Saturday, November 18, 2023

रंगरेज़ जाति के बारे में

 रंगरेज इस मुल्क में सांस्कृतिक प्रतीक रहे हैं. उनका अपना ही अतीत रहा है. आप चाहें तो कह सकते हैं कि वे इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब के ध्वजवाहक रहे हैं. उनके लिए सब एक समान थे. न जाति का भेद और न मजहब का. उन्होंने सबके कपड़े रंगे. सबके कपड़ों पर छाप लगाई. तभी तो अमीर खुसरो ने भी लिखा–


छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके

प्रेम भटी का मदवा पिलाइके


बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा

अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके


जिन्हें धर्मनिरपेक्ष भारत में यकीन रहा है, उनके लिए अमीर खुसरो का यह गीत एक सुखद एहसास से कम नहीं है. लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि वस्त्र उद्योग के मशीनीकरण ने रंगरेजों से उनकी आजीविका छीन ली है. सांस्कृतिक रूप से तो इस जाति के दुर्दिन तभी शुरू हो गए थे जब रंगरेजी को हिंदू और मुसलमान में बांट दिया गया.


थोड़ा इतिहास को पलटें, तो रंगरेजों का सुनहरा अतीत नजर आता है. फिर चाहे वह अवध के इलाके हों या फिर दिल्ली सल्तनत के वे दिन जब लालकिले के मीना बाजार में रंगरेजों का रसूख किसी भी मनसबदार से कम नहीं होता था. उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड इलाके में भी रंगरेजों का अपना दबदबा था. और बनारस तो उनका अपना घर रहा. बनारसी साड़ियों पर रंगरेजों का काम आज भी बोलता है. रंगरेज बिहार में भी रहे और पश्चिम बंगाल में भी. उनका विस्तार पंजाब तक रहा


यदि केवल बिहार की बात की जाए, तो बिहार सरकार द्वारा जारी जाति आधारित गणना रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में इनकी आबादी केवल 43 हजार 347 है. यह आबादी वहां के भागलपुर, पटना, नालंदा, बक्सर आदि जिलों में निवास करती है. जाहिर तौर पर यह संख्या बहुत कम है.


ऐसा क्यों है, इसके पीछे एक व्यापक शोध की आवश्यकता है, जो यह बताए कि जिन रंगरेजों की दुकानों से बाजार गुलजार रहते थे, वे कहां गए? क्या उन्होंने पेशा बदलने के बाद अपनी जाति भी बदल ली?


रंगरेज मुसलमान होते हैं. हालांकि हिंदुओं में भी रंगवा होते हैं, जिनका काम रंगरेजों जैसा ही होता है. बिहार में रंगवा जाति के लोगों की आबादी केवल 3,001 बची है.


रंगरेजों की सामाजिक हैसियत की बात करें, तो वे सुन्नी मुसलमान माने जाते हैं और भले ही अपने पेशे के कारण अछूत नहीं माने जाते, लेकिन वे मोमिनों (जुलाहों) के जैसे अशराफ मुसलमानों द्वारा सम्मान के पात्र नहीं माने जाते हैं.


रही बात राजनीतिक हिस्सेदारी की तो बिहार में इनकी आबादी कुल आबादी का केवल 0.0332 प्रतिशत है और मौजूदा लोकतांत्रिक सियासत में यह संख्या न के बराबर मायने रखती है. कहना अतिरेक नहीं कि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक हमले झेलता यह समुदाय यह जाति और इसका पेशा अंतिम सांसें ले रहा है. क्योंकि दुनिया बहुत बदल चुकी है. कुछ लोग अब भी प्रयासरत हैं कि उनकी कला जिंदा रहे. लेकिन जब रोटी ही नहीं मिलेगी तो भूखे पेट कब तक जिंदा रहेंगे?

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