Monday, June 19, 2023

लखनवी

 बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

 


बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!


बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी

बूढ़े, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी

बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी बोल !


अरी, ओ धरती बोल ! !

राज सिंहासन डाँवाडोल!


कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले

देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले

मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले



बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!


क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी

कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेज़ारी

कब तक सरमाए के धंधे, कब तक यह सरमायादारी

 


बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!


नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम

धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मजबूर नहीं हम

मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम

 


बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!


बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है

बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है

बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है



बोल कि हमसे जागी दुनिया

बोल कि हमसे जागी धरती


बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!


(शीर्ष पर वापस)


सरमायेदारी


कलेजा फुंक रहा है और जबाँ कहने से आरी है,

बताऊँ क्या तुम्हें क्या चीज यह सरमायेदारी है,


ये वो आँधी है जिसकी रौ में मुफ़लिस का नशेमन है,

ये वो बिजली है जिसकी जद में हर दहकन का ख़र्मन है


ये अपने हाथ में तहज़ीब का फ़ानूस लेती है,

मगर मज़दूर के तन से लहू तक चूस लेती है


यह इंसानी बला ख़ुद ख़ूने इंसानी की गाहक है,

वबा से बढ़कर मुहलक, मौत से बढ़कर भयानक है।


न देखे हैं बुरे इसने, न परखे हैं भले इसने,

शिकंजों में जकड़ कर घोंट डाले है गले इसने।


कहीं यह खूँ से फ़रदे माल ओ ज़र तहरीर करती है,

कहीं यह हड्डियाँ चुन कर महल तामीर करती है।


गरीबों का मुक़द्दस ख़ून पी-पी कर बहकती है

महल में नाचती है रक्सगाहों में थिरकती है।


जिधर चलती है बर्बादी के सामां साथ चलते हैं,

नहूसत हमसफ़र होती है शैतां साथ चलते हैं।


यह अक्सर टूटकर मासूम इंसानों की राहों में,

खुदा के ज़मज़में गाती है, छुपकर ख़ानकाहों में।


ये गैरत छीन लेती है, ये हिम्मत छीन लेती है,

ये इंसानों से इंसानों की फ़ितरत छीन लेती है।


गरजती, गूँजती यह आज भी मैदाँ में आती है,

मगर बदमस्त है हर हर कदम पर लड़खड़ाती है।


मुबारक दोस्तों लबरेज़ है अब इसका पैमाना,

उठाओ आँधियाँ कमज़ोर बुनियादे काशाना।

(शीर्ष पर वापस)


जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है


जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

मगर वो आज भी बरहम नहीं है


बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना

तेरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है


मेरी बर्बादियों के हमनशीनों

तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है


अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं,

अभी तो आँख भी पुरनम नहीं है


'मजाज़' इक बादाकश तो है यक़ीनन

जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है


(शीर्ष पर वापस)


चार ग़ज़लें


[एक]


हुस्न को बेहिजाब होना था

शौक़ को कामयाब होना था


हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछो

ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था।


तेरे जलवों में घिर गया आख़िर

ज़र्रे को आफ़ताब होना था।


कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी

कुछ मुझे भी ख़राब होना था।


[दो]


कमाल-ए-इश्क़ है दीवानः हो गया हूँ मैं

ये किसके हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं


तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया

बचा सको तो बचा लो, कि डूबता हूँ मैं


ये मेरे इश्क़ मजबूरियाँ मा’ज़ अल्लाह

तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं


इस इक हिजाब पे सौ बेहिजाबियाँ सदक़े

जहाँ से चाहता हूँ तुमको देखता हूँ मैं


बनाने वाले वहीं पर बनाते हैं मंज़िल

हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं


कभी ये ज़ौम कि तू मुझसे छिप नहीं सकता

कभी ये वहम कि ख़ुद भी छिपा हुआ हूँ मैं


मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बादः ए-इशरत

मजाज़ टूटे हुए दिल की इक सदा हूँ मैं


(शीर्ष पर वापस)


[तीन]


हुस्न फिर फ़ित्न (त्‌न) ग़र है क्या कहिए,

दिल की जानिब नज़र है क्या कहिए।


फिर वही रहगुज़र है क्या कहिए,

ज़िंदगी राह पर है क्या कहिए।


हुस्न ख़ुद पर्दादर है क्या कहिए,

ये हमारी नज़र है क्या कहिए।


आह तो बेअसर थी बरसों से,

नग़्म भी बेअसर है क्या कहिए।


हुस्न है अब न हुस्न के जलवे,

अब नज़र ही नज़र है क्या कहिए।


आज भी है मजाज़ ख़ाकनशीन,

और नज़र अर्श पर है क्या कहिए।


[चार]


कुछ तुझको ख़बर है हम क्या-क्या, ऐ शोरिश-ए-दौरां भूल गये।

वो ज़ुल्फ़-ए-परीशां भूल गये, वो दीदः-ए-गिरियां भूल गये।


ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए, नज़ारों में कोई सूरत ही नहीं।

ऐ ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कहिए,हम सूरत-ए-जानां भूल गये।


अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं, अब दिल की कली खिलती ही नहीं।

ऐ फ़स्ल-ए-बहारां रूख़सत हो, हम लुत्फ़-ए-बहारां भूल गये।


सबका तो मदावा कर डाला, अपना ही मदावा कर न सके।

सबके तो गरेबां सी डाले, अपना ही गरेबां भूल गये।


ये अपनी वफ़ा का आलम है, अब उनकी जफ़ा को क्या कहिए

इक नश्तर-ए-ज़हर आगीं रखकर नज़दीक-ए-रग-ए-जां भूल गये।



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