चोरों ने तौबा कर ली (कहानी)

 गोनू झा और चोरों के बीच आँख -मिचौली बरसों चलती रही। गोनू झा महाराज को वचन दे चुके थे कि उनके रहते मिथिला में चोरों का मनोबल बढ़ने नहीं दिया जाएगा । संयोग ऐसा रहा कि हमेशा चोरों को गोनू झा से मुँह की खानी पड़ी ।


दूसरी तरफ चोर बिरादरी के लोग लंगडू उस्ताद से वचनबद्ध थे कि जब भी मौका मिलेगा, वे गोनू झा के घर ऐसी चोरी करेंगे जिसे उनके सात पुश्त स्मरण रखेंगे।


घात-प्रतिघात की यह बात गोनू झा समझते थे और हमेशा सतर्क रहते थे। एक बार की बात है । गोनू झा दरबार से लौटकर अपने दरवाजे पर टहल रहे थे। सतर्क रहने की आदत ने गोनू झा को थोड़ा शंकालु बना दिया था । वे टहलते समय भी इतने चौकन्ने रहते, जितना कि बाज रहता है । अचानक उन्होंने कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनी । सोचने लगे, कुत्ता इस समय इस तरह नहीं भौंकता है। उन्होंने ध्यान देकर सुना-यह पड़ोसी मदन झा के कुत्ते के भौंकने की आवाज थी ।


मदन झा ने हाल में ही गोनू झा के अहाते के बगल में जमीन खरीदी थी और वहाँ अपना मकान बना लिया था । बहुत शौकीन आदमी था मदन झा । दिलेर और उत्साही भी । उसके आजू-बाजू उसके दो रिश्तेदारों ने भी मकान बनाया था । देर रात उनके घरों की महिलाएँ एक जगह एकत्रित होकर गीत गातीं-सोना-चकवा के गीत । पंडिताइन से भी वे काफी हिल -मिल गई थीं । कई बार वे अपने साथ पंडिताइन को भी ले गई थीं गीत गाने ।


मदन झा के दोनों सम्बन्धी लखन झा और सुमन झा भी मिलनसार थे। गोनू झा का सम्मान करते थे । घर -प्रवेश के अवसर पर उन्होंने गोनू झा को विशेष रूप से आमन्त्रिात किया था ।


कुत्ते के भौंकने की आवाज कभी धीमी पड़ती और फिर कभी तेज हो जाती। गोनू झा सशंकित मन से मदन झा के घर की ओर टहलते हुए बढ़े। उन्होंने एक आदमी को उसी समय उधर से गुजरते हुए देखा । आदमी की चाल उन्हें ठीक नहीं लगी। मदन झा उन्हें अपने दरवाजे पर ही मिल गए । थोड़ी देर तक उनसे इधर-उधर की बातें करके गोनू झा अपने घर की ओर लौटने लगे तभी लखन झा और सुमन झा उन्हें रास्ते में मिल गए। गोनू झा का उन्होंने अभिवादन किया और अनुनय करके गोनू झा को अपने घर ले आए । शर्बत पिलाया । इधर -उधर की बातें होती रहीं । थोड़ी देर के बाद गोनू झा ने उनसे विदा ली । विदा होते होते उन्होंने कहा -" आजकल गाँव में अजनबी चेहरे फिर दिखने लगे हैं । कहीं फिर से चोर उचक्कों का उत्पात न शुरू हो जाए । आप लोग भी सावधान रहा करिए । एक समय इस गाँव में चोरों के उत्पात से त्राहि- त्राहि की स्थिति रही है।"


उनसे विदा लेने के बाद गोनू झा के दिमाग में उस आदमी की चाल बार -बार कौंध जाती थी ... थोड़ा उचक -उचककर चलता यह हट्टा-कट्टा आदमी... उन्हें लगा कि कहीं उसे देखा है । दिमाग पर जोर डाला तो कुछ याद नहीं आया ।


रात को भोजन करने के बाद वे फिर टहलने के लिए निकल गए। अपने दरवाजे से निकलकर वे गाँव की मुख्य सड़क पर आ गए और टहलते हुए मदन झा के घर से थोड़ी दूर आगे तक निकल गए । अचानक मदन झा का कुत्ता जोर-जोर से भौंकने लगा । गोनू झा जहाँ थे वहीं एक पेड़ की ओट में खड़े हो गए और मदन झा के घर की ओर देखने लगे । चाँदनी रात थी इसलिए सब- कुछ साफ दिख रहा था । उन्होंने उचक-उचककर चलने वाले आदमी को सड़क से गुजरते देखा ।...थोड़ी दूर चलकर वह आदमी गोनू झा के बगान की ओर मुड़ गया ।


गोनू झा घर लौट आए। गोनू झा का ध्यान बाहर था । खट्- खट् की आवाज पिछवाड़े की दीवार से आ रही थी । गोनू झा को समझते देर न लगी कि पीछे की दीवार में संध लगाई जा रही है।


गोनू झा से अचानक पंडिताइन ने कहा -" अँगनावाला दरवाजा खुला रह गया है... बन्द कर आऊँ।"


इसी समय एक साया उस दरवाजे से घुटने के बल सरकता हुआ कमरे में आ गया और सरकता हुआ गोनू झा के पलंग के नीचे घुस गया। गोनू झा अपनी पत्नी को बोलने लगे – “पंडिताइन, मैं सोच रहा हूँ कि जब हमारे बच्चे होंगे..."


“धत्! “पंडिताइन ने नारी सुलभ लज्जा के साथ कहा।


" धत् कहती हो ! मैं भविष्य के लिए कल्पनाएँ सँजो रहा हूँ। तुम हो कि धत् कह रही हो ।" गोनू झा ने थोड़ी तेज आवाज में कहा।


गोनू झा ने कहना शुरू किया-”मैं अपने बेटे का, पहले बेटे का नाम मदन रखूँगा।"


" पहले बेटे का नाम मदन ?" पंडिताइन ने उनकी बात दुहराई और लजाते हुए बोली -" इसका मतलब ... कि दूसरा बेटा भी होगा ?"


" दूसरा क्या, तीसरा भी होगा ।" गोनू झा बोले।


"अच्छा, ठीक...लेकिन बच्चों की संख्या बढ़ाने से पहले दूसरे और तीसरे बेटे का नाम भी तो बताओ।"


" हूँ... बताता हूँ भाग्यवान ... दूसरे बेटे को मैं लखन बुलाऊँगा... और तीसरे को ? तीसरे को सुमन।"


अचानक गोनू झा पालथी लगाकर पलंग पर बैठ गए और बोले-“पंडिताइन, कल्पना करो कि एक दिन तीनों बच्चे घर से बाहर खेलने चले जाएँ और इस बीच ही घर में चोर आ जाए तब तुम क्या करोगी?"


पंडिताइन गोनू झा के व्यवहार में आए इस परिवर्तन से खिन्न हो गई। क्षुब्ध होकर बोली-“यह क्या बात हुई ? ऐसी घड़ी में यह भी कोई कल्पना करने की बात है ?"


गोनू झा बोले” तुम न करो तो न करो । मैं तो करूँगा।" उन्होंने आँखें बंद की और पुकारने लगे" लखन ! मदन ! सुमन ! जल्दी आओ हो ...लखन, मदन, सुमन दौड़ो... जल्दी आओ... घर में चोर घुसल हो ..." पंडिताइन उन्हें चुप रहने को बोलती और गोनू झा पंडिताइन को चिढ़ाते हुए चीख पड़ते -” दौड़ो भाई ! जल्दी आओ!"


उनकी आवाज सुनकर उनके पड़ोसी मदन झा, सुमन झा, और लखन झा हाथों में लाठी लिए दौड़े आए और गोनू झा का दरवाजा ठकठकाने लगे। गोनू झा पलंग से उतरे और दरवाजा खोल दिया । घर में तीनों घुसे और पूछा -" कहाँ है चोर?"


गोनू झा ने पलंग के नीचे इशारा कर दिया । फिर तो चोर को वे लोग पलंग के नीचे ही छाँकने लगे और बेदम करके उसे पलंग से बाहर निकाला । चोर हवालात भेजा गया ।


इसके बाद फिर किसी चोर ने गोनू झा के घर की ओर आने की हिम्मत नहीं की ।


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