Tuesday, November 21, 2023

मानव का कर्त्तव्य (प्रेरक कथा)

 किसी जंगल में एक साधु कुटी बना कर रहते थे। बड़ा निर्जन स्थान था । साधु को जो मिल जाता, खा लेते और ध्यान- तपस्या में लीन रहते ।


एक दिन रात को बड़े जोर की वर्षा हो रही थी। आसमान में काली घटाएं छाई थीं। बिजली कड़क रही थी। अपनी कुटिया का दरवाजा बन्द करके साधु अन्दर लेटे थे । अचानक द्वार पर किसी के थपथपाने की आवाज सुनाई दी। साधु ने सोचा, कौन हो सकता है । जब-तब वहां जंगली जानवर आ जाया करते थे, पर ऐसे तूफान में तो कोई भी आने की हिम्मत नहीं कर सकता था । वह उठे और उन्होंने दरवाजा खोला तो देखते क्या हैं, सामने पानी में सराबोर एक आदमी खड़ा है। साधु को देखते ही वह कांपती आवाज में बोला, "महाराज, मैं रास्ता भूल कर इधर आ गया हूं और मुसीबत में फंस गया हूं । बचने के लिए यहां कोई जगह नहीं है। आपकी बड़ी कृपा होगी, अगर यह रात मुझे यहां गुजार लेने दें। सबेरा होते ही चला जाऊंगा ।"


साधु ने कहा, "वाह, यह तुमने खूब कही ! अरे भाई, खुशी अन्दर आओ। यह कुटिया तुम्हारी ही है। इसमें एक आदमी सो सकता है, दो बैठ सकते हैं। आओ, हम दोनों आराम से बैठेंगे।" इतना कह कर साधु बड़े प्यार से उस आदमी को भीतर ले गये और दरवाजा बन्द करके दोनों मजे में बैठ गये ।


कुछ ही देर बीती होगी कि फिर किसी ने दरवाजा खटखटाया । साधु ने उठकर दरवाजा खोला। देखा, पानी में भीगा, थरथर कांपता, एक आदमी खड़ा था । उसने भी साधु से वही बात कही, जो पहले ने कही थी । अन्त में बोला, "स्वामीजी, बस कैसे ही यह रात निकल जाय ! आपको थोड़ी दिक्कत तो होगी, पर जरा-सी जगह दे देंगे तो दे आपका बड़ा अहसान होगा ।"


साधु ने कहा, "इसमें अहसान की क्या बात है, भैया ! मुसीबत में एक-दूसरे की मदद करना इंसान का फर्ज है। इस कुटिया में एक आदमी के सोने की जगह है, दो बैठ सकते हैं और तीन खड़े हो सकते हैं। तीन आदमी मिल जायं, इससे बड़ा भाग्य और क्या हो सकता है ! आओ, अन्दर आओ, हम तीनों जने खड़े-खड़े मौज से रात गुजारेंगे।"

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