Thursday, July 13, 2023

Untouchability in India: 29 अप्रैल 1947 को सभा के सदस्य प्रमथ रंजन ठाकुर ने इस विषय पर बहस करते हुए प्रश्न उठाया कि ''बिना वर्ण व्यवस्था को उठाये आप अस्पृश्यता को कैसे उठा सकते हैं? अस्पृश्यता और कुछ नहीं है, यह तो वर्ण व्यवस्था रूपी रोग का लक्षण है.''

 आधुनिक भारत की सामाजिक व्यवस्था के कुछ उदाहरण हैं :-

मध्यप्रदेश के राजगढ़ में मालाकार समाज के युवक ओम मालाकार ने वाल्मीकि समाज के युवक की शादी में भागीदारी की और वहां सभी के साथ मिलजुलकर खाना खाया. इसकी फोटो सोशल मीडिया पर भी साझा की गई. इससे प्रभुत्व संपन्न जाति ने ओम मालाकार के काम को सामाजिक अपराध माना. और उस पर 5100 रुपये का अर्थदंड लगाया. इसके साथ ही उसे अपने बाल उतारने और शुद्धिकरण के लिए शिप्रा स्नान करने का आदेश दिया.


गुजरात के पाटन जिले में काकोशी गाँव में एक घटना हुई. वहां एक स्कूल में क्रिकेट मैच के दौरान एक बच्चे ने गेंद उठा ली. इससे वहां बवाल मच गया. तात्कालिक रूप से तो आपसी विवाद शांत हो गया, लेकिन शाम को सात लोगों के समूह ने उस बच्चे के घर पर हमला कर दिया और उस बच्चे के चाचा धीरज परमार का अंगूठा काट दिया और गंभीर रूप से घायल कर दिया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह बच्चा, जिसने क्रिकेट की गेंद को छुआ था वह दलित समुदाय से सम्बद्ध था.


उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बैनोल गाँव का 22 साल का आयुष मंदिर गया. वह ईश्वर की पूजा करना चाहता था. लेकिन समाज की ऊंची जाति के लोगों को आयुष का ईश्वर की पूजा करना मंज़ूर नहीं था, क्योंकि वह दलित समाज से सम्बद्ध था. ईश्वर की पूजा करने की आकांक्षा के एवज़ में आयुष को जलती लकड़ियों से घाव ग्रहण करने की सजा मिली.

मध्यप्रदेश के गरोठ में एक गाँव है पिपलिया राजा. इस गाँव में एक दिन में दो शादियाँ हो रही थीं. एक शादी मेघवाल समाज में थी और दूसरी मीणा समाज में. मेघवाल समाज के बिंदोली-बारात निकालने से मीणा समाज को नाराजगी थी. उनकी नाराजगी का महत्व उनकी जाति के कारण बड़ा आकार ले लेता है. मेघवाल समाज भारतीय व्यवस्था का वंचित समूह है. इस समूह का एक युवक भारत की सेना में शामिल होकर देश की सुरक्षा में जुटा है. उसके बारात निकालने पर समाज की ऊंची जातियों को नाराजगी होती है और वे बारातियों पर पथराव करते हैं, मारपीट करते हैं. पुलिस आती है, मेघवाल समाज के लोगों की सुरक्षा करती है, तो उस पर भी पथराव किया जाता है.


ये वर्ष 2023 के भारत की घटनाएं हैं. भारत अपने भीतर गहरे तक जड़ें जमाये बैठे छुआछूत और जातिवाद के जहर से मुक्त नहीं हो पाया है. जब तक इन जड़ों को पोषित किया जाता रहेगा, तब तक कोई भी विकास, कोई भी बेहतरी बेमानी ही होगी. भारत की स्वतंत्रता के आन्दोलन के दौरान ही महात्मा गांधी और बाबा साहेब अम्बेडकर यही कह रहे थे कि अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्त हो जायेंगे, लेकिन समाज के भीतर की गुलामी से मुक्त होने की क्या तैयारी है?


भारतीय संविधान सभा ने 24 जनवरी 1947 यानी पूर्ण स्वतंत्रता हासिल होने से पहले ही भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों से सम्बंधित व्यवस्था और प्रावधान तय करने के लिए सलाहकार समिति का गठन कर दिया था. इसके अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल थे. इस समिति ने 23 अप्रैल 1947 को अपनी रिपोर्ट संविधान सभा में प्रस्तुत की. इसी समिति ने प्रस्ताव दिया था कि देश में समता का अधिकार होना चाहिए, छुआछूत, शोषण और भेदभाव की समाप्ति होना चाहिए और इसके लिए समिति की रिपोर्ट में निम्न प्रावधान किये गए थे –

4 (1) राज्य की ओर से किसी नागरिक के विरुद्ध धर्म, जाति, वर्ण या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं बरता जाएगा. (इसमें व्याख्या की गई थी कि व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, सार्वजनिक रेस्टोरेंट, होटल और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान, कुएं, तालाब, सड़कें, सार्वजनिक सम्मिलन के स्थान आदि शामिल हैं.)


4 (6) ‘अस्पृश्यता” को, चाहे वह किसी रूप में हो, ख़त्म किया जाता है और इस सम्बन्ध में किसी भी असमर्थता को लागू करना अपराध समझा जाएगा.


ये घोषणाएं भारत के आज़ाद होने से पहले कर दी गई थीं. इसका अर्थ यह है कि संविधान सभा शुरू से ही स्वतंत्र भारत में भेदभाव और छुआछूत की समाप्ति के लिए प्रतिबद्ध थी. संविधान सभा की विभिन्न समितियों की रिपोर्ट के आधार पर चर्चा के लिए पहला प्रारूप बनाने की जिम्मेदारी 14 जुलाई 1947 को संविधान सभा के सलाहकार बी. एन. राऊ को सौंपी गई. यह प्रारूप 14 अक्टूबर 1947 को संविधान सभा के सामने प्रस्तुत किया गया. संवैधानिक सलाहकार के प्रारूप में जो भी प्रावधान भारत शासन अधिनियम से लिए गए थे, उनके साथ इस अधिनियम का सन्दर्भ पूरी पारदर्शिता के साथ दर्ज किया गया था. बी. एन. राऊ द्वारा बनाए गए प्रारूप में भेदभाव के सन्दर्भ में धर्म, जाति, वर्ण या लिंग के ”मूलवंश” को भी जोड़ा गया.


इसी दौरान 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने संविधान का मसौदा बनाने के लिए 7 सदस्यों की ‘मसौदा समिति” का गठन किया. इस समिति ने 30 अगस्त 1947 को हुई अपनी पहली बैठक में ही डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को अपना अध्यक्ष चुना. यह भारत के इतिहास की अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक घटना थी, क्योंकि स्वतंत्र भारत का रूप-स्वरुप-मूल्य-शासन व्यवस्था कैसी होगी, यह दिशा तय करने का काम समाज के सबसे वंचित तबके के विद्वान् व्यक्ति को सौंपा गया. संवैधानिक सलाहकार की रिपोर्ट आ जाने के बाद 30 अक्टूबर 1947 को मसौदा समिति की पहली बैठक हुई और इसी बैठक में इन दोनों अनुच्छेदों को स्वीकार कर लिया गया.


संविधान सभा असमानता, भेदभाव और छुआछूत सरीखे विषय पर महज औपचारिकतापूर्ण बहस नहीं कर रही थी. 29 अप्रैल 1947 को सभा के सदस्य प्रमथ रंजन ठाकुर ने इस विषय पर बहस करते हुए प्रश्न उठाया कि ”बिना वर्ण व्यवस्था को उठाये आप अस्पृश्यता को कैसे उठा सकते हैं? अस्पृश्यता और कुछ नहीं है, यह तो वर्ण व्यवस्था रूपी रोग का लक्षण है. वर्ण व्यवस्था के कारण ही आज इसका अस्तित्व है. जब तक कि वर्ण व्यवस्था को हम बिलकुल ख़तम नहीं कर देते, अस्पृश्यता की समस्या का समाधान ढूंढ़ना एक व्यर्थ और बेतुकी बात है.”

संवैधानिक सलाहकार और मसौदा समिति के प्रस्ताव में ”जन्म के स्थान” के आधार पर भेदभाव न किये जाने का उल्लेख नहीं था, लेकिन आसाम का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य सय्यद अब्दुर रऊफ़ ने कहा कि ”इस अनुच्छेद का उद्देश्य यह है कि नागरिकों के प्रति विभेद के बर्ताव को निषिद्ध किया जाए. हमने धर्म, प्रजाति (मूलवंश), जाति अथवा लिंग के आधार पर विभेद पर रोक लगाईं है, लेकिन मुझे भय है कि दुष्ट लोग, जो नागरिकों के प्रति विभेद बरतना चाहेंगे, वे इन आधारों पर भेदभाव नहीं करेंगे. धर्म और जाति के आधार पर किया गया भेदभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देगा और कोई ऐसा करने का साहस नहीं करेगा. लिंग के सम्बन्ध में भी बीसवीं सदी के मध्य में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो लिंग के आधार पर विभेद करेगा. मेरे विचार से जन्मस्थान के कारण, स्थानीय देश प्रेम से प्रेरित होकर भी नागरिकों के प्रति विभेद बरतने का प्रयास किया जा सकता है. इस संभावना को दूर करने के लिए मैंने यह संशोधन उपस्थित किया है.”


नवम्बर 1948 को संविधान सभा में सय्यद अब्दुर रऊफ़ द्वारा जाहिर की गई आशंका स्वतंत्र भारत में सही साबित हुई और क्षेत्रीयता, भाषा और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर भेदभाव के नज़ारे दिखाई देते रहे. उनके संशोधन को स्वीकार किया गया और इस अनुच्छेद में ”जन्म स्थान” के आधार पर भेदभाव को रोकने का प्रावधान शामिल कर लिया गया.


इसी तरह लोक नियोजन में जब सरकारी व्यवस्था में नौकरियों में भेदभाव से सम्बंधित विषय पर चर्चा चल रही थी, तब यह माना गया कि लोक नियोजन में सभी नागरिकों के लिए अवसरों की समता होगी और वहां भी धर्म, जाति, वर्ण या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा, लेकिन किसी विशेष वर्ग के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जा सकेगी. इस पर चर्चा करते हुए सभा के सदस्य जसपत राय कपूर ने कहा था कि ”हर नागरिक को, चाहे वह जहाँ भी रहता हो, राज्य के अधीन नियुक्तियों के लिए समान अवसर मिलना चाहिए.”


दुर्भाग्यवश कुछ दिनों से हम यह देख रहे हैं कि देश में प्रांतीयता की भावना बढ़ती जा रही है. बंगाल बंगालियों के लिए है, मद्रास मद्रासियों के लिए है तथा अन्य ऐसे ही नारे हमें रह-रह कर सुनाई देते हैं. ये आवाजें देश की एकता और अखंडता के लिए हानिकर हैं. भारत 75 साल बाद भी इस बात का अर्थ नहीं समझ पाया है.


जब देश में अस्पृश्यता को समाप्त करने वाले प्रावधान पर चर्चा हो रही थी, तब नजीरुद्दीन अहमद ने कहा कि ”अस्पृश्यता” का कोई कानूनी अर्थ नहीं है, यद्यपि राजनीति के प्रसंग में हम सब इसका अर्थ समझते हैं. किसी महामारी अथवा छूत की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अस्पृश्य कहा जा सकता है. कुछ विचारधाराओं के अनुसार अन्य परिवारों की महिलायें अस्पृश्य समझी जाती हैं. पंडित ठाकुरदास भार्गव के अनुसार 15 वर्ष से कम आयु की पत्नी अपने प्यारे पति के लिए अस्पृश्य होगी क्योंकि उसे स्पर्श करना शिष्टता की दृष्टि से अनुचित व्यवहार होगा. इसलिए इस शब्द को उचित रूप में रखने का प्रयास किया जाए. वह इस प्रकार है – धर्म अथवा जाति के आधार पर ही अस्पृश्यता वर्जित है.


डॉ मनमोहन दास ने कहा, ”इस प्रावधान का उद्देश्य किसी अल्पसंख्यक समुदाय को विशेषधिकार या अभिरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य भारतीय राष्ट्र के छठे भाग को चिरस्थाई दासत्व, नैराश्य, आत्म-ग्लानि तथा अपमान से मुक्त करना है. अस्पृश्यता की प्रथा से करोड़ों भारतीय अन्धकार और निराशा में डूबे रहे तथा लज्जा और अपमान का अनुभव करते रहे और इसके कारण हमारे राष्ट्र की सजीवता ही नष्ट हो गई. मेरे विचार से आज 29 नवम्बर 1948 का दिन हम अछूतों के लिए एक स्मरणीय दिवस है. यह मुक्ति दिवस या पांच करोड़ भारतीयों के उत्थान दिवस के नाम से विख्यात होगा.”


मद्रास के प्रतिनिधि सदस्य वी. आई. मुनिस्वामी पिल्ले ने कहा कि ”इस देश में जाति-विभेद के कारण एक विशेष वर्ग अस्पृश्यता के बंधनों से जकड़ा रहा है और वे युगों से तथाकथित सवर्ण हिन्दुओं और ऐसे सभी लोगों के हाथों सताए जाते रहे हैं, जो अपने को ताल्लुकदार और जमींदार कहते आये हैं और वे उन साधारण सुविधाओं से भी वंचित रहे हैं, जो किसी भी मनुष्य के लिए जीवन धारण करने के लिए आवश्यक हैं. अस्पृश्यता का अभिशाप कुछ वर्गों के लिए असहनीय हो गया और कई लोगों ने अपना धरम छोड़कर उन धर्मों की शरण ली, जिनके अनुयायियों ने उनके प्रति सहिष्णुता दिखाई.” यानी छुआछूत और भेदभाव ही धर्मांतरण का महत्वपूर्ण कारक रहा है.


ओडिशा का प्रतिनिधित्व कर रहे शान्तनु कुमार दास ने कहा कि ”इस अनुच्छेद का मतलब यह है कि सामाजिक वैषम्य, सामाजिक कलंक और सामाजिक बंधन कैसे दूर करें? सब लोग चाहते हैं कि किसी तरह यह छुआछूत ख़तम हो जाए, लेकिन कोई मदद नहीं देते हैं. मैं चाहता हूँ कि हम लोग यहाँ आकर क़ानून बनाएं और आदेश दें कि देहात में जो जनता है, उसका पालन करे. हम यहाँ आकर क़ानून बनाएं पर आदेश दूसरे लोगों को दें, यह कैसी बात है? प्रांतीय सरकारें क़ानून बना रही हैं – रिमूवल आफ अनटचेबिलिटी बिल और रिमूवल आफ डिसेबिलिटी बिल और टेम्पल एंट्री बिल; पर हमारे जो सदस्यगण हैं, वे देहात में जाकर पांचवें कालम का काम करते हैं और वहां जाकर कहते हैं कि यह क़ानून लागू नहीं है और दूसरे वह इस क़ानून के खिलाफ काम करते हैं.” यानी जातिवाद और छुआछूत को राजनीति का संरक्षण मिलता है, तभी वह पनपती रहती है.


भारतीय संविधान सभा ने पूरी गंभीरता के साथ यह माना था कि छुआछूत, जातिवाद, कट्टरता, आर्थिक असमानता, लैंगिक भेदभाव और राजनीतिक व्यवस्था की आपसी रिश्तेदारी बहुत गहरी है और राजनीति की रूचि इस रिश्तेदारी को बनाए रखने में होगी, क्योंकि इसी से समाज के सवर्णों और सामंतों की ताकत बरकरार रहेगी. ऐसे में सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाना आसान न होगा. इसमें कोई शक नहीं है कि जातिभेद और छुआछूत के रोग को कानूनों से नहीं मिटाया जा सकता है. इसके लिए मानव मन को साफ़ करना जरूरी था. मानव मन की सफाई का काम कहीं पीछे छूट गया. और इसका परिणाम यह हुआ कि जाति की राजनीति बड़ी होती गई और जातिवाद का भाव वहीं का वहीं बना रहा. भारत को संविधान लागू करने के लिए एक गंभीर कार्यक्रम की जरूरत थी. एक मानवीय मूल्यों की शिक्षा के आन्दोलन की जरूरत थी. और इन सबसे ऊपर धार्मिक ग्रंथों से ऊपर उठकर संविधान को भारतीय व्यवस्था का व्यावहारिक ग्रंथ बनाने की जरूरत थी. यह जरूरत अब तक अधूरी है.

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