सोचने या विचार करने के कितने तरीके हो सकते हैं। अगर मैं आपसे कहूं आप जिस कुर्सी पर बैठकर या जिस बिस्तर पर लेट कर यह पोस्ट पढ़ रहे हैं वह दरअसल है ही नहीं, वह सिर्फ आपका वहम है। आपको जो कुछ भी दिख रहा है उसका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है। आपके दिमाग की पांच इंद्रियां आपको वह सब दिखा या महसूस करा रही हैं।
आयरलैंड के मशहूर दार्शनिक जार्ज बर्कले का दावा है कि इस दुनिया में कोई चीज भौतिक नहीं। यह जगत दरअसल है ही नहीं। ये सब एक विचार है। जैसे आपने पेन को आंखों से देखा और त्वचा से छुआ। पेन का कान्सेप्ट आपके दिमाग में पहले से है इसलिए आप उसे पेन कह रहे हैं। दूर अफ्रीका के जंगलों से आया कोई आदिवासी जिसने पहले कभी पेन नहीं देखा उसे वह उस वस्तु को पेन नहीं कहेगा।
यानी सबकुछ आपके अनुभव पर निर्भर है और अनुभव चेतना का हिस्सा है। यानी चेतना है तो जीवन है वरना दुनिया जैसी कोई चीज नहीं है। भौतिक वस्तुओं का अस्तित्व नहीं है। जो है वह सिर्फ चेतना है। यह दार्शनिक विचार दुनिया को सबसे पहले ईसा की तीसरी शताब्दी में भारत के विज्ञानवाद ने दिया। विज्ञानवाद बौद्ध दर्शन से जुड़ा था। यह बौद्ध महायान की शाखा थी जिसकी स्थापना मैत्रेयनाथ ने की थी।
योग तथा आचार पर विशेष बल देने के कारण इसे योगाचार भी कहा गया। यह द्वैतवाद, अद्वेतवाद, चार्वक, सांख्य, मीमांसा जैसे अन्य भारतीय दर्शन शाखाओं की तरह प्रसिद्ध नहीं हुआ लेकिन इस दर्शन ने जो कहा वह कई सदियों बाद यूरोप में अनुभववाद की आंधी के रूप में आया और हर तरफ छा गया।
विज्ञानवाद या योगाचार का दर्शन भी बर्कले या जान लॉक की तरह मानता था कि हमारा मन हमारे अनुभवों की रचना करता है। जो कुछ है वह मन है। इस मन से बाहर संवेदना का कोई और दूसरा स्रोत नहीं है। इस सम्प्रदाय का साफ मानना था कि मन या चित्त के विज्ञान के अतिरिक्त संसार के किसी भी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। वह सभी बाहरी भौतिक पदार्थ, जिन्हें हम देखते हैं वे विज्ञान मात्र हैं। भौतिक पदार्थ जो दिखाई पड़ते हैं, वे शून्य हैं।
अंदर अगर किसी चीज का ज्ञान न हो तो बाहर किसी वस्तु का बोध नहीं हो सकता। इस दर्शन की मान्यता थी कि दुख इसीलिए कभी खत्म नहीं होता क्योंकि हम सब बाहर की चीजों में यानी भौतिकतावाद में फंसे रहते हैं। हम यह नहीं जानते कि बाहर तो केवल शून्य का साम्राज्य है। इसीलिए बाहर की चीज मिल भी जाए तो दुख नहीं खत्म होता क्योंकि उसकी प्राप्ति से अन्ततः संतोष नहीं होता। कुछ और पाने की इच्छा बनी रहती है।
वह कुछ और बाहर तो है ही नहीं वह तो बस आपके दिमाग में है। विज्ञानवाद के तीन सदी बात इसी बात को आदि शंकराचार्य ने दूसरी तरह से कहा। इसीलिए शंकराचार्य को कई विचारक प्रच्छन्न बौद्ध भी कहते रहे हैं।
भौतिक चीजों और चेतन का द्वंद्व
दरअसल दर्शनशास्त्र में जड़ यानी भौतिक चीजों और चेतन या चिंतन का द्वंद्व सदियों से चला आ रहा है। दुनिया में इस द्वंद्व की शुरुआत सबसे पहले भारतीय ऋषियों ने द्वैतवाद और अद्वैतवाद के विचार के रूप में की। द्वैतवाद ने जड़ और चेतन दोनों को अंतिम सत्य कहा जबकि अद्वैतवाद ने कहा अंतिम सत्य सिर्फ एक है। जड़ और चेतन के रूप में उसमें भेद नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर आगे चलकर छठी सदी में आदि शंकराचार्य ने कहा जगत माया है।
मैं हमेशा सोचता रहा कि शायद शंकराचार्य कहना चाहते हैं कि हम सभी की बुद्धि पर माया का पर्दा पड़ा हुआ है और वे काफी हद तक सही भी थे। पश्चिम के दर्शनिकों ने इसी फलसफे को आगे बढ़ाया। इस स्कूल ने भौतिकवाद को किनारे कर चेतना की सत्ता को महत्ता दी। तब अनुभववाद का दर्शन आया।
17वीं सदी में पश्चिम में जॉन लॉक ने अनुभववादी दर्शन की नींव रखी थी। जान लॉक मानते थे कि मनुष्य का दिमाग जन्म के समय कोरा कागज होता है, जिस पर बाहरी चीजों का असर पड़ता है। इनमें विचार और भावनाएं शामिल हैं। लॉक के मनोविज्ञान में तीन बातें थीं। एक- दृष्टि, ध्वनि, स्वाद, स्पर्श और गंध मिलकर इंसान में एक तरह की चेतना यानी सोचने और समझने की शक्ति प्रदान करते हैं। दो- चेतना किस प्रकार भावना में बदल जाती है। तीसरी बात- भावनाएं किस तरह परस्पर सम्मिलित होती हैं।
दरअसल हम अपना सारा ज्ञान अनुभव से हासिल करते हैं। हमारा सोचना, समझना, चीजों को पहचानना, उन्हें कोई नाम देना यह सब हमारे अनुभव पर आधारित है। आपने देखा है जन्म के वक्त किसी बच्चे का मन कोरे कागज की तरह खाली होता है। क्योंकि उसका कोई दुनियावी अनुभव नहीं होता। मां के गर्भ के अनुभव को वह व्यक्त नहीं कर सकता क्योंकि तब तक उसकी ज्ञानेन्द्रियां विकसित नहीं होती।
अनुभव ही है मनुष्य के सम्पूर्ण ज्ञान का आधार
उम्र के साथ मन छोटे-छोटे अनुभवों के साथ उसका प्रत्यय यानी विचार धारण करता जाता है। जान लॉक का मानना था कि मनुष्य के सम्पूर्ण ज्ञान का अंतिम आधार उसकी जिन्दगी के तमाम अनुभव हैं। इसके भी तीन आधार हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान या स्मृति और कल्पना। प्रत्यक्ष यानी वह अनुभव जो हमें सामने से दिख या महसूस हो रहा है। जैसे एक गुलाब का फूल। उसे आंखों से प्रत्यक्ष रूप में देखकर, हाथों से छू कर और नाक से सूंघ कर हम कहते हैं ये गुलाब का फूल है। न कोई शक है और न कोई संदेह।
अब हम उसे सामने से न भी देखें तो भी हमारे दिमाग में उसकी एक तस्वीर हमेशा के लिए बन गई। हम किसी किताब में गुलाब के फूल की तस्वीर देखेंगे तो तुरंत कह देंगे कि ये गुलाब का फूल है। बात खत्म। कहीं आसपास गुलाब की खुशबू आएगी तो हम कहेंगे यहां आसपास कहीं गुलाब का फूल या इत्र है। अब ये हमारे अनुभव का हिस्सा हो गया। जॉन लॉक के इस अनुभववाद को बाद के दार्शनिकों ने विस्तार दिया जिसमें जार्ज बर्कले, जार्ज विल्हेम फ्रेड्रिक हेगेल जैसे पश्चिमी दार्शनिक शामिल थे।
ये दुनिया कहीं ईश्वर का स्वप्न तो नहीं?
इन्होंने बहुत चौंकाने वाली बातें कहीं जिन्हें आप पढ़ेंगे समझेंगे तो आप निश्चित हंसेंगे। वे तर्क देते हैं कि आपने सपना देखा। सपने में जो आप देख रहे हैं वह भौतिक है या चेतन है। सपने में आपने कुर्सी देखी, मेज देखा, अपना कोई दोस्त देखा। वह सब भौतिक कैसे हो सकता है? वह आपकी ही चेतना के हिस्से हैं। लेकिन आपके सपने में वे भौतिक लग रहे हैं। हेगेल ने कहा कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सब गोरखधंधा जिसे हम दुनिया कहते हैं वह ईश्वर के किसी लंबे सपने का हिस्सा हो। हम भगवान के सपने का विचार मात्र हों।
जर्मन दार्शनिक इनामुअल कांट ने कहा जगत में जो वस्तुएं हैं उसे हम जान ही नहीं सकते। जो जान रहे हैं वह फिनोमिना है। तो जिसे शंकराचार्य माया या मिथ्या कह रहे हों वह कोई अनसुलझा फिनामिना है बस। तर्क की कसौटी पर सोचें तो इन दार्शनिकों की बातों में दम है। लोग इन बातों पर हंसते आए हैं। इन दार्शनिकों का मजाक भी उड़ाते आए हैं।
बर्कले ने जब कहा कि 'समस्त ज्ञान संवेदन मात्र हैं और वस्तुओं की सत्ता बाहर न होकर मन के भीतर होती है' तो पश्चिम में इस वाक्य का खूब मजाक उड़ाया गया। "गुलिवर्स ट्रैवल्स' के मशहूर लेखक स्विफ्ट एक किस्सा सुनाते थे कि एक दफा बर्कले उनके घर आए तो उन्होंने दरवाजा नहीं खोला स्विफ्ट ने उनसे कहा-अगर तुम्हारा दार्शनिक चिंतन सही है तो बंद दरवाजे से भी उसी तरह अंदर आ सकते हो जैसे खुले दरवाजे से। क्योंकि दरवाजा तो तुम्हारे मन के भीतर है जिसे तुम्हारी आत्मा अनुभव कर रही है बाहर तो वो है ही नहीं. तो आ जाओ अंदर?"
डेविड ह्यूम ने जान लॉक के इसी अनुभववाद को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाया। उन्होंने साबित किया कि तर्क और अनुभव के आधार पर न हम ईश्वर को साबित कर सकते हैं और न आत्मा को। क्योंकि मानव की बुद्धि और उसके अनुभव बहुत सीमित हैं। डेविड ह्यूम के तर्क लाजवाब थे लेकिन उस पर फिर कभी।
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