Monday, May 22, 2023

Review:;फिल्म सिर्फ एक बंदा काफी है मनोज जी की बेस्ट एक्टिंग

 


फिल्म सिर्फ एक बंदा काफी है' को बनाना साहस का काम है। निर्माता | विनोद भानुशाली लगातार ऐसी कहानियां चुन रहे हैं, जिनकी तरफ मुंबई के आम फिल्म निर्माताओं को ध्यान कम ही जाता है। इस बार उन्होंने कहानी चुनी है उन पूनमचंद सोलंकी के साहस की जिन्होंने देश के सबसे चर्चित मामलों में से एक में एक नाबालिग की तरफ से पैरवी की और लाखों अनुयायियों वाले एक बाबा को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया। 

कहानी ये है कि अंधभक्त माता पिता अपनी बच्ची की तबीयत खराब होने पर उसे अपने 'श्रद्धेय' बाबा के पास लेकर जाते हैं। बाबा उस बच्ची का मान मर्दन करता है। माता पिता अपनी बच्ची को न्याय दिलाने के लिए कानून का सहारा लेते हैं। सरकारी वकील इस मामले का करोड़ों में सौदा करने की फेर में होता है तो कुछ कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी उसकी मदद को आगे आते हैं और सुझाते हैं एक ऐसे वकील का नाम, जिसकी ईमानदारी पर पुलिस को भी भरोसा है। फिल्म में अधिकतर इस वकील को सोलंकी कहकर ही संबोधित किया गया है, लेकिन एक दृश्य में उनका पूरा नाम आता है, पूनम चंद। पूनम चंद सोलंकी ने जिस बाबा के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत ये केस लड़ा, उसे जीवित रहने तक आजीवन कारावास की सजा हुई और ये पूरा मामला कानून के छात्रों के लिए एक ऐसा दृष्टांत साबित हुआ, जिसकी मिसाल आने वाले वर्षों में बार बार दी जाती रहेंगी।

सोलंकी का ये किरदार परदे पर मनोज बाजपेयी ने निभाया है। अपने तमाम किरदारों का चोला अपनी अदाकारी की रूह से जीवंत कर देने वाले मनोज बाजपेयी फिल्म 'सिर्फ एक बंदा काफी है' की भी रूहहैं। जोधपुर की स्थानीय बोली में अपनी भाषा को साधते हुए मनोज बाजपेयी यहां एक बुजुर्ग मां के बेटे और एक बेटे के पिता के रूप में हैं। 

फीस का जिक्र आने पर सोलंकी बस मांगते हैं, 'गुड़िया की स्माइल'। फिल्म में इस मामले के दिग्गज वकीलों के असल नाम तो नहीं लिए गए हैं, लेकिन राम जेठमलानी, सुब्रमणियन स्वामी और सलमान खुर्शीद से प्रेरित किरदारों के सामने सामने पूनम चंद सोलंकी की जिरह को मनोज बाजपेयी ने जिस तरह जिया है, वह अदाकारी की पाठ्यपुस्तक के अध्याय.. बनते दिखते हैं।



मेरे हिसाब से आप को मूवी देखनी चाहिए जो की हमे समाज मे फेली गंदी मानसिकता के बारे में बताती हैं और पैसे के दम पर लोग क्या करते हैं ये भी दिखती है

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