Thursday, July 13, 2023

मोबाइल यद्यपि जीवन का अनिवार्य अंग है तथापि इसके इतने अधीन हो जाना कि जीवन में सुख आराम नींद छीन जाए और रिश्ते भी दांव पर लग जाए यह तो उचित नहीं है. चिन्ता का विषय है कि मोबाइल के ज्यादा उपयोग से सम्बन्धों में दरार आ रही है.

 जिन्दगी के साथ जिन्होंने हमेशा ही संघर्ष किया. जिनके जीवन में नवीनताएं नहीं रहीं जो परिवार के लिए रोजी रोटी जुटाने में ही लगे रहे. मनोरंजन के साधनों का जिन्हें सदैव ही अभाव रहा. देश विदेश घूमने की चाह तो जिनके लिए एक कल्पना ही बनी रही जो अपने ही देश में अपनों के सपने पूरे करने के कारण घूम नहीं सके. ऐसे बुजुर्ग अपने व्यवसाय या नौकरी की समाप्ति के पश्चात् अकेलेपन को झेलते थे.


नीरस जीवन जीने को विवश रहते थे. पर आज जमाना बदला है. आज वो स्थिति नहीं है. आज उनके हाथ में स्मार्टफोन है. जिन्दगी की ढलती सांझ में ये उनका सच्चा साथी साबित हो रहा है. आज उनका अकेलापन. नौकरी के बाद का खालीपन. बच्चों के साथ समय ना बिता पाने की कसक. अड़ोस पड़ोस में लम्बी चौड़ी बातें बनानें की ललक सब बेमानी हो गया है. उनकी जिन्दगी बेरंग ना होकर खिल उठी है. उनके हाथ में स्मार्ट फोन है. इसमें उन्हें सब कुछ मिल गया है. वे इसके आदी हो गए हैं. मोबाइल उनकी अनिवार्य आवश्यकता हो गया है. नीरसता का अभाव नहीं रहा. सजीवता बनी रहती है. कुछ बुजुर्ग तो हर वक्त ही फोन से चिपके रहते हैं.


बैंक के एक मैनेजर हैं रिटायर्ड होने के बाद सारा दिन फोन पर ही समय व्यतीत करते हैं. कोई काम बताओ तो भी फोन पर चलती हुई वीडियो पूरी होने के बाद ही उठेंगे. घर के सभी लोग उनके निरन्तर फोन देखने के कारण परेशान रहते हैं. मूवी. समाचार के इतने आदी हो गये हैं कि कभी-कभी तो पत्नी भी खीज जाती है. उनके लिए भी वक्त नहीं निकाल पाते. कह भी देती हैं किसी और काम में भी तो मन लगा लिया करो. हर वक्त फोन से ही चिपके रहते हो. ये एक घर की कहानी नहीं. घर-घर का किस्सा है कि बुजुर्ग भी अब व्यस्त हो गये हैं. नींद का बुढ़ापे से बैर है या यूं कहें कि वृद्धावस्था में नींद कम हो जाती है. अब इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता फोन ने आराम व रातों की नींद भी छीन ली है. पर अब नींद ना आने का भी गम नहीं है. सच्चा सुख फोन में ही है.

एक शख्स हैं पार्क में सुबह की सैर के लिए नियमित रूप से आते हैं. घर के गेट से निकलते ही हाथ में फोन आ जाता है. फिर तो कितनी देर भी घूमना हो एक मुद्रा में फोन ही देखते रहते हैं. उन्हें देखने वाले बोर हो जाएं पर वो अपने उसी रूप में हर दिन टहलते हैं. वाकई इंसान इसका गुलाम हो गया है. युवा तो इसके बिना रह ही नहीं पाते पर बुजुर्गों का हाल भी कम बुरा नहीं है. जापान में जानकारी में आया है कि बुजुर्ग अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए स्मार्टफोन का कुछ ज्यादा ही प्रयोग कर रहे हैं इससे उनके रिश्तों पर भी फर्क पड़ रहा है. हर वक्त ऑनलाइन रहने के कारण परिवार वाले उनसे मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने को जब टोकते हैं तो उनका व्यवहार बदल जाता है. वे उन्हें अपना हितैषी नहीं समझते और दुर्व्यवहार करने लगते हैं.


जापान के साठ साल से ज्यादा के 80 प्रतिशत लोग स्मार्ट फोन का प्रयोग करते हैं. ये बुजुर्ग टीवी कम्प्यूटर से दूर रहकर मोबाइल ज्यादा पसन्द करते हैं. ये सोशल साइट्स पर अपना सारा समय व्यतीत करते हैं. ये वे व्यक्ति हैं जो अपनी नौकरी के समय में मोबाइल फोन का जरूरत के समय ही इस्तेमाल करते थे पर आज वे इसके इतने आदि हैं कि स्मार्ट फोन के अलावा उनका अपना कोई नहीं है. कुछ वर्ष पूर्व बुजुर्ग अपने हमउम्र लोगों के साथ समय व्यतीत करते थे. घूमने जाते थे. पंचायत सी जुटाकर अपना समय बिताते थे. मिल-जुलकर रहने में विश्वास करते थे.


वहीं आज मोबाइल की अनिवार्यता स्वीकार करते हैं. उनके मित्रों का दायरा कम हो रहा है. बातचीत के द्वार बन्द हो रहे हैं. शून्यता मुखर हो रही है. चिन्ता का विषय है कि सम्बन्धों में दरार आ रही है. मोबाइल यद्यपि जीवन का अनिवार्य अंग है तथापि इसके इतने अधीन हो जाना कि जीवन में सुख आराम नींद छीन जाए और रिश्ते भी दांव पर लग जाए यह तो उचित नहीं है. दादा जी के पास अपनी नौ वर्षीय बेटी को होमवर्क करने को कहकर लीना अपने ऑफिस चली गयी. शाम को लौटी तो देखा कि होमवर्क तो किया है पर दादा जी ने जरा भी ध्यान नहीं दिया. सुलेख. मात्रा विकार और भी काफी गलतियां थीं. पूछने पर बेटी ने बताया कि दादा जी तो सारे समय फोन पर ही थे. उससे जैसा हुआ कर दिया. बड़ा क्षोभ हुआ गुस्सा भी आया पर बड़े हैं. इस लिहाज से चुप रही बड़बड़ायी तो जरूर कि बड़े बच्चों को क्या सिखा रहे हैं. खुद पर नियन्त्रण नहीं रख सकते. बच्चे कैसे रखेंगे. ना जाने क्या आकर्षण है. मोबाइल में कि बुजुर्ग भी अपना स्वभाव भूलते जा रहे हैं.

नीरा की सास तो जब भी उसके घर आती हैं. हर वक्त फोन पर अपने रिश्तेदारों से बतियाती रहती हैं. घण्टों तक फोन से चिपकी रहती हैं. सुनने वाले भी उकता जाते हैं घर में नकारात्मकता का वातावरण रहता है. मना कर नहीं सकते. सुनना मजबूरी हो जाती है. लेकिन एक पक्ष ये भी है कि उनकी जिन्दगी का सरलीकरण भी हो गया है वे अपने समय को अच्छे से व्यतीत कर पाते हैं. गुजरते वक्त के साथ मोबाइल उनका हमदर्द हो गया है.


रमन की माता जी काफी प्रतिभा सम्पन्न आौर प्रभावी व्यक्तित्व की स्वामिनी थी. बुढ़ापा आने से विवश हो गयीं. स्मार्ट फोन तो नहीं सादे से फोन से ही नम्बर मिलाकर लड़कियों से और रिश्तेदारों से बातें कर लिया करती थीं. बेटे बहू के पास तो फुर्सत के क्षण होते नहीं थे. रमन को भी ऑफिस में फोन लगा देती थीं. रमन ने उनकी इस आदत से परेशान होकर उनसे फोन ही ले लिया. उसे ऐसा लगता था कि लड़कियों और रिश्तेदारों को फोन करके घर की बातें बताती हैं. बूढ़ी मां की छटपटाहट को बेटियों ने महसूस किया पर लाचार मां से बात नहीं कर पाने की पीड़ा को झेलकर दुखी होती रहतीं.


बूढ़ों की कमजोर अवस्था में उनके प्रति इतने क्रूर भी ना बने कि उनसे जिन्दगी की वो खुशी ही छीन लें जो उनका सहारा हो. बुजुर्ग फोन में अपनी खुशियां ढूंढ़ रहे हैं. इससे उनके जीने का अंदाज बदला है. उनकी सोच और बदलती जीवन शैली से वृद्धावस्था में फोन उनका सच्चा साथी बनकर आया है. उन्हें उनके अन्दाज में जीने की खुशियां मिलती रहें. हमारा यही प्रयास होना चाहिए.

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