ग्रीष्म ऋतु के पश्चात् गर्मी से राहत पाने के लिए मानसून का लम्बा इन्तजार करना पड़ता है. सावन का मनमोहक महीना भी अपनी हरियाली को समेटे मानसून लेकर आया. भीगा-भीगा सावन तन मन को शान्ति देता है. राहत देता है. लेकिन इसका विकट रूप चिन्तित भी कर देता है. खेत खलिहानों को भी सावन की आहट होते ही भय मिश्रित आशंका होती है कि सावन में बादल ज्यादा बरसकर उन्हें नष्ट ना कर दें. किसान भी दबी खुशी में यही आशा करते हैं बदरा झूम के बरसना पर इतना ना बरसना कि खेती ही चौपट हो जाए. बड़ा अच्छा लगता है भीगना पर बड़ा डर लगता है.
प्रकृति के प्रकोप से. इस बार तो आते ही बादलों ने जो बरसना शुरू किया तो रूकने का नाम ही नहीं लिया. सब कुछ तहस नहस कर दिया. तबाही ही तबाही जिसकी कल्पना भी नहीं की थी. ऐसा भयानक मंजर चारों तरफ पानी ही पानी घर. गलियां. गांव. कस्बे. शहर सब जलमग्न हो गये. बारिश का कहर मौत बनकर झपट पड़ा. हजारों लोग खतरे में पड़ गये. कितनों की जान चली गयी. पुल ढह गये. गाड़ियां बह गयीं. रास्तों के सम्पर्क टूट गये. लोगों की जानें बचाने के लिए गांव के गांव खाली कराए गये. जमीने गढडों में तब्दील हो गयीं. नदियां उफान पर आ गयीं. लगातार होने वाली बारिश ने कई राज्यों में भीषण विनाशलीला रच दी.
उत्तर भारत के राज्यों में और केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली में भी बारिश से भारी तबाही हुई है. दिल्ली में 41 वर्षों में सबसे ज्यादा पानी बरसा है. विभिन्न राज्यों में अनेकों परिवार अपनों की मौत से दुःख में डूब गये हैं. घूमने फिरने के शौकीन युवा. तीर्थस्थानों पर गये भक्त. घर से निकले लोगों के जीवन पर संकट बना हुआ है. कुछ जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कुछ पानी के भयावह रूप को देखकर आशंकित हैं. अपने घरों से सैकड़ों मील दूर उनकी वापसी कष्टकारी और आशंका से भरी हुई है. घर परिवारों में चिन्ता का माहौल है. कांवड़ यात्रा है. भक्तों की परीक्षा का समय है. यद्यपि कांवड़ियों के लिए गरमी का मौसम असहनीय होता है. लेकिन भक्ति की शक्ति में डूबे वे अपने गन्तव्यों तक पहुंच ही जाते हैं.
मूसलाधार बारिश से यात्रा का संकट वहन करते हुए वे मौसम की मार से बोझिल हो रहे हैं. बारिश ने कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ा है. लगातार बारिश से पहाड़ों पर भूस्खलन हो रहा है. बादल फटने से कई लोगों की मौत हो गयी है. रेलवे की ट्रेनें रद्द हो गयीं हैं. मार्ग बदल दिये गये हैं. उत्तराख्ण्ड की 175 सड़कें बारिश से प्रभावित होकर मलबे से पट गयी. ग्रामीण क्षेत्र ही नहीं शहरी क्षेत्रों में भी बारिश के प्रकोप का प्रभाव है. क्या कारण है कहीं तो विचार करने की आवश्यकता है. नित्य नवीन निर्माण कार्य से धरती की जल संचय की क्षमता कम हो गयी है. कंकरीट की प्रमुखता ने पर्यावरण को संकट में डाल दिया है. पृथ्वी की सतह का बढ़ता तापमान.
उन्नति के अवसरों के लिए हर समय सड़कों का निर्माण होना और इस सब के लिए असंख्य पेड़ों का काटा जाना. क्या ये सब हमारे जीवन को प्रभावित नहीं कर रहे हैं. आवागमन को आसान बनाने के लिए और जाम की स्थिति से बचने के लिए निरन्तर नये मार्ग बनाए जा रहे हैं. बड़े-बड़े शहरों में जीवन सुगम करने के लिए आधुनिकता का ध्यान रखा जा रहा है पर पानी की निकासी के लिए नालियों और नालों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. नाले गन्दगी से पटे रहते हैं, जिनमें पानी का बहाव रूक जाता है और जलभराव की स्थिति बन जाती है. सैकड़ों रुपये खर्च करके जो निर्माण कराया जाता है. बारिश की पहली झलक ही उसे बरबाद कर देती है. पहाड़ी क्षेत्रों को तीर्थाटन और भ्रमण हेतु उन्हें भव्य और आकर्षित बनाने के लिए नित्य विकास और निर्माण हो रहा है. जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है.
पहाड़ी इलाकों में बारिश की मार से उनका जीवन प्रभावित होता हैं. रोजी रोटी की समस्या. बीमारियों का बढ़ जाना और जीवन अस्त व्यस्त हो जाना आम है. बारिश का मौसम उनकी चिन्ताओं को बढ़ा देता है. इस बार तो बाढ़ की विकट स्थिति से हर जगह पानी का रौद्र रूप दिखाई दे रहा है. ये सरकार की व्यवस्थाओं का नतीजा है. नगरीकरण का प्रभाव है. या मनुष्य की लापरवाही है. जो प्रकृति के बार बार चेतावनी देने के पश्चात् भी कंकरीट का जंगल बनाता जा रहा है. धरती पानी कैसे सोखेगी. उसकी शक्ति को नष्ट करने पर तुले हुए हैं. जल संरक्षण हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए पर वर्षा का सारा पानी बर्बाद हो जाता है. सरकारें दोषी हैं या योजनाएं. जो बनती तो हैं पर वे समय आने पर फलीभूत नहीं होती.
जनसंख्या वृद्धि चिन्ता का विषय है. उसी जनता के समय और सुरक्षा के लिए फ्लाई ओवर और सड़कों का जाल बिछा दिया गया है. इसके लिए लाखों पेड़ों का कटान होता है. हर व्यक्ति एक पेड़ लगाएं ये शोर और सन्देश तो प्रसारित होता रहता है पर असंख्य पेड़ों को अपने स्वार्थ के लिए काट देना मानव जाति को समाप्त करने के बराबर ही है. पूरे वर्ष कहीं ना कहीं नालों की सफाई चलती रहती है. बांधों का निर्माण होता रहता है. पर बारिश आते ही सब चौपट हो जाता है. शहरों का सौन्दर्यीकरण चलता रहता है. बिजली पानी सफाई के नाम पर खर्च की गयी रकम की पोल मौसम की पहली बारिश ही खोल देती है. कुछ प्रदेश तो हर वर्ष मौसम की मार झेलने के आदि हो गये हैं.
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