पालेराम दहिया गांव से बाहर हुई रागिनी के स्टेज को एक बार फिर गांव के भीतर लेकर आए।
रागिनी से फूहड़ता को किया खत्म :
रागिनी में एक दौर ऐसा भी आ गया था कि स्टेज पर फूहड़ता हावी हो गई थी। हालात ऐसे हो गए थे कि गांवों के अंदर रागिनी के स्टेज लगने बंद हो गए थे पालेराम दहिया गांव से बाहर हुई रागिनी के स्टेज को एक बार फिर गांव के भीतर लेकर आए।
पालेराम दहिया ने अपनी रागिनी से हरियाणवी संस्कृति को जीवंत रखने में अहम भूमिका निभाई। उनकी रागिनी में सामाजिक ताना-बाना से लेकर लोगों के लिए एक नई सीख होती थी। उन्होंने अपनी दमदार रागिनी के बलबूते लोगों की सोच बदलने का काम किया।
गांव हलालपुर के रहने वाले पालेराम की रागिनी के प्रेमियों की संख्या बहुत अधिक है। फेसबुक पर पालेराम दहिया के हरियाणवी रागिनी फैन पेज पर फॉलोअर्स की संख्या भी पांच हजार से अधिक है। उनकी गाई रागिनी बुरा मान चाहे भला मान, तू मारती कदे वो मारता, सर में भड़क आंख में पानी को काफी पसंद किया जाता है।
पिता के गुजर जाने के बाद नहीं कर सके पढ़ाई :
पालेराम ने बचपन में ही पिता को खो दिया था। वर्ष 1967 में पिता के निधन के बाद उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। इस समय तक उन्होंने पांचवीं कक्षा ही पास की थी। गाने का शौक उन्हें स्टेज पर ले आया।
कुछ दिन रोडवेज विभाग में नौकरी की
पालेराम ने रागिनी गाने के दौरान हरियाणा रोडवेज विभाग में भी कुछ दिन तक नौकरी की, लेकिन रागिनी का शौक ही उनके लिए सबकुछ था। इसके चलते उन्होंने कुछ महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी। पालेराम की तीन बेटियां और दो बेटे हैं। उनका कहना था कि उन्हें गांव वालों ने भी सहयोग दिया।
इसलिए नाम के साथ जुड़ गया महाशय
पालेराम को महाशय पालेराम कहा जाने लगा था। इसके पीछे की वजह वह बताते थे कि उन्होंने कभी फूहड़ता को स्टेज पर नहीं परोसा । उन्हें खुद व कला पर विश्वास था। यही कारण था कि उन्हें जनता ने खूब प्यार दिया। उत्तर प्रदेश में एक प्रतियोगिता के आयोजन के दौरान अन्य गायकों के मौजूद होने के बावजूद भीड़ ने उन्हें व मास्टर सतबीर को पूरी रात गिनी गाने के लिए बोल दिया था। उन्हें खुद पर ही चुटकुले सुनाने के लिए जाना जाता था। इस पर वह कहते थे कि जब लोगों का मनोरंजन ही करना है तो दूसरे पर छींटाकशी क्यों, अपने ऊपर ही कोई बात कह लेता । ऐसे स्वभाव के चलते ही उन्हें महाशय पालेराम कहा जाने लगा था।

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