Thursday, July 13, 2023

पत्नी को प्रापर्टी में आधा हिस्सा एहसान नहीं बल्कि उनका हक़' Madras High Court: मैरिलिन वेरिंग ने लिखा था और संभवत: रोजा लक्‍जमबर्ग ने सबसे पहले ये बात कही थी कि “जिस दिन औरतों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी चोरी पकड़ी जाएगी,” तो अब औरतों की तरफ़ देखने का वक्त आ गया है.

 पति की खरीदी संपत्ति पर हाउस वाइफ बराबर की हिस्सेदार

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि एक हाउसवाइफ भी अपने पति की कमाई से खरीदी गई संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी की हकदार है. कोर्ट ने कहा कि भले ही हाउसवाइफ के योगदान को मान्यता देने के लिए कोई कानून नहीं है, लेकिन कोर्ट इसे पहचान सकती है. मद्रास हाई कोर्ट ने माना है कि एक हाउसवाइफ (गृहिणी) अपने पति की संपत्ति के आधे हिस्से की हकदार है. न्यायमूर्ति कृष्णन रामास्वामी की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि एक गृहिणी अपनी दिनचर्या से बिना किसी छुट्टी के चौबीसों घंटे घर चलाने का काम करती है. न्यायाधीश ने कहा कि घर की देखभाल करने वाली महिला परिवार के सदस्यों को बुनियादी चिकित्सा सहायता प्रदान करके घरेलू डॉक्टर का काम भी करती है. उन्होंने आगे कहा कि एक महिला अपने पति की अपनी कमाई से खरीदी गई संपत्तियों में बराबर हिस्सेदारी की हकदार होगी.


कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा, ‘पत्नियां जो दशकों से घर संभाल रही हैं और परिवार की देखभाल कर रही हैं. उन्हें संपत्ति में हिस्सेदारी का हक है. शादी के बाद वह कई बार पति और बच्चों की देखभाल के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ देती हैं. यह अनुचित है, जिसके परिणामस्वरूप आखिर में उनके पास अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं होता.’ कोर्ट ने कहा कि इसलिए संपत्ति का अधिग्रहण अगर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर पति-पत्नी के संयुक्त योगदान से किया जाता है तो दोनों समान हिस्से के हकदार होंगे.

पति की मौत के बाद प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी मांगी थी

कोर्ट ने कंसाला अम्माल की ओर से दायर अपील की इजाजत दी, जिन्होंने अपने पति की मौत के बाद प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी मांगी थी. कोर्ट ने कहा कि पति परिवार की देखभाल के लिए अपनी पत्नी के सहयोग के बिना पैसा नहीं कमा पाता. अदालत ने कहा, ‘संपत्ति पति या पत्नी के नाम पर खरीदी गई हो सकती है, फिर भी इसे पति और पत्नी दोनों के संयुक्त प्रयासों से बचाए गए पैसे से खरीदी गई माना जाना चाहिए.’ अदालत ने कहा कि भले ही गृहिणी के किए गए योगदान को मान्यता देने के लिए अब तक कोई कानून नहीं बनाया गया है, लेकिन अदालतें योगदान को अच्छी तरह से पहचान सकती हैं, और यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि जब महिलाओं को उनके किए गए त्याग के लिए पुरस्कृत करने की बात आती है तो उन्हें उचित इंसाफ मिले.


मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी अहम क्यों?

हाउस वाइफ शाज़िया रेहाना कहतीं है कि “मद्रास हाई कोर्ट ने औरतों के हक़ में अहम टिप्पणी की है कि बिना पत्नी की मदद के पति पैसा नहीं कमा सकता, औरतें बिना किसी छुट्टी के 24 घण्टे घर के काम करती हैं. औरतें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पति की प्रॉपर्टी में सहायक हैं, वो बच्चों और पति के काम-काज ही नहीं करती बल्कि सास-ससुर और घर के दूसरे सदस्यों के खाने-पीने, बीमारी-हारी में भी देखभाल करती हैं. घर के बजट से लेकर बचत तक अच्छे से संभालती हैं. इन सब चीज़ों से बेफ़िक्र होकर पति बाहर कमा पाता है. औरतें घर के काम निपटा कर पति की दुकानों पर बैठ रही हैं, जिससे वो घर में आराम कर सकें या दुकान का सामान ला सकें और दुकानदारी में घाटा न हो. खेतों-खलिहान से लेकर गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी पालकर उनकी देखभाल करती हैं और होने वाली कमाई पति के हाथ में जाती है. ये अप्रत्यक्ष सहयोग है. प्रत्यक्ष सहयोग में नौकरी करके सारा पैसा पति के हाथ में जाता है. पत्नी के जेवर से लेकर दहेज तक पर पति का कब्ज़ा होता है. बुरे वक़्त में पत्नी उसे पति को सौंप देती हैं, जिससे उसकी आर्थिक मदद हो सके और घर परिवार मुसीबत में न आए”


सामाजिक कार्यकर्ता विशाल दुबे मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार की प्रक्रिया शुरू होना मानते हैं. वो कहते हैं कि “इतिहास गवाह है महिलाओं के पारिवारिक कामों को कभी किसी भी आर्थिक गतिविधि के अधीन या उसका मूल्य माना ही नही गया, आज़ादी के बाद से ही महिलाएं हर तरह के शोषण की शिकार होती चली आयी हैं. विडम्बना यह है कि संस्कृति के नाम पर जो समाज अपने पुरातन होने का दावा करता है वो ही अपने समाज में अपनी आधी आबादी के अस्तित्व को मानवीय अधिकार देने से बचता आया है. वर्तमान में इस तरह कानूनी टिप्पणियों से महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना दिखती है, आशा है ये फैसला समाज में एक नजीर बनेगा, लेकिन अभी भी केवल आर्थिक ही नहीं अन्य मोर्चों पर भी महिला अधिकारों पर बहुत से नए बदलावों का इंतज़ार है.”

महिलाएं घरों में काम करके परिवार के लिए कितना योगदान देती हैं, इसकी अहमियत समझने में पुरुष असफल रहे हैं. ये कहना है पत्रकार पारुल चंद्रा का. पारूल आगे कहतीं है कि महिलाएं पूरा घर-बच्चे-परिवार संभालती हैं, पुरुष सब उस महिला के भरोसे छोड़कर, निश्चिंत होकर अपने काम पर जा सकते हैं. वे उन पर भरोसा करते हैं, लेकिन अक्सर यही पुरुष ये कहते हुए नज़र आते हैं कि ‘तुम घर में करती ही क्या हो’. और जब बात प्रॉपर्टी या आर्थिक मामलों की आती है तो महिलाओं को सिर्फ ये कह दिया जाता है कि वो पत्नी ही तो हैं, पति ने उन्हें घर दिया है, अच्छा जीवन दिया है. महिला चाहे, घरेलू हो या फिर कामकाजी, उसके काम की कभी भी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती, लेकिन अहमियत ज़रूर दी जा सकती है.


मद्रास हाईकोर्ट का ये फैसला कि ‘हाउसवाइफ अपने पति की संपत्ति के आधे हिस्से की हकदार हैं, ये महिलाओं के हित में एक अहम फैसला है. बल्कि सिर्फ हाउसवाइफ ही नहीं, मेरे जैसी कामकाजी महिलाएं जो घर हाउस वाइफ की तरह संभालती हैं और बाहर जाकर घर चलाने में भी सहयोग करती हैं, उन्हें भी यह अधिकार मिलना चाहिए. अदालत का यह कहना कि पति परिवार की देखभाल के लिए अपनी पत्नी के सहयोग के बिना पैसा नहीं कमा पाता. ये बड़ी बात है, जिसे वाकई अब तक दरकिनार रखा गया. ऐसे में पत्नी अगर कामकाजी हो तो ये पति के लिए बोनस ही है. दोनों घर के लिए ही मेहनत कर रहे हैं, ऐसे में आधा हिस्सा पत्नी को दिया जाना उनपर अहसान नहीं, बल्कि उनका हक है.’

मद्रास हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद एक नई उम्मीद सी जगी है, ये उम्मीद है कि हाउस वाइफ की तरफ़ से भी सोचा जाना चाहिए. समाज को इतना संवेदनशील होना होगा कि वो अपनी पूरी ज़िंदगी घर और परिवार के नाम कर देने वाली औरतों को सराहें, उनकी मदद करें, उनका हाथ बंटाए. घरेलू औरतों के श्रम को लेकर लगातार बहस होती आई है. मैरिलिन वेरिंग ने लिखा था और संभवत: रोजा लक्‍जमबर्ग ने सबसे पहले ये बात कही थी कि “जिस दिन औरतों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी चोरी पकड़ी जाएगी,” तो अब औरतों की तरफ़ देखने का वक्त आ गया है. गृहणियां सिर्फ़ घर में काम करने वालीं अनदेखी इंसान नहीं हैं, बल्कि वो पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली उनकी लाइफ पार्टनर हैं और पार्टनर ज़िंदगी के साथ मुनाफ़े नुकसान दोनों का बराबर का हिस्सेदार होता है.

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