो कि धत् कह रही हो ।" गोनू झा ने थोड़ी तेज आवाज में कहा।


गोनू झा ने कहना शुरू किया-”मैं अपने बेटे का, पहले बेटे का नाम मदन रखूँगा।"


" पहले बेटे का नाम मदन ?" पंडिताइन ने उनकी बात दुहराई और लजाते हुए बोली -" इसका मतलब ... कि दूसरा बेटा भी होगा ?"


" दूसरा क्या, तीसरा भी होगा ।" गोनू झा बोले।


"अच्छा, ठीक...लेकिन बच्चों की संख्या बढ़ाने से पहले दूसरे और तीसरे बेटे का नाम भी तो बताओ।"


" हूँ... बताता हूँ भाग्यवान ... दूसरे बेटे को मैं लखन बुलाऊँगा... और तीसरे को ? तीसरे को सुमन।"


अचानक गोनू झा पालथी लगाकर पलंग पर बैठ गए और बोले-“पंडिताइन, कल्पना करो कि एक दिन तीनों बच्चे घर से बाहर खेलने चले जाएँ और इस बीच ही घर में चोर आ जाए तब तुम क्या करोगी?"


पंडिताइन गोनू झा के व्यवहार में आए इस परिवर्तन से खिन्न हो गई। क्षुब्ध होकर बोली-“यह क्या बात हुई ? ऐसी घड़ी में यह भी कोई कल्पना करने की बात है ?"


गोनू झा बोले” तुम न करो तो न करो । मैं तो करूँगा।" उन्होंने आँखें बंद की और पुकारने लगे" लखन ! मदन ! सुमन ! जल्दी आओ हो ...लखन, मदन, सुमन दौड़ो... जल्दी आओ... घर में चोर घुसल हो ..." पंडिताइन उन्हें चुप रहने को बोलती और गोनू झा पंडिताइन को चिढ़ाते हुए चीख पड़ते -” दौड़ो भाई ! जल्दी आओ!"


उनकी आवाज सुनकर उनके पड़ोसी मदन झा, सुमन झा, और लखन झा हाथों में लाठी लिए दौड़े आए और गोनू झा का दरवाजा ठकठकाने लगे। गोनू झा पलंग से उतरे और दरवाजा खोल दिया । घर में तीनों घुसे और पूछा -" कहाँ है चोर?"


गोनू झा ने पलंग के नीचे इशारा कर दिया । फिर तो चोर को वे लोग पलंग के नीचे ही छाँकने लगे और बेदम करके उसे पलंग से बाहर निकाला । चोर हवालात भेजा गया ।


इसके बाद फिर किसी चोर ने गोनू झा के घर की ओर आने की हिम्मत नहीं की ।


उपदेशी को सबक (कहानी)

 गोनू झा एक दिन मिथिला बाजार में चहल-कदमी कर रहे थे। वहाँ एक सेठ एक भारी बक्सा लिए बैठा था और बार-बार मजदूरों को बुलाता और उनसे कुछ बातें करता और मजदूर गर्दन हिलाते हुए या हाथ को इनकार की मुद्रा में हिलाते हुए वहाँ से चले जाते ।


काफी देर तक बाजार चौक पर यह नजारा देखने के बाद गोनू झा ने सोचा चलो, चल के देखें कि माजरा क्या है? वैसे वे इतना समझ चुके थे कि सेठ वह बक्सा उठवाकर कहीं ले जाना चाहता है मगर मजदूर कम मेहनताना के कारण इनकार करके वहाँ से चले जा रहे हैं।


गोनू झा सेठ के पास पहुँचे और सेठ से पूछा -" क्या बात है सेठ जी, आप बहुत देर से यहाँ परेशान हाल बैठे हैं ?”


सेठ ने कहा -" हाँ, भाई ! मुझे एक मजदूर चाहिए जो यह बक्सा उठा-कर यहाँ से तीन कोस की दूरी पर जो गाँव है, वहाँ पहुँचा दे।” ।


गोनू झा ने कहा-“मैं भी यहाँ काम की तलाश में आया हूँ- चलिए, मैं ही पहुँचा दूँ! बोलिए मजूरी क्या देंगे ?"


सेठ मुस्कुराया, बोला-“मेरे पास देने के लिए तीन अनमोल उपदेश हैं जो मैं हर एक कोस पर तुम्हें एक- एक कर दूंगा !"


गोनू झा ने कहा “यानी पैसा -रुपया कुछ नहीं ? खाना-खुराकी भी नहीं ? सिर्फ उपदेश?"


सेठ ने कहा-“तीन अनमोल उपदेश, जिससे तुम्हारा जीवन बदल जाएगा।"


गोनू झा ने मजदूर की तरह ही हाव- भाव बनाते हुए कहा-“सो तो ठीक है, मगर उपदेश हर आधा कोस पर दीजिए!"


सेठ ने कहा -" ठीक है मगर तीसरा और अन्तिम उपदेश सुनने के बाद तुम्हें तीन कोस चलकर मुझे उस गाँव तक पहुँचाने का वादा करना होगा !"


गोनू झा ने वादा कर लिया । गोनू झा मन ही मन सोच रहे थे कि उपदेश लेना बुरा नहीं है । हो सकता है कि कोई काम की बात सुनने को मिल जाए और यदि सेठ ने ठगने की कोशिश की तो उसे सबक सिखाकर ही लौटूंगा ...।


जब गोनू झा बक्सा उठाने के लिए झुके तो सेठ ने कहा-“अहा ! जरा सावधानी से ! इसमें बेहद नाजुक चीजें हैं !”


गोनू झा ने सावधानीपूर्वक सिर पर बक्सा उठा लिया । आधा कोस चले तो सेठ से कहा-“सेठ जी, पहला उपदेश दे दीजिए।"


“ऐसे आदमी पर भरोसा न करना जो कहे कि केवल अपना पेट भरने से अच्छा है भूखा रह जाना ।" सेठ ने उपदेश दिया ।


गोनू झा को सेठ की बात पसन्द आई ।


जब गोनू झा दूसरे आधे कोस में प्रवेश कर गए तब दूसरा उपदेश सुनने की बेचैनी होने लगी। उन्होंने सेठ से दूसरा उपदेश देने को कहा ।



सेठ ने दूसरा उपदेश सुनाया-“ऐसा आदमी विश्वसनीय नहीं जो कहे, घोड़े पर सवार होने से अच्छा है पैदल चलना!"


गोनू झा यह सुनकर शान्त रह गए। बात ठीक भी थी कि जब घोड़ा हो तो कोई पैदल क्यों चले ?


तीसरे अधकोसी में प्रवेश के बाद गोनू झा ने सेठ से कई बार कहा कि उपदेश सुनाए मगर सेठ टालता गया । जब गन्तव्य की दूरी महज दो फर्लांग बची तो गोनू झा रुक गए और बोले-“अब तीसरा और अन्तिम उपदेश दे दीजिए सेठ जी वरना अब एक कदम आगे नहीं बढ़ाऊँगा! यदि आप यह सोच रहे हैं कि उपेदश सुनने के बाद मैं यह बक्सा आपके स्थान तक नहीं पहुचाऊँगा तो यह बात मन से निकाल दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ और झूठा वादा नहीं करता हूँ।"


विवश होकर सेठ ने तीसरा उपदेश सुनाया “उस आदमी पर भरोसा न करना जो कहे कि संसार में तुमसे भी बड़ा कोई मूर्ख होगा !”


गोनू झा को बात समझ में आ गई कि सेठ उससे मुफ्त में बक्सा ढुलवा कर उन्हें संसार का सबसे बड़ा मूर्ख भी बता रहा है। मगर वे चुपचाप चलते रहे ।


जब सेठ का घर आ गया तब उसने गोनू झा से कहा-“बक्सा यहाँ रख दो !”


सेठ की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गोनू झा ने बक्सा सिर से ही धरती पर पटक दिया धड़ाम-चनन्-चनाक-छन ! की आवाज बक्सा गिरते ही पैदा हुई ।


सेठ चीखा “अरे मैंने तुम्हें सावधानी बरतने को कहा था !"


गोनू झा ने कहा-“सेठ जी ! भूलिए मत ! आपने मुझे सावधानी से बक्सा उठाने के लिए कहा था-रखने के लिए नहीं।"


सेठ वहीं सिर पकड़कर बैठ गया क्योंकि बक्से में काँच से बनी चीजें रखी थीं और गोनू झा अपने होंठों पर विजयी मुस्कान लिए वहाँ से लौट आए।

Saturday, April 6, 2024

घरानों का इतिहास और इनका क्या है मतलब? हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला शामिल है.

 जब हम संगीत की बात करते हैं तो 'घराना' का नाम सबसे पहले आता है. आज भारत में ग्वालियर घराना, पंजाब घराना जैसे संगीत से जुड़े कई अलग अलग घराने मशहूर हैं.


आमतौर पर अगर किसी भी गायक, वादक के नाम के साथ किसी समृद्ध घराने का नाम जुड़ा होता है तो संगीत की जगत में उसका सम्मान बढ़ जाता है. 


लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये घराना है क्या और इसका संगीत की दुनिया से क्या ताल्लुकात है. इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि यह घराना है क्या और अस्तित्व में कैसे आया...


क्या होता है घराना


घराने को आमतौर पर संगीत के स्कूल या कलाकारों के समूह को कहा जाता है. दरअसल संगीत ऐसी कला है जिसे कोई भी व्यक्ति एक दिन, एक महीने या एक साल में नहीं सीख सकता. यह वर्षों का संघर्ष मांगता है और जब गायक या वादक की उम्र बीतने लगती है, तो उनके साथ ही उनका संगीत भी अनुभवी और उम्रदराज होने लगता है.  


बाद में उनकी इसी विशिष्ट शैली को उनके शिष्य अपना लेते हैं और फिर वे उनके शिष्यों को भी उसी विशिष्ट शैली में शिक्षा देते हैं. धीरे-धीरे यह एक चेन बन जाता है और इसी को घराने की संज्ञा दी गई है. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला शामिल है.


इसे उदाहरण के तौर पर ऐसे समझे की हर एक्टर के एक्टिंग का एक अपना स्टाइल होता है. ठीक वैसे ही हर संगीतकार का धुन बनाने का भी अपना अलग अंदाज होता है. अगर आप संगीत प्रेमी है तो कई बार आपको सुनकर ही समझ आ जाता होगा कि ये धुन किस संगीतकार की हो सकती है. क्योंकि हर संगीतकार का अपना अलग अंदाज होता है. 


ऐसे ही अलग अलग घराने भी अपना अंदाज समेटे होते हैं, भारत के अलग अलग संगीत घरानों ने अपना ही एक अलग गायन और वादन शैली का निर्माण किया है.



घराना स्थापित होने में लग जाती है कई पीढ़ियां 


महान संगीतकारों, गायक और वादकों पर लिखी गई एक पुस्तक वाह उस्ताद में लेखक प्रवीण कुमार ने घराने को लेकर कहा कि ऐसा नहीं है कि किसी भी घराने में कुछ एक सालों में ही परिपक्वता आ जाती है. बल्कि उन्हें स्थापित करने में कई पीढ़ियां लग जाती हैं. 


उन्होंने इसी किताब में लिखा कि घरानों में मर्यादा का खास ख्याल रखा जाता है और यहां अनुशासन का काफी महत्व भी होता है. अगर अनुशासन भंग हो तो जीवन भर के लिए किसी संगीत साधक को उस घराने से दूर होना पड़ सकता है. 


आज के विपरीत 18वीं शताब्दी से पहले लोग संगीत सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए नहीं सुनते थे, बल्कि इस कला का सम्मान सबसे ज्यादा किया जाता था , उस वक्त इन घरानों की काफी प्रतिष्ठा थी और एक घराना अपनी विशिष्ट गायकी को दूसरे घराने के प्रभाव से बचाकर रखते थे. 


पहले एक गायक गलती से भी किसी और के घराने की गायकी नहीं गाते थे. न ही वे अपने गुरु के अलावा किसी और घराने के गुरु से संगीत सीखने की कोशिश करते थे. घरानों में यह नियम भी हुआ करता था कि एक शिष्य केवल एक ही घराने के गुरु से शिक्षा ले सकते है.  


घराने का गंडा बंधन रस्म 


संगीत घराने में गुरु और शिष्यों से बीच गंडा बंधन रस्म हुआ करता था. इस रस्म के दौरान एक छोटा-सा संगीत सम्मेलन आयोजित किया जाता था और उस सम्मेलन में अन्य घराने के सारे संगीतज्ञ मौजूद होते थे. इस रस्म के दौरान गुरु अपने शिष्य की बांह पर एक ताबीज़ बांधा करते थे, जिसे गंडा बांधन कहा जाता था.  


इस ताबीज या धागे को बांधने के बदले शिष्य अपने गुरु को दक्षिणा भेंट करत थे. हालांकि गुरु ये रस्म तभी करते थे जब उन्हें लगता था कि उनका शिष्य उनकी कला को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उठा सकता है.


इस गंडा को बांधने का अर्थ होता है कि अब शिष्य एक ही गुरु से संगीत शिक्षा ग्रहण करें. इसके बाद अगर कोई शिष्य अपने गुरु को बदलने की कोशिश करता है तो उसे कोई भी अपना शिष्य नहीं बनाता था.



घराने का निर्माण 


किसी भी संगीत सिखाने वाले जगह को घराना तब ही माना जा सकता है, जब उसमें कम से कम तीन पीढ़ियों तक संगीत की धारा का प्रवाह हो.


इसके साथ ही संगीत के सभी घराने का एक अपना एक अलग कलात्मक अनुशासन होता है. अलग अलग घरानों में विशेष गायन-शैलियां, विशेष राग और उनकी विशेष बंदिशें अलग-अलग होती हैं. 


कुछ घरानों ने ख़्याल शैली को अपनाया तो कुछ घरानों ने ध्रुपद-धमार गायन शैली को अपनी विशेषता बना ली. कुछ घराने धमार तो कुछ ठुमरी शैली को अपनाते हैं. 


क्यों जरूरी है ये घराने 


वर्तमान में संगीत के घराने हमारे संगीत को सुरक्षित रखने का एक मात्र स्तम्भ हैं, इन घरानों की वजह से ही आज भी हम उस तरह की संगीत को सीख या समझ पा रहे हैं तो हमारे पूर्वजों ने शुरू की थी. 


देशी राज्य और रजवाड़े संगीत के पोषक और संरक्षक रहे हैं. इस विषय में कुछ राज्यों और रियासतों ने अधिक ख्याति पाई है, जैसे पटियाला, बड़ौदा, इंदौर, जयपुर, ग्वालियर, मैसूर, रामपुर, लखनऊ, बनारस आदि. 


प्रसिद्ध गायकी के कुछ प्रमुख शैलियां


हिंदुस्तानी संगीत में गायन की दस मुख्य शैलियाँ हैं. इन शैलियों के नाम हैं- ध्रुपद, धमार, होरी, ख्याल, टप्पा, चतुरंग, रस सागर, तराना, सरगम और ठुमरी. 


ध्रुपद


हिंदुस्तानी संगीत की ये शैली अब तक की सबसे पुरानी और भव्य शैली में से एक है. यह नाम ध्रुव और पद शब्दों से मिलकर बना है. कहा जाता है कि अकबर के शासनकाल में तानसेन ने अपनी इसी संगीत की शैली का प्रदर्शन किया था. इसके अलावा बैजू बावरा से लेकर ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर के दरबार तक ध्रुपद गाने वाले प्रवीण गायकों के साक्ष्य मिलते हैं. 


मध्यकाल में ध्रुपद शैली गायन की प्रमुख विधा बन गई थी लेकिन 18वीं शताब्दी तक आते आते ये हाशिये की स्थिति में पहुंच गई. ध्रुपद शैली के गानों में संस्कृत के अक्षरों का उपयोग किया जाता है और इसका उद्गम मंदिरों से हुआ है. 


डागरी घराना


संगीत की इस शैली में आलाप पर पर ज्यादा जोर दिया जाता है. इस घराने से प्रशिक्षित संगीतकार डागर वाणी में गायन करते हैं. डागर मुसलमान गायक होते हैं, लेकिन सामान्यतः हिंदू देवी-देवताओं के पाठों का गायन करते हैं.  


दरभंगा घराना


इस घराने में ध्रुपद खंडार वाणी और गौहर वाणी में गाना गाया जाता है. इस शैली के संगीतकार रागालाप पर बल देते है और साथ ही तात्कालिक आलाप पर गीतों की रचना करते हैं 


इस शैली का प्रतिनिधि मलिक परिवार है. इस घराने के मशहूर गायकों में राम चतुर मलिक, प्रेम कुमार मलिक और सियाराम तिवारी का नाम शामिल है.  


बेतिया घराना


यह घराना सिर्फ परिवार के भीतर प्रशिक्षित लोगों को ज्ञात कुछ अनोखी तकनीकों वाली ‘नौहर और खंडार वाणी' शैलियों का प्रदर्शन करता है. इस शैली का प्रतिनिधि मिश्र परिवार है. 



ख्याल शैली के घराने 


ग्वालियर घराना- यह सबसे पुराने और सबसे बड़े खयाल घरानों में शामिल है. यहां सीखने आए शिष्यों को काफी कठोर नियमों का पालन करता है क्योंकि यहां रागमाधुर्य और लय पर समान बल दिया जाता है. इस घराने के सबसे ज्यादा लोकप्रिय गायक नाथू खान और विष्णु पलुस्कर हैं. 


किराना घराना- इस घराने का नाम राजस्थान के 'किराना' गांव के नाम पर रखा गया है और इसके स्थापक नायक गोपाल थें. हालांकि 20वीं सदी की शुरुआत में इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय अब्दुल करीम खान और अब्दुल वाहिद खान को जाता है.


इस घराने में धीमी गति वाले राग की प्रशिक्षण दी जाती है. इस शैली के कुछ प्रसिद्ध गायकों में पंडित भीमसेन जोशी और गंगू बाई हंगल जैसे महान कलाकार शामिल हैं. 


आगरा घराना- इतिहासकारों की मानें तो इस घराने की स्थापना 19वीं सदी में खुदा बख्श ने की थी, लेकिन संगीतविदों का मानना है कि इसके संस्थापक हाजी सुजान खान थे. हालांकि इस घराने को फैयाज खान पुनर्जीवित करने का काम किया था, जिसके बाद इसका नाम रंगीला घराना पड़ गया. वर्तमान में इस शैली के प्रमुख गायकों में सी.आर. व्यास और विजय किचलु जैसे महान गायक आते है. 


पटियाला घराना- 19वीं सदी में बड़े फतेह अली खान और अली बख्श खान ने इस घराने की शुरुआत की थी. इस घराने को पंजाब में पटियाला के महाराजा का समर्थन भी मिला हुआ है. इस घराने में बृहत्तर लय के उपयोग पर बल का प्रशिक्षण दिया जाता है. 


इस घराने के सबसे प्रसिद्ध संगीतकार बड़े गुलाम अली खान साहब थे. उन्हें भारत के प्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायकों में से एक कहा जाता है. यह घराना तराना शैली के अद्वितीय तान, गमक और गायकी के लिये प्रसिद्ध है.




शाहरुख खान की 'बेटी' सलमान के शो में आएगी नजर? Sana Saeed: सना सईद को लेकर कहा जा रहा है कि एक्ट्रेस सलमान खान के शो 'बिग बॉस ओटीटी 3' में एंट्री ले सकती हैं

 Bigg Boss OTT 3: सना सईद कई सालों से इंडस्ट्री में एक्टिव हैं. सना 'बाबुल का आंगन छूटे ना', 'खतरों के खिलाड़ी', 'नच बलिये', 'लो हो गई पूजा इस घर की' जैसे टीवी शोज में काम किया है. इसी के साथ सना सईद ने 'कुछ कुछ होता है' फिल्म में शाहरूख खान की बेटी अंजलि का किरदार निभाया था.





शाहरुख खान की 'बेटी' सलमान के शो में आएगी नजर?


बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट पॉपुलर हुई सना सईद को लेकर कहा जा रहा है कि अब एक्ट्रेस सलमान खान के शो 'बिग बॉस ओटीटी 3' में एंट्री ले सकती हैं. बता दें कि बिग बॉस ओटीटी का पहला सीज़न, जहां दिव्या अग्रवाल ने जीता था, लेकिन एक्ट्रेस कई लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब नहीं हो पाई, वहीं दूसरे सीजन को यूट्यूबर एल्विश यादव ने शो जीता



मेकर्स अब तीसरे सीजन के साथ पूरी तरह तैयार हैं और ओटीटी शो में जाने वाले नामों में से एक 'कुछ कुछ होता है' फेम सना सईद हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, सना को 'बिग बॉस ओटीटी 3' को मेकर्स ने अप्रोच किया है. कहा जा रहा है कि अग चीजें ठीक रही तो सना इस शो में नजर आ सकती हैं.


'बिग बॉस ओटीटी 3' में मचेगा तहलका


सना को फिल्म 'कुछ कुछ होता है' में अंजलि के किरदार से फेम मिला, जहां उन्होंने शाहरुख खान और रानी मुखर्जी की ऑन-स्क्रीन बेटी की भूमिका निभाई थी. इसके अलावा उन्होंने खतरा खतरा खतरा, झलक दिखला जा 9, फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 7, नच बलिए 7 और कई रियलिटी शो में हिस्सा लिया है. फिल्मों की बात करें तो सना ने 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' फिल्म में एक छोटा सा किरदार निभाया था. हालांकि एक्ट्र्रेस ज्यादा पहचान 'कुछ कुछ होता है' में उनके अभिनय के लिए मिली थी.


Amit Shah Attacked Mallikarjun Kharge: जम्मू कश्मीर को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक बयान पर गृहमंत्री अमित शाह ने निशाना साधा है.

 Amit Shah Questions Mallikarjun Kharge: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के एक बयान पर निशाना साधा. दरअसल, खरगे ने राजस्थान में एक रैली में कहा था कि आर्टिकल 370 खत्म होने का राजस्थान से क्या वास्ता है? अमित शाह ने खरगे के इस बयान को इटालियन संस्कृति वाला बताया. उन्होंने कहा है कि यह सुनना शर्मनाक है कि कांग्रेस पूछ रही है कश्मीर से क्या वास्ता है.




उन्होंने एक्स पर मल्लिकार्जुन खरगे के वीडियो को शेयर करते हुए लिखा- 'यह सुनना शर्मनाक है कि कांग्रेस पार्टी पूछ रही है कि कश्मीर से क्या वास्ता है? मैं कांग्रेस पार्टी को याद दिलाना चाहूंगा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और प्रत्येक राज्य और नागरिक का जम्मू-कश्मीर पर अधिकार है, जैसे जम्मू-कश्मीर के लोगों का शेष भारत पर अधिकार है.


अमित शाह बोले -कश्मीर में राजस्थान के कई वीर सपूतों ने शहादत दी है




अमित शाह ने आगे कहा कि कांग्रेस को यह नहीं पता कि कश्मीर में शांति और सुरक्षा के लिए राजस्थान के कई वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी है, लेकिन यह सिर्फ कांग्रेस नेताओं की गलती नहीं है. भारत के विचार को न समझ पाने के लिए अधिकतर कांग्रेस पार्टी की इटालियन संस्कृति ही दोषी है. ऐसे बयानों से हर उस देशभक्त नागरिक को ठेस पहुंचती है जो देश की एकता और अखंडता की परवाह करता है. जनता कांग्रेस को जरूर जवाब देगी.'




कांग्रेस पर अपने हमले तेज करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आगे लिखा- 'और कांग्रेस की जानकारी के लिए, यह अनुच्छेद 371 नहीं, बल्कि अनुच्छेद 370 था, जिसे मोदी सरकार ने निरस्त कर दिया था. हालांकि, कांग्रेस से ऐसी भयानक गलतियां करने की अपेक्षा ही की जाती है. इसके (कांग्रेस) द्वारा की गई ऐसी भूलों ने दशकों से हमारे देश को परेशान किया है.'


राजस्थान में एक बयान में मल्लिकार्जुन खरगे ने कश्मीर से राजस्थान को जोड़े जाने के प्रसंग का जिक्र करते हुए कहा था कि कश्मीर से क्या वास्ता है? इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिस पर अब अमित शाह ने हमला बोला है.

महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...