Friday, June 16, 2023

गीदड़ का बंटवारा कहानी

 किसी जंगल में एक गीदड़ रहता था।


वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था।


उसकी हर इच्छा को पूरी करना वह अपना कर्त्तव्य समझता था ।


जंगल के सारे जानवर उनका प्यार देखकर दंग रहते थे और उनका प्यार सबके लिए आदर्श माना जाता था ।


दोनों का व्यवहार बहुत अच्छा था।


कभी भी किसी के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं करते थे।


अपने पड़ौसियों का बड़ा आदर करते थे।


सभी की सहायता करना उनका धर्म था।


इसी प्रकार बड़ी सुख-शान्ति से उनका जीवन कट रह था।


एक दिन दोनों पति-पत्नी सैर करने के लिए चल पड़े।


गीदड़ी कुछ दूर चलने के बाद रुक गई, उसकी सांस तेजी से चल रही थी।


लगता था, वह बहुत थक गयी थी ।


यह देख गीदड़ ने घबराकर पूछा- "अरे, यह क्या ? प्रिये! क्या बात है ?


तुम बहुत थकी हुई सी लग रही हो ?"


गीदड़ी ने बुझी-सी आवाज में उत्तर दिया- "स्वामी बात यह है; मैं बहुत कमजोरी महसूस कर रही हूं।


आजकल मुझे शीघ्र ही थकान - सी हो जाती है ।


" पत्नी की यह बात सुनकर गीदड़ ने उसे सहारा देकर बैठाया और कहा - "तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ?


अच्छा तो तुम यहां बैठो।


मैं तुम्हारे लिए कहीं से अच्छा-सा मांस लेकर आता हूं।" -


मैं "मुझे पशुओं का मांस खाने की इच्छा नहीं है।


यदि आप मेरे लिए रोहू मछली ला दें, तो कितना अच्छा होगा।


उसका मांस खाने से मैं तुरन्त ठीक हो जाऊंगी।” गीदड़ी बोली ।


"अरे यह कौन-सी बड़ी बात है ? तुमने पहले क्यों नहीं बताया ?


तुम्हारी कोई इच्छा हो मैं उसे पूरी न करूं । ऐसा कैसे हो सकता है ?"


कहते हुए गीदड़ ने बड़े प्यार से उसके गले में अपने पंजे डाले ।


वह गीदड़ी को बहुत प्यार करता था।


उसकी हर इच्छा खुशी से पूरी करता था ।


पशुओं का मांस लाना तो उसके बांये हाथ का खेल था, लेकिन पानी के जानवरों से उसका दूर तक वास्ता नहीं था।


वह इसी उलझन में पड़ गया कि किस तरह पानी में उतरकर रोहू मछली पकड़ी जाए, जिसे खाकर उसकी पत्नी की तबीयत ठीक हो जाए ।


वह अपनी पत्नी को घर वापस छोड़कर मछली लाने का आश्वासन देकर चल पड़ा।


वह रास्ते भर सोचता जा रहा था कि पत्नी से वादा तो कर लिया, किन्तु अब क्या होगा ?


मछली लाना खेल नहीं था।


गीदड़ की कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।


यही सोचता हुआ वह उदास होकर चलता-चलता नदी के किनारे जा पहुंचा।


उसे मालूम था कि नदी में बहुत सी मछलियां हैं, लेकिन उन्हें कैसे पकड़ा जाए ?

चारों ओर घना अंधकार फैला था।


पत्नी के प्यार में दीवाना होकर वह यहां तक पहुंच गया था ।


वह बार-बार यही सोच रहा था कि खाली हाथ पत्नी के सामने किस मुंह से जाए, उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।


पत्नी भी सोचगी कि उसका पति इतनी छोटी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकता।


इसी सोच-विचार में बैठा हुआ वह एकटक नदी के जल को देख रहा था |


मैं अचानक उसने एक अहाट सुनी और सामने देखा कि दो ऊदबिलाव पानी से बाहर आ रहे थे।


उनके पास मछली थी ।


गीदड़ की आंखों में चमक आ गयी।


उसने ध्यानपूर्वक मछली को देखा तो पहचान गया कि यह तो रोहू मछली है।


इसे ही मेरी पत्नी ने मांगा था, किन्तु मैं इसे कैसे प्राप्त कर सकता हूं ?


निराश होकर गीदड़ एक कौने में बैठ गया | वह ललचाई दुष्टि से एकटक मछली को देखे जा रहा था।


उसका दिमाग अपना कार्य करने में लगा था ।


उसने देखा दोनों ऊदबिलाव मछली को बीच में रखे हुए बैठे थे।


एक ऊदबिलाव दूसरे से बोला- "बड़ी समस्या है मित्र! मछली तो एक है और हम दो।


इसका बंटवारा कैसे किया जाए ?”


मछली को बीच में रखकर दोनों सोचने लगे।


उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्योंकि उन्हें एक-दूसरे पर विश्वास भी नहीं था।


दोनों को सन्देह था कि बांटने वाला बड़ा हिस्सा ले लेगा या बराबर हिस्सा न मिलने पर झगड़ा होगा, जिससे उनकी पुरानी मित्रता दुश्मनी में बदल जाएगी।


उधर चुपचाप बैठा हुआ गीदड़ यह सब तमाशा देखे जा रहा था।


उसकी नजर मछली पर ही टिकी थी।


उनकी बातें सुनकर गीदड़ समझ गया कि बंटवारे को लेकर इनका झगड़ा अवश्य होगा।


वह सोचने लगा, क्या यही अच्छा होता, यदि वे उससे बांटने को कहते।


यदि वे उसे बंटवारा करने के लिए कहेंगे, तो काटने के लिए औजार चाहिए ।


उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा।


उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई ।


उसके सामने वृक्ष के नीचे एक लकड़हारा अपनी कुल्हाड़ी को पास रखकर आराम से सो रहा था ।


कुल्हाड़ी देखकर गीदड़ बहुत खुश हो गया।


काम बन गया, उसने मन में सोचा।


यह सोचकर वह पूरी सावधानी से कुल्हाड़ी उठा लाया, लकड़हारे को इसका कुछ पता न लगा

गीदड़ ने वापस आकर देखा कि दोनों ऊदबिलाव आपस में झगड़ रहे हैं, अन्त में उन्होंने निर्णय किया यह बंटवारा किसी दूसरे से करवाया जाए।

गीदड़ इसी मौके की प्रतीक्षा कर रहा था ।


वह झट से उन दोनों के पास आकर बोला-"राम-राम भाइयों! आपस में मत झगड़ो।


लड़ाई करने से कुछ निष्कर्ष नहीं निकल पाएगा।


लाओ मैं ही इस मछली को तुम दोनों में बराबर-बराबर बांट देता हूं।


इससे तुम्हारा झगड़ा समाप्त हो जाएगा।"


दोनों ऊदबिलाव खुश होकर बोले- "हमें तुम्हारा फैसला मंजूर है।


इस मछली को हम दोनों में बांट दो।"


गीदड़ ने उन्हें विश्वास दिलाते हुए कहा - "मैं बिल्कुल सही बंटवारा करूंगा।


लाओ, मछली मुझे दो।" ऐसा कहकर उसने मछली ले ली।


गीदड़ ने मछली को कुल्हाड़ी से काटा और सिर तथा दुम को अलग-अलग कर दिया।


फिर सिर को उठाकर एक ऊदबिलाव को देते हुए कहा- "लो भाई, सिर तुम्हारे हिस्से में आता है।


इसे तुम खा लो।" और फिर दुम वाला हिस्सा दूसरे ऊदबिलाव को देते हुए कहा- "लो भाई, यह पूंछ तुम्हारी है।


इसे तुम ले लो।" दोनों ऊदबिलाव अपना-अपना हिस्सा लेकर सन्तुष्ट हो गए ।


दो भाग तो गीदड़ ने बांट दिये, तीसरा भाग भी तो बचा पड़ा था।


दोनों ऊदबिलाव देखने लगे कि यह हिस्सा किसे मिलता है।


गीदड़ ने उनसे पूछा- "भाइयों आप इस भाग की ओर क्यों देख रहे हैं ?" ऐसा कहते हुए उसने मछली का टुकड़ा अपने पास रख लिया ।


दोनों ऊदबिलाव हैरानी से एक-दूसरे की ओर देखकर बोले- "क्या यह टुकड़ा हमें नहीं मिलेगा ?"


गीदड़ ने गुस्से से उत्तर दिया- "अरे भई! आप लोग भी बड़े मूर्ख हैं, जो इतना नहीं समझते कि मैंने आप लोगों का इतना बड़ा काम किया है।


उसका मेहनताना मुझे मिलना ही चाहिए।"


दोनों ऊदबिलाव एक साथ बोले- "तो क्या यह टुकड़ा तुम ले जाओगे ?" गीदड़ ने कहा - "मैंने अपनी मजदूरी ही ली है।


मैं मुफ्त में काम नहीं करता ।"


ऐसा कहकर वह गीदड़ वहां से भाग खड़ा हुआ।


दोनों ऊदबिलाव निराश होकर गीदड़ को जाता हुआ देखते रहे और कहने लगे- "हमने एक-दूसरे पर विश्वास न करके तीसरे पर विश्वास किया।


इससे हमें इतना बड़ा नुकसान सहना पड़ा।


चिड़िया का घोंसला

इस बार गर्मी की छुट्टियों में एनी अपनी सहेलियों के साथ खेलने के बजाय सारा दिन पार्क में बैठी छोटे-छोटे पक्षियों को घोंसला बनाते देखती रहती ।

पार्क में तरह-तरह के पक्षी आते थे - गौरैया, कबूतर, कठफोड़वा, लवा और बुलबुल ।

एनी किसी भी पक्षी को देखते ही पहचान जाती थी, क्योंकि उस की मैम ने उसे सभी पक्षियों के सुंदर चित्र दिखाए थे और कहा था कि इन छुट्टियों में तुम सब पक्षियों की आदतें गौर से देखना और गरमी

की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुलेगा तब तुम सब को पक्षियों पर एक लेख लिखने के लिए दिया जाएगा ।

सब से अच्छे लेख पर जो किताब इनाम में दी जाने वाली थी, वह भी बच्चों को दिखाई गई थी ।

मैम ने उम्हें जानवरों और पक्षियों की कहानियों वाली उस किताब के रंगीन चित्र भी दिखाए थे और कहानियां भी पढ़ कर सुनाई थी ।

एनी को वह किताब इतनी पसंद आई थी कि उस ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि जैसे भी हो वह इस किताब को पाने के लिए मेहनत करेगी और इसलिए एनी अपनी छुट्टियां खेलने के बजाय पार्क में बैठ कर पक्षियों की आदतों को जानने में गुजार रही थी ।

एनी देखती कि पक्षी अपना घोंसला बनाने के लिए कितने धैर्य से छांटछांट कर पुराणी सुतली, घास, पत्तियां और घोंसले को आरामदेह बनाने के लिए पंख आदि जमा करते हैं ।

एनी का जी चाहता, कितना अच्छा होता कि मैं भी इन पक्षियों की कुछ मदद कर सकती ।

अचानक एनी को एक खयाल आया । इन दिनों ज्यादातर पक्षियों ने अपने घोंसले बना लिए थे, फिर भी कुछ पक्षी ऐसे थे जिन के घोंसले अभी तक तैयार नहीं हुए थे ।

कुछ शरारती लड़कों ने पत्थर मार कर इन के घोंसले नष्ट कर दिए थे । एनी ने उन्हें गुस्सा कर रोकना चाहा ।

एनी ने सोचा-क्यों न मैं अपने हाथों से एक घोंसला बना कर बगीचे के किसी पेड़ पर लटका दूं ।

हो सकता है कोई पक्षी वहां रहने आ जाए, आह, कितना अच्छा लगेगा जब पक्षी वहां अंडे देंगे और कुछ दिनों में घोंसला छोटे-छोटे पक्षियों से भर जाएगा ।

पक्षियों की चहचहाहट से मेरे बगीचे में रौनक आ जाएगी, यह सोच कर एनी बहुत खुश हुई ।

अब तो एनी को अपने आप गुस्सा आ रहा था कि इतनी अच्छी बात उसे पहले क्यों नहीं सूझी ? कुछ मिनटों का ही तो काम होगा और बस घोंसला तैयार हो जायेगा । पक्षियों के चोंच से बने घोंसलों के मुकाबले मेरा यह घोंसला ज्यादा सफाई से बना हुआ होगा, एनी ने सोचा ।

अगले दिन एनी की मां यह देख कर बड़ी हैरान हुई कि एनी सारा दिन तिनके, कागज आदि ही बुनती रही ।

कहां तो एनी ने सोचा था कि घोंसला बनाना तो कुछ मिनटों का ही काम है और कहां एनी को सारी शाम घोंसला बनाते- बनाते गुजर गई ।

घोंसला को टिकाने के लिए एनी ने बांस की कुछ तीलियां भी लगाई थी । अब वे तीलियां टिक नहीं रही थी ।

बेचारी एनी ने धागे की पूरी रील लगा दी ।

तब कहीं जा कर घोंसला इधर-उधर से बंध कर तैयार हुआ, पर घोंसला अजीब ऊबड़खाबड़ सा बना था ।

यह तो पक्षियों को बहुत चुभेगा, यह सोच कर एनी मां के पास गई और बोली, मां, यह घोंसला अंदर से कितना सख्त है, इसे जरा नरम बना दो न ।

मां ने एक छोटी कटोरी ली और घोंसले के अंदर उसे गोलमोल घुमा कर काफी हद तक उसे आरामदेह बना दिया । ऊबड़खाबड़ तिनके और कागज बैठ गए थे |
अब एक छोटा सा घोंसला तैयार था जो न गोल कहा जा सकता था, न चौरस और न लंबा ।

चिड़ियाँ चोंच से घोंसला बनाती हैं, पर कितने सलीके और सफाई से बनाती हैं । हाथों से तो कभी ऐसे घोंसला बनाए ही नहीं जा सकते ।

सुबह एनी ने बड़ी शान से वह घोंसला बगीचे के एक पेड़ पर लटका दिया और खुद कुछ दूरी पर खड़ी इंतजार करती रही कि कोई पक्षी आ कर उसे अपना घर बना ले ।

पर जब काफी समय गुजर गया और कोई पक्षी न आया तो एनी बड़ी निराशा हुई । अचानक उस ने देखा लवा पक्षियों के एक जोड़े ने, जो घोंसला के ऊपर मंडरा रहा था, चोंच मारमार कर घोंसला तोड़फोड़ डाला ।

'शैतान, पक्षी ' गुस्से से एनी बड़बड़ाई ।

एनी की आवाज सुनकर उसकी मां वहां आ गई ।

मां, देखो न, उन्हें मेरा घोंसला पसंद नहीं आया, एनी ने सुबकते हुए कहा ।

मां भी वहीं खड़ी हो कर पक्षियों की हरकतें देखने लंगी ।

अचानक मां जोर से हंस पड़ी, देखो, एनी, ये पक्षी पहले घोंसले से तिनके चुनचुन कर एक नया घोंसला तैयार कर रहे हैं । हो सकता है ये लोग और किसी के बनाए घोंसलों में रहना पसंद न करते हों । मां, मैं जो लेख लिखूंगी न, उस में यह बात भी जरूर लिखूंगी, एनी बोली ।

एनी, पक्षियों ने घोंसला चाहे जिस कारण तोड़ा हो, पर वे तुम्हारा बड़ा एहसान मान रहे होंगे कि तुम ने घोंसला बनाने का सारा सामान एक जगह जमा कर रखा है, मां ने कहा ।

मां, तुम ने एक बात पर गौर किया ? एनी ने मां से कहा, यह लवा अपना घोंसला झाड़ियों के अंदर बनाती है ।

हाँ, एनी, अभी तक तो मैं ने यही देखा सुना था कि लवा अपना घोंसला पेड़ पर या घरों के रोशनदानों आदि में बनाती है । आज पहली बार मैं यह तरीका देख रही हूँ ।

एनी सारा दिन बगीचे में बैठी लवा पक्षियों को काम में जुटे देखती रहती । एनी की मौजूदगी का पक्षी भी बुरा नहीं मानते थे । शायद उन्हें पता था कि वह उन की मित्र है ।

जल्दी ही घोंसला छोटे-छोटे लवा पक्षियों से भर गया । इसी बीच एनी को लवा पक्षी की एक और दिलचस्प आदत का पता चला ।

आमतौर पर पक्षी उड़ते हुए आते हैं और सीधे अपने घोंसले पर ही उतरते हैं, पर लवा कभी ऐसा नहीं करती। वह हमेशा अपने घोंसले से थोड़ी दूरी पर उतरती है और फिर फुदकफुदक कर और थोड़ा इधर-उधर पता चले ।

घूम कर अपने घोंसले में जाती है । शायद वह नहीं चाहती कि किसी को उसी के घोंसले की जगह पता चले ।
छुट्टियों के बाद जब लेख प्रतियोगिता हुई तो एनी को प्रथम पुरस्कार मिला । इनाम वाली किताब हाथ में पकड़े एनी अपनी सहेलियों को बता रही थी, तुम्हें पता है, मैं ने एक नहीं दो इनाम जीते हैं । एक तो यह किताब और दूसरा अपने बगीचे में छोटे-छोटे लवा पक्षियों से भरा घोंसला ।

इस कहानी से हमे ये सीख मिलती है कि "कोई प्रतियोगिता जीतने से ज्यादा, दूसरों की मदद कर के खुशी मिलती है । "


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