बदलते दौर के साथ अब मीडिया और उसके भीतर कामकाज का तरीका भी बदल चुका है। अख़बारों से आगे बढ़कर ख़बरें अब वेबसाइट और यूट्यूब पर सीधे प्रसारण के साथ जा रही हैं। देखने वालों तक को मीडिया कंपनी अपने अंदाज़ में ख़बरें परोसती ही हैं लेकिन इन कंपनी के भीतर अपनी एक दुनिया है जो एक ख़बर हो सकती है। ऐसे ही एक मीडिया हाउस देश-दुनिया के बारे में मीडियाकर्मी और लेखक विजय मनोहर तिवारी ने किताब लिखी है 'स्याह रातों के चमकीले ख़्वाब।' किताब लेखक के पत्रकारिता के अनुभवों पर आधारित है जिसका लाभ निश्चित रूप से नई पौध को मिलेगा। देश-दुनिया एक अख़बार है जिसे लेखक एक केस स्टडी की तरह लेते हैं।
बदलते हुए फॉन्ट, शब्दावली के साथ-साथ रिपोर्टिंग, डेस्क, राजनीति और संपादकीय विभाग पर पूरी कहानी इस किताब में मौजूद है। कहानी शुरु होती हुई कोविड काल और नौकरी की बेचैनी तक आती है। लेखक का मानना है कि इसे सत्तर या अस्सी के दशक में आना था, चूंकि वह अख़बार का स्वर्णिम दौर था और पूरी कहानी ही जबकि उसी माध्यम पर लिखी गई है। परंत, कहानी भले ही अख़बार पर आधारित हो लेकिन मीडिया में काम करने वाला हर पत्रकार यह जानता है कि अख़बार का अनुभव कितना ज़रूरी है ख़ास तौर पर मीडिया के अनुशासन को समझने के लिए।
यद्यपि किताब सचेत करती है कि 'यहां ख़ुद को अंधेरे में रखकक दूसरों की सुर्खियां सजाई जाती हैं' तथापि किताब प्रोत्साहन का ही काम करती है। मीडिया में काम करने के इच्छुक और इसी को संभावना की तरह देखने वालों लोगों को यह किताब पढ़नी चाहिए। निदा फ़ाज़ली के शेर से शुरु हुई किताब एक शेर के साथ ख़त्म तो हो रही है लेकिन पत्रकारिता के अनुभवों पर सोचने के लिए भी विवश करती है।
किताब प्रभात प्रकाशन से छपी है, इसका मूल्य 500 रुपये है। लेखख विजय मनोहर तिवारी है जो वर्तमान में मध्य प्रदेश में राज्य सूचना आयुक्त और देश के बहुकला केन्द्र 'भारत भावन' के न्यासी हैं।
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