कृतघ्न प्राणी (कहानी) : गोनू झा

 मिथिला नरेश की जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी, वैसे-वैसे वे मनमौजी होते जा रहे थे। कई बार तो दरबारी उनके व्यवहार से चकित हो जाते और आपस में बतियाते कि महाराज तो इन दिनों सनकी होते जा रहे हैं । जब देखो तब बेतुकी बातें करने लगते हैं ।


एक दिन ऐसे ही मिथिला नरेश दरबार में बहक गए और दरबारियों से पूछा -" आप में से कोई बता सकता है कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन है?"


दरबारी अटकलें लगाने लगे। एक ने कहा -" शेर महाराज, शेर। शेर से बड़ा कृतघ्न प्राणी भला कौन होगा ? बड़े से बड़ा जानवर उससे घबराता है । खरगोश हो या हाथी, सबको चटकर जाता है। एक बार पेट भर जाए तो पन्द्रह दिनों तक हिलता-डुलता नहीं। अघाया हुआ पड़ा रहता है।"


दूसरे ने कहा “अरे महाराज ! यही आदत तो बाघ, चीता, तेंदुआ आदि में भी है। आखिर यह कैसे तय होगा कि इनमें से कौन कृतघ्न है ?"


तीसरे ने कहा -" महाराज, सबसे कृतघ्न प्राणी लकड़बग्घा होता है । शरीर से कुछ और सिर से कुछ और दिखता है । छोटे जीवों और कमजोर बच्चों को अपना आहार बनाता है ।"


मतलब यह कि दरबार में बतकही का दौर चला तो चलता ही रहा । गोनू झा इन बातों में रुचि नहीं ले रहे थे। उन्हें अनमना देखकर महाराज ने उनसे कहा -" क्या बात है पंडित जी ? आप चुप क्यों हैं ? आप भी कुछ बताइए।"


गोनू झा ने महाराज से विनीत -स्वरों में कहा-“महाराज ! मैं आज नहीं, कल बताऊँगा कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन होता है।“ फिर महाराज से आज्ञा लेकर अपने आसन पर बैठ गए।


दरबार के समापन के बाद गोनू झा अपने घर आए। उन दिनों उनके घर एक सम्बन्धी आया हुआ था । दूर का सम्बन्ध था, वह भी दामाद का । गोनू झा ने उससे कहा -” मेहमान ! कल दरबार चलना । इतने दिन हुए तुम्हें आए, कहीं कुछ देखा नहीं-न मैंने तुम्हें दिखाया । कल तुम्हें दरबार ले चलूँगा । वहाँ काम-काज देखना। शाम को तुम्हें महाराज की फुलवारी दिखाने ले चलूँगा। तरह-तरह के फूल हैं वहाँ। बहुत ही सुन्दर फव्वारा है। उद्यान ऐसा जैसा आस -पास किसी राज्य में नहीं है । एक बार यहाँ अंगदेश के महाराज आए थे तो अधिकांश समय उसी उद्यान में व्यतीत करते थे। उन्हें वहाँ इतनी शान्ति मिलती थी कि कहते थे यहाँ से जाने का मन ही नहीं करता । वापसी के समय फुलवारी में लगे तरह-तरह के फूलों के बीज अपने साथ लेते गए । देखोगे तो मन हर्षित होगा।"




दूसरे दिन उनका दामाद बन -ठनकर तैयार हुआ । उसने रेशमी धवल वस्त्र धारण किए । युवा और आकर्षक तो वह था ही । गोनू झा के साथ दरबार में पहुँचने के बाद उसने दरबार की शोभा देखी । अभिभूत हुआ ।


दरबार में जब महाराज आए तो उन्हें देखकर दरबारी समझ गए कि महाराज आज भी हास -परिहास और बतकही में दिन गुजार देंगे । हुआ भी वैसा ही । देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। अचानक महाराज की नजर गोनू झा पर पड़ी तो उन्हें स्मरण हो आया कि आज गोनू झा को बताना था कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन है।


महाराज ने गोनू झा से पूछा" पंडित जी ! आज तो आप बताएँगे कि संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी कौन है?"


गोनू झा अपने आसन से उठे और अपने दामाद की ओर इंगित करते हुए कहा -”महाराज ! यह युवक, जो मेरे पास बैठा है मेरा दामाद है । संसार का सबसे कृतघ्न प्राणी दामाद होता है । दामाद को उसका ससुर अपनी पुत्री सौंपता है। उसके साथ सौगात के रूप में उसकी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हर तरह की वस्तु देता है। यथा सामर्थ्य धन भी देता है । मगर दामाद कभी सन्तुष्ट नहीं होता । उसकी इच्छा रहती है कि ससुराल से उसे और धन मिले । वह कभी यह नहीं सोचता कि उसकी पत्नी बनकर उसके घर में आई कन्या ने उससे सम्बन्ध बनाने के लिए अपना सब कुछ छोड़ा है माता -पिता, भाई-बहन, सगे सम्बन्धी, सहेली -मित्र-सब कुछ, फिर भी दामाद तो दामाद है-उसकी लोलुप दृष्टि ससुराल के धन पर बनी रहती है।"


महाराज ने जब गोनू झा की बातें सुनीं तो तैश में आ गए और बोले -" सच कहते हैं पंडित जी, ऐसे प्राणी को कृतघ्न तो क्या, कृतघ्नतम् प्राणी कहेंगे।" उन्होंने तुरन्त आज्ञा दी -" इस अधम प्राणी को कारागार में डाल दिया जाए ।"


गोनू झा ने विनम्रता से कहा-”महाराज ! यह ठीक है कि दामाद को मैंने कृतघ्न कहा, लेकिन महाराज ! हम सभी किसी न किसी के दामाद हैं । हम सबमें यह दुर्गुण मौजूद है । सोच के देखें महाराज, तो आपको मेरी बात ठीक लगेगी। हम सभी अपनी पत्नियों को अपनी जागीर समझते हैं । कभी यह नहीं सोचते कि उसे भी अपने बचपन के दिनों की स्मृति हो आती होगी । उसका भी जी करता होगा अपने सगे- सम्बन्धियों से मिलने का ।... मैंने यह तो कहा नहीं कि मेरा दामाद ही कृतघ्न प्राणी है।"


दामाद, जिसके हलक तक आ गए थे -प्राण और जो भरे दरबार में अपने को अपमानित हुआ महसूस कर रहा था अब थोड़ा संयत हुआ । महाराज को भी बात समझ में आ गई ।


दरबार के समापन के बाद गोनू झा अपने दामाद को लेकर महाराज के पास पहुँचे और बोले-“महाराज, मैं मेहमान को फुलवारी घुमाने लाया हूँ।"



महाराज बोले-”पंडित जी ! आप इस तरह की औपचारिकताओं से ऊपर हैं । यह फुलवारी आप की ही है ।"


"अरे मैं तो भूल ही गया था आपका दामाद । मेरा भी तो कुछ होता है ।" उन्होंने अपने गले से मोतियों की माला उतारकर गोनू झा के दामाद के गले में डाल दी और बोले-“पुत्र ! यह तो तुम्हारा अधिकार है। इसे धारण करो। इससे तुम कृतघ्न नहीं हो जाओगे । पंडित जी ने तो उस प्रथा पर चोट की है जिससे बेटी के बाप को अपना सबकुछ लुटाकर दामाद की लोलुपता की तुष्टि करनी पड़ती है।"


गोनू झा के दामाद ने जब महाराज के चरण छुए तब महाराज ने उसे अपने गले से लगा लिया ।


बाद में गोनू झा ने अपने दामाद को महराज की फुलवारी घुमाई और अपने घर की ओर चल पड़े ।


उनका दामाद गद्गद मन से गोनू झा के साथ चल रहा था ।


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