नीतीश कुमार भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को बटोरने (एकजुट) की कोशिश में लगे हैं. अब तक विभिन्न दलों के 5 प्रमुख विपक्षी नेताओं से उनकी मुलाकात और बातचीत हुई है. इनके सकारात्मक उत्तर से नीतीश कुमार खुश जरूर हैं. लेकिन, राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सफर अभी भी आसान नहीं है. विपक्षी एकता की बैठक में किसको आमंत्रित किया जाएगा, कौन आएंगे, जो नहीं आएंगे उनका रुख क्या होगा? अगर बैठक होती है तो उसमें क्या सहमति बनेगी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो अभी तो भविष्य के गर्भ में हैं.
लेकिन, इसके जवाब के बिना विपक्षी एकता की बात करना भी बेमानी होगी क्योंकि विपक्षी एकता को लेकर कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं और शर्तें हैं. वैसे कांग्रेस ने भाजपा के विरोध में शक्ति प्रदर्शन को लेकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री की ताजपोशी में 19 दलों के नेताओं को आमंत्रित किया था. इसमें बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद नहीं गई थी. उन्होंने अपने प्रतिनिधि को भेजा था. जबकि दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और बसपा नेत्री मायावती को निमंत्रण नहीं भेजा गया था.
नीतीश कुमार कितना सफल होंगे?
नीतीश कुमार की पहल पर कांग्रेस के साथ बैठक में कौन-कौन दल शामिल होंगे, यह तो बैठक के दिन ही दिखेगा. लेकिन, नीतीश कुमार अपनी मुहिम में लगे हैं. इसको लेकर वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी के अलावा आप, एनसीपी, शिवसेना, सपा और तृणमूल की नेता से मिल चुके हैं. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को छोड़कर किसी नेता ने नीतीश कुमार के इस प्रयास पर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है.
इधर, कांग्रेस भी हाल में संपन्न कर्नाटक चुनाव में सरकार बनाने के बाद राहत महसूस कर रही है. कर्नाटक से लौटने के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर दिल्ली में विपक्षी एकता की मुहिम को लेकर कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिले हैं. इस मुलाकात से यह उम्मीद जग गई है कि भाजपा विरोधी ये नेता एक साथ बैठने को तैयार हो गए हैं. बैठक पटना में संभावित है. हालांकि बैठक के स्थान और समय को लेकर विकल्प खुला रखा गया है.
सीटों के बंटवारे का क्या होगा?
विपक्षी एकता को लेकर क्षेत्रीय दल कितनी कुर्बानी देंगे. कांग्रेस कितनी दरियादिली दिखाती है. विपक्षी एकता को लेकर यह अहम सवाल होगा. कई राज्य में तो कांग्रेस का भाजपा से सीधा मुकाबला है. वहां क्षेत्रीय दलों का नामोनिशान भी नहीं है. ऐसे राज्यों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, गुजरात जैसे बड़े राज्य शामिल हैं. कांग्रेस की इनमें से चार राज्यों में सरकार है. इसमें हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक शामिल है. अरविंद केजरीवाल की पार्टी की दिल्ली और पंजाब में सरकार है. शेष सभी राजनीतिक दल एक-एक राज्य की पार्टी हैं. इसमें बिहार में नीतीश कुमार की जदयू हो,लालू प्रसाद की राजद, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस या महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी हो. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का मुकाबला सीधे भाजपा से होगा. बिहार में जदयू और राजद के अलावा जीतनराम मांझी की पार्टी हम और वाम दल और कांग्रेस महागठबंधन के अंग हैं. यहां कांग्रेस जदयू व राजद से बची कुछ सीटों से ही कांग्रेस को अभी तक संतुष्ट होती रही है लेकिन क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस इससे संतुष्ट होगी या फिर अपने लिए कुछ और सीटों की मांग करेगी? पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को तृणमूल व वामदलों से सहमति का रास्ता तलाशना होगा.
इस मुद्दे पर नीतीश कुमार के पास अगर कोई फार्मूला है तो वह अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. हां, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसको लेकर एक राजनीतिक संकेत जरुर दी हैं. उनका कहना है कि जो दल जिस राज्य में मजबूत है उसे वहां पर आगे कर चुनाव लड़ा जाए. बाकी दल उसको सहयोग करें. ममता बनर्जी के इस फार्मूले पर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने तो अपनी सहमति दे दी है. लेकिन, इस मुद्दे पर अभी तक न तो कांग्रेस ने और नहीं नीतीश कुमार या राजद नेता लालू प्रसाद की ओर से किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया आई है. ऐसे में नीतीश कुमार किस प्रकार राजनीतिक समीकरण को लेकर चल रहे हैं, यह तस्वीर तो संभावित बैठक में ही साफ हो पाएगा.
विपक्ष क्यों गोलबंद हुआ?
सीबीआई और ईडी की कार्रवाई से पूरा विपक्ष केंद्र की बीजेपी सरकार से आक्रोशित है. ईडी और सीबीआई की कार्रवाई ने विपक्ष को गोलबंद होने के लिए एक मजबूत मंच दिया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो गई है. गांधी परिवार के खिलाफ भी ईडी की कार्रवाई चल रही है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया अभी शराब के मामले में जेल में बंद हैं. अरविंद केजरीवाल भी केंद्रीय एजेंसियों के घेरे में हैं. अब दिल्ली में अधिकारियों के नियंत्रण को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश ने आप सरकार पर नकेल कस दिया है.
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