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Showing posts from November, 2023

ज्ञान की प्यास

 उन दिनों महादेव गोविंद रानडे हाई कोर्ट के जज थे। उन्हें भाषाएँ सीखने का बड़ा शौक था। अपने इस शौक के कारण उन्होंने अनेक भाषाएँ सीख ली थीं; किंतु बँगला भाषा अभी तक नहीं सीख पाए थे। अंत में उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने एक बंगाली नाई से हजामत बनवानी शुरू कर दी। नाई जितनी देर तक उनकी हजामत बनाता, वे उससे बँगला भाषा सीखते रहते। रानडे की पत्नी को यह बुरा लगा। उन्होंने अपने पति से कहा, ‘‘आप हाई कोर्ट के जज होकर एक नाई से भाषा सीखते हैं। कोई देखेगा तो क्या इज्जत रह जाएगी ! आपको बँगला सीखनी ही है तो किसी विद्वान से सीखिए।’’ रानडे ने हँसते हुए उत्तर दिया, ‘‘मैं तो ज्ञान का प्यासा हूँ। मुझे जाति-पाँत से क्या लेना-देना ?’’ यह उत्तर सुन पत्नी फिर कुछ न बोलीं। ज्ञान ऊँच-नीच की किसी पिटारी में बंद नहीं रहता।

गिलहरी और बुद्ध (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 भगवान बुद्ध आत्मज्ञान की खोज में तपस्या कर रहे थे। उनके मन में विभिन्न प्रकार के प्रश्न उमड़ रहे थे। उन्हें प्रश्नों का उत्तर चाहिए था लेकिन अनेक प्रयासों के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिली। वे आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगे। अनेक कष्ट सहन किए, कई स्थानों की यात्राएं कीं परंतु जो समाधान उन्हें चाहिए था, वह उन्हें मिला नहीं। एक दिन उनके मन में कुछ निराशा का संचार हुआ। सोचने लगे, धन, माया, मोह और संसार की समस्त वस्तुओं का भी त्याग कर दिया। फिर भी आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। क्या मैं कभी आत्मज्ञान प्राप्त कर सकूंगा ? मुझे आगे क्या करना चाहिए ? इसी प्रकार के अनेक प्रश्न बुद्ध के मन में उठ रहे थे। तपस्या में सफलता की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही थी और इधर बुद्ध ने प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। वे उदास मन से इन्हीं प्रश्नों पर मंथन कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें प्यास लगी। वे अपने आसन से उठे और जल पीने के लिए सरोवर के पास गए। वहां उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। एक गिलहरी मुंह में कोई फल लिए सरोवर के पास आई। फल उससे छूटकर सरोवर में गिर गया। गिलहरी ने देखा, फल पानी की ...

कन्या अछूत नहीं (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 एक बार वैशाली के बाहर जाते धम्म प्रचार के लिए जाते हुए गौतम बुद्ध ने देखा कि कुछ सैनिक तेजी से भागती हुयी एक लड़की का पीछा कर रहे हैं । वह डरी हुई लड़की एक कुएं के पास जाकर खड़ी हो गई। वह हांफ रही थी और प्यासी भी थी। बुद्ध ने उस बालिका को अपने पास बुलाया और कहा कि वह उनके लिए कुएं से पानी निकाले, स्वयं भी पिए और उन्हें भी पिलाये। इतनी देर में सैनिक भी वहां पहुँच गये। बुद्ध ने उन सैनिकों को हाथ के संकेत से रुकने को कहा। उनकी बात पर वह कन्या कुछ झेंपती हुई बोली ‘महाराज! मै एक अछूत कन्या हूँ। मेरे कुएं से पानी निकालने पर जल दूषित हो जायेगा।’ बुद्ध ने उस से फिर कहा ‘पुत्री, बहुत जोर की प्यास लगी है, पहले तुम पानी पिलाओ।’ इतने में वैशाली नरेश भी वहां आ पहुंचे। उन्हें बुद्ध को नमन किया और सोने के बर्तन में केवड़े और गुलाब का सुगन्धित पानी पानी पेश किया। बुद्ध ने उसे लेने से इंकार कर दिया। बुद्ध ने एक बार फिर बालिका से अपनी बात कही। इस बार बालिका ने साहस बटोरकर कुएं से पानी निकल कर स्वयं भी पिया और गौतम बुद्ध को भी पिलाया। पानी पीने के बाद बुद्ध ने बालिका से भय का कारण पूछा। कन्या ने बता...

सबसे बड़ा गरीब

 एक महात्मा भ्रमण करते हुए नगर में से जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक रुपया मिला। महात्मा तो विरक्त और संतोषी व्यक्ति थे। वे भला उसका क्या करते? अतः उन्होंने किसी दरिद्र को यह रुपया देने का विचार किया। कई दिन तक वे तलाश करते रहे, लेकिन उन्हें कोई दरिद्र नहीं मिला। एक दिन उन्होंने देखा कि एक राजा अपनी सेना सहित दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा है। साधु ने वह रुपया राजा के ऊपर फेंक दिया। इस पर राजा को नाराजगी भी हुई और आश्चर्य भी। क्योंकि, रुपया एक साधु ने फेंका था इसलिए उसने साधु से ऐसा करने का कारण पूछा। साधु ने धैर्य के साथ कहा- ‘राजन्! मैंने एक रुपया पाया, उसे किसी दरिद्र को देने का निश्चय किया। लेकिन मुझे तुम्हारे बराबर कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला, क्योंकि जो इतने बड़े राज्य का अधिपति होकर भी दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा हो और इसके लिए युद्ध में अपार संहार करने को उद्यत हो रहा हो, उससे ज्यादा दरिद्र कौन होगा?’ राजा का क्रोध शान्त हुआ और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए उसने वापिस अपने देश को प्रस्थान किया। प्रेरणाः- हमें सदैव संतोषी वृत्ति रखनी चाहिए। संतोषी व्यक्ति को अपने प...

उपकार

 अफ्रीका बहुत बड़ा देश है। उस देश में बहुत घने वन हैं और उन वनों में सिंह, भालू, गैंडा आदि भयानक पशु बहुत होते हैं। बहुत से लोग सिंह का चमड़ा पाने के लिये उसे मारते हैं। गरमी के दिनों में हाथी जिस रास्ते झरने पर पानी पीने जाते हैं, उस रास्ते में लोग बड़ा और गहरा गड्ढा खोद देते हैं, उस गड्ढे के चारों ओर भाले के समान नोंकवाली लकड़ियों को गाड़ देते हैं। फिर गड्ढे को पतली लकड़ियों और पत्तों से ढक देते हैं। जब हाथी पानी पीने निकलते हैं तो उनके दल में सबसे आगे- आगे चल रहा हाथी गड्ढे के ऊपर बिछी टहनियों के कारण गड्ढे को देख नहीं पाता और जैसे ही टहनियों पर पैर रखता है, टहनियाँ टूट जाती हैं और हाथी गड्ढे में गिर जाता है। हाथी पकड़ने वाले उस हाथी को लाकर पहले कई दिनों भूखा रखते हैं। गड्ढे में भी हाथी कई दिन भूखा रखा जाता है, जिससे कमजोर हो जाने के कारण निकलते समय बहुत उधम न मचाए। भूख के मारे हाथी जब छटपटाने लगता है, तब एक आदमी उसे चारा देने जाता है। चारा देने के बहाने वह आदमी हाथी से धीरे- धीरे जान- पहचान कर लेता है और फिर हाथी को वही सिखाता है। शिक्षा देने के बाद हाथी को लोग बेच देते हैं। क...

दो सिर वाला पक्षी : पंचतंत्र की कहानी

 एक तालाब में भारण्ड नाम का एक विचित्र पक्षी रहता था । इसके मुख दो थे, किन्तु पेट एक ही था । एक दिन समुद्र के किनारे घूमते हुए उसे एक अमृतसमान मधुर फल मिला । यह फल समुद्र की लहरों ने किनारे पर फैंक दिया था । उसे खाते हुए एक मुख बोला- "ओः, कितना मीठा है यह फल ! आज तक मैंने अनेक फल खाये, लेकिन इतना स्वादु कोई नहीं था । न जाने किस अमृत बेल का यह फल है ।" दूसरा मुख उससे वंचित रह गया था । उसने भी जब उसकी महिमा सुनी तो पहले मुख से कहा- -"मुझे भी थोड़ा सा चखने को देदे ।" पहला मुख हँसकर बोला- -"तुझे क्या करना है ? हमारा पेट तो एक ही है, उसमें वह चला ही गया है । तृप्ति तो हो ही गई है ।" यह कहने के बाद उसने शेष फल अपनी प्रिया को दे दिया । उसे खाकर उसकी प्रेयसी बहुत प्रसन्न हुई । दूसरा मुख उसी दिन से विरक्त हो गया और इस तिरस्कार का बदला लेने के उपाय सोचने लगा । अन्त में, एक दिन उसे एक उपाय सूझ गया । वह कहीं से एक विषफल ले आया । प्रथम मुख को दिखाते हुए उसने कहा- "देख ! यह विषफल मुझे मिला है । मैं इसे खाने लगा हूँ ।" प्रथम मुख ने रोकते हुए आग्रह किया- "मू...

हंस और राजकुमारी (बाल कहानी

 एक हंस था। वह नीलमणि तालाब में रहता था। तालाब निर्मल पानी से भरा था। वहाँ बड़े सुन्दर-सुन्दर कमल खिले रहते थे। हंस कमलों के बीच तैरता हुआ, न मालूम क्या, सोचा करता था। एक बार पूरब की राजकुमारी तालाब में नहाने आई। हंस को देखकर वह मुग्ध हो गई। उसने सखियों से कहा, 'कितना सुंदर हंस है यह! क्या मैं इसे घर नहीं ले जा सकती?' कमलों से आवाज़ आई, ‘नहीं, नहीं, ऐसा मत करना। यह परियों की रानी का है।' राजकुमारी ने पूछा, 'कहाँ रहती हैं परियों की रानी?' कमल बोले, ‘आओ, चाहती हो, तो तुम्हें मिला दें।' वे उसे तालाब के बीचोंबीच ले गए। पलक झपकते ही वह परियों के महल में पहुँच गई। परियों ने उसे घेर लिया। फिर अपनी रानी के पास ले आईं। परियों की रानी ने पूछा, 'तुम कौन हो?' राजकुमारी ने उत्तर दिया, 'मैं पूरब की राजकुमारी हूँ। आपके हंस को अपने घर ले जाना चाहती हूँ। जो कमल के फूल आपके दरवाजे पर पहरा दे रहे थे, वही मुझे आपके पास लाए हैं।' परियों की रानी ने कहा, 'तुम हंस ले जाना चाहो, तो ले जा सकती हो, किंतु एक शर्त है।' ‘क्या?' पूरब की राजकुमारी ने चौंकते हुए पूछा।...

बुद्धि का बल

 विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां एक ज्योतिषी आ पहुंचा। वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला, “मैं ज्ञानी हूँ ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?” सभी शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे। सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा। अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा। सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे, बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, “तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….” ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा। पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कह...

अछूत कौन ? (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 महात्मा बुद्ध प्रवचन सभा में आकर मौन बैठ गये। शिष्य समुदाय उनके इस मौन के कारण चिंतित हुए कि कहीं वे अस्वस्थ तो नहीं है। आखिर एक शिष्य ने पूछ ही लिया, "भन्‍ते ! आप आज इस तरह मौन क्‍यों हैं?” वे नहीं बोले तो दूसरे शिष्य ने फिर पूछा -"गुरुदेव ! आप स्वस्थ तो हैं?” बुद्ध फिर भी मौन ही बैठे रहे। इतने में बाहर से एक व्यक्ति ने जोर से पूछा -“आज आपने मुझे धर्मसभा में आने की अनुमति क्‍यों नहीं दी?" बुद्ध ने कोई उत्तर नहीं दिया और आंखें बन्द कर ध्यानमग्न हो गये। वह बाहर खड़ा व्यक्ति और जोर से बोला- "मुझे धर्मसभा में क्यों नहीं आने दिया जा रहा है?” धर्मसभा में बैठे बुद्ध के शिष्यों में से एक ने उसका समर्थन करते हुए कहा- “भन्ते! उसे धर्मसभा में आने की अनुमति प्रदान कीजिये।” महात्मा बुद्ध ने आंखें खोलीं और बोले- "नहीं, उसे अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि वह अछूत है।” “अछूत ! मगर क्यों?” सारे शिष्य सुनकर आश्चर्य में पड़ गये कि भन्ते यह छुआछूत कब से मानने लग गये? महात्मा बुद्ध ने शिष्य समुदाय के मन के भावों को ताड़ते हुए कहा "हां, वह अछूत है। वह आज अपनी पत्नी से लड़ क...

धैर्य (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 महात्मा बुद्ध को एक सभा में भाषण करना था । जब समय हो गया तो महात्मा बुद्ध आए और बिना कुछ बोले ही वहाँ से चल गए । तकरीबन एक सौ पचास के करीब श्रोता थे । दूसरे दिन तकरीबन सौ लोग थे पर फिर उन्होंने ऐसा ही किया बिना बोले चले गए ।इस बार पचास कम हो गए । तीसरा दिन हुआ साठ के करीब लोग थे महात्मा बुद्ध आए, इधर – उधर देखा और बिना कुछ कहे वापिस चले गए । चौथा दिन हुआ तो कुछ लोग और कम हो गए तब भी नहीं बोले । जब पांचवां दिन हुआ तो देखा सिर्फ़ चौदह लोग थे । महात्मा बुद्ध उस दिन बोले और चौदोहों लोग उनके साथ हो गए । किसी ने महात्मा बुद्ध को पूछा आपने चार दिन कुछ नहीं बोला । इसका क्या कारण था । तब बुद्ध ने कहा मुझे भीड़ नहीं काम करने वाले चाहिए थे । यहाँ वो ही टिक सकेगा जिसमें धैर्य हो । जिसमें धैर्य था वो रह गए। केवल भीड़ ज्यादा होने से कोई धर्म नहीं फैलता है । समझने वाले चाहिए, तमाशा देखने वाले रोज इधर – उधर ताक-झाक करते है । समझने वाला धीरज रखता है । कई लोगों को दुनिया का तमाशा अच्छा लगता है । समझने वाला शायद एक हजार में एक ही हो ऐसा ही देखा जाता है ।

सुबह का सपना (कहानी) :

 बात असल में यों हुई। उन दिनों शहर में प्रदर्शनी चल रही थी। जाने की कभी तबीयत न हुई। आखिर एक दिन मेरे मित्र मुझे घर से पकड़ ले गए। शायद आखिरी दिन था उसका। चला गया, पर ऐसे जमघटों में अब मन नहीं जमता। वही चिर पहचाने चेहरे ...वही मस्ती और दिखावटी लापरवाही, जो नुमायश में घूमते वक़्त लोगों पर आ जाती है। उसे खूब देख चुका हूँ; देखते-देखते अभ्यस्त हो गया हूँ। सब कुछ साधारण हो गया है। इस नुमायशी जिन्दगी में कोई उतार चढ़ाव नहीं दीखता, सो जाकर सीधा एक पुस्तक-भण्डार पर खड़ा हो गया। मित्र कुछ अँगरेजी की पुस्तकें उलटने-पलटने लगे। मैंने सामने रखी एक पत्रिका उठा ली, उसे खोलने ही जा रहा था कि मित्र ने फुसफुसाकर कहा, “वाह-वाह, क्‍या चीज़ है!” मैंने उनकी पसन्द-भरी आँखों की ओर देखा, तो जैसे पानी को दिशा मिल जाती है, वैसे ही मेरी दृष्टि अनायास उधर घूम गई, जिधर वह देख रहा था। यह एक कलेण्डर था, जिसमें दो स्वस्थ बच्चे, रुई सा सफेद कबतूर पकड़े थे। मन आपसे-आप खिल उठा। उन बच्चों की सारी मासूमियत और कोमलता जैसे हृदय में उतर गई। लगता था अभी यह लड़का अपने दोनों हाथों को झटका देकर कबूतर को आकाश की ओर छोड़ देगा। फ...

संतोष का फल

 एक बार एक देश में अकाल पड़ा। लोग भूखों मरने लगे। नगर में एक धनी दयालु पुरुष थे। उन्होंने सब छोटे बच्चों को प्रतिदिन एक रोटी देने की घोषणा कर दी। दूसरे दिन सबेरे बगीचे में सब बच्चे इकट्ठे हुए। उन्हें रोटियाँ बँटने लगीं। रोटियाँ छोटी- बड़ी थीं। सब बच्चे एक- दूसरे को धक्का देकर बड़ी रोटी पाने का प्रयत्न कर रहे थे। केवल एक छोटी लड़की एक ओर चुपचाप खड़ी थी। वह सबसे अन्त में आगे बढ़ी। टोकरे में सबसे छोटी अन्तिम रोटी बची थी। उसने उसे प्रसन्नता से ले लिया और वह घर चली गयी। दूसरे दिन फिर रोटियाँ बाँटी गयीं। उस लड़की को आज भी सबसे छोटी रोटी मिली। लड़की ने जब घर लौट कर रोटी तोड़ी तो रोटी में से सोने की एक मुहर निकली। उसकी माता ने कहा कि- ‘मुहरउस धनी को दे आओ।’ लड़की दौड़ी -दौड़ी धनी के घर गयी।’’ धनी ने उसे देखकर पूछा- ‘तुम क्यों आयी हो?’ लड़की ने कहा- ‘मेरी रोटी में यह मुहर निकली है। आटे में गिर गयी होगी। देने आयी हूँ। आप अपनी मुहर ले लें।’ धनी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसे अपनी धर्मपुत्री बना लिया और उसकी माता के लिये मासिक वेतन निश्चित कर दिया। बड़ी होने पर वही लड़की उस धनी की उत्तराधिकारिणी ब...

घंटी की कीमत

 रामदास एक ग्वाले का बेटा था। रोज सुबह वह अपनी गायों को चराने जंगल में ले जाता। हर गाय के गले में एक-एक घंटी बँधी थी। जो गाय सबसे अधिक सुंदर थी उसके गले में घंटी भी अधिक कीमती बँधी थी। एक दिन एक अजनबी जंगल से गुजर रहा था। वह उस गाय को देखकर रामदास के पास आया, ‘‘यह घंटी बड़ी प्यारी है ! क्या कीमत है इसकी ?’’ ‘‘बीस रुपये।’’ रामदास ने उत्तर दिया। ‘‘बस, सिर्फ बीस रुपये ! मैं तुम्हें इस घंटी के चालीस रुपये दे सकता हूँ।’’ सुनकर रामदास प्रसन्न हो उठा। झट से उसने घंटी उतारकर उस अजनबी के हाथ में थमा दी और पैसे अपनी जेब में रख लिये। अब गाय के गले में कोई घंटी नहीं थी। घंटी की टुनक से उसे अन्दाजा हो जाया करता था। अतः अब इसका अन्दाजा लगाना रामदास के लिए मुश्किल हो गया कि गाय इस वक्त कहाँ चर रही है। जब चरते-चरते गाय दूर निकल आई तो अजनबी को मौका मिल गया। वह गाय को अपने साथ लेकर चल पड़ा। तभी रामदास ने उसे देखा। वह रोता हुआ घर पहुँचा और सारी घटना अपने पिता को सुनाई। उसने कहा, ‘‘मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि वह अजनबी मुझे घंटी के इतने अच्छे पैसे देकर ठग ले जाएगा।’’ पिता ने, ‘‘ठगी का सुख बड़ा खतरना...

सफलता का रहस्य

 सफलता का रहस्य क्या है? जब यह प्रश्न एक युवक ने युनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से किया तो इस प्रश्न के उत्तर में सुकरात ने उस युवक को कल सुबह नदी किनारे मिलने के लिए कहा। अगले दिन सुबह के समय वह युवक और सुकरात दोनों नदी किनारे पहुंच गए। सुकरात ने नौजवान युवक से उनके साथ पानी में आगे बढ़ने को कहा। युवक सुकरात के साथ नदी में पानी की ओर बढ़ता चला गया। जब आगे बढ़ते- बढ़ते पानी गले तक आ गया। तब अचानक सुकरात ने उस युवक का सिर पानी में डुबो दिया। नौजवान युवक अपना सिर बाहर निकालने के लिए छटपटाने लगा। सुकरात ताकतवर थे इसलिए युवक का पानी से बाहर निकलने का हर प्रयास विफल होता जा रहा था। जब शरीर नीला पड़ने लगा तब जाकर सुकरात ने उस युवक का सिर पानी से बाहर निकाला और बाहर निकलते ही जो काम नौजवान ने सबसे पहले किया वो था हाँफते हुए जल्दी-जल्दी सांस लेना। सुकरात ने उस युवक से पूछा -जब तुम्हारा सिर पानी के भीतर था तब तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे। नौजवान युवक ने उत्तर दिया - सांस लेना। सुकरात ने कहा - बस, यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतना ही ज्यादा चाहोगे जितना कि तुम उस वक्त सांस लेना...

सुकरात और आईना

 दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे। तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा । वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, “मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?” शिष्य कुछ नहीं बोला, उसका सिर शर्म से झुक गया। सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया, “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ” “नहीं”, शिष्य बोला । गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं”। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।” शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी । परंतु उसने एक शंका प्रकट की- “तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए ?” “ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले ,“उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ...

गालियों का प्रभाव (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 महात्मा बुद्ध एक बार एक गांव से गुजरे। वहां के कुछ लोग उनसे शत्रुता रखते थे। उन्होंने उन्हें रास्ते में घेर लिया। बेतहाशा गालियां देकर अपमानित करने लगे। बुद्ध सुनते रहे। जब वे थक गए तो बोले, आपकी बात पूरी हो गई हो, तो मैं जाऊं। वे लोग बड़े हैरान हुए। उन्होंने कहा- हमने तो तुम्हें गालियां दीं, तुम क्रोध क्यों नहीं करते? बुद्ध बोले- तुमने देर कर दी। अगर दस साल पहले आए होते, तो मैं भी तुम्हें गालियां देता। तुम बेशक मुझे गालियां दो, लेकिन मैं अब गालियां लेने में असमर्थ हूं। सिर्फ देने से नहीं होता, लेने वाला भी तो चाहिए। जब मैं पहले गांव से निकला था, तो वहां के लोग भेंट करने मिठाइयां लाए थे, लेकिन मैंने नहीं लीं, क्योंकि मेरा पेट भरा था। वे उन्हें वापस ले गए। बुद्ध ने थोड़ा रुककर कहा- जो लोग मिठाइयां ले गए, उन्होंने मिठाइयों का क्या किया होगा? एक व्यक्ति बोला - अपने बच्चों, परिवार और चाहने वालों में बांटी होंगी। बुद्ध बोले- तुम जो गालियां लाए हो, उन्हें मैंने नहीं लिया। क्या तुम इन्हें भी अपने परिवार और चाहने वालों में बांटोगे..? बुद्ध के सारे विरोधी शर्मिदा हुए और वे बुद्ध के शिष्य ब...

सुख (कहानी) :

 यह किस्सा मुझे वरसोवा के एक मछुआरे ने सुनाया था। तब मैं अपने वीक-एण्ड घर 'पराग' में आकर रुकता था और सागर तट पर घूमता और डूबते सूरज को देखा करता था। तब मेरी जिन्दगी को अफ़वाहों का पिटारा बना दिया गया था। यहाँ तक कि जब मैं सोलह-सत्रह साल की अपनी बेटी मानू को रात के दस-ग्यारह बजे लेकर सन-एण्ड सैण्ड होटल से घर जाने के लिए निकला, तो एक अंग्रेजी अखबार ने छापा--कमलेश्वर को कमसिन लड़कियाँ पसन्द हैं। ऐसे थपेड़ों को बर्दाश्त कर सकना आसान नहीं है। ऐसा ही एक और हादसा मेरी माली (आर्थिक) हालत को लेकर हुआ। फिल्‍मी लेखन के शुरुआती दौर में मैं ब्लैक-मनी नहीं लेता था, पर मेरी लिखी फिल्में जब चल निकलीं तो इनकमटैक्स वालों ने मुझे घेरा। इनकमटैक्स अफसर ने अपने दफ्तर बुलाकर सवाल किया-मि. कमलेश्वर! आपकी आमदनी तो अब प्रति फिल्‍म चार-पाँच लाख होगी क्योंकि फिल्म सफल होते ही लेखक की प्राइस बढ़ जाती है...पर आप फिल्‍मी आमदनी में लाख-सवा लाल से ऊपर नहीं दिखाते; इस पर कैसे विश्वास किया जाए? मैंने कहा-मैं ब्लैक मनी नहीं लेता! सवाल था-यह कैसे मुमकिन है? मैं-क्योंकि मैं जो कुछ कमाता हूँ उसमें खुश हूँ...मेरी खुश...

ब्रह्मा जी के थैले

 इस संसार को बनाने वाले ब्रह्माजी ने एक बार मनुष्य को अपने पास बुलाकर पूछा- ‘तुम क्या चाहते हो?’ मनुष्य ने कहा- ‘मैं उन्नति करना चाहता हूँ, सुख- शान्ति चाहता हूँ और चाहता हूँ कि सब लोग मेरी प्रशंसा करें।’ ब्रह्माजी ने मनुष्य के सामने दो थैले धर दिये। वे बोले- ‘इन थैलों को ले लो। इनमें से एक थैले में तुम्हारे पड़ोसी की बुराइयाँ भरी हैं। उसे पीठ पर लाद लो। उसे सदा बंद रखना। न तुम देखना, न दूसरों को दिखाना। दूसरे थैले में तुम्हारे दोष भरे हैं। उसे सामने लटका लो और बार- बार खोलकर देखा करो।’ मनुष्य ने दोनों थैले उठा लिये। लेकिन उससे एक भूल हो गयी। उसने अपनी बुराइयों का थैला पीठ पर लाद लिया और उसका मुँह कसकर बंद कर दिया। अपने पड़ोसी की बुराइयों से भरा थैला उसने सामने लटका लिया। उसका मुँह खोल कर वह उसे देखता रहता है और दूसरों को भी दिखाता रहता है। इससे उसने जो वरदान माँगे थे, वे भी उलटे हो गये। वह अवनति करने लगा। उसे दुःख और अशान्ति मिलने लगी। तुम मनुष्य की वह भूल सुधार लो तो तुम्हारी उन्नति होगी। तुम्हें सुख- शान्ति मिलेगी। जगत् में तुम्हारी प्रशंसा होगी। तुम्हें करना यह है कि अपने पड़ोस...

सूअर और लड़के

 दो शहरी लड़के रास्ता भूल गए। अँधेरा बढ़ रहा था, अतः मजबूरन उन्हें एक सराय में रुकना पड़ा। आधी रात को एकाएक उनकी नींद उचट गई। उन्होंने पास के कमरे से आती हुई एक आवाज को सुना—‘कल सुबह एक हंडे में पानी खौला देना। मैं उन दोनों बच्चों का वध करना चाहता हूँ।’’ दोनों लड़कों का खून जम गया। ‘हे भगवान !’ वे बुदबुदाए, ‘इस सराय का मालिक तो हत्यारा है !’’ तुरंत उन्होंने वहाँ से भाग जाने का निश्चय किया। कमरे की खिड़की से वे बाहर कूद गए। पर बार पहुँचकर उन्होंने पाया कि बाहर दरवाजे पर ताला लगा हुआ है। अंत में उन्होंने सुअरों के बाड़े में छिपने का निर्णय किया। रात भर उन्होंने जागते हुए बिताई। सुबह सराय का मालिक सुअरों के बाड़े में आया। बड़ा सा छुरा तेज किया और पुकारा—‘‘आ जाओ मेरे प्यारे बच्चों, तुम्हारा आखिरी वक्त आ पहुँचा है !’’ दोनों लड़के भय से काँपते हुए सराय के मालिक के पैरों पर गिर पड़े और गिड़गिड़ाने लगे। सराय का मालिक यह देखकर चकित रह गया। फिर पूछा, ‘‘बात क्या है ?’’ ‘‘हमने रात में आपको किसी से कहते सुना था कि सुबह आप हमें मौत के घाट उतारने वाले हैं।’’ लड़कों ने जवाब दिया। सराय का मालिक यह ...

बिजली और तूफान की कहानी

 बहुत समय पहले बिजली और तूफान धरती पर मनुष्यों के बीच रहा करते थे। राजा ने उन्हें मनुष्यों की बस्ती से दूर रखा था। बिजली तूफान की बेटी थी। जब कभी किसी बात पर बिजली नाराज हो उठती, वह तड़प कर किसी के घर पर गिरती और उसे जला देती या किसी पेड़ को राख कर देती, या खेत की फसल नष्ट कर देती। मनुष्य को भी वह अपनी आग से जला देती थी। जब-जब बिजली ऐसा करती, उसके पिता तूफान गरज-गरजकर उसे रोकने की चेष्टा करते। किंतु बिजली बड़ी ढीठ थी। वह पिता का कहना बिलकुल नहीं मानती थी। यहाँ तक कि तूफान का लगातार गरजना मनुष्यों के लिए सिरदर्द हो उठा। उसने जाकर राजा से इसकी शिकायत की। राजा को उसकी शिकायत वाजिब लगी। उन्होंने तूफान और उसकी बेटी बिजली को तुरंत शहर छोड़ देने की आज्ञा दी और बहुत दूर जंगलों में जाकर रहने को कहा। किंतु इससे भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। बिजली जब नाराज होती, जंगल के पेड़ जला डालती। कभी-कभी पास के खेतों का भी नुकसान कर डालती। मनुष्य को यह भी सहन न हुआ। उसने फिर राजा से शिकायत की। राजा बेहद नाराज हो उठा। उसने तूफान और बिजली को धरती से निकाल दिया और उन्हें आकाश में रहने की आज्ञा दी, जहाँ से ...

नीलकेतु और तेनालीराम : तेनालीराम की कहानी

 एक बार राज दरबार में नीलकेतु नाम का यात्री राजा कृष्णदेव राय से मिलने आया। पहरेदारों ने राजा को उसके आने की सूचना दी। राजा ने नीलकेतु को मिलने की अनुमति दे दी। यात्री एकदम दुबला-पतला था। वह राजा के सामने आया और बोला- महाराज, मैं नीलदेश का नीलकेतु हूं और इस समय मैं विश्व भ्रमण की यात्रा पर निकला हूं। सभी जगहों का भ्रमण करने के पश्चात आपके दरबार में पहुंचा हूं। राजा ने उसका स्वागत करते हुए उसे शाही अतिथि घोषित किया। राजा से मिले सम्‍मान से खुश होकर वह बोला- महाराज! मैं उस जगह को जानता हूं, जहां पर खूब सुंदर-सुंदर परियां रहती हैं। मैं अपनी जादुई शक्ति से उन्हें यहां बुला सकता हूं। नीलकेतु की बात सुन राजा खुश होकर बोले - इसके लिए मुझे क्‍या करना चाहिए? उसने राजा कृष्‍णदेव को रा‍त्रि में तालाब के पास आने के लिए कहा और बोला कि उस जगह मैं परियों को नृत्‍य के लिए बुला भी सकता हूं। नीलकेतु की बात मान कर राजा रात्रि में घोड़े पर बैठकर तालाब की ओर निकल गए। तालाब के किनारे पहुंचने पर पुराने किले के पास नीलकेतु ने राजा कृष्‍णदेव का स्‍वागत किया और बोला- महाराज! मैंने सारी व्‍यवस्‍था कर दी है। ...

मौत की सजा : तेनालीराम की कहानी

 बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह को डर था कि राजा कृष्णदेव राय अपने प्रदेश रायचूर और मदकल को वापस लेने के लिए हम पर हमला करेंगे। उसने सुन रखा था कि वैसे राजा ने अपनी वीरता से कोडीवडु, कोंडपल्ली, उदयगिरि, श्रीरंगपत्तिनम, उमत्तूर और शिवसमुद्रम को जीत लिया था। सुलतान ने सोचा कि इन दो नगरों को बचाने का एक ही उपाय है कि राजा कृष्णदेव राय की हत्या करवा दी जाए। उसने बड़े इनाम का लालच देकर तेनालीराम के पुराने सहपाठी और उसके मामा के संबंधी कनकराजू को इस काम के लिए राजी कर लिया। कनकराजू तेनालीराम के घर पहुंचा। तेनालीराम ने अपने मित्र का खुले दिल से स्वागत किया। उसकी खूब आवभगत की और अपने घर में उसे ठहराया। एक दिन जब तेनालीराम काम से कहीं बाहर गया हुआ था, कनकराजू ने राजा को तेनालीराम की तरफ से संदेश भेजा- ‘आप इसी समय मेरे घर आएं तो आपको ऐसी अनोखी बात दिखाऊं, जो आपने जीवनभर न देखी हो।' राजा बिना किसी हथियार के तेनालीराम के घर पहुंचे। अचानक कनकराजू ने छुरे से उन पर वार कर दिया। इससे पहले कि छुरे का वार राजा को लगता, उन्होंने कसकर उसकी कलाई पकड़ ली। उसी समय राजा के अंगरक्षकों के सरदार ने कनकरा...

बेशकीमती फूलदान : तेनालीराम की कहानी

 विजयनगर का वार्षिक उत्सव बहुत ही धूमधाम से बनाया जाता था। जिसमें आसपास के राज्यों के राजा भी महाराज के लिए बेशकीमती उपहार लेकर सम्मिलित होते थे। हर बार की तरह इस बार भी महाराज को बहुत से उपहार मिले। सारे उपहार में महाराज को रत्नजड़ित रंग – बिरंगे चार फूलदान बहुत ही पसंद आए। महाराज ने उन फूलदानों को अपने विशेष कक्ष में रखवाया और उन फूलदानों की रखवाली के लिए एक सेवक भी रख लिया। सेवक रमैया बहुत ही ध्यान से उन फूलदानों की रखवाली करता था क्योंकि उसे ये काम सौंपने से पहले ही बता दिया गया था कि अगर उन फूलदानों को कोई भी नुकसान पहुंचा तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। एक दिन रमैया बहुत ही सावधानी से उन फूलदानों की सफाई कर रहा था कि अचानक उसके हाथ से एक फूलदान छूटकर ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। जैसे ही महाराज को ये बात पता चली तो उन्होंने चार दिन बाद रमैया को फांसी देना का आदेश सुना डाला। महाराज का ये आदेश सुनते ही तेनालीराम महाराज के पास आया और बोला, “महाराज एक फूलदान के टूट जाने पर आप अपने इतने पुराने सेवक को मृत्युदंड कैसे दे सकते हैं ? ये तो सरासर नाइंसाफी है।” परन्तु महाराज उस समय बह...

कल्याण मित्र (कहानी) : महात्मा बुद्ध से संबंधित

 भगवान बुद्ध देव और मनुष्यों के शास्ता थे, परन्तु सबसे पहले वह मनुष्य थे। मनुष्य बढ़कर देवता बनता है, यह प्राचीन मान्यता थी, आज भी हम मनुष्यत्व के ऊपर देवत्तव की बात करते है, परन्तु बुद्ध ने इस क्रम को पलट दिया। उन्होंने कहा, “यह जो मनुष्यता है, वही देवताओं का सुगति प्राप्त करना कहलाती है।” देवता जब सुगति प्राप्त करता है, तब वह मनुष्य बनता है। देवताओं में विलास है, राग, द्वेष,ईर्ष्या और मोह भी वहां है। निर्वाण की साधना वहां नहीं हो सकती। इसके लिए देवताओं को मनुष्य बनना पड़ता है। मनुष्यों में ही देव पुरुष का आविर्भाव होता है, जिनको देवता नमस्कार करते है। मानवता धर्म का उपदेश देने वाले बुद्ध स्वयं मानवता के जीते जागते रुप थे। यहां उनके जीवन से संबंधित कुद प्रसंग दिये जाते हैं, जिनसे उनके व्यक्तित्व में बैठी हुई गहरी मानवता का दर्शन होता है। भगवान का परिनिर्वाण होने वाला है। रात का पिछला पहर है। भिक्षु उनकी शैया को घेरे बैठे हैं। बुद्ध उन्हें उपदेश दे रहे हैं। कह रहे हैं, “भिक्षुओ, बुद्ध धर्म और संघ के विषय में कुछ शंका हो तो पूछ लो, पीछे मलाल मत करना कि भगवान हमारे सामने थे, पर हम उन...

पत्थर की आँख (कहानी) :

 यह दो दोस्तों की कहानी है। एक दोस्त अमेरिका चला गया। बीस-बाईस बरस बाद वह पैसा कमाके भारत लौट आया। दूसरा भारत में ही रहा। वह गरीब से और ज्यादा गरीब होता चला गया। अमीर ने बहुत बड़ी कोठी बनवाई। उसने अपने पुराने दोस्तों को भी याद किया। गरीब दोस्त मिलने गया। बातें हुईं। गरीब ने कहा-तुमने बहुत अच्छा किया दोस्त, अमेरिका दुनिया- भर के हम गरीबों को लूटता है, तुम अमेरिका को लूट लाए। अमीर दोस्त यह सुनकर खुश हुआ। काफी दिन गुजर गए। गरीब दोस्त के दिन परेशानियों में गुज़र रहे थे। वह कुछ मदद-इमदाद के लिए अमीर दोस्त से मिलना भी चाहता था। तभी अमीर दोस्त की पत्नी का देहान्त अमेरिका में हो गया। वह अपने पति के साथ भारत नहीं लौटी थी। वह भारत में नहीं रहना चाहती थी। दोस्त की पत्नी के स्वर्गवास की ख़बर पाकर गरीब दोस्त मातम-पुर्सी के लिए गया। उसने गहरी शोक-संवेदना प्रकट की। अमीर दोस्त ने कहा-वैसे इतना शोक प्रकट करने की जरूरत नहीं है दोस्त, क्योंकि वह अमेरिका में बहुत खुश थी...वहीं खुशियों के बीच उसने अन्तिम साँस ली। वह यहाँ होती और यहाँ उसकी मौत होती तो मुझे ज्यादा दुःख होता. ..क्योंकि वह दुःखी मरती...पर ...

पेट भरा भरा लगना का कारण

 पेट भरा हुआ महसूस करने के कई कारण होते हैं, और यह अक्सर आपके खाने की आदतों और पूरे स्वास्थ्य से संबंधित होता है। यहां कुछ सामान्य कारण दिए गए हैं जो पेट भरा हुआ महसूस करने में योगदान देते हैं: अधिक भोजन का सेवन: ज़रुरत से अधिक मात्रा में भोजन करने या बहुत जल्दी-जल्दी खाने से पेट भरे होने का एहसास होता है। यह अनुभूति तब होती है जब आपका पेट भोजन को समायोजित करने के लिए फैलता है। डिहाइड्रेशन: कभी-कभी, डिहाइड्रेशन को भूख समझ लिया जाता है। भोजन से पहले और भोजन के दौरान पानी पीने से भूख को नियंत्रित करने और तृप्ति की भावना को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। फाइबर का सेवन: हाई फाइबर वाले खाद्य पदार्थ, जैसे कि फल, सब्जियां और साबुत अनाज, तृप्ति की भावना पैदा करते हैं क्योंकि वे पचने में अधिक समय लेते हैं और संतुष्टि की भावना प्रदान करते हैं। पोषक तत्व डेंसिटी: विटामिन और खनिजों से भरपूर, पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों का चयन आपको कम कैलोरी के साथ पूर्ण और संतुष्ट महसूस करने में मदद करता है। चिकित्सीय स्थितियाँ: कुछ चिकित्सीय स्थितियाँ, जैसे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिसऑर्डर्स या डायबिटीज, आ...

हींग के फायदे

 हींग, जिसे “हिंग” भी कहा जाता है, भारतीय और मिडिल ईस्ट में खाना पकाने में इस्तेमाल किया जाने वाला एक लोकप्रिय मसाला है। यह स्वाद और संभावित स्वास्थ्य गुणों दोनों के संदर्भ में कई लाभ प्रदान करता है: स्वाद बढ़ाने वाला: हींग में तेज़ और तीखी सुगंध होती है। इसका उपयोग विभिन्न व्यंजनों का स्वाद बढ़ाने के लिए, विशेषकर शाकाहारी खाना पकाने में, कम मात्रा में किया जाता है। एंटीमाइक्रोबियल: हींग का उपयोग माइक्रोबियल संक्रमण से लड़ने के लिए एक प्राकृतिक उपचार के रूप में किया गया है। यह छोटे घावों या कीड़े के काटने के इलाज में मदद करता है। रेस्पिरेटरी हेल्थ: ऐसा माना जाता है कि इसके संभावित एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण यह अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी रेस्पिरेटरी हेल्थ के लिए लाभकारी है। अरोमाथेरेपी: हींग की तेज़ गंध का उपयोग अरोमाथेरेपी में आराम लाने और तनाव कम करने के लिए किया जाता है। खाली पेट हींग खाने के फायदे हींग ईरान और अफगानिस्तान के मूल निवासी पौधे की रेसिन से प्राप्त होता है। खाली पेट हींग का सेवन करने से कुछ संभावित लाभ जुड़े हुए हैं, लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस क्षेत्...

सोते समय मुंह से लार क्यों निकलती है

 लार का उत्पादन एक सतत प्रक्रिया है जो पूरे दिन और रात में मुंह में होती है। जब आप जाग रहे होते हैं, तो निगलने और अन्य मौखिक गतिविधियाँ लार के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन जब आप सो रहे होते हैं, तो ये मैकेनिज्म रिलैक्स्ड हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, कभी-कभी आपके मुंह में लार जमा हो जाती है और बाहर निकलने लगती है, जिसे आमतौर पर नींद के दौरान “लार आना” के रूप में जाना जाता है। यह एक प्राकृतिक और सामान्य घटना है, और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लार और निगलने को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियां और नर्व्स नींद के दौरान कम सक्रिय हो जाती हैं। नींद के दौरान लार का प्रवाह बढ़ने में कई कारक योगदान देते हैं: स्थिति: पीठ के बाल सोने की स्थिति में सोने से मुंह में लार जमा होने की संभावना बढ़ जाती है। पीठ के बल सोते समय यह अधिक आम है। नींद की अवस्था: नींद की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान लार का प्रवाह भिन्न-भिन्न होता है। आरईएम (रैपिड आई मूवमेंट) नींद के दौरान इसके होने की अधिक संभावना हो जाती है। मुंह से सांस लेना: कुछ लोग सोते समय स्वाभाविक रूप से अपने मुंह से सांस लेते हैं, जिससे ल...

बाबापुर की रामलीला : तेनालीराम की कहानी

 हर वर्ष दशहरे से पूर्व काशी की नाटक मंडली विजयनगर आती थी। सामान्यतः वे राजा कृष्णदेव राय तथा विजयनगर की प्रजा के लिए रामलीला किया करते थे। परंतु एक बार राजा को सूचना मिली कि नाटक मंडली विजयनगर नहीं आ रही है। इसका कारण यह था कि नाटक मंडली के कई सदस्य बीमार हो गए थे। यह सूचना पाकर राजा बहुत दुःखी हुए, क्योंकि दशहरे में अब कुछ ही दिन बाकी थे। इतने कम दिनों में दूसरी नाटक मंडली की भी व्यवस्था नहीं की जा सकती थी। पास में दूसरी कोई नाटक मंडली नहीं होने के कारण इस वर्ष रामलीला होने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे जबकि दशहरे से पूर्व रामलीला होना विजयनगर की पुरानी संस्कृति थी। महाराज को इस तरह दुःखी देखकर राजगुरु बोले, 'महाराज, यदि चाहें तो हम रामपुर के कलाकारों को संदेश भेज सकते हैं?' 'परंतु, इसमें तो कुछ सप्ताह का समय लगेगा', राजा ने निराश स्वर में कहा। इस पर तेनालीराम बोले, 'महाराज, मैं पास ही की एक मंडली को जानता हूं, वे यहां दो दिन में आ जाएंगे और मुझे विश्वास है कि वे रामलीला का अच्छा प्रदशन करेंगे। यह सुनकर राजा प्रसन्न हो गए और तेनालीराम को मंडली को बुलाने की जिम्मेद...

कुछ नहीं : तेनालीराम की कहानी

 तेनालीराम राजा कृष्ण देव राय के निकट होने के कारण बहुत से लोग उनसे जलते थे। उनमे से एक था रघु नाम का ईर्ष्यालु फल व्यापारी। उसने एक बार तेनालीराम को षड्यंत्र में फसाने की युक्ति बनाई। उसने तेनालीराम को फल खरीदने के लिए बुलाया। जब तेनालीराम ने उनका दाम पूछा तो रघु मुस्कुराते हुए बोला, “आपके लिए तो इनका दाम ‘कुछ नहीं’ है।” यह बात सुन कर तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोका और कहा कि मेरे फल के दाम तो देते जाओ। तेनालीराम रघु के इस सवाल से हैरान हुए, वह बोले कि अभी तो तुमने कहा की फल के दाम ‘कुछ नहीं’ है। तो अब क्यों अपनी बात से पलट रहे हो। तब रघु बोला की, मेरे फल मुफ्त नहीं है। मैंने साफ-साफ बताया था की मेरे फलों का दाम कुछ नहीं है। अब सीधी तरह मुझे ‘कुछ नहीं’ दे दो, वरना मै राजा कृष्ण देव राय के पास फरियाद ले कर जाऊंगा और तुम्हें कठोर दंड दिलाऊँगा। तेनालीराम सिर खुझाने लगे। और यह सोचते-सोचते वहाँ से अपने घर चले गए। उनके मन में एक ही सवाल चल रहा था कि इस पागल फल वाले के अजीब षड्यंत्र का तोड़ कैसे खोजूँ। इसे कुछ नहीं कहाँ से लाकर दूँ। अगले ही...

जादूगर का घमंड : तेनालीराम की कहानी

 एक बार राजा कृष्ण देव राय के दरबार में एक जादूगर आया। उसने बहुत देर तक हैरतअंगेज़ जादू करतब दिखा कर पूरे दरबार का मनोरंजन किया। फिर जाते समय राजा से ढेर सारे उपहार ले कर अपनी कला के घमंड में सबको चुनौती दे डाली- क्या कोई व्यक्ति मेरे जैसे अद्भुत करतब दिखा सकता है। क्या कोई मुझे यहाँ टक्कर दे सकता है? इस खुली चुनौती को सुन कर सारे दरबारी चुप हो गए। परंतु तेनालीराम को इस जादूगर का यह अभिमान अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत उठ खड़े हुए और बोले कि हाँ मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि जो करतब मैं अपनी आँखें बंद कर के दिखा दूंगा वह तुम खुली आंखो से भी नहीं कर पाओगे। अब बताओ क्या तुम मेरी चुनौती स्वीकार करते हो? जादूगर अपने अहम में अंध था। उसने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। तेनालीराम ने रसोइये को बुला कर उस के साथ मिर्ची का पाउडर मंगवाया। अब तेनालीराम ने अपनी आँखें बंद की और उनपर एक मुट्ठी मिर्ची पाउडर डाल दिया। फिर थोड़ी देर में उन्होंने मिर्ची पाउडर झटक कर कपड़े से आँखें पोंछ कर शीतल जल से अपना चेहरा धो लिया। और फिर जादूगर से कहा कि अब तुम खुली आँखों से यह करतब करके अपनी जादूगरी का नमूना दिखाओ।...

अंगूठी चोर : तेनालीराम की कहानी

 महाराजा कृष्ण देव राय एक कीमती रत्न जड़ित अंगूठी पहना करते थे। जब भी वह दरबार में उपस्थित होते तो अक्सर उनकी नज़र अपनी सुंदर अंगूठी पर जाकर टिक जाती थी। राजमहल में आने वाले मेहमानों और मंत्रीगणों से भी वह बार-बार अपनी उस अंगूठी का ज़िक्र किया करते थे। एक बार राजा कृष्ण देव राय उदास हो कर अपने सिंहासन पर बैठे थे। तभी तेनालीराम वहाँ आ पहुंचे। उन्होने राजा की उदासी का कारण पूछा। तब राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, और उन्हे पक्का शक है कि उसे उनके बारह अंग रक्षकों में से किसी एक ने चुराया है। चूँकि राजा कृष्ण देव राय का सुरक्षा घेरा इतना चुस्त होता था की कोई चोर-उचक्का या सामान्य व्यक्ति उनके नज़दीक नहीं जा सकता था। तेनालीराम ने तुरंत महाराज से कहा कि- मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूँगा। यह बात सुन कर राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने तुरंत अपने अंगरक्षकों को बुलवा लिया। तेनालीराम बोले, “राजा की अंगूठी आप बारह अंगरक्षकों में से किसी एक ने की है। लेकिन मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूँगा। जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं और जो चोर है वह कठोर दण्ड भोगने के...

पड़ोसी राजा : तेनालीराम की कहानी

 विजयनगर राज्य का अपने पड़ोसी राज्य से मनमुटाव चल रहा था। तेनाली राम के विरोधियों को तेनाली राम के खिलाफ राजा कृष्णदेव राय को भड़काने का यह बड़ा ही सुन्दर अवसर जान पड़ा। एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने बगीचे में अकेले बैठे पड़ोसी राज्य की समस्या के बारे में ही सोच रहे थे कि तभी एक दरबारी उनके पास पहुंचा और बड़ी होशियारी से इधर उधर झांकता हुआ राजा के कान के पास मुंह ले जाकर बोला, ‘‘महाराज, कुछ सुना आपने ?’’ ‘‘नहीं तो..क्या हुआ ?’’ राजा चौंके। ‘‘महाराज, क्षमा करें। पहले जान बख्श देने का वचन दें तो कुछ कहूं।’’ ‘‘जो भी कहना हो, निस्संकोच कहो, डरने की कोई बात नहीं है।’’ राजा ने दरबारी को अभय दान देते हुए कहा। ‘‘महाराज, तेनाली राम पड़ोसी राजा से मिले हुए हैं। वे हमारे पड़ोसी राजा के साथ हमारे सम्बन्ध बिगाड़ना चाहते हैं।’’ ‘‘क्या बकते हो ?’’ राजा गरज कर बोले। मैं तो पहले ही समझ गया था महाराज। तेनाली राम ने आप के ऊपर ऐसा जादू किया हुआ है कि आप उसकी शिकायत सुन ही नहीं सकते, या यूं कहिए कि तेनाली राम की शिकायत आपके कानों को सहन नहीं होती।’’ ‘‘तेनाली राम राज्य का सच्चा वफादार है। वह कभी राजद्रो...

महामूर्ख : तेनालीराम की कहानी

 राजा कृष्णदेव राय होली का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाते थे। होली के दिन मनोविनोद के अनेक कार्यक्रम विजयनगर में होते थे। प्रत्येक कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार देने की व्यवस्था भी होती थी। सबसे बड़ा तथा सबसे मूल्यवान पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था। तेनाली राम को हर साल सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का पुरस्कार तो मिलता ही था। अपनी चतुराई और बुद्धिमानी के बल पर प्रतिवर्ष ‘महामूर्ख’ भी वही चुना जाता था। इस तरह तेनाली राम हर वर्ष दो-दो पुरस्कार अकेले हड़प लेता था। इसी कारण अन्य दरबारियों को प्रतिवर्ष ईर्ष्या की आग में झुलसना पड़ता था। इस साल अन्य दरबारियों ने फैसला कर लिया था कि इस बार होली के उत्सव पर तेनाली राम का पत्ता ही साफ कर दिया जाए। उसके लिए उन्होंने एक तरकीब भी खोज ली थी। तेनाली राम के प्रमुख सेवक को पढ़ा-सिखाकर उसके द्वारा तेनाली राम को छककर भंग पिलवा दी गई। होली के दिन इसी कारण तेनाली भंग के नशे की तरंग में घर पर ही पड़ा रहा। दोपहर बाद जब तेनाली राम की नींद खुली तो वह घबरा गया और इसी घबराहट में भागता-भागता दरबार में पहुंच गया। जब वह दरबार में पहुंचा, ...

घरेलु उपाए: नाखून बढ़ाने का तरीका

 नीचे दिए गए घरेलु नुस्के आपके नाखून बढ़ाने में करेंगे मदद – 1. नारियल का तेल एक कटोरी में थोड़ा अतिरिक्त कुंवारी नारियल का तेल लें और इससे अपने नाखूनों और उंगलियों की मालिश करें। मालिश करते समय, गोलाकार गति का उपयोग करें क्योंकि यह रक्त प्रवाह में सुधार करने में सहायता करेगा और इस प्रकार नाखून के विकास को बढ़ावा देगा। इसे रोज रात को सोने से पहले करें। 2. जैतून का तेल गुनगुने जैतून के तेल से अपने नाखूनों और क्यूटिकल्स की लगभग 5 मिनट तक मालिश करें। अपने हाथों को ढकने के लिए दस्ताने पहनें और रात भर ऐसे ही छोड़ दें। इसे दिन में एक बार करें। 3. ऑरेंज जूस एक कटोरी में संतरे का रस लें और इसमें अपने नाखूनों को लगभग 10 मिनट तक डुबोकर रखें। गर्म पानी का उपयोग करके अपने नाख़ून धो लें और अच्छी तरह से मॉइस्चराइज़ करें। ऐसा आपको दिन में कम से कम एक बार जरूर करना चाहिए। 4. नींबू का रस हम जानते हैं कि नींबू में उच्च विटामिन सी होता है जो स्वस्थ नाखूनों के विकास के लिए अच्छा होता है। नाखूनों पर नींबू लगाने से ब्लीचिंग प्रभाव के कारण नाखूनों के दाग से छुटकारा मिल सकता है। प्रत्येक दिन, आपको लगभग 5 ...

लाल मोर : तेनालीराम की कहानी

 विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय को अद्भुत व विलक्षण चीजें संग्रह करने का बहुत शौक था। हर दरबारी उन्हें खुश रखने के लिए ऐसी ही दुर्लभ वस्तुओं की खोज में रहता था ताकि वह चीज महाराज को देकर उनका शुभचिंतक बन सके तथा रुपये भी ऐंठ सके। एक बार एक दरबारी ने एक अनोखी चाल चली। उसने एक मोर को रंगों के एक विशेषज्ञ से लाल रंगवा लिया और उस लाल मोर को लेकर वह सीधा राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुंचा और राजा से बोला-‘‘महाराज ! मैंने मध्य प्रदेश के घने जंगलों से आपके लिए एक अद्भुत व अनोखा मोर मंगाया है।’’ राजा कृष्णदेव राय ने उस मोर को बड़े गौर से देखा। उन्हें बड़ा ताज्जुब हो रहा था...‘‘लाल मोर...वास्तव में आपने हमारे लिए अद्भुत चीज मंगाई है। हम इसे राष्ट्रीय उद्यान में बड़ी हिफाजत से रखवाएंगे। अच्छा...यह तो बताओ कि इस मोर को मंगाने में तुम्हें कितना रुपया खर्च करना पड़ा ?’’ दरबारी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो वह प्रसन्न हो उठा। बड़े ही विनम्र भाव से वह राजा से बोला, ‘‘महाराज, आपके लिए यह अनोखी वस्तु लाने के लिए मैंने अपने दो सेवक पूरे देश की यात्रा पर भेज रखे थे। वे वर्षों तक किसी अद्भुत वस्तु की खोज म...

ब्राह्मण किसकी पूजा करे : तेनालीराम की कहानी

 एक दिन महाराज कृष्णदेव राय ने कहा ‘‘सभी दरबारी तथा मंत्रीगणों को यह आभास तो हो ही गया होगा कि आज दरबार में कोई विशेष कार्य नहीं और ईश्वर की कृपा से किसी की कोई समस्या भी हमारे सम्मुख नहीं। अतः क्यों न किसी विषय पर चर्चा की जाए। क्या आप जैसे योग्य मंत्रियों व दरबारियों में से कोई सुझा सकता है ऐसा विषय, जिस पर चर्चा कराई जा सके ।’’ तभी तेनालीराम बोला, ‘‘महाराज, विषय का निर्णय आप ही करें तो अच्छा होगा।’’ महाराज ने कुछ सोचा और फिर बोले, ‘‘जैसा कि आप सभी जानते हैं कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-तीनों वर्ग ब्राह्मण को पूजनीय मानें ?’’ सभी दरबारियों व मन्त्रियों को महाराज का यह प्रश्न बेहद सरल प्रतीत हुआ। ‘‘इसमें कठिनाई क्या है महाराज ? ब्राह्मण गाय को पवित्र मानते हैं... गाय जो कामधेनु का प्रतीक है।’’ एक मंत्री ने उत्तर दिया। दरबार में उपस्थित सभी लोग उससे सहमत लगे। तभी महाराज बोले, ‘‘तेनालीराम, क्या तुम भी इस उत्तर से संतुष्ट हो या तुम्हारी कुछ अगल राय है।’’ तेनालीराम हाथ जोड़ते हुए विनम्र भाव से बोला, ‘‘महाराज ! गाय को तो सभी पवित्र मानते हैं, चाहे मानव हो या देवता। और ऐसा मानने वाला मैं अ...

सुब्बा शास्त्री को सबक मिला :

 एक बार फारस देश से घोड़ों का एक व्यापारी कुछ बेहद उत्तम नस्ल के घोड़े लेकर विजय नगर आया। सभी जानते थे कि महाराज कृष्णदेव राय घोड़ों के उत्तम पारखी हैं। उनके अस्तबल में चुनी हुई नस्लों के उत्तम घोड़े थे। महाराज ने फारस के व्यापारी द्वारा लाए गए घोड़ों का निरीक्षण किया तो पाया कि वे घोड़े दुर्लभ नस्ल के हैं। उन्होंने व्यापारी से सभी घोड़े खरीद लिए, क्योंकि वे अपनी घुड़सवारी सेना को और मजबूत व सुसज्जित करना चाहते थे। जब घोड़ों का व्यापारी चला गया तो महाराज ने अपनी घुड़सवार सेना के चुने हुए सैनिकों को बुलाया और एक-एक घोड़ा देते हुए उसकी अच्छी तरह देखभाल और उसे भलीभांति प्रशिक्षित करने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि घोड़ों के प्रशिक्षण व भोजनादि का सारा खर्च राजकोष वहन करेगा। तेनालीराम को जब पता चला तो वह भी महाराज के पास पहुंचा और एक घोड़ा अपने लिए भी माँगा। उसे भी एक घोड़ा दे दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को घर लाकर अस्तबल में बाँध दिया। लेकिन उसे न जाने क्या सूझा कि उसने अस्तबल के सामने की ओर भी दीवार उठवा दी। अब अस्तबल की स्थिति कुछ ऐसी हो गई थी कि न तो वह घोड़ा कहीं बाहर जा सकता था। औ...

हीरों का सच

 एक बार राजा कृष्णदेवराय दरबार में बैठे मंत्रियों के साथ विचार विमर्श कर रहे थे कि तभी एक व्यक्ति उनके सामने आकर कहने लगा,”महाराज मेरे साथ न्याय करें। मेरे मालिक ने मुझे धोखा दिया है। इतना सुनते ही महाराज ने उससे पूछा, तुम कौन हो? और तुम्हारे साथ क्या हुआ है।” “अन्नदाता मेरा नाम नामदेव है। कल मैं अपने मालिक के साथ किसी काम से एक गाँव में जा रहा था। गर्मी की वजह से चलते-चलते हम थक गए और पास में स्थित एक मंदिर की छाया में बैठ गए। तभी मेरी नज़र एक लाल रंग की थैली पर पड़ी जो की मंदिर के एक कोने में पड़ी हुई थी। मालिक की आज्ञा लेकर मैंने वो थैली उठा ली उसे खोलने पर पता चला कि उसके अंदर बेर के आकार के दो हीरे चमक रहे थे। हीरे मंदिर में पाए गए थे इसलिए उन पर राज्य का अधिकार था। परन्तु मेरे मालिक ने मुझसे ये बात किसी को भी बताने से मना कर दिया और कहा कि हम दोनों इसमें से एक-एक हीरा रख लेंगे। मैं अपने मालिक की गुलामी से परेशान था इसलिए मैं अपना काम करना चाहता था जिसके कारण मेरे मन में लालच आ गया।हवेली आते ही मालिक ने हीरे देने से साफ़ इनकार कर दिया।यही कारण है कि मुझे इन्साफ चाहिए। महाराज ने तु...