Monday, June 19, 2023

असरारुल हक़ मजाज़ (मजाज़ ‘लखनवी’) 19 अक्तूबर, 1911 - 5 दिसम्बर, 1955

 ख्वाबे सहर


मेहर सदियों से चमकता ही रहा अफलाक पर

रात ही तारी रही इंसान की इदराक पर

अक्ल के मैदान में जुल्मत का डेरा ही रहा

दिल में तारीकी दिमागों में अंधेरा ही रहा

आसमानों से फरिश्ते भी उतरते ही रहे

नेक बंदे भी खुदा का काम करते ही रहे

इब्ने मरियम भी उठे मूसाए इम्रां भी उठे

राम ओ गौतम भी उठे, फिरऔन ओ हामॉ भी उठे

मस्जिदों में मौलवी खुतबे सुनाते ही रहे

मन्दिरों में बरहमन अश्लोक गाते ही रहे

इक न इक दर पर जबींए शौक घिसती ही रही

आदमीयत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही

रहबरी जारी रही, पैगम्बरी जारी रही

दीन के परदे में, जंगे जरगरी जारी रही

अहले बातिन इल्म के सीनों को गरमाते रहे

जिहल के तारीक साये हाथ फैलाते रहे

ज़ेहने इंसानी ने अब, औहाम के जुल्मात में

जिंदगी की सख्त तूफानी अंधेरी रात में

कुछ नहीं तो कम से कम ख़्वाबे सहर देखा तो है

जिस तरफ देखा न था अब तक उधर देखा तो है


(शीर्ष पर वापस)


तार्रुफ़


ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैं,

जिन्स-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं


इश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरी,

फ़ित्नः-ए-अक़्ल से बेज़ार हूँ मैं


ख़्वाब-ए-इशरत में है अरबाब-ए-ख़िरद,

और इक शायर-ए-बेदार हूँ मैं


छेड़ती हैं जिसे मिज़राब-ए-अलम,

साज़-ए-फ़ितरत वही तार हूँ मैं


रंग-ए-नज़ारा-ए-कुदरत मुझसे,

जान-ए-रंगीनी-ए-कुहसार हूँ मैं


नश्शः-ए-नरगिस-ए-ख़ूबां मुझसे,

ग़ाज़ः-ए-आरिज़-ओ-रूख़सार हूँ मैं


ऐब, जो हाफ़िज-ओ-ख़य्याम में था,

हाँ कुछ उसका भी गुनहगार हूँ मैं


ज़िंदगी क्या है गुनाह-ए-आदम,

ज़िंदगी है तो गुनहगार हूँ मैं


रश्क-ए-सद होश है मस्ती मेरी,

ऐसी मस्ती है कि हुशियार हूँ मैं


लेके निकला हूँ गुहरहा-ए-सुख़न,

माह-ओ-अंजुम का ख़रीदार हूँ मैं


दैर-औ-काबः में मिरे ही चर्चे,

और रूसवा सर-ए-बाज़ार हूँ मैं


कुफ्र-ओ-इलहाद से नफ़रत है मुझे,

और मज़हब से भी बेज़ार हूँ मैं


अहल-ए-दुनिया के लिए नंग सही,

रौनक-ए-अंजुमन-ए-यार हूँ मैं


ऐन इस बे सर-ओ-सामानी में,

क्या ये कम है कि गुहरबार हूँ मैं


मेरी बातों में बेहयाई है,

लोग कहते हैं कि बीमार हूँ मैं


मुझसे बरहम है मिज़ाज-ए-शेरी,

मुजरिम-ए-शोख़ी-ए-गुफ़्तार हूँ मैं


हूर-ओ-गिलमां का यहाँ ज़िक्र नहीं,

नवा-ए-इन्सां का परस्तार हूँ मैं


महफ़िल-ए-दहर पे तारी है जुमूद,

और वारफ़्ता-ए-रफ़्तार हूँ मैं


इक लपकता हुआ शोला हूँ मैं,

एक चलती हुई तलवार हूँ मैं।

 


(शीर्ष पर वापस)


नौजवान ख़ातून से


हिजाब ऐ फ़ितनापरवर अब उठा लेती तो अच्छा था

खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था


तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है

तू इस नश्तर की तेज़ी आजमा लेती तो अच्छा था


तेरी चीने ज़बी ख़ुद इक सज़ा कानूने-फ़ितरत में

इसी शमशीर से कारे-सज़ा लेती तो अच्छा था


ये तेरा जर्द रुख, ये खुश्क लब, ये वहम, ये वहशत

तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था


दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल

तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था


तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मोत का तारा है

अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा था


तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन

तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

No comments:

Post a Comment

महिलाओं को राजनीति में आरक्षण प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मकता?

 भारत में महिलाओं को राजनीति में आरक्षण देने का उद्देश्य केवल उनकी संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की ताकत...