सीखने की प्रक्रिया अनेक कारकों से प्रभावित होती है। अधिगम
को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख कारकों को पाँच वर्गों में विभाजित किया जा सकता है,जो निम्नलिखित प्रकार से है –
(1) विद्यार्थी से सम्बन्धित कारक
1. सीखने की इच्छा
2. शैक्षिक योग्यता या निष्पन्ति
3. आकांक्षा का स्तर
4. बुद्धि (Intelligence)
5. संवेगात्मक स्थिति
(2) अध्यापक से सम्बन्धित कारक
1. विषय का ज्ञान
2. अध्यापक का व्यवहार
3. शिक्षण विधि
4. अध्यापक का मानसिक स्वास्थ्य एवं समायोजन स्तर
5. सिखाने की इच्छा
(3) विषय-वस्तु से सम्बन्धित कारक
1. विषय-वस्तु की प्रकृति
2. जीवन से सम्बन्धित उदाहरण
3. पूर्व अधिगम
4. विभिन्न विषयों में कठिनाई स्तर
(4) वातावरण से सम्बन्धित कारक
1. भौतिक वातावरण
2. परिवारिक वातावरण
3. सामाजिक एवं संवेगात्मक वातावरण
4. उचित सामग्री और सुविधाएँ
(5) अनुदेशन से सम्बन्धित कारक
1. अधिगम विधि
2. अभ्यास (Practice)
3. परिणाम का ज्ञान
4. नवीन ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करना
इन कारकों का विस्तार से वर्णन करते हैं – चलिए अब पढ़ते है अधिगम या सीखने को प्रभावित करने कारक विस्तार से –
विद्यार्थी से सम्बन्धित कारक (Factors related to Learner)
1. सीखने की इच्छा (wish to Learn) – यदि बच्चे में सीखने की इच्छा है तो नया ज्ञान उसे सरल तरीके से सिखाया जा सकता है। बालक यदि सीखने के लिए तैयार नहीं है तो शिक्षक के सामने बहुत गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाती है। सीखने की इच्छा, रुचि तथा अभिप्रेरणा बहुत सीमा तक अधिगम को प्रभावित करते हैं।
2. शैक्षिक योग्यता या निष्पन्ति (EducationalAchievement) – विद्यार्थी की शैक्षिक योग्यता का अधिगम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यदि विद्यार्थी किसी विषय में पिछड़ा है तो उस विषय से सम्बन्धित नवीन ज्ञान सीखने में उसे कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। यदि विद्यार्थी की किसी विषय में शैक्षिक योग्यता सामान्य से अधिक है तो विद्यार्थी नया ज्ञान सुगमता से सीख लेता।
3. आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiation) – बालक की महत्वाकाक्षा पर अधिगम की सफलता काफी कुछ निर्भर करती है। जब तक विद्यार्थी में महत्वाकांक्षा नहीं होगी, वह सीखने के लिए प्रयत्नशील नहीं होगा।
4. बुद्धि (Intelligence) – सीखना बहुत कुछ सीखने वाले की बौद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है। तीव्र बृद्धि वाले बालक कम बुद्धि वाले
बालकों की अपेक्षा शीघ्र सीख लेते हैं।
5. संवेगात्मक स्थिति (Emotional Condition) – सीखने में संवेगात्मक स्थिति एक महत्वपूर्ण कारक है। संवेगात्मक रूप से स्वस्थ विद्यार्थी शीघ्रता से सीखता है।
भौतिक वातावरण, जैसे स्वच्छ वायु एवं प्रकाश, सफाई तथा बैठने आदि की व्यवस्था भी सीखने पर प्रभाव डालती है।
2. परिवारिक वातावरण (Family Environment) – बालक के सीखने में उनके परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिन परिवारों में शांतिपूर्ण और सौहार्द का वातावरण होता है, बालक शीघ सीखने में सक्षम होते हैं। कलहपूर्ण वातावरण अधिगम में बाधक होता है।
3. सामाजिक एवं संवेगात्मक वातावरण (The Socio-emotional Environment) – सीखने का समय जिस प्रकार का सामाजिक संवेगात्मक वातावरण शिक्षण-अधिगम कार्य को ठीक प्रकार से सम्पन्न करने के लिए कक्षा, विद्यालय तथा अन्य सीखने की परिस्थितियों में प्राप्त होता उतनी ही अच्छी तरह से अधिगम प्रक्रिया को संचालित किया जा सकेगा।
4. उचित सामग्री और सुविधाएँ (Appropriate Learning Material and Facilities) – जब बालकों को उपयुक्त अध्ययन सामग्री और सुविधाएँ प्राप्त होती है तो आशाजनक सफलता प्राप्त होती है। इसके विपरीत दे विद्यार्थी, जिन्हें सीखने में सहायक आवश्यक साज-सज्जा, अधिक सामग्री और सुविधाएँ (पाठ्य-पुस्तक, लिखने-पढ़ने के अन्य सामग्री पुस्तकालय, प्रयोगशाला सम्बन्धी सुविधाएँ, गृहकार्य करने के लिए आवश्यक समय एवं सुविधाएँ आदि) नहीं प्राप्त होती, वे पिछड़ जाते हैं।
अनुदेशन से सम्बन्धित कारक (Factors related to Instruction)
1. अधिगम विधि (Learning Method) – अध्यापक द्वारा अपनाई गई अधिगम विधि का प्रभाव विद्यार्थी के अधिगम पर पड़ता है। किसी प्रकरण को पढ़ाने की एक विधि से सभी बालक प्रभावित नहीं होते हैं यदि कोई अध्यापक अपने विषय को दबाव के साथ अवैज्ञानिक और अगनोवैज्ञानिक तरीके से बालक को पढ़ाता है तो बालक उसमें रुचि नहीं लेते हैं। मगर जो अध्यापक बालकों की रुचि, योग्यता और आवश्यकता के अनुरूप अधिगम विधि का चुनाव करते हैं, बालक उनकी कक्षा में उत्साहित रहते हैं ।
2. अभ्यास (Practice) – सीखने की क्रिया के ऊपर अभ्यास का काफी प्रभाव पड़ता है। किसी कार्य को बार-बार करने से कार्य की गति बढ़ती है तथा त्रुटियाँ कम हो जाती हैं। अभ्यास द्वारा सीख हुआ शान स्थायी होता है।
3. परिणाम का ज्ञान (Knowledge ofAchievement) – सीखने के दौरान यदि समय-समय पर सीखने की प्रगति का ज्ञान होता रहता है तो सीखने वाले में उत्साह बना रहता है। उसे अपनी त्रुटियों का ज्ञान होता रहता है जिससे वह उन्हें सुधार लेता है। अधिगम के परिणाम का ज्ञान पुनर्बलन का कार्य करता है।
4. नवीन ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करना (Learning of the ney Learning) – नए ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित कर पढ़ाने पर बालक शीघ्रता से सीखता है।
निवेदन
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