बेगम हजरत महल की जीवनी Begum Hazrat Mahal Biography in Hindi
वास्तविक नाम: मुहम्मदी खानम
जन्म: 1820, फ़ैज़ाबाद, अवध, भारत
धर्म: इस्लाम (शिया)
पति: नवाब वाजिद अली शाह
बच्चे: एक बेटा (मिर्ज़ा बिर्जिस कादर)
कार्य: 1857 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह, लखनऊ में सत्ता पर कब्जा
मृत्यु: 7 अप्रैल 1879, काठमांडू, नेपाल।
ऐतिहासिक कहानी : अवध की बेगम (लेखक: ज़ाकिर अली `रजनीश´)
अंग्रेजों की हड़प नीति जारी थी। बड़े-बड़े राज्य उनकी ताकत और कूटनीति के आगे नतमस्तक हुए जा रहे थे। ऐसे में जब अंग्रेजी हुकूमत ने 06 फरवरी 1856 को यह आदेश जारी किया कि अवध राज्य को ब्रिटिश हुकूमत में मिलाया जा रहा है, तो पूरे राज्य में खलबली मच गयी।
नवाब वाजिद अली शाह का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। उनकी तबियत दिन प्रतिदिन गिरती जा रही थी। उनके अंदर इतनी कूवत नहीं बची थी कि वे अंग्रेज़ों का विरोध करते। लिहाज़ा उन्होंने समर्पण कर दिया। लेकिन उनकी बेगम हज़रत महल को यह बात नागवार गुज़री। बेगम ने अपने बेटे मिर्ज़ा बिर्जिस कादर की कसम खाई कि वह अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा देंगी।
जो औरत सात पर्दों के अंदर सैकड़ों बांदियों से घिरी रहती थी, उसने शर्म और हया का पर्दा उतार फेंका और जनता के बीच जा पहुंची। हज़रत महल ने सैनिकों को ललकारते हुए कहा, ``साथियों, अवध हमारा राज्य है। हम अंग्रेजों को यहां से उखाड़ फेकेंगे।´´
बेगम की बातों ने लोगों पर जादू की तरह असर किया। अवध की जनता उनके साथ होने लगी। नवाब के कारण जिस सेना का हौसला बुरी तरह से पस्त हो गया था, बेगम के नेतृत्व में वह हिमालय की तरह बुलंद हो गया। और इस तरह देखते ही देखते एक विद्रोही सेना तैयार हो गयी और अंग्रेजी राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी की जाने लगी।
हज़रत महल का साथ देने के लिए सैनिकों से लेकर किसान तक एकजुट हो गये। चारों ओर बेगम की जय-जयकार होने लगी। लेकिन अभी भी कुछ लोग ऐसे थे, जो बेगम के औरत होने के कारण उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर रहे थे। उन्हीं में से एक थे अम्मान और इम्मान। ये वे ही लोग थे, जिन्होंने गांव की एक अनाम लड़की को नवाब साहब के महल की बेगम हज़रत महल बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।
यह उस समय की बात है जब अवध में अकाल पड़ा था। उन दिनों अम्मान और इम्मान फैज़ाबाद में थे। एक दिन वे एक घर के सामने से गुजर रहे थे। तभी घर के बाहर बैठी हुयी एक खूबसूरत लड़की को देखकर उनके कदम ठिठक गये। वह लड़की बर्तन मांज रही थी। पास में ही उसके बूढ़े मां-बाप भी बैठे हुए थे।
उस लड़की को देखकर अम्मान और इम्मान की आंखें चमक उठीं। इम्मान बोला, ``क्या कहते हो अम्मान भाई, यह लड़की तो नवाब साहब के हरम में होनी चाहिए। यह यहां पर इस धूल-मिट्टी के बीच क्या कर रही है?´´
``हां इम्मान भाई, तुम ठीक कहते हो।´´ अम्मान ने भी उसका समर्थन किया, ``हम इस धूल के फूल को अवध के सिंहासन की शोभा बनाएंगे।´´
``ज़रूर, बस इसे थोड़ा तहज़ीब और सलीका सिखाना होगा।´´ इम्मान ने मशवरा दिया।
अम्मान भी कहां चुप रहने वाला था। वह मुस्करा कर बोला, ``यह तो हमारे बाएं हाथ का काम है।´´
दोनों लोग मन ही मन हंसते हुए उस लड़की के मां-बाप के पास पहुंचे। उन्होंने लड़की के मां-बाप को ढ़ेर सारा धन दिया और उसे खरीद कर ले आए। उन लोगों ने उस लड़की को थोड़े दिन अपने पास रखा। उसे पढ़ाया-लिखाया और महलों के तौर तरीके सिखाए। उसके बाद उन्होंने उसे नवाब साहब की खिदमत में पेश कर दिया।
अपनी खूबसूरती और सलाहियत के बल पर उस लड़की ने नवाब साहब का दिल जीत लिया। नवाब वाजिद अली शाह ने अम्मान और इम्मान को ढ़ेर सारे इनाम-ओ-इकराम से नवाज़ा और उस लड़की को अपनी बीवी बना लिया और उसका नाम `महक परी´ रख दिया।
महक परी की हर अदा निराली थी। देखते ही देखते नवाब साहब महक परी के मुरीद हो गये। उन्होंने उसे `इफ्तखार-उल-निसा´ अर्थात स्त्री का गर्व के खिताब से सम्मानित किया।
कुछ दिनों के बाद महक परी ने एक चांद से पुत्र को जन्म दिया। अपने बेटे को देखकर नवाब साहब खुशी से फूले नहीं समाए। और इस मौके पर उन्होंने बेगम को सबसे बड़ा खिताब `हज़रत महल´ अता किया।
वही हज़रत महल आज विद्रोही सेना का नेतृत्व कर रही थीं। अम्मान और इम्मान की तरह सैकड़ों लोगों की नजरों में हज़रत महल आज भी गांव की एक अनाम लड़की ही थी। उन्हें आशा थी कि जनता की भावना को देखते हुए अंग्रेज सरकार नवाब साहब को ज्यादा दिनों तक कैद में नहीं रख पाएगी। लेकिन जल्दी ही उनका भरम टूट गया। नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने देश निकाला दे दिया। उन्हें कलकत्ता में कैद कर दिया गया। यह देखकर हज़रत महल के विरोधियों के हौसले पस्त हो गये। अब उनके सामने हज़रत महल के समर्थन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था।
विद्रोही फौज ने पूरी तैयारी के साथ अंग्रेजों पर आक्रमण किया। अंग्रेज सेना इसके लिए पहले से ही तैयार थी। उसने चिनहट गांव के पास विद्रोहियों को रोक लिया। दोनों सेनाओं में घमासान लड़ाई हुयी। अंग्रेज सेना का कमाण्डर सर हेनरी लॉरेन्स था। उसने बड़ी बहादुरी के साथ विद्रोही सेना का मुकाबला किया। लेकिन अवध के शूरवीरों के आगे उसकी एक न चली। अपनी हार होते देखकर लॉरेन्स पीछे हट गया। उसने लखनऊ को खाली कर दिया। इस प्रकार अवध की राजधानी लखनऊ पर विद्रोही सेना का कब्जा हो गया।
लखनऊ फतह के बाद सर्वसम्मति से बेगम हज़रत महल को अवध का खेवनहार चुन लिया गया। लेकिन बेगम ने यह पदवी लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने दस वर्षीय पुत्र मिर्ज़ा बिर्जिस कादर को अवध का नवाब नियुक्त किया और स्वयं को उसका सरपरस्त घोषित किया।
कुछ ही समय में हज़रत महल ने अपने कुशल प्रबंधन के बल पर अवध के लोगों का दिल जीत लिया। उन्होंने घूम-घूम कर पूरे राज्य का दौरा किया। लोगों से खुलकर बात की और उनकी समस्याएं जानीं। उन्होंने जनता की परेशानियों को न सिर्फ सुना, बल्कि उन्हें दूर करने के लिए समुचित कदम भी उठाए।
हज़रत महल की कार्यकुशलता देखकर अवध की जनता उनकी मुरीद हो गयी। इससे पहले कोई भी शासक जनता के बीच इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था। हज़रत महल की लोकप्रियता का यह आलम था कि वहां की जनता वही सोचती थी, जो हज़रत महल सोचती थीं, और वह वही करती थी, जो हज़रत महल कहती थीं।
अवध की रियासत अपने हाथ से गंवाने के बाद अंग्रेज चैन से नहीं बैठे। उन्होंने अपनी शक्ति संगठित की और पुन: फरवरी 1858 में हमला कर दिया। बेगम हज़रत महल ने अंग्रेज सेना का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने हाथी पर बैठकर अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। लेकिन उनकी सेना अंग्रेजों के मुकाबले बहुत छोटी थी। अंग्रेजों की तोपों के आगे अवध की सेना के पैर उखड़ गये।
अपनी सेना की हार होते देखकर हज़रत महल ने चालाकी से काम लिया। वे कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ वहां से भाग निकलीं और बहराइच जिले में स्थित बूंदी के किले में शरण ली। वहां पर वे अपनी सेना को पुन: संगठित करने लगीं।
अंग्रेज़ कमाण्डर को हज़रत महल की लोकप्रियता का हाल मालूम था। उसने सोचा कि जब तक बेगम पकड़ी नहीं जातीं, उसे चैन नहीं मिलेगा। रह-रह कर यहां से विद्रोह से स्वर फूटते रहेंगे। इससे अच्छा है कि उन्हें लालच देकर अपने साथ मिला लिया जाए। यह सोच कर अंग्रेज़ कमाण्डर ने हज़रत महल के पास संधि का प्रस्ताव भेजा। उसमें लिखा हुआ था कि अंग्रेज सरकार आपके सारे गुनाह माफ करती है। वह आपके गुज़ारे के लिए पेंशन देगी और आपके बेटे की पढ़ाई-लिखाई का पूरा बन्दोबस्त करेगी।
लेकिन उस खुद्दार औरत ने अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया। उन्होंने संधि के जवाब में कहलाया- मैं हंसते-हंसते कुर्बान हो जाऊंगी, लेकिन अंग्रेज़ों की भीख नहीं लूंगी।
यह सुनकर अंग्रेज़ कमाण्डर तिलमिला उठा। उसने भारी लाव-लश्कर के साथ बूंदी के किले पर धावा बोल दिया। हज़रत महल की सेना ने पूरे दम-खम के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया। लेकिन उनकी फौज के कुछ विश्वस्त लोगों ने गद्दारी कर दी। जागीर के लालच में वे अंग्रेजों से जा मिले। हज़रत महल की सेना अंग्रेजों के मुकाबले वैसे ही छोटी थी। गद्दारों के कारण उनकी सेना की हालत पतली हो गयी। उनके सैनिकों ने बहुत बहादुरी से लड़ा। लेकिन धीरे-धीरे उनके पैर उखड़ने लगे।
हज़रत महल के सेनापति को हकीकत समझते देर नहीं लगी। वह बोला, ``बेगम साहिबा, अंग्रेज सेना बहुत बड़ी है। हमारी सेना अब ज्यादा देर तक उन्हें नहीं रोक सकती। हमारी हार निश्चित है। आप कुछ विश्वस्त सैनिकों को साथ लेकर यहां से तुरन्त निकल जाएं।´´
``नहीं।´´ हज़रत महल जोर से चिल्लाईं, ``मैं अपनी सेना को अकेला छोड़ कर नहीं जा सकती। मैं मरते दम तक अंग्रेजों से लड़ती रहूंगी।´´
``मान जाइए बेगम साहिबा। आपको कादर साहब का वास्ता।´´ सेनापति ने हाथ जोड़े, ``आज़ादी की इस जंग को जारी रखने के लिए आप दोनों का सलामत रहना बहुत जरूरी है। फिलहाल इस समय हवा का रूख़ हमारे खिलाफ है। और समझदार सियासतदां वही है, जो हवा के रूख के मुताबिक अपनी चालों को बदल ले।´´
``लेकिन......´´ हज़रत महल ने कुछ कहना चाहा।
सेनापति ने उनकी बात बीच में ही काट दी, ``लेकिन-वेकिन कुछ नहीं बेगम साहिबा। आप कादर साहब को लेकर फौरन यहां से चली जाएं और नेपाल नरेश के यहां शरण लें। वे आपकी भरपूर मदद करेंगे।´´
इसके बाद हज़रत महल अपने सेनापति का विरोध न कर सकीं। वे अपने बेटे को लेकर नेपाल नरेश के पास चली गयीं। पर वे अपने साथियों की गद्दारी के कारण बेहद निराश हो गयी थीं।
और जब उन्हें पता चला कि अंग्रेज़ सेना ने 1857 के विद्रोह के पूरी तरह से कुचल दिया है, तो उनका रहा सहा उत्साह भी जाता रहा। इसके बाद न तो नेपाल नरेश ने इस मामले में उनकी कोई मदद की और न ही वे दोबारा अपनी सेना संगठित कर पाईं।
बेगम हज़रत महल ने अपनी जिंदगी का बाकी सफर एक आम आदमी की तरह तय किया। बिलकुल शान्त और मामूली। उस सफर में उनका बेटा मिर्जा बिर्जिस कादर बराबर उनके साथ रहा। आखीर में एक दिन उस गैर मामूली औरत के जीवन का सफर खत्म हो गया। वह अल्लाह को प्यारी हो गयीं। पर अपने पीछे छोड़ गयीं वे तारीख़ के तमाम सुनहरे वर्क। उनकी बहादुरी और कार्यकुशलता के किस्से इतिहास की किताबों में ही नहीं बल्कि अवध के सीने में भी ज़िन्दा हैं। आज भी जब अवध के लोग उस महान हस्ती को याद करते हैं, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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