काश! की शादी न की होती – एक विचार | shaadi ka laddooभारतिय संस्कृति में विवाह एक शुभ और पवित्र बंधन माना गया है। मंत्रों द्वारा अग्नि के सात फ़ेरे दिलवाये जाते हैं और वर-वधू को आशीर्वाद दिये जाते है और यह सात जन्मों का बंधन माना गया हैं।
हर शादी शुदा व्यक्ति के मन में कभी न कभी यह विचार आ ही जाता होगा कि काश! शादी न की होती, चाहे वह महिला हो या पुरुष। किसी ना किसी कारण वश यह विचार आना संभव है किसी भी इंसान के मन में, गृहस्थ जीवन को सबसे कठिन माना गया है मनुष्यो के लिए। सभी मनुष्य इसी में उलझे रहते है किसी न किसी रूप में।
अक्सर जब घर के मौहोल में जब तनाव उत्पन होता है और वह तनाव हद पार करने लगता है, झेलने की ताकत को कम करने लगता है तभी ये उत्तम विचार मन में दौड़ने लगता है कि काश! शादी न की होती, काश! घर वालो की बात नहीं सुनी होती तो आज ये दिन न देखना पड़ता। काश! शादी के लिए मना कर दिया होता, ऐसी तम्माम बातें मन में आने लगती हैं। ऐसी विचार आये भी ना क्यों, क्यों की आज भी जायदातर शादियाँ घर-रिश्तेदार वाले ही करवाते हैं चाहें मर्जी हो या ना हो, लड़का या लड़की एक दूसरे को पसंद हो या ना हो, चाहें उनके विचार एक दूसरे के साथ मिलते ही ना हो, चाहें घर वालों के विचार एक दूसरे से मिलते हो या ना मिलते हो।
अकसर आपने सास बहू की लड़ाई, झगड़ों के बारे में सुना होगा, सास बहू के चुटकुले सुने होंगे। जब तक ये किसी और के घर की बात होती है तब तक सब ठीक रहता है पर जैसे ही ये आपके घर में सुरु होता तो मानो जिंदगी नरक से बदतर लगने लगती है और फिर दिमाग काम करने बंद करने लगता है। आप लाख कोशिश करते हो की सब ठीक हो जाये घर में शांति रहे, सब लोग खुश रहे पर ऐसा हो नहीं पाता हैं इसके कई कारण होते हैं। कारण गलत हो या सही पर जब भी बात शादी को लेकर कहा सुनी सुरु होती है तब यही बात होती है काश! शादी न की होती, हमने शादी तो अपने मर्जी से तो की नहीं या love marriage तो की नहीं, लड़की और लड़की के परिवार से तो हमने तो बात की नहीं, शादी तो माँ बाप ने करवाई, लड़की भी उन्होंने ही देखी, पर वही जब इसके बारे में बोलना सुरु करते है तब दिमाग काम करने बंद करता है और फिर इससे छुटकारा पाने के बारे में सोचता है, सब कुछ छोड़ कर भागने का विचार आता है, divorce के बारे में सोचने लगते हैं।
माँ बाप के emotional atyachar, संस्कार के बाद रहीं सही कसर जब पति पत्नी पूरी कर दे तब तो जिंदगी में दुःख, पछतावा के आलावा कुछ बचता ही नहीं। तब यही जिंदगी नर्क से भी बदतर होने लगती हैं। सारी अच्छी बुरी बाते शादी के आड़े आने लगती है दिमाग मानो फट सा जायेगा, suicide तक विचार आने लगते हैं। लोग एक दूसरे से नफ़रत करना सुरु कर देते हैं। नफ़रत तो ऐसी हो जाती है की मजबूरी न हो तो एक दूसरे के साथ एक मिनट भी साथ ना रहे चाहे वो पति पत्नी हो या माँ बाप।
कहते है ना की शादी के पहले इंसान एक आज़ाद पंक्षी की तरह होता है ज्यादा तर वह अपना जीवन अपने हिसाब से जीता है न उसे किसी की जिम्मेदारी उठने और निभाने की जरूरत होती है न ही कोई ज़बाब देहि होती है किसी भी बात की।
रोज रोज वहीं ऑफिस, घर, माँ बाप, बीवी और बच्चे इन सब की जिम्मेदारी उठाते उठाते इंसान थक जाने लगता हैं और सुख शान्ति की कामना करने लगता हैं। तब वो धीरे धीरे अपने पुराने दिनों के यादों की तरफ मुड़ने लगता है उसे अपने पुराने सुनहरें दिन अपनी ओर खींचने लगते है धीरे धीरे उसे अपने पुराने दिनों में बिताये हुए दिन याद आने लगते हैं धीरे धीरे वह अपने स्कूल-कॉलेज और स्कूल-कॉलेज के दोस्तों को याद करने लगता हैं। बचपन जवानी के बिताये हुए दिन, दोस्तों के साथ की गयी मस्ती, वो आज़ादी के बिताये हुए पल एक एक कर सब अपनी ओर खिंचने लगते हैं।
अब बात शादी का लड़्डू खाकर पछताने वालों की करते हैं। जीवन में उतार चढ़ाव तो आते रहते है सुख दुःख लगा रहता हैं कभी कभी कुछ बड़ी परेशानियाँ आ जाती है या कुछ ऐसे हादसे भी जीवन में हो जाते है जिस से मनुष्य बहोत दुःखी और खुद को बहोत कमज़ोर मह्सूस करने लगता हैं।
भारतिय संस्कृति में विवाह एक शुभ और पवित्र बंधन माना गया है। मंत्रों द्वारा अग्नि के सात फ़ेरे दिलवाये जाते हैं और वर-वधू को आशीर्वाद दिये जाते है और यह सात जन्मों का बंधन माना गया हैं।
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