सोशल मीडिया एक मोहल्ले का ऐसा नुक्कड़ बन गया है. जहां पर निकम्मे, नाकारा लोग बैठते हैं, टाइम पास करते हैं और किसी के घर में होने वाले आपसी विवाद को चटखारे लेकर एक दूसरे को सुनाते हैं. शायद हालात इससे कहीं ज़्यादा बदतर और निचले स्तर के हो गए हैं. पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया पर सारे लिहाज़ ख़त्म हो गए हैं. हर किसी के हाथ में मोबाइल और सस्ता डाटा है, तो फिर कोई किसी बात का लिहाज़ क्यों करे. पर निंदा में आनंद ही आनंद है. ये सब इसलिए कह रही हूं क्योंकि लगातार ऐसे मामले आते हैं, जहां सोशल मीडिया पर बैठा हर इंसान जज बन जाता है. एक कोई मुद्दा मिला नहीं कि निकल पड़े सोशल मीडियावीर युद्ध को. गली मोहल्ले में होने वाले छोटे छोटे झगड़े, परिवारों के आपसी विवाद लोगों के चटखारे लेकर शेयर करते हैं. अगर मामला किसी महिला से जुड़ा है तो फिर तो नीचे गिरने की कोई हद ही नहीं रह जाती है. बस एक होड़ लगी रहती है कि कैसे तमाम महिलाओं को निशाने पर लिया जाए, उन्हें कैसे नीचा दिखाया जाए, कैसे पित्तृसत्ता की जड़ों को और गहरा किया जाए.
हाल फिलहाल सोशल मीडिया पर जो बहस चल रही है वो है उत्तर प्रदेश की एसडीएम ज्योति मौर्या और उनके पति आलोक मौर्या को लेकर. विवाद पति पत्नी के बीच का है, लेकिन इसमें पूरा देश चौधरी बनकर बैठ गया है. दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है और फिलहाल मामला जांच के दायरे में है. आलोक मौर्या और उनके परिवार पर दहेज लेने का आरोप है. वहीं ज्योति मौर्या पर पति की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा है. आलोक मौर्या प्रतापगढ़ में पंचायती राज विभाग में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं.
मामला सुर्खियों में तब आता है जब ज्योति के पति आलोक पत्नी पर अवैध संबंध और अपनी हत्या की साजिश का आरोप लगाते हैं. मीडिया के सामने रोते हुए आलोक कहते हैं कि उन्होंने पत्नी को शादी के बाद पढ़ाया और उसे एसडीएम बनाया. एसडीएम बनने के बाद अब पत्नी उन्हें तलाक देना चाहती है. आलोक यही नहीं रुकते हैं, वो ज्योति और गाज़ियाबाद में होमगार्ड कमांडेंट की पर्सनल चैट भी सार्वजिनक करते हैं. हालांकि ज्योति और आलोक के मामले में बहुत सारे पेंच हैं. सही और गलत की जांच की जा रही है, जिसका फ़ैसला अदालत को करना है.
लेकिन अदालत में पहुंचने से पहले ये फ़ैसला सोशल मीडिया में बैठे ट्रोलर्स सुना रहे हैं. ज्योति मौर्या के चरित्र की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. बात इतनी ही नहीं है. अगर सोशल मीडियावीर यहीं रुक जाते तो मसला थोड़ा समझ भी आता, लेकिन ज्योति तो बस एक नाम हैं, यहां बैठे कुंठित लोग तमाम पढ़ने लिखने वाली बहू बेटियों को अपना निशाना बना रहे हैं. लोग लगातार महिलाओं के प्रति अपनी कुंठा निकाल रहे हैं. ऐसा साबित किया जा रहा है कि पढ़ी लिखी, नौकरी पेशा बीवी बेवफ़ा हो जाती है. लिखा जा रहा है कि बेटी पढ़ाओ, बीवी नहीं. चटखारे लिए जा रहे हैं. मीम्स, जोक्स की बाढ़ आ गई है.
‘बेवफ़ा एसडीएम बीबी’ की कहानी टाइटल से लंबी लंबी पोस्ट लिखी जा रही है. ज्योति के पति आलोक को मिसाल बनाकर कहा जा रहा है कि आलोक मौर्या सूर्यवंशम फिल्म के हीरा ठाकुर बनने चले थे, और पत्नी को अधिकारी बनाने में अपना सबकुछ गवां बैठे. हालांकि आलोक मौर्या की पत्नी को एसडीएम बनाने के दावे को लेकर भी बहुत कुछ कहा जा रहा है. आलोक ने जिस तरह से परिवार के विवाद को सड़क पर लाया इससे उनकी मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं. कुल मिलाकर एसडीएम ज्योति मौर्या के बहाने सोशल मीडिया पर दो धड़े हो गए हैं.
अब बात करते हैं, उन लोगों की जो आलोक के इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने ज्योति को पीसीएस बनाया. हुमा अंसारी लिखती हैं कि भारत में न जाने कितने ही पति होंगें जिनकी पढ़ाई और जॉब उनकी पत्नी के बलबूते हुई है, लेकिन उसका कोई गुणगान नही होता है, कभी एक पति, पत्नी की पढ़ाई में सहयोग कर दे सब नतमस्तक हो रहे हैं. ज्योति मौर्य को उसके पति ने PCS बनाया ऐसे कह रहे हैं, जैसे लगता हैं, PCS उनकी बुआ की बाग में बनते होंगे, कि लो जाओ तुम बन लो अधिकारी और हम बने रहेंगे सफाई कर्मचारी वाला त्याग बलिदान”
गौरव सिंह लिखते हैं कि ज्योति मौर्या और आलोक मौर्या की शादी 2010 में हुई है. शादी के वक्त आलोक मौर्य ने बताया था कि वो ग्राम विकास अधिकारी हैं, जबकि वो सफाई कर्मचारी थे. ज्योति का कहना है कि वो शादी के तुरंत बाद ही तलाक लेना चाहती थीं, लेकिन कुछ कारणों से पीछे हट गईं. (हमारा समाज तलाक को इतनी सहजता से नहीं लेता है, यही कारण रहा होगा पीछे हटने का)
ज्योति मौर्या 2015 बैच में 16वीं रैंक के साथ SDM बनीं. अब अगर PCS बनने के बाद ज्योति को घमंड आ गया होता, तो वो 2015 में ही तलाक ले लेतीं, 8 साल SDM बनने के बाद यह कवायद क्यों करतीं.
ख़ैर मसला ये नहीं कि ज्योति और आलोक के बीच क्या हुआ. मसला ये है कि क्या ज्योति देश के तमाम औरतों की नुमाइंदगी करती हैं. ज्योति के बहाने एक बार फिर सारी कोशिश है कि औरतों की पढ़ाई रोक दी जाए, उन्हें घरों में रखा जाए. ‘बेटी पढ़ाओ, बीवी नहीं’ का नया नारा देने वाले ये भूल गए कि अगर बेटी को बेहतर शिक्षा देंगे तो बीवी को पढ़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. मुद्रा पटेल कहती हैं कि बीवी को पढ़ाना तो बहुत दूर की बात है, जो ऑटो रिक्शा/टेंपो चलाता है, उन्होंने आज तक अपनी मां बहन और बीवी को ड्राइविंग नहीं सिखाया, कि अगर किसी दिन, मैं बीमार हो जाऊं, मुझे छुट्टी रखनी हो, मुझे कहीं बाहर जाना हो, तो आप लोगों में से कोई उस दिन ड्राइव कर सकती है!
कोई सुथारी, लुहारी, प्लंबर कोई अपनी मां बहन या बीवी को अपने साथ साइट पर लेकर नहीं जाता, कि चलो तुम भी रोज मेरे साथ आया करो, धीरे-धीरे तुम भी सब काम सीख जाओगी! कोई ऑटो गैरेज/दुकान/फैक्टरी वाला अपनी मां बहन या बीवी को रोज अपने साथ ऑटो गैरेज/दुकान/फैक्टरी में लेकर नहीं जाता कि मैं तुम्हें अपने बिजनेस की सब चीजें सिखाना चाहता हूं! हर मर्द अपने घर की औरतों को खाली गुलाम बना के रखना चाहता है!
कनुप्रिया ने लिखा कि हो सकता है कि ज्योति मौर्य ने अपने पति के उनके प्रति dedication या सपोर्ट सिस्टम बन जाने का मान न रखा हो, हालांकि जिस तरह उनके पति ने उन्हें बदनाम किया है. प्रेम से अधिक आर्थिक स्वार्थ की ही बू आती है, ऐसे में ज्योति का बाहर कथित अफ़ेयर होना चकित भी नहीं करता, मगर इतना तो साफ़ है कि यही सपोर्ट सिस्टम उन्हें उनके घर में ही मिल जाता तो वो पहले ही सफल हो चुकी होतीं. वो जो कुछ बनी हैं, अपनी मेहनत और क़ाबिलियत के दम पर. समाज को स्त्रियों से कम से कम उनके परिश्रम का श्रेय छीनना छोड़ देना चाहिए. आगे बढ़ने के समान अवसर उनका हक है, वांछित सपोर्ट सिस्टम और अवसर मिलें तो जानें कितनी ही ज्योति मौर्य अपनी काबिलियत ख़ुद सिद्ध कर सकती हैं.
हालांकि ये पहला मामला नहीं है, जब सोशल मीडिया किसी भी मुद्दे को लेकर बौराया हो. हाथ में मोबाइल और इंटरनेट होने से कुछ भी कहना सस्ता और आसान है. महिलाओं को लेकर तो यहां पर बैठे लोग ऐसी बातें करते हैं कि गली कूचे के टपोरी, गुंडे मवाली शरमा जाएं. हर बार इनके निशाने पर पढ़ने लिखने, सोचने समझने और आगे बढ़ने वाली महिलाएं होती हैं. ज्योति मौर्या का मसला उनके और उनके ससुराल, पति के बीच का है, लेकिन कुंठित लोगों के निशाने पर तमाम औरतें आ गईं. वो औरतें जो पढ़ना चाहती हैं, आगे बढ़ना चाहती हैं, अपना भविष्य बनाना चाहती हैं.
ज्योति मौर्या को गलत मिसाल बनाकर पेश किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि देख लो पढ़ी लिखी औरत को. अगर हम मान भी ले कि ज्योति ने एसडीएम बनने के बाद अपने फोर्थ ग्रेड पति को छोड़ दिया तो भी क्या ये उसका निजी फ़ैसला नहीं है. वो महिला है इसलिए इतना बवाल खड़ा किया जा रहा है. हमारे सामने तो कामयाब होने पर पत्नियों को छोड़ने की इतनी मिसालें मिलेंगी की लिस्ट बहुत लंबी हो जाएगी. नेताओं से लेकर, अभिनेता, लेखक, गायक कितने ही ऐसे लोग हैं, जिन्होंने बुलंदी पर पहुंचने पर पहली पत्नी को गंवई बताकर छोड़ दिया और किसी स्मार्ट औरत से शादी कर ली.
मर्द जब अपनी बीवी को गंवार, अनपढ़ बताकर छोड़कर दूसरी शादी करता है, एक्ट्रा मैरिटियल अफ़ेयर चलाता है तो किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती है. यहां एक ज्योति मौर्या ने पितृसत्ता की चूलें हिला दीं. पितृसत्ता के पैरोकार एकजुट हो गए, कुंठित मर्द अपनी कुंठा शांत करने में लग गए. पिछले कुछ दिनों से ज्योति मौर्या को लेकर जो कुछ लिखा और कहा जा रहा है वो हमारे समाज का आईना है, दरअसल हम ऐसे ही कुंठित लोगों से घिरे हुए हैं, जिन्हें लड़की उतनी ही पढ़ी लिखी चाहिए कि जो आगे जाकर दबी कुचली, सहमी बीवी बने और अपने पति की सेवा करे बिना किसी उफ्फ़ के.
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