Friday, October 6, 2023

दार्शनिक का पत्थर : कश्मीरी लोक-कथा

 कथा का एक और रूप


एक बार की बात है कि एक आदमी तख्ते सुलैमान पर चढ़ने के लिये चला। उस दिन दिन बहुत गरम था सो उसको बहुत जल्दी ही प्यास लग आयी। उसने अपनी जेब से एक नाशपाती निकाली और उसे छीलने लगा।


जब वह नाशपाती छील रहा था तो उसके हाथ से चाकू फिसल गया और उसका हाथ कट गया। उस आदमी ने खून चाकू से साफ करके फिर उसे एक पत्थर पर घिस कर उसका खून साफ करके अपनी जेब में रख लिया।


पहाड़ी पर पहुँच कर वह वहाँ बैठ गया। वहाँ पहुँच कर उसको भूख भी लग आयी सो उसने एक दूसरी नाशपाती निकाली और अपनी जेब से चाकू निकाला और उसको छीलने ही वाला था कि उसने देखा कि उसका चाकू तो सोने का हो गया था। “यह कैसे हुआ?”


यह देख कर उसको कोई शक नहीं रहा कि उसने अपना चाकू जरूर ही किसी संगी पारस पर घिस दिया था। वह तुरन्त ही वापस आया पर अफसोस उसको वह पत्थर फिर नहीं मिला। पर हम यह जानते हैं कि वह पत्थर अभी भी जरूर ही वहीं कहीं होगा।

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