मैतेई और कुकी के बीच की लड़ाई क्या है जिसमें जल रहा है मणिपुर

 मणिपुर में मार्च 2023 में बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा जनजाति का दर्जा मिलने से परेशान नागा-कुकी आदिवासियों के विरोध प्रदर्शन में बहुत से लोग मारे गए हैं। मणिपुर में कुकी जनजाति म्यांमार (बर्मा) से शरणार्थी बनकर आई थी और 1700 ई. से मणिपुर के चूडाचंद्रपुर इलाके में बसी हुई है। और भी नए लोग म्यांमार से शरणार्थी बनकर लगातार आ रहे हैं। कुकी और नागा जनजाति दोनों मिलकर मणिपुरी जनसंख्या का लगभग 40% (25% और 15%) है। दोनों ईसाई हैं और उनको जनजाति का दर्जा और आर्थिक आरक्षण की सुविधा प्राप्त है। मैतेई समुदाय जनसंख्या के 50% से थोड़े अधिक हैं और अधिकांश हिन्दू हैं। मैतेई जनसंख्या का 8% मुस्लिम है जिसे ‘मैतेई पंगल’ कहते हैं।


1993 में नागा-कुकी समुदाय के बीच भी झगड़े में भारी हिंसा हुई जिसमें नागाओं ने कुकी को मारा था। किन्तु मैतेई समाज का विरोध ये दोनों साथ मिलकर करते हैं क्योंकि जनजातियों का मानना है कि उनके पहाड़ों में रहने के कारण आर्थिक विकास उन तक पहुँच नहीं पाता और सारा लाभ समतल में रहने वाले मैतेई को मिलता है। मैतेई जनसंख्या के 50% से थोड़े ही अधिक हैं पर उनके लिए विधान सभा में 60% सीटें भी सुरक्षित हैं। इसलिए जब मणिपुर उच्च न्यायालय ने मैतेई जाति को अनुसूचित जनजाति में डालने का आदेश दिया तो इन समुदायों के बीच भयानक द्वंद्व छिड़ गया। दंगों को रोकने के लिए राज्य में सेना तैनात करनी पड़ी और देखते ही गोली मारने (शूट एट साइट) के आदेश जारी किए गए। किन्तु मई 2023 में बहुसंख्यक मैतेई द्वारा कुकी जनजाति की महिलाओं पर बर्बरता की वीभत्स और नृशंस घटना ने देश-दुनिया को हिलाकर रख दिया। मई 2023 में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित आदेश के लिए हाई कोर्ट को फटकार भी लगाई और जून 2023 में मणिपुर उच्च न्यायालय ने अपने आदेश का ‘रिव्यू’ करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और जुलाई में सुनवाई शुरू हुई है।


इस भयंकर समस्या का दूसरा पक्ष देखें तो कई लोगों का मानना है कि अंग्रेजों ने कुकी समाज को बर्मा से लाकर मणिपुर में बसाया। ईसाइयों ने जगह-जगह अपने स्कूल खोले और कुकी समाज को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना शुरू किया। उन्हें नागाओं के खिलाफ खड़ा किया क्योंकि ये नागा अंग्रेजों को मारते थे। धीरे-धीरे वहां के मूल लोगों की संस्कृति नष्ट होने लगी। मैतेई समाज का दुखड़ा यह भी है कि वे मूलतः आदिवासी थे किन्तु वर्षों पहले हिन्दू धर्म अपनाने के कारण उन्हें ‘सामान्य’ श्रेणी में रखा गया और वे जनजाति का आरक्षण पाने से चूक गए। मंडल कमीशन के बाद मैतेई को ‘ओबीसी‘ की श्रेणी में रखा गया। किन्तु वे अभी भी पहाड़ी भूमि नहीं खरीद सकते जबकि कुकी और नागा अपने जनजाति होने के कारण पहाड़ी और समतल- दोनों में भूमि खरीद सकते हैं। ये भी आरोप है कि कुकी और नागा जनजाति-आदिवासी आरक्षण का लाभ लेकर मणिपुर के 90% भूभाग पर कब्जा करके अमीर हो गए हैं और बहुसंख्यक मैतेई के पास केवल 10% भूभाग रह गया है। इससे आर्थिक असमानता उत्पन्न हो गई है। कई लोगों का यह भी आरोप है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी मैतेई समाज को उनका अधिकार देने के बजाय कुकी जनजातियों द्वारा म्यांमार आतंकवादियों की मदद से और चीन के आधुनिक हथियारों से मारा जा रहा है।


यदि विदेशी मूल के प्रवासियों की बात करें तो गोगोई जाति भी बर्मा से आकर असम में बसी है। कितने ही बांग्लादेशी शरणार्थी और घुसपैठिए दयालु देश भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में विशेष रूप से और देश की राजधानी के अन्दर भी उपस्थित हैं। बर्मा से ही आए हुए रोहिंग्या मुस्लिम भी देश में भर रहे हैं। हम इस विषय में क्या कार्रवाई कर रहे हैं? प्रशासन को देश में आने वाली प्रवासी आबादी के लिए नागरिकता और आरक्षण की एक स्पष्ट और कड़ी नीति बनानी होगी। पहले हम अपनी दयालुता दिखाकर किसी अज्ञात कुलगोत्र को शरण दे दें और फिर उसकी समृद्धि या शक्ति में वृद्धि देखकर उसे गालियाँ दें, यह दोनों ही बातें सही नहीं हैं। हिन्दू भी ईसाई देशों में प्रवासी बनकर जाते हैं, बसते हैं और कभी जातिगत टकराव होने पर उन्हें भी खतरा हो सकता है। फिर जब मॉरिशस और इंग्लैंड में भारतीय मूल का प्रधानमंत्री बनता है या यूएसए में भारतीय मूल की उपराष्ट्रपति बनती हैं, तब देश में प्रसन्नता की लहर और विजय की उमंग क्यों दौड़ जाती है? क्या विदेशी मूल के व्यक्तियों के बढ़ते कद और आर्थिक समृद्धि से सिर्फ हमें ‘प्रॉब्लम’ होती है, दूसरों को नहीं?


मणिपुर की समस्या का जो भी कारण हो, उसका शीघ्र निदान ढूंढना नीतिकारों का दायित्व है। अपने आर्थिक हित के सरंक्षण के लिए मनुष्यों के समूहों में और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में टकराव सदा से होते आए हैं। भारत में पहले भी जनजाति की आरक्षण सुविधा के लिए राजस्थान में मीणा और गुर्जर समूहों में टकराव हुआ है। पर मणिपुर का टकराव बिल्कुल अलग है। यहाँ मूल निवासी बनाम प्रवासी और हिन्दू बनाम ईसाई के भी मुद्दे दिखते हैं। भला आर्थिक आरक्षण का महिला की इज्जत उछालने से क्या सम्बन्ध? पुलिस ने भी पीड़ित का साथ नहीं दिया और बहुसंख्यक के हाथों छोड़ दिया। इसका कारण कुछ और ही लगता है। यहाँ पीड़ित कुकी जनजाति ईसाई धर्म मानती है और आक्रमणकर्ता मैतेई अधिकांश हिन्दू हैं। बर्बरता की वीभत्स और नृशंस घटना सर्वथा निंदनीय है और चाहे कोई भी तर्क, सुझाव या स्पष्टीकरण दें, इसे उचित नहीं बताया जा सकता। यह घोर अपराध जल्द से जल्द बहुत कड़ी सजा की मांग कर रहा है। इस नृशंस घटना ने भारत का ‘विश्वगुरु’ बनने का दावा ख़त्म कर दिया है। जिस ‘गुरुकुल’ में बच्चियों के साथ यह बर्ताव हो, वहां कैसा गुरु? हम सावधान रहें कि कृष्णा की प्रेमलीलाओं से ‘प्रेम गुरु’ का सम्मानप्राप्त देश महिलाओं पर बर्बरता के कारण कहीं ‘दुराचार गुरु’ का मेडल न जीत जाए। यदि ऐसे अपराध रोके न गए तो भारत फिर से महाभारत की और बढ़ेगा। इस ब्रह्मांड की कई शक्तियां हमारे देश पर पैनी निगाहें टिकाए हुई हैं जिन्हें अपने हथियारों के खेल के लिए एशिया महाद्वीप का ‘प्लेग्राउंड’ विशेष रूप से पसंद है।

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