Monday, June 19, 2023

मजाज़ ‘लखनवी’

 सानिहा

(गांधीजी की मौत से प्रभावित होकर)


दर्दो-ग़मे-हयात का दरमां1 चला गया

वह ख़िज़्रे-अस्रो – ईसीए-दौरां2 चला गया


हिन्दू चला गया, न मुसलमां चला गया

इंसां की जुस्‍तुजू में इक इंसां चला गया


रक़्सां चला गया, न ग़ज़लख़्वां चला गया

सोज़ो-गुदाज़ो-दर्द में ग़लतां3 चला गया


बरहम है ज़ुल्फ़े -कुफ़्र तो ईमां है सरनिगूं

वह फ़ख़्रो-कुफ़्रो-नाज़िशे-ईमां चला गया


बीमार ज़िन्दगी की करे कौन दिलदही

नब्बा ज़ो-चारासाज़े-मरीज़ां चला गया


किसकी नज़र पड़ेगी अब ''इसियां''4 पे लुत्फ़म की

वह महरमे-नज़ाकते-इसियां चला गया


वह राज़दारे-महफ़िले-यारां नहीं रहा

वह ग़मगुसारे – बज़्मे – हरीफ़ां चला गया


अब काफ़िरी में रस्मोस-रहे-दिलबरी नहीं

ईमां की बात यह है कि ईमां चला गया


इक बेखुदे–सुरूरे–दिलो-जां नहीं रहा

इक आशिक़े–सदाक़ते–पिन्हां चला गया


बा चश्मेआ-नम है आज जुलैख़ाए-कायनात

ज़िन्दांशिकन वह यूसुफ़े-ज़िन्दांत चला गया


अय आरज़ू वह चश्म‍:ए-हैवां न कर तलाश

ज़ुल्मात से वह चश्मन:ए-हैवां चला गया


अब संगो-ख़िश्तोश-ख़ाको-ख़ज़फ़सर बलन्दं हैं

ताजे-वतन का लाले – दरख़्शा चला गया


अब अहिरमन5 के हाथा में है तेग़े – ख़ूंचकां

खुश है कि दस्तो -बाज़ुए-यज़दां चला गया


देवे-बदी से मारिक:ए-सख़्त ही सही

यह तो नहीं कि ज़ोरे-जवानां चला गया


क्यों अहले-दिल में जज़्ब:ए-ग़ैरत नहीं रहा

क्यों अज़्मे–सरफ़रोशिए-मर्दां चला गया


क्यों बाग़ियों की आतिशे-दिल सर्द हो गयी

क्यों सरकशों का जज़्ब:ए-पिन्हां चला गया


क्यों वह जुनूनो-जज़्ब:ए-बेदार मर गया

क्यों वह शबाबे-हश्र बदामां चला गया


ख़ुश है बदी जो दाम यह नेकी पे डाल के

रख देंगे हम बदी का कलेजा निकाल के

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