आज की दुनिया तकनीक और उन्नति के शिखर पर होने का दावा करती है, लेकिन हकीकत यह है कि हम आज भी आदिम युग की बर्बरता में जी रहे हैं। दुनिया के नक्शे पर खींच दी गई कुछ लकीरों और चंद 'नेताओं' की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की बलि आज लाखों मासूम लोग चढ़ रहे हैं।
नेताओं के फैसले और जनता की बर्बादी
एसी कमरों में बैठकर नक्शों पर उंगलियां घुमाना आसान है, लेकिन उन फैसलों का अंजाम जमीन पर लहू बनकर बहता है। कुछ शासकों की सनक और 'अहंकार' (Ego) की वजह से पूरा का पूरा देश बर्बादी की कगार पर खड़ा हो जाता है। जब एक नेता युद्ध का आदेश देता है, तो वह केवल दुश्मन पर हमला नहीं करता, बल्कि अपने ही देश की अर्थव्यवस्था, भविष्य और शांति को भी गिरवी रख देता है। महंगाई आसमान छूने लगती है, बुनियादी सुविधाएं ठप हो जाती हैं और आम आदमी अपनी ही छत के नीचे असुरक्षित हो जाता है
मासूमों की चीखें और उजड़ते आंगन
युद्ध में सबसे बड़ी कीमत वे चुकाते हैं जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होता। मलबे के नीचे दबे उन मासूम बच्चों की लाशें मानवता पर सबसे बड़ा कलंक हैं, जो अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखे थे। स्कूल जाने की उम्र में वे बमों के धमाके और अपनों को खोने का मातम देख रहे हैं।
दूसरी ओर, सीमा पर खड़ा सैनिक, जो किसी का बेटा, किसी का पति या किसी का पिता है, एक आदेश पर अपनी जान न्योछावर कर देता है। उसके जाने के बाद उसके परिवार की जो दुर्दशा होती है, उसे कोई मेडल या मुआवजा पूरा नहीं कर सकता। क्या उन नेताओं के बच्चे भी उसी मोर्चे पर होते हैं जहाँ वे दूसरों के बेटों को भेज देते हैं? जवाब है—नहीं।
अरबों का बारूद बनाम करोड़ों की भूख
आज दुनिया में युद्धों पर जितना पैसा खर्च हो रहा है, उसका अगर आधा हिस्सा भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगाया जाता, तो दुनिया से भुखमरी और गरीबी का नामोनिशान मिट जाता।
एक मिसाइल की कीमत में हजारों गरीब बच्चों को साल भर का खाना मिल सकता है।
एक फाइटर जेट की कीमत में दर्जनों आधुनिक अस्पताल बन सकते हैं।
लेकिन विडंबना देखिए, दुनिया 'विनाश' के सामान खरीदने के लिए तो तैयार है, पर 'विकास' के लिए बजट कम पड़ जाता
है।
वक्त है जागने का: समाधान क्या है?
हमें यह समझने की जरूरत है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्याओं की जननी है। दुनिया के आम लोगों को आपसी नफरत छोड़कर अपनी असली समस्याओं—बेरोजगारी, बीमारी और जलवायु परिवर्तन—से लड़ने की जरूरत है।
हमें ऐसे नेतृत्व को चुनना और पहचानना होगा जो 'विस्तारवाद' की नहीं, बल्कि 'मानवतावाद' की बात करे। जब तक आम जनता युद्ध के उन्माद में तालियां बजाना बंद नहीं करेगी, तब तक ये सत्तालोभी नेता मासूमों के खून से अपनी सियासत चमकाते रहेंगे।
निष्कर्ष:
बंदूकें और बम सिर्फ विनाश लाते हैं। असली ताकत जोड़ने में है, तोड़ने में नहीं। आइए, एक ऐसी दुनिया की मांग करें जहाँ बजट हथियारों के लिए नहीं, बल्कि थालियों में रोटी और बच्चों के हाथों में कलम के लिए हो।
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