Monday, June 26, 2023

भैया दूज पौराणिक कथा (Bhaiya Dooj Pauranik Katha)::भैया दूज पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। भैया दूज की पौराणिक कथा इस प्रकार से है...

 भैया दूज पौराणिक कथा:

भैया दूज के संबंध में पौराणिक कथा इस प्रकार से है। सूर्य की पत्नी संज्ञा से 2 संतानें थीं, पुत्र यमराज तथा पुत्री यमुना। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण अपनी छायामूर्ति का निर्माण कर उन्हें ही अपने पुत्र-पुत्री को सौंपकर वहाँ से चली गई। छाया को यम और यमुना से अत्यधिक लगाव तो नहीं था, किंतु यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती थीं।


यमुना अपने भाई यमराज के यहाँ प्राय: जाती और उनके सुख-दुःख की बातें पूछा करती। तथा यमुना, यमराज को अपने घर पर आने के लिए भी आमंत्रित करतीं, किंतु व्यस्तता तथा अत्यधिक दायित्व के कारण वे उसके घर न जा पाते थे।


एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज अपनी बहन यमुना के घर अचानक जा पहुँचे। बहन के घर जाते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। बहन यमुना ने अपने सहोदर भाई का बड़ा आदर-सत्कार किया। विविध व्यंजन बनाकर उन्हें भोजन कराया तथा भाल पर तिलक लगाया। जब वे वहाँ से चलने लगे, तब उन्होंने यमुना से कोई भी मनोवांछित वर मांगने का अनुरोध किया।


यमुना ने उनके आग्रह को देखकर कहा: भैया! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दीजिए कि आज के दिन प्रतिवर्ष आप मेरे यहाँ आया करेंगे और मेरा आतिथ्य स्वीकार किया करेंगे। इसी प्रकार जो भाई अपनी बहन के घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाये, उसे आपका भय न रहे। इसी के साथ उन्होंने यह भी वरदान दिया कि यदि इस दिन भाई-बहन यमुना नदी में डुबकी लगाएंगे तो वे यमराज के प्रकोप से बचे रहेंगे।


यमुना की प्रार्थना को यमराज ने स्वीकार कर लिया। तभी से बहन-भाई का यह त्यौहार मनाया जाने लगा। भैया दूज त्यौहार का मुख्य उद्देश्य, भाई-बहन के मध्य सद्भावना, तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना है। भैया दूज के दिन ही पांच दीनो तक चलने वाले दीपावली उत्सव का समापन भी हो जाता है।


इस दिन अगर अपनी बहन न हो तो ममेरी, फुफेरी या मौसेरी बहनों को उपहार देकर ईश्वर का आर्शीवाद प्राप्त कर सकते हैं। जो पुरुष यम द्वितीया को बहन के हाथ का खाना खाता है, उसे धर्म, धन, अर्थ, आयुष्य और विविध प्रकार के सुख मिलते हैं। साथ ही यम द्वितीय के दिन शाम को घर में बत्ती जलाने से पहले घर के बाहर चार बत्तियों से युक्त दीपक जलाकर दीप-दान करना भी फलदायी होता है।


भाई दूज एवं रक्षाबंधन के बीच समानता व अंतर:

भाई दूज एवं रक्षाबंधन दोनो ही भाई व बहन के बीच मनाया जाने वाले पर्व है। दोनों में पूजा करने के नियम भी लगभग समान ही हैं।


रक्षाबंधन में बहने अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बँधती हैं जबकि भाई दूज के दिन माथे पर तिलक लगातीं हैं। भाई दूज पर मुख्यतया भाइयों का अपनी विवाहित बहनों के घर जाकर तिलक लगवाते हैं। जबकि रक्षाबंधन के दिन बहने अपने भाई के घर आकर राखी/रक्षासूत्र बांधती हैं।


रक्षाबंधन - Raksha Bandhan

रक्षाबंधन हिंदू धर्म में भाई-बहन का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस त्यौहार के दिन बहनें अपने भाईयों के कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं, और अपने प्रिय भाई की लंबी उम्र की कामना करती हैं। तथा भाई अपनी बहन की सुरक्षा का वचन करते हैं। बहनें यह रक्षा सूत्र अपने भाई के दाहिने हाथ में बाँधती हैं, इस रक्षा सूत्र को प्रायः राखी कहा जाता है।

रक्षाबंधन के दिन पवित्र नदी में स्नान करें, यदि नदी में स्नान नहीं हो पाए तो घर में किसी पवित्र नदी गंगा, सरयू, नर्मदा, कावेरी, क्षिप्रा इत्यादि के जल से स्नान कर लें।

विभिन्न राज्यों में रक्षा बंधन उत्सव:
❀ पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इस दिन को झूलन पूर्णिमा भी कहा जाता है। भगवान श्री कृष्ण एवं राधारानी की भव्य तरीके से पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही साथ बहिने, अपने भाइयों को राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना करतीं हैं।

❀ महाराष्ट्र में कोली समुदाय के बीच, राखी पूर्णिमा का त्योहार नारली पूर्णिमा अथवा नारियल दिवस के रूप मे मनाया जाता है।

❀ उत्तर भारत के क्षेत्रों में विशेषकर ज्यादातर जम्मू एवं कश्मीर में जन्माष्टमी तथा रक्षा बंधन के आस-पास के अवसरों पर पतंग उड़ाना एक आम बात सी है।

संबंधित अन्य नाम राखी
सुरुआत तिथि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा
कारण भाई-बहन के घनिष्ट प्रेम संबंध का उत्सव।
उत्सव विधि राखी, भाई द्वारा बहन को उपहार भेंट।


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