Wednesday, August 9, 2023

जीन पियाजे (Jean Piaget)संज्ञानात्मक विकास की अवधारणा (Concept of Cognitive Development)

 जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत –


जीन पियाजे एक मनोवैज्ञानिक थे | उनका जन्म 9 अगस्त सन 1896 को स्विट्जरलैंड में हुआ था 

इस विकास का प्रतिपादन जीन पियाजे ने ही किया था

जीन पियाजे ने अपने बच्चों और आस पड़ोस के बच्चों पर ज्ञानात्मक, संज्ञान, मानसिक विकास का अध्ययन किया था

जीन पियाजे के सिद्धांतों को अवस्था का सिद्धांत और विकासात्मक सिद्धांत भी कहा जाता है

जीन पियाजे का मानना है कि जिस तरीके से बच्चों में जैविक परिपक्वता आती है वैसे वैसे वह वस्तुओं के बारे में अपने दिमाग में धारणा मना लेते हैं|

परिभाषा – बच्चे नन्हे वैज्ञानिक तथा सक्रिय ज्ञान निर्माता है जो कि संसार के बारे में अपने सिद्धांतों की रचना करते हैं |


संज्ञानात्मक विकास की अवधारणा (Concept of Cognitive Development)

1.अनुकूलन (Adaptation)

अनुकूलन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जीव अपने पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाते हैं जैसे कि – मनुष्य पर्यावरण के अनुकूल होते हैं वैसे ही उनका चिंतन भी उन परिवर्तनों के अनुकूल होता है जो भी वे अनुभव करते हैं अनुकूलन में 2 बुनियादी प्रक्रियाएं समायोजन और समावेश शामिल है 


वातावरण के अनुसार अपने आपको ढालना अनुकूलन कहलाता है 

जीन पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक विकास दो प्रक्रियाओं संतुलन और अनुकूलन से होता है

अनुकूलन में दो उप क्रियाएं समायोजन और आत्मसात करण शामिल है

अनुकूल में स्थितिजान्य मांगों को पूरा करने के लिए बच्चे का परिवर्तन शामिल होता है

आत्मसातकरण और समायोजन (Assimilation and Accomodation)

जीन पियाजे एक प्रमुख स्विस मनोवैज्ञानिक है जिन्होंने बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को समझने में बहुत बड़ा योगदान दिया है उन्होंने वर्षों की अवधि में बच्चों का आकलन किया था और साथ ही कहा कि मानव व्यवहार भौतिक पर्यावरण के अनुकूलन का एक कार्य है


 जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया को समझने के लिए आत्मसात करने के लिए समायोजन, आत्मसातकरण, स्कीमा और संतुलन की चार प्रक्रियाओं का प्रयोग किया था

 समायोजन और आत्मसातकरण की प्रक्रिया पर्यावरण के साथ होने वाली अंतः क्रियाओं का मूल आधार है

1. आत्मसातकरण (Assimilation)

आत्मसातकरण नई वस्तुओं या विचारों को समझने की मौजूदा क्षमता के साथ समझना है 

आत्मसातकरण को हम समावेश भी कह सकते हैं यह हमारे पहले से मौजूद स्कीमा में जानकारी लेने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है यह वह तरीका है जिसमें कोई व्यक्ति पूर्व मौजूदा मानसिक संरचनाओं में बिना किसी बदलाव के नई जानकारी लेता है और उसकी व्याख्या करता है |

आत्मसातकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक बच्चा अनुभवों और धारणाओं को मौजूदा संज्ञानात्मक संरचनाओं (स्कीमा) में अनुकूल करके समझता है

उदाहरण – मान लीजिए एक बच्चा जो गाय से परिचित है वह भैंस को देखकर चार पैर वाले जानवर (गाय) के मौजूदा स्कीमा में अधिक जानकारी जोड़कर एक अनुभव के अनुकूल होगा 


मतलब एक बच्चा है जिसने गाय देखी है और वह भैंस को देखकर कहता है कि यह भी एक गाय है तब हम उसे बताएंगे कि यह एक भैंस है तो वह अपने आप ही दिमाग में बिठा लेगा की हर चार पैर वाला जानवर गाय नहीं होती यह भैंस है क्योंकि इसका रंग ऐसा है और देखने में ऐसी है |



अब कक्षा में समझते हैं – जब शिक्षक नई अवधारणाओं का परिचय देते हैं तो वे अवधारणाओं को पहले से मौजूद ज्ञान से जोड़कर आत्मसात करने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने का प्रयास करते हैं


2. समायोजन (Accomodation)

समायोजन एक नई वस्तु के साथ संतुलन करने की प्रवृत्ति मतलब नई वस्तु में अनुकूल होने के लिए किसी की समझ को बदलना होता है

समायोजन तब होता है जब किसी व्यक्ति को नई स्थिति का उत्तर देने के लिए मौजूदा योजनाओं को बदलना चाहिए उदाहरण के लिए बच्चा अपने चूसने के तरीके को संशोधित करता है और एक नए खिलौने को चूसने को शामिल करता है

जब कभी आत्मसात करने की प्रक्रिया काम नहीं करती है क्योंकि नए अनुभव किसी भी मौजूदा स्कीमा में अनुकूल नहीं होते हैं तो नए अनुभव के अनुकूल होने के लिए एक नए स्कीमा विकसित करना होता है

एक नया स्कीमा बनाने और किसी की मौजूदा संज्ञानात्मक संरचनाओं में संशोधन करके सोचने और करने की विधियों को समायोजित करने की प्रक्रिया को समायोजन कहा जाता है |

उदाहरण – मान लीजिए आप चेन्नई में छात्रों की एक कक्षा को वर्ष के लगभग चार मौसम पढ़ा रहे हैं तो हो सकता है कि उनके पास सर्दियों के मौसम के बारे में स्कीम न हो क्योंकि चेन्नई में सर्दी का अनुभव नहीं होता है इसलिए बच्चों को नई जानकारी को व्यवस्थित करने के लिए एक नया स्कीमा बनाना होगा 


मतलब आप चेन्नई शहर में बच्चों को पढ़ा रहे हैं एक शिक्षक के तौर पर और आप उनको पढ़ाएंगे कि भारत में 4 तरह के मौसम होते हैं भारत में चार ऋतु होती हैं-


शीत ऋतु 

ग्रीष्म ऋतु 

वर्षा ऋतु 

शरद ऋतु 

जब आप उन छात्रों को शरद ऋतु के बारे में बताएंगे तब उनको यकीन नहीं होगा कि शरद ऋतु भी होती है यानी कि ठंडा मौसम भी होता है जिसमें हर समय स्वेटर पहनना होता है और इसी प्रकार वह अपने दिमाग में यह स्कीमा और बना लेंगे कि ऐसा भी एक मौसम होता है जिसमें सर्दी पड़ती है


3. संतुलन (Equilibiration)

जीन पियाजे पहले ऐसे मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने संज्ञानात्मक विकास का व्यवस्थित अध्ययन किया था जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत के अनुसार समावेश (आत्मसातकरण) समायोजन और संतुलन एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम से बच्चे नए अनुभवों को पहले से मौजूदा अनुभूति संरचनाओं धारणाओं स्कीमा में एकीकृत करते हैं | इसके द्वारा बच्चे आत्मसातकरण और समायोजन की प्रक्रिया के बीच संतुलन कायम करते हैं |


संतुलन तब होता है जब एक बच्चा पुरानी और नई धारणाओं और अनुभवों के बीच सामंजस्य बनाता है और जब उसकी योजनाएं समावेश के माध्यम से सबसे नई जानकारी में समाधान कर सकती हैं |

असंतुलन की स्थिति तब पैदा होती है जब नई जानकारी मौजूदा मानसिक निरूपण (समावेश) में समा न सकती हो |

स्कीम्स (Schemes)


अनुभव या व्यवहार को संगठित करने की ज्ञानात्मक संरचना को स्कीम्स कहते हैं |

स्कीमा (Schemas)


जीन पियाजे ने स्कीमा को बुद्धिमान व्यवहार का बुनियादी निर्माण खंड और ज्ञान को व्यवस्थित करने का एक रूप कहां है एक स्कीमा को विश्व के जुड़े हुए मानसिक अभ्यावेदन के एक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका उपयोग हम स्थितियों को समझने और प्रतिक्रिया करने के लिए करते हैं | 

मानव के दिमाग में जो चीजें पहले से ही संरक्षित होती हैं वह उनका प्रयोग करके किसी विषय के प्रति एक धारणा बनाता है और इसे हम स्कीमा कहते हैं |



केंद्रीकरण (Centralization) – जब बच्चा किसी वस्तु की सारी विशेषताओं को छोड़कर केवल एक विशेषता पर ध्यान देता है वह अवस्था केंद्रीकरण कहलाती है

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational State) (7 से 11 वर्ष)

मूर्त संक्रियात्मक अवस्था में बच्चा सामने रखी हुई चीजों को देखकर ही कुछ कर सकता है या उस पर चिंतन करना शुरू कर देता है |


इस अवस्था में अपलटावी, जीववाद, मुद्रा, भार आदि की धारणा का गुण आ जाता है |

अपने स्वयं के विचारों और दूसरों के विचारों के बीच अंतर करने की क्षमता आ जाती है |

 बच्चे वस्तुओं को उनकी संख्या द्रव्यमान आदि के आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं |

 बच्चे वस्तुओं और घटनाओं के बारे में तार्किक रूप से सोचने की क्षमता रखते हैं |

आगमनात्मक तर्कणा (Inductive reasonin) यह भी इसी अवस्था में आता है यानी कि जब बच्चा उदाहरण के ऊपर आधारित होकर तर्क करने लगता है |


जैसे कि – 


बच्चा – हमारे लिए पेड़ जरूरी है या नहीं है 


उत्तर – क्योंकि इससे हमें ऑक्सीजन मिलती है


4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage) (11 से 15 वर्ष)

औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था संज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है और यह अवस्था प्याजे के वर्गीकरण की चौथी अवस्था है जो लगभग 11 वर्ष की आयु से शुरू होती है और लगभग 15 वर्ष की आयु तक जारी रहती है मूर्त संक्रियात्मक में बच्चे को मुख्य रूप से चार महत्वपूर्ण संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है उनके नाम निम्नलिखित हैं |


 मानसिक प्रतिनिधित्व

 संरक्षण

 वर्ग समावेश

 बहु वर्गीकरण

इसमें बच्चा अमूर्त और वैज्ञानिक चिंतन करने लग जाता है |


यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है जहां मानसिक क्षमताओं को अधिकतम स्तर तक विकास किया जा सकता है काल्पनिक और निगमनात्मक तर्क के लिए सक्षम है |


अमूर्त रूप से सोचने पर आसन ज्ञान और समस्या का हल करने की क्षमता होती है |


निगमनात्मक तर्कणा – इसमें बच्चा नियमों के ऊपर तर्क करने लगता है |


जैसे कि – गणित के सवाल मन में ही हल कर देते हैं क्योंकि नियम पता है |



पियाज़े के संज्ञानात्मक विकास के 4 चरण है :


विकास के चरण विशेषताएँ

संवेदीप्रेरक अवस्था 

(जन्म से 2 वर्ष)


इंद्रियों और क्रियाओं के माध्यम से दुनिया को देखता है

(देखना, सुनना, छूना, बोलना और प्राप्त करना आदि)


वस्तु स्थायित्व विकसित करता है

संज्ञानात्मक विकास बच्चे की इंद्रियों और गति के उपयोग से शुरू होता है

पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था

   (2-7 वर्ष)


चित्रों और शब्दों द्वारा वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए भाषा का उपयोग करना सीखता है

सोच अहंकार केंद्रित है; दूसरों के दृष्टिकोण को समझने में कठिनाई होती है

प्रतीकात्मक सोच विकसित करता है 

किसी एकल सुविधा द्वारा वस्तुओं को वर्गीकृत करता है। 

मूर्त संक्रियात्मक 

(7-11 वर्ष)


संख्या (आयु -6), द्रव्यमान (आयु -7) और वजन (आयु -9) की स्थिरता प्राप्त करता हैडी

परिचालन सोच विकसित करता है 

ठोस घटनाओं के बारे में तार्किक रूप से सोचना, ठोस अंकगणितीय संचालन करना

अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था

  (11 वर्ष और उस से अधिक)


काल्पनिक, भविष्य और वैचारिक समस्याओं से संबंधित हो जाता है

अमूर्त अवधारणा विकसित करता है

अधिक परिपक्व नैतिक तर्क के लिए संभावित 

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