Saturday, July 8, 2023

Viratnagar History In Hindi राजस्थान की राजधानी जयपुर से 90-95 किलोमीटर दूर अरावली पर्वत की सुंदर घाटियों के बीच बसा विराटनगर इतिहास के पन्नो में अपने पौराणिक इतिहास की घटनाओं को दर्ज किए हुए है। यही वो स्थान है जिससे महाभारत की विशिष्ठ कड़ी जिसमे पांडव पुत्र अपने अज्ञातवास का समय सबसे छिपकर बिताते है और एक वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण करते है। यहाँ महाभारत के इतिहास के साथ-साथ अन्य कई सभ्यताओं के साक्ष्य मिले है। विराटनगर पुरातात्विक सभ्यता और पौराणिक धरोहर है। जिसने इतिहास को आज भी समेट कर रखा है। विराटनगर को प्राचीन काल में मत्स्य देश भी कहा जाता था।

 विराटनगर, जयपुर । Viratnagar Jaipur

राजस्थान के जयपुर जिले में बसा विराटनगर पौराणिक इतिहास का केंद्र है। जहां का इतिहास आज भी विश्वनीय है। विराटनगर का नाम पुराकाल महाभारत युग के समय से भी जुड़ा है। यही वो स्थान था जहां महाभारत काल के समय पांचों पांडव पुत्रों युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव ने अपनी पत्नी पांचाली(द्रोपदी) के साथ एक साल का अज्ञातवास व्यतीत किया था।


आज का विराटनगर प्राचीन युग में मत्स्य देश की राजधानी हुआ करता था। वर्तमान में भी यह क्षेत्र यहां के ऐतिहासिक महत्व के कारण प्रसिद्ध है। यहां भीम डूंगरी, अशोक शिलालेख, बौद्ध स्तूप, बीजक की पहाड़िया, गणेश मंदिर आदि इसको आज भी चर्चित बनाए रखते है।


विराटनगर का इतिहास । Viratnagar History

प्राचीन काल में विराटनगर मत्स्य देश की राजधानी हुआ करती थी। वर्तमान में भी कुछ लोग राजस्थान के अलवर और दौसा क्षेत्र को मत्स्य देश का भाग मानते है। वैदिक काल में मत्स्य देश को 16 महाजनपदों में शामिल था। प्राचीन भारत में राज्य और प्रशासनिक इकाइयों को महाजनपद(Monarchy) कहते थे। महाजनपद पर राजा का अधिकार होता था इसके विपरीत गणराज्य माना जाता था, जहां लोगों का समूह राज्य को संचालित करता था और सर्वोच्च पद पर आम जनता में से एक व्यक्ति पद पर बैठता था। प्राचीन यूनान में गणराज्य का प्रचलन था।


विराटनगर का महाभारतकालीन इतिहास । Mahabharata period history of Viratnagar

ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल में विराट राज्य के महाराजा विराट हुआ करते थे लेकिन इसका कोई भी पुरातात्विक प्रमाण पूरा वैज्ञानिकों को आज तक नहीं प्राप्त हुआ है।


बताया जाता है कि महाभारत काल में महाराज पांडु के पुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव जिनको पांडव कहा जाता था, ने अपने अज्ञातवास के लिए मत्स्य देश को चुना था। यही पांडवों ने अपना भेष बदलकर 1 साल तक जीवन यापन किया था।


भारत की सभ्यता कि एक पौराणिक धरोहर है विराट नगर जो इतिहास में समाहित है। यहा कि अनमोल धरोहर को जानने के लिए दूर - दूर से लोग आते हैं।जो यहा कि प्रकृति की खुबसुरती को और इसके पौराणिक सभ्यता को देखकर मोहित हो जाते हैं।


विराटनगर का पुरातात्विक इतिहास । Archaeological History of Viratnagar

प्राचीन भारत वैदिक काल में मगध(पटना,बिहार) कौशल(अयोध्या,फैजाबाद) अवंती(उज्जैन,मध्यप्रदेश) महाजनपद हुआ करते थे। महाजनपदों का प्रचलन छठी ईसा पूर्व शताब्दी से लेकर तीसरी सदी ईसा पूर्व तक ही माना गया है।


इस सदी में लोहे का अधिक प्रयोग होने लगा था। लोहे के सिक्के बनाने के लिए टकसालों का निर्माण भी शुरू हो गया था। इसी समय बौद्ध और जैन विचार धाराओं का उद्गम हुआ था। जिसका प्रचार प्रसार करने हेतु कई महाजनपदों ने योगदान किया था। 


बीजक की पहाड़ी

विराटनगर में गणेश जी मंदिर से थोड़ी दूरी पर एक बीजक की पहाड़ी स्थित है जो लगभग 25000 साल पुरानी बौद्ध स्तूप के रूप में स्थित है। विराटनगर स्टैंड से लगभग 3 किलोमीटर दूरी पर एक पहाड़ी है उस पहाड़ी को बीजक की पहाड़ी कहते हैं। पहाड़ी से विराट नगर का पौराणिक प्राकृतिक सौंदर्य स्पष्ट रूप से नजर आता है। 


यहां भगवान हनुमान जी का मंदिर एक विशाल सिला पर उपस्थित है। यह बहुत बड़ी डायनासोर रूपी चट्टान के नीचे बना हुआ है। जो दिखने में बहुत आकर्षित लगती है। उसे देखने पर एक जीव की तरह दिखाई देती है जो बहुत ही विशाल और डरावनी शिला के रूप में है। यहां पर मौजूद हनुमान जी का छोटा सा मंदिर जिसका कोई भी पौराणिक तथ्य मौजूद नहीं है।



विराटनगर में बौद्ध इतिहास के साक्ष्य

बीजक पहाड़िया पर एक समतल धरातल है। जहां सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया एक भव्य स्तूप है। जो बहुत आकर्षक होने के साथ पौराणिक इतिहास को अपने अंदर समेटे हुए है। कुछ बौद्ध स्तूप के अवशेष उसमें सिमटे हैं। इस पहाड़ी पर बुद्ध का स्तूप है। वहां बौद्ध भिक्षुओं के स्थान की तरफ सीढ़ियां जाती है।


प्राचीन काल में विराटनगर को मगध साम्राज्य के अधीन जनपद बनाया था। उस समय मगध पर मौर्य वंश का आधिपत्य था। सम्राट अशोक के निधन के कुछ समय पश्चात ही मौर्य वंश का पतन शुरू हो गया था। सम्राट अशोक के उत्तर अधिकारी साम्राज्य को संभालने के योग्य नहीं था। सम्राट अशोक के प्रपौत्र को उनके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मार डाला और शुंग राजवंश की स्थापना की शुरुआत हुई। और मौर्य वंश का अंत। 


 स्तूप अब भारतीय पुरातत्व के अधीन है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने 1935 ईसवी में इसका उत्खनन किया गया। बौद्ध स्तूप की दुर्गति पुष्यमित्र शुंग के हाथों हुई। उसके बाद उन राजवंश सेंट्रल एशिया(एशिया माइनर) आई और पांचवी शताब्दी में इस बौद्ध स्तूप को जलाकर ध्वस्त कर दिया। गुप्त वंश को परास्त करके उन्होंने अपना आधिपत्य उत्तर और पश्चिम भारत पर अधिकार कर लिया।


(स्तूप :- मिट्टी या ईटों के टीले होते हैं जो गुंबद आकार होते है। पुराकल में जब महापुरुष मर जाते थे तो उनकी भस्म के जो अवशेष होते थे उन्हें भूमि में नीचे गाडकर स्मारक के रूप में बनाया जाता था)


मानने में आता है की मध्यप्रदेश में स्थित विश्व का सबसे प्रसिद्ध सांची स्तूप और बीजक की पहाड़ी का बौद्ध स्तूप एक दूसरे की तरह समकालीन है। सांची स्तूप और बीजक की पहाड़ी का निर्माण मौर्य काल के सम्राट अशोक ने ही करवाया था। 


हनुमान मंदिर से कुछ दूरी जाने पर दूसरा समतल मैदान मध्य में ईटों की सहायता से निर्मित किया गया है जो गोलाकार परिक्रमा की तरह एक आयताकार जगह पर बनी हुई है। इसके चारों तरफ भक्त परिक्रमा करते हैं। इसकी गोलाकार परिक्रमा की दूरी 8. 23 मीटर है जिसमें 26 अष्ठ कोणीय एकांतर में लकड़ी के स्तंभ जुड़े थे वर्तमान समय में यह नहीं है इनकी आकृति गोलाकार गुंबद थी।


यह एक आयताकार चार दिवारी है इस चैत्य के चारों ओर एक गोलाकार परिक्रमा को घेरा हुआ है यह अष्ट कोनिया परिक्रमा है वर्तमान समय में इस चार दिवारी का कोई अवशेष बचा नहीं है और इस गोलाकार गुंबद का भी कोई अवशेष नहीं बचा है इसलिए बुद्ध के स्तूप को बुद्ध के प्रतीक के रूप में पूजते थे इन स्तूपोर को चैत्य गृह कहते है। यहां जो समतल मैदान बना है वह बौद्ध भिक्षुओं का आयताकार विहार था।


यह कहना गलत नहीं होगा की मौर्य राजवंश की बौद्ध धर्म के प्रति सहिष्णुता उस समय के ब्राह्मण समाज को पसंद नहीं आ रही थी क्योंकि जो बहुत विचारधारा थी वह वैदिक समाज की रीतियों और नीतियों से बिल्कुल उल्टी थी जिसके चलते जो मौर्य राजवंश का विनाश हुआ और बौद्ध धर्म के स्मारक महज अवशेष बनकर रह गए थे।


इस जगह पर तीन समतल मैदान थे 30 या 40 फीट ऊंचाई पर तीसरा मैदान भी स्थित था जहां बौद्ध भिक्षुओं के रहने की व्यवस्था और सोने की व्यवस्था की गई थी। यह वर्गाकार कक्ष है जो आपस में जुड़े है। सभी कक्षों के पास जल के निकास के लिए नालिया निर्मित की गई थी। इन कक्षों को विहार कहा जाता था जिन्हें वर्तमान समय में छात्रावास या हॉस्टल कहा जाता है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत आता है यह चारों ओर से प्रकृति द्वारा घिरा हुआ है


गणेश जी का मंदिर

बीजक पहाड़ी से कुछ दूर आगे आने पर गणेश जी का मंदिर स्थित है। जहां दूर दूर से लोग दर्शन करने आते है। मान्यता है की यहां आने वाले हर इंसान की मनोकामना जरूर पूरी होती है। बुधवार के दिन गणेश मंदिर में दूर-दूर से लोग आते है। यहां पर पत्थर की बड़ी-बड़ी शिलाए है। गणेश मंदिर के ऊपर पहाड़ पर चढ़ने पर वहां से पूरे विराटनगर की प्रकृति का बहुत सुंदर नजारा दिखाई देता है। गणेश मंदिर मैं दो छोटे छोटे तालाब भी है जो बारिश के समय में पानी से भरे रहते है।


बारिश के मौसम में संपूर्ण प्राकृतिक सौंदर्य है जो और भी ज्यादा खूबसूरत दिखाई देने लगता है। यहां विराटनगर में उपस्थित अरावली पर्वत मालाओं के विराट शिखर दिखाई देते है। गणेश जी के मंदिर के बिल्कुल सामने देखने पर भीम डूंगरी दिखाई पड़ती है जो गणेश मंदिर से लगभग 4 किलोमीटर दूरी पर है। माना जाता है महाभारत समय में पांडव पुत्र महाबलशाली भीम जी ने एकशीला उठाकर यहां फेंकी थी।


भीम डूंगरी

गणेश जी मंदिर के ठीक सामने भीम जी की डूंगरी दिखाई देती है। गणेश मंदिर के सामने 4 किलोमीटर दूर 5 विशालकाय पत्थरों से निर्मित भीम डूंगरी देखने योग्य है। आपको जानकारी आश्चर्य होगा कि केवल 5 विशालकाय पत्थर एक दूसरे पर बिना किसी सहारे के प्राचीन काल से टिके हुए है और आज भी ज्यों के त्यों है। 


भीम डूंगरी पर माता का मंदिर है। गणेश की मंदिर में जलने वाले दीपक की लो और भीम डूंगरी वाले मंदिर में जलने वाली दीपक की एक दूसरे के सामने होती है। मतलब यदि आप पूजा के समय गणेश जी मंदिर से देखेगे तो भीम जी मंदिर में जलने वाले दीपक की लो आपको दिखाई देगी और यदि भीम जी मंदिर से देखते है तो गणेश जी मंदिर में जलने वाले दीपक की लो दिखाई देती है। ये दोनो मंदिर एक समान ऊंचाई पर बने हुए है।


पुरातत्व विभाग

गणेश मंदिर के बिल्कुल पास नीचे ही पुरातत्व विभाग है। यहां पर प्राचीन समय की बहुत सामग्री और मौर्य वंश के अवशेष उपस्थित है। यहां पर कई प्रकार के शैल चित्र दिखाई पड़ते हैं यह शैल चित्र प्राकृतिक रंगों और जीवों की चर्बी से मिलकर बनाए गए।


जानवर की खोपड़ी सी प्रतीत होती एक शिला जिसके नीचे एक छोटी सी गुफा बनी हुई है। इस पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में मिट्टी के बने पात्र सिक्के मूर्तियां बुद्ध की भस्म के अवशेष आदि सुरक्षित संग्रहालय में रखे गए हैं। पुरातात्विक संग्रहालय का संचालन पर्यटन कला एवं संस्कृति विभाग राजस्थान सरकार द्वारा किया जा रहा है। यह पुरातात्विक विभाग विराटनगर बस स्टैंड से दो किलोमीटर दूर है।


इस संग्रहालय में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित शिलालेख का एक चित्र उपस्थित है जो पाली और ब्रह्म लिपि में लिखा गया था। यहां उपस्थित शिलालेख सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म को स्वीकार लेने का साक्ष्य है इस शिलालेख पर पाली भाषा मैं लिखा गया है। विराटनगर के कुछ दूरी पर स्थित भाब्रू गांव में सम्राट अशोक के शिलालेख को ब्रिटिश काल के कैप्टन बर्ट ने 1837 में खोजा था कैप्टन ने इस शिलालेख को चट्टान से अलग करवाया। यह बीजक पहाड़ी से ही प्राप्त हुआ था जो समय गुजरने के बाद भाब्रू पहुंच गया। कैप्टन इसको कोलकाता लेकर गए और वहां अभिलेख बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के भवन में रखवा दिया।


गणेश जी मंदिर से भीम डूंगरी जाने पर

गणेश मंदिर से विराटनगर बस स्टैंड आने पर भीम डूंगरी करीब ढाई 3 किलोमीटर दूर स्थित है। आगे आने पर यहां तिराहा आता है जहां से दो रास्ते जाते है जिनमे एक भीम डूंगरी जाता है और दूसरा जो पावटा रोड को आगे बढ़ाता है। जिसपर करीब 1 किलोमीटर दूरी पर जैन मंदिर और मुगल दरवाजा आता है। 


यहां से आगे जाने पर भीम डूंगरी दिखाइए पढ़ती है वह कुछ ऊंचाई पर स्थित है भीम डूंगरी चढ़ने से थोड़ी दूरी पहले अशोक शिलालेख पड़ता है। जहां ब्रह्म लिपि में शीला के ऊपर कुछ लिखा गया है। भीमसेन जी के ऊपर चढ़ने पर एक लता आती है। माना जाता है यह लता भीम जी ने अपने पैर की एडी मार कर जमीन से पानी निकाला था। यह डूंगरी प्रकृति की गोद में समाहित है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत मन मोहित करने वाला है चारों तरफ से अरावली पर्वत शिखर ने घेरा हुआ है। 


एक शिला के नीचे एक गुफा निर्मित है जिसके अंदर भीमसेन जी का मंदिर स्थापित है वहां अखंड ज्योत प्रज्वलित रहती है। माना जाता है महाभारत काल से ही यह अखंड ज्योत अभी तक बुझी नहीं है। यहां से बाहर निकलने पर करीब हजार फुट ऊपर जाने पर भक्त हनुमान मंदिर स्थित है यहां जाने के दो रास्ते हैं एक रास्ता सीढ़ियों से होता हुआ जाता है और दूसरे रास्ते पर आधी दूरी तक सड़क निर्मित है और आधी दूरी सीढ़ियों से तय की जा सकती है। 


सीढ़ियों की मध्य में भगवान शिव जी का मंदिर स्थापित है। इस मंदिर मैं दर्शन के बाद सीढ़ियों पर जाने पर हनुमान मंदिर तक पहुंचा जाता है। यहां से प्रकृति का इतना सुंदर नजारा दिखाई देता है चारों ओर पर्वत शिखर और बीच में यह मत्स्य नगरी बहुत ही खूबसूरत दिखाई देती है। यह संपूर्ण डूंगरी सिलाओ से निर्मित है यहां प्रकृति की खूबसूरती को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह डूगरी पावटा रोड पर आगे जाने पर आती है। यहां से वापस आने पर करीब 1 किलोमीटर दूरी पर मुगल दरवाजा और जैन नसिया जिसे जैन मंदिर के नाम से जाना जाता है यहां पर स्थित है।


जैन मंदिर 

भीम डूंगरी से एक किलोमीटर दूर मुगल दरवाजे के पास जैन मंदिर स्थित है। जो मुगल बादशाह अकबर द्वारा बनवाए गए है नौमहल और चौमाहल में स्थित है। चौमहल में ही जैन धर्म के महावीर जैन की प्रतिमा स्थापित है। जहां दूर दूर से जैन धर्म के लोग आते है। विराटनगर का जैन मंदिर भी प्रसिद्ध है। यहां घूमने आने वाले लोग जैन मंदिर दर्शन के बाद ही वापस लौटते है।


मुगल दरवाजा

भीमसेन जी से पावटा रोड पर आगे आने पर मुगल दरवाजा आता है जो अकबर के समय निर्मित करवाया गया था। माना जाता है उस समय दिल्ली जाने का रास्ता यहीं से होकर गुजरता था। इस वजह से बादशाह की यात्रा के दौरान यहां पर रुकने के लिए यहां पर एक छतरी का निर्माण किया गया है जो देखने में मुगल महल की तरह दिखाई देता है। 


यहां पर मुगल काल के अवशेष मिले है। इसकी दीवारों पर मुगल बादशाह और उनके सेना के चित्र निर्मित है। यह चित्रकारिता मुगल समय में की गई थी। यहां पर मुगल समय के सिक्के भी पाए गए थे और मुगल समय के कई पुरातत्विक अवशेष पाए गए है। यह भवन मुगल बादशाह अकबर के विश्राम के लिए कच्छ के महाराजा मानसिंह ने बनवाया था। जब अकबर अजमेर दरगाह में जाते थे तो वह यही विश्राम किया करते थे।


यह एक गुंबदाकार भवन है जिसके चारों और बड़े-बड़े चबूतरे गुडसाले बनी है। इसकी दूसरी मंजिल पर 4 कक्ष बने हैं जिनका प्रवेश होल के अंदर खुलता है। इन भवन के अंदर गवाक्ष बनाए गए है और इस भवन के छत पर पांच छतरियां निर्मित की गई है। अकबर के विश्राम के लिए तीन भवन निर्मित किए गए थे:-


पंचमहल

चौमहल 

नौमहल 

पंचमहल

पंचमहल भवन बादशाह अकबर के आवास के लिए बनाया गया था इसको पंचमहल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस भवन की छत के ऊपर पांच खूबसूरत छतरियां निर्मित की है जो बहुत ढंग से सुसज्जित है इसके चार कोनों पर चार छतरी और एक विशाल रूपी छतरी निर्मित है। इस भवन के दीवारों पर भित्ति चित्र बनाए गए है इस भवन की बनावट ताजमहल की तरह है चारमीनारों को छोड़कर संपूर्ण भवन ताजमहल की तरह दिखाई देता है। 


माना जाता है इसे ही देखकर ताजमहल का निर्माण करवाया गया था। इस भवन के दरवाजे आकार में बहुत छोटे है। प्रवेश में एक बड़ा गुंबदाकार होल है यहां की दीवारों पर हिंदी और पास ही में लेख लिखें मिले हैं जो समय के गुजर जाने से अस्पष्ट तौर पर पर नजर आते है। इसकी दीवारों पर 1620 सदी के लेख मिलते हैं जो यहां के मुगल खजाने को यहां से ले जाने का प्रमाण देते है। यहां पर उस समय के अधिकारियों का हस्ताक्षर के प्रमाण भी मिले है। 


इस भवन में ऊपर जाने के लिए दोनों तरफ सीढ़ियां बनाई गई है यहां दूसरी मंजिल पर इसके चारों कोनों पर भित्ति चित्र युक्त कमरे निर्मित है। हर कमरे के बाहर अर्ध चंद्रमा कर गवाक्ष बने हैं जो हवा के आवाजाही के लिए बहुत ही उपयोगी है। यहां कमरों के अंदर जाने के रास्ते गुंबद आकार हॉल में खुलते है। इन कमरों के अंदर भित्ति चित्र बनाए गए हैं। मुगलकालीन कुश्ती, गुलदस्ते, पक्षी, फूल पत्तियां, पेड़ आदि चित्र निर्मित किए गए है। भवन की छत पर चारों और छतरी बनाई गई है यहां पर मुगल दरबार राजपूताना वेशभूषा महाभारत कालीन समय के चित्र बनाए गए है। राजनर्तकी रासलीला के चित्र भी बनाए गए हैं।


नौमहल

कुछ दूरी पर नौमहल बना है जिसका उपयोग रानियों के निवास हेतु किया जाता था इस भवन के नौ सुंदर छतरिया निर्मित की गई। यहां पर नौ ढाने का कुआं भी निर्मित है जहां पर हुए से पानी नौ नालियों द्वारा प्रवाहित होता था। चौमहल जहां पर मंत्री और सेनापति बैठक किया करते थे। यह नौमहल के बिल्कुल सामने है इसमें चार छतरियां निर्मित है। यहां पर एक सुंदर बगीचे का निर्माण करवाया गया था पानी के निकास के लिए नालियां बनवाई गई जो वर्गाकार और आयताकार रूप में बनाई गई।


चौमहल

चौमहला और नौमहला जैन संप्रदाय के दिगंबर समाज के आधीन है। नौ महला में महावीर जैन की श्वेत संगमरमर की विशाल मूर्ति भी स्थापित है। अंदर प्रांगण में जैन समाज के लोगो ने एक धर्मशाला एंव शादी ब्याह इत्यादि के लिए एक भवन का निर्माण करवाया है जिसमे कोई भी व्यक्ति अपने पारिवारिक जलसे करवा सकता है। मेरे अनुसार ये निर्माण इस सुन्दर मुग़ल कालीन विरासत को नुकसान पहुंचा रहा है। इनका निर्माण इन भवनों के बाहर भी करवाया जा सकता था क्यूंकि इसके निर्माण हेतु इन्होने सारे बाग़ की ज़मीन का उपयोग कर इन भवनों की आंतरिक सुन्दरता को नष्ट कर दिया गया है।


वर्तमान समय में नौ महल जैन समाज के अधीन है। नौ महल के अंदर महावीर जैन कि वे संगमरमर की मूर्ति को स्थापित किया हुआ है। वर्तमान समय में जैन समाज के लोग इसकी देखरेख करते हैं और इस संपूर्ण जगह को अपने अधीन किए हुए हैं। जहां अब शादी ब्याह और कोई सामाजिक कार्य के लिए उस जगह का उपयोग किया जाता है। यह खूबसूरत जगह विराटनगर की पौराणिक इतिहास को दर्शाता है। इससे पता चलता है की प्राचीन काल में मत्स्य नगरी कैसी हुआ करती थी।



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