Thursday, July 13, 2023

Madhya Pradesh: 09 के लोकसभा चुनाव में 30 प्रतिशत अपराध वाले जनप्रतिनिधियों को हम भारत के लोगों ने अपना सांसद बनाया, 2014 में इनकी संख्या बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई. 2019 में तो यह बढ़कर ऐतिहासिक रूप से 43 प्रतिशत है. क्या ऐसा मुल्क बनाने के लिए आजादी आई है?

 देश की जनता ने खुद पर आपराधिक मामले दर्ज करने वाले 43 प्रतिशत उम्मीदवार जन प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेज दिया हो, उस देश में किसी भारतीय नागरिक के सिर पर दूसरे नागरिक के पेशाब कर देने पर क्यों आश्चर्य होना चाहिए! जिस मूल्यहीनता और मानवीय मूल्यों के पतन की ओर समाज आंख मींच कर चल पड़ा है, वहां ऐसी घटनाएं सामने आएंगी ही, क्या आप कभी अपने मन से यह सवाल करते हैं कि जिस जनप्रतिनिधि को मैं वोट कर रहा हूं उसकी छवि कैसी है, उस पर अपराध के कितने केस दर्ज हैं, होता तो यहां तक है कि जेल के अंदर से भी चुनाव जीत जाया करते हैं, ऐसे युग में एक जनप्रतिनिधि का एक प्रतिनिधि यदि मानवीय मूल्यों पर आग मूतता है तो यह सवाल उनसे नहीं हम सभी से है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं? क्या यह आजादी इसीलिए हासिल की है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की गरिमा को अपनी पेशाब में बहाए?


मामला वायरल है. मध्य प्रदेश का एक जिला है सीधी. सीधी जिले में उतनी ही उल्टी घटना हुई जिसमें एक दबंग व्यक्ति ने एक कमजोर व्यक्ति को अपने पेशाब से नहला दिया. निश्चित तौर पर आरोपी नशे में था, सिगरेट के छल्ले भी उड़ा ही रहा था, और एक व्यक्ति ने बिना कुछ सोचे-समझे उसका वीडियो भी बना लिया. वीडियो वायरल हुआ और उस पर लोग लानत-मलानत करने लगे.

महात्मा गाँधी ने यंग इंडिया में लिखा था…

“मैं ऐसे संविधान की रचना करवाने का प्रयास करूंगा, जो भारत को हर तरह की गुलामी और परावलंबन से मुक्त कर दे, और उसे आवश्यकता हो तो पाप करने तक का अधिकार दे. मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें गरीब से गरीब लोग भी यह महसूस करेंगे कि यह उनका देश है – जिसके निर्माण में उनकी आवाज़ का महत्व है. मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें ऊंचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा, और जिसमें विविध सम्प्रदायों में पूरा मेलजोल होगा. ऐसे भारत में अस्पृश्यता के और शराब या दूसरी नशीली चीज़ों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता.”


क्या यह ऐसी पहली घटना रही होगी? हो सकता है कि नहीं, आजकल हर हाथ में मोबाइल कैमरों और इंटरनेट के कारण ऐसे मामले पकड़ में भी आ जाते हैं और वायरल भी हो जाते हैं, जिससे भावनाएं उबाल मारने लगती हैं, लेकिन समाज का यह खोखलापन न तो एकदम अभी शुरू हुआ है और न ही वह किसी एक घटना ताज सीमित है. अलग-अलग स्वरूपों में ऐसी वीभत्स कोशिशें चलती रहती हैं, और इनको संरक्षण देने वाला तत्व है वह अहंकार जो कानून-व्यवस्था को अपनी जेब में लेकर घूमता है और उसे लगता है कि सब कुछ तो मैनेज किया ही जा सकता है.

सीधी जिले से भी पीड़ित का एक ऐसा शपथ पत्र सोशल मीडिया पर नुमाया हो रहा है, जिसमें उसने ऐसी किसी भी घटना से इंकार कर दिया है. हालाँकि बाद में मामला बढ़ता देख पुलिस ने कार्यवाई भी की, सरकारी बुलडोजर भी चला और अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीड़ित व्यक्ति को अपने आवास पर बुलाकर उसके पैर धुलाये और सांत्वना दी. पर इससे सिस्टम कितना ठीक होगा, यह वक्त ही बताएगा


नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ने लोकसभा चुनाव 2019 में सांसदों के शपथपत्रों का विश्लेषण किया. इनमें से जो जनप्रतिनिधि चुनकर हमने अपनी संसद बनाकर देश का भविष्य उनके हाथों में सौंपा उनमें से 43 प्रतिशत सांसदों ने यह बताया था कि उन पर किसी तरह का अपराध दर्ज था. इनकी संख्या 233 थी. इनमें से 29 प्रतिशत सांसदों ने यह बताया था कि उन पर गंभीर किस्म के आपराधिक प्रकरण दर्ज थे. और यह हर पार्टी से संबंधित थे.


यहां पर गौर करने वाली बात यह भी है कि संसद में ऐसे जनप्रतिनिधियों की संख्या निरंतर बढ़ी है. 2009 के लोकसभा चुनाव में 30 प्रतिशत अपराध वाले जनप्रतिनिधियों को हम भारत के लोगों ने अपना सांसद बनाया, 2014 में इनकी संख्या बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई. 2019 में तो यह बढ़कर ऐतिहासिक रूप से 43 प्रतिशत है. वहीं गंभीर अपराध वाले उम्मीदवारों का प्रतिशत 2009 में 14 था, 2014 में 21 और पिछले चुनाव में बढ़कर 29 प्रतिशत तक हुआ है.

तो सवाल यह है कि हमारा समाज जा किस तरफ रहा है? क्या इस बात का कोई असर पड़ता है कि हमारा जनप्रतिनिधि जिस वक्त हम चुन रहे हैं उस वक्त उसकी छवि कैसी है. उसकी धन संपत्ति कैसी है और उसे उन्होंने किस तरह से अर्जित किया है, गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में 88 प्रतिशत जनप्रतिनिधि करोड़पति थे. राजनीति अब मूल्यों से ज्यादा धन-बल के रास्ते से आगे बढ़ती है, इस रास्ते को बनाने के लिए जिन टूल्स और जिन लोगों का तैयार किया जाता है, वह अब आमतौर पर ऐसे ही ज्यादा होते हैं. राजनैतिक पहुंच और धनबल के जरिए जब पहले से अहंकार में डूबा व्यक्ति जब दूसरे सस्ते नशों में डूबता है तब ठीक ऐसा ही होता है जैसा कि सीधी के उस वीडियो में होता दिखाई दे रहा है.


इसे केवल जाति के चश्मे से देखना मतलब समस्या को ठीक तरह से नहीं समझना है. पर इस समस्या को कौन समझेगा और किस तरह से इस पर काम किया जाएगा. क्या एक यह मानसिकता नहीं है जिसमें इस तरह के स्वभाव को ही अपनी नियति मान लिया जाकर स्वीकार कर लिया जाता है. वह इसलिए भी क्योंकि इस तरह के प्रतिनिधि चेहरे हर ओर ही दिखाई दे रहे हैं, यह ऐसी बुराई है जो समाज को तकरीबन हर प्रमुख राजनीतिक दल में दिखाई दे रही है, वह चुने तो किसे चुने? अपने नैतिक मूल्यों को हवा में उड़ाते हुए रोज-रोज दलबदल के नए-नए ड्रामा देखकर भारतीय समाज भी तो ठिठका हुआ है. तो विकल्प कौन बनेगा?

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