कौन हैं दशा माता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दशा माता मां पार्वती का ही स्वरूप है। दशा माता का व्रत, घर-परिवार के बिगड़े ग्रहों की दशा और परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं पूजा और व्रत करके गले में एक खास डोरा (पूजा का धागा) पहनती है ताकि परिवार में सुख-समृद्धि, शांति, सौभाग्य और धन संपत्ति बनी रहे। महिलाएं इस दिन दशा माता और पीपल की पूजा कर सौभाग्य, ऐश्वर्य, सुख-शांति और अच्छी सेहत की कामना करती हैं।
पूजाविधि
इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु के स्वरूप पीपल वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा बनाकर उसमें 10 गांठ लगाती हैं,उसे हल्दी से रंगती हैं और पीपल वृक्ष की प्रदक्षिणा करते उसकी पूजा करती हैं। पूजा करने के बाद वृक्ष के नीचे बैठकर नल-दमयंती की कथा सुनती हैं। इसके बाद परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करते हुए डोरा गले में बांधती हैं। घर आकर द्वार के दोनों हल्दी कुमकुम के छापे लगाती है। इस दिन एक समय भोजन किया जाता है। भोजन में नमक का प्रयोग नहीं किया जाता है।
दशा माता व्रत की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय राजा नल और रानी दमयंती सुखपूर्वक राज्य करते थे। एक दिन रानी दमयंती ने दशा माता का व्रत किया और डोरा अपने गले में बांधा। राजा ने जब ये देखा तो उन्होंने वो डोरा निकालकर फेंक दिया। उसी रात दशा माता एक बुढ़िया के रूप में राजा के सपने में आई और कहा कि “तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है। तूने मेरा अपमान किया है।”इस घटना के कुछ दिन बाद में राजा की दशा इतनी बुरी हो गई कि उसे अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में काम के लिए जाना पड़ा। यहां तक उन पर चोरी का आरोप भी लगा। एक दिन वन से गुजरते समय राजा नल को वही सपने वाली बुढि़या दिखाई दी तो वे उसके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे और बोले “माई मुझसे भूल हुई क्षमा करो। मैं पत्नी सहित दशामाता का पूजन करूंगा।”
बुढि़या ने उन्हें क्षमा करते हुए दशामाता का पूजन करने की विधि बताई। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आने पर राजा-रानी ने अपनी सामर्थ्य अनुसार दशामाता का पूजन किया और दशामाता का डोरा गले में बांधा। इससे उनकी दशा सुधरी और राजा को पुनः अपना राज्य मिल गया। इसलिए सभी को श्रद्धापूर्वक मां दशाा माता की पूजा करनी चाहिए और स्त्रियों को कथा-पूजन कर डोरा धारण करना चाहिए।
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