Monday, June 26, 2023

भगवान दत्तात्रेय जन्म | पतिव्रता सती माता अनसूइया की कथा (Pativrata Sati Mata Ansuiya Ki Katha)

 भगवान को अपने भक्तों का यश बढ़ाना होता है तो वे नाना प्रकार की लीलाएँ करते हैं। श्री लक्ष्मी जी, माता सती और देवी सरस्वती जी को अपने पतिव्रत का बड़ा अभिमान था।


तीनों देवियों के अभिमान को नष्ट करने तथा अपनी परम भक्तिनी पतिव्रता धर्मचारिणी अनसूया के मान बढ़ाने के लिये भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा की। फलत: वे श्री लक्ष्मी जी के पास पहुँचे, नारद जी को देखकर लक्ष्मी जी का मुख-कमल के समान खिल उठा।

लक्ष्मी जी ने कहा: आइये, नारद जी! आप तो बहुत दिनों बाद आये। कहिये, क्या हाल है?

नारद जी बोले: माता! क्या बताऊँ, कुछ बताते नहीं बनता। अब की बार मैं घूमता हुआ चित्रकूट की ओर चला गया। वहाँ मैं महर्षि अत्रि के आश्रम पर पहुँचा। माता! मैं तो महर्षि की पत्नी अनुसूया जी के दर्शन करके कृतार्थ हो गया। तीनों लोकों में उनके समान कोई भी पतिव्रता स्त्री नहीं है।


लक्ष्मी जी को नारद जी की बात पर आश्चर्य हुआ।

उन्होंने पूछा: नारद! क्या वह मुझसे भी बढ़कर पतिव्रता है?

नारद जी ने कहा: माता! आप ही नहीं, तीनों लोकों में कोई भी स्त्री सती अनुसूया की तुलना में किसी भी गिनती में नहीं है।


इसी प्रकार देवर्षि नारद ने माता पार्वती एवं माता सरस्वती के पास जाकर उनके मन में भी सती अनुसूया के प्रति यही भाव जगा दिया। अन्त में तीनों देवियों ने त्रिदेवों से हठ करके उन्हें सती अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिये आग्रह किया। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश महर्षि अत्रि के आश्रम पर पहुँचे। तीनों देव मुनि वेष में थे। उस समय महर्षि अत्रि अपने आश्रम मे नहीं थे। अतिथि के रूप में आये हुए त्रिदेवों का सती अनुसूया ने स्वागत-सत्कार करना चाहा, किन्तु त्रिदेवों ने उसे अस्वीकार कर दिया।


त्रिदेव बन गए शिशु

सती अनुसूया ने उनसे पूछा: मुनियो! मुझसे कौन-सा ऐसा अपराध हो गया, जो आप लोग मेरे द्वारा की हुई पूजा को ग्रहण नहीं कर रहे हैं?

मुनियों ने कहा: देवि! यदि आप बिना वस्त्र के हमारा आतिथ्य करें तो हम आपके यहाँ भिक्षा ग्रहण करेंगे।

यह सुनकर सती अनुसूया सोच में पड़ गयीं। उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो सारा रहस्य उनकी समझ में आ गया।

वे बोलीं: मैं आप लोगों का विवस्त्र होकर आतिथ्य करूँगी। यदि मैं सच्ची पतिव्रता हूँ और मैंने कभी भी काम-भाव से किसी पर-पुरुष का चिन्तन नहीं किया हो तो आप तीनों छ:-छ: माह के बच्चे बन जाएँ।


पतिव्रता माता अनसूइया का इतना कहना था कि त्रिदेव छ:-छ: माह के बच्चे बन गये। माता अनुसूया ने विवस्त्र होकर उन्हें अपना स्तनपान कराया और उन्हें पालने में खेलने के लिये डाल दिया। इस प्रकार त्रिदेव माता अनुसूया के वात्सल्य प्रेम के बन्दी बन गये।


उधर जब तीनों देवियों ने देखा कि हमारे पति तो आये ही नहीं तो वे चिन्तित हो गयीं। अंततः तीनों देवियाँ अपने पतियों का पता लगाने के लिये चित्रकूट गयीं। संयोग से वहीं नारद जी से उनकी भेंट हो गयी। त्रिदेवियों ने उनसे अपने पतियों के बारे मे पूछा। नारद जी ने कहा कि वे लोग तो आश्रम में बालक बनकर खेल रहे हैं।


दत्तात्रेय जन्म कथा

त्रिदेवियों ने अनुसूया जी से आश्रम में प्रवेश करने की आज्ञा माँगी। अनुसूया जी ने उनसे उनका परिचय पूछा?

त्रिदेवियों ने कहा: माता जी! हम तो आपकी बहुएँ हैं। आप हमें क्षमा करदें और हमारे पतियों को लौटा दें।

अनुसूया जी का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने बच्चों पर जल छिड़ककर उन्हें उनका पूर्व रूप प्रदान किया और अन्तत: उन त्रिदेवों की पूजा-स्तुति की।


त्रिदेवों ने प्रसन्न होकर अपने-अपने अंशों से अनुसूया के यहाँ पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। इस प्रकार त्रिदेवों के अंश के रूप मे दत्तात्रेय का जन्म हुआ।


श्री दत्त मंदिर, पुणे - Shri Datta Mandir

मुख्य आकर्षण - Key Highlights
◉ भक्ति भारत का प्रथम भगवान दत्तात्रेय को समर्पित मंदिर है।
◉ श्री दगडूशेठ हलवाई की पत्नी श्रीमती लक्ष्मीबाई द्वारा स्थापित।

महाराष्ट्र के पुणे शहर का श्री दत्त मंदिर भक्ति भारत का प्रथम भगवान दत्तात्रेय को समर्पित मंदिर है। श्री दत्त मंदिर प्रसिद्ध दगडूसेठ हलवाई गणपति मंदिर पुणे से कुछ ही मिनटों की दूरी पर स्थित है।

लगभग 100 साल पहले पुणे शहर के श्री दगडूशेठ हलवाई की पत्नी श्रीमती लक्ष्मीबाई ने इंदौर निवासी अपने गुरु श्री माधवनाथ जी के आदेश से एक दत्त मंदिर की स्थापना की, जो कि भगवान गुरुदत्त के बहुत बड़े भक्त थे।

सप्ताह के प्रत्येक गुरुवार को भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति तथा उनकी चरण पादुका को पालकी में रख कर, रात्रि 11:15 बजे भ्रमण कराया जाता है। जिसे भगवान दत्तात्रेय की पालकी यात्रा के नाम से जाना जाता है। मंदिर में प्रत्येक एकादशी को शाम 5:30 बजे से भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है।



No comments:

Post a Comment

महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...