Sunday, November 19, 2023

घासी जाति के बारे में

 बिहार सरकार द्वारा जो रिपोर्ट जारी की गई, उसका उन जातियों के लिहाज से क्या महत्व है. हम यह भी जानेंगे कि उन जातियों की परंपरपाएं क्या हैं? उनका विस्तार कितना है और निस्संदेह हम इस बात की भी चर्चा करेंगे कि आज उनकी स्थिति क्या है?


हालांकि, बिहार सरकार द्वारा सामाजिक और आर्थिक रिपोर्ट जारी नहीं की गई है, लेकिन हम कोशिश करेंगे जातियों के भीतर के तहों को उघाड़ने की.


आज सबसे पहले उस जाति की बात जिसे उस यादव जाति का सदस्य माना जाता है, जो बिहार में कम से कम 1990 के बाद से सियासी रूप से सबसे शक्तिशाली जाति माना जाता रहा है. यह जाति है घासी. आज हम इसी जाति की बात करेंगे जो बिहार सरकार द्वारा जारी रपट में 56वें स्थान पर है और इसकी कुल आबादी केवल 1,462 बताई गई है. प्रतिशत के आधार पर केवल 0.0011 प्रतिशत.


कौन हैं घासी?

मूलत: यह चरवाहा जाति रही है, लेकिन वैसे चरवाहे नहीं जो अपनी भेड़-बकरियों व मवेशी आदि को लेकर यायावर की तरह जीते हैं. ये तो मैदानी इलाकों में रहने वाले चरवाहे हैं. इन्हें घसियारा भी कहा जाता है. इनका काम भी यही था अतीत में. मवेशियों को पालना और पालने के लिए उनके वास्ते घास काटकर लाना.


इन्हें घासी कहने की परंपरा तब प्रारंभ हुई होगी जब यायावर चरवाहों के एक समूह ने अपने लिए एक सुरक्षित और स्थायी जीवन जीने का फैसला किया होगा. तब उनके सामने दो बातें रही होंगी- एक तो यह कि उनके मवेशियों को चारा-पानी मिल जाए और दूसरा यह कि जीवन चलाने के लिए अनाज उपजाने को जमीन. इस तरह से इस जाति के पूर्वजों ने खेती और मवेशीपालन को अपनाया होगा.


लेकिन कालांतर में स्थितियां जरूर बदली होंगी.


हुआ यह होगा कि मैदानी इलाकों में बसने के कारण जनजातीयता धीरे-धीरे लुप्त हुई होगी और गैर-जनजातीय पहचान विकसित हुई होगी. घासी को घोषी और गोशी भी कहते हैं. इन दोनों शब्दों का मतलब वैसे तो किसी एक किताब में सुनिश्चित नहीं है. लेकिन हिंदी साहित्य यह बताता है कि घोषी का मतलब पुकारने वाला. यह घोष शब्द से आया है और इसका अर्थ ही है- पुकारना और घोषी का मतलब पुकारने वाला.



यह जाति बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश के इलाकों में वास करती है. जैसा कि पहले बताया कि यह यादवों की एक उपजाति भी है.


क्या रहा है इतिहास

इतिहास की बात करूं, तो कई इतिहासकारों (देशी नहीं, विदेशी) रोज़, इब्बट्सन, डेंजिल, मकलागन, एडवर्ड डगलस आदि ने इस जाति के बारे में विचार प्रकट किया है कि ये हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं. कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि जिन यादवों ने धर्मांतरण कर इस्लाम को अपनाया, वे ही घोसी कहे गए. लेकिन यह बात अब कोई नहीं मानता. अब तो जिन्होंने घोसी परिवार में जन्म लिया, अब वे भी खुद को घोसी के बजाय सीधे यादव कहने लगे हैं.


बिहार के मगध इलाके में इस जाति के लोग इक्का-दुक्का ही सही, मिल जाते हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मैनपुरी, इटावा, हमीरपुर, झांसी, बांदा, जालौन, कानपुर, फ़तेहपुर इत्यादि जिलों में इस जाति के लोग बसते है.


भारतीय हिंदू जातियों में एक समानता यह है कि सभी जातियां गोत्रों में बंटी होती हैं. घासी जाति के लोग भी कई गोत्रों में बंटे पड़े हैं और इस तरह कि वे आज भी अपने गोत्र के बाहर जाकर विवाह संबंध नहीं बनाते. कुछ गोत्र हैं– बाबरिया या बरबाइया, फाटक, जिवारिया या जरवारिया, फटकालू या फटकियां, कराइया, शोनदेले, राऊत, लहुगाया, अंगूरी, भृगुदे या भृगुदेव, गाइन्दुया या गुदुया, निगाना तथा धूमर या धुंर इत्यादि.


खैर, इस जाति के लोगों के पास अपनी खूब सारी कहानियां हैं, जो असल में किंवदंतियां हैं. निश्चित रूप से कृष्ण से जुड़ाव केंद्र में है. लेकिन अब एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि सब यादव शब्द की छतरी के नीचे आ गए हैं. इसलिए घासी या घोसी के रूप में पृथक अस्तित्व की आवश्यकता नहीं रह गई है.


इसके पीछे राजनीतिक कारण हैं. बिहार में लालू प्रसाद यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की राजनीति ने सभी यादवों को लगभग एक कर दिया है. इस कारण समेकित रूप से यह एक बड़ी राजनीतिक ताकत है.


बहरहाल, बिहार की जाति आधारित गणना रिपोर्ट में घासी जाति का अलग से उद्धरित हुआ है तो इसका मतलब यह भी है कि अब भी इस जाति के कुछ लोग हैं जो स्वयं को यादव कहलाना पसंद नहीं करते. वे तो बस घासी हैं. चरवाहे के माफिक.

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