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Showing posts from June, 2023

बदलते रिश्तो की दास्तान | मतलबी रिश्ते – सत्य घटना पर आधारित🥲कब आपको अपने ही किस मोड़ पे धोखा दे दे, ये आप सोच नहीं सकतें।

 ये कहानी हमारे सोसाइटी में रहने वाले एक व्यक्ति कि है। जिनको मै बचपन से अपने सोसाइटी में रहते देख रहा हूँ। एक ही सोसाइटी में रहते रहते मै उनको अच्छे से जनता हु। मेरा और उनका मिलना जुलना भी होता है। जो अब बूढ़े हो चुके है, ये बात पच्चीस साल पहले कि जब वह व्यक्ति गाव से अपने बड़े भाई के पास मुंबई रहने के लिए आये थे। उनके बड़े भाई अपने परिवार के साथ मुंबई में रहते थे जिसमे उनकी पत्नी और दो बेटे थे। दोनों बेटो कि उम्र पांच छह साल के आस पास ही थी। कम पढ़ा लिखें होने कि वजह से उस व्यक्ति को कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल रही थी। बहुत कोशिश किया उन्होंने लेकिन उन्हें कोई भी नौकरी नहीं मिली और कई महीने बित गए। उनके पास जो भी पैसे थे वो भी ख़तम हो ने लगे फिर उन्होंने हिम्मत करके मुंबई की एक सड़क के किनारे बैठकर बेल्ट और पर्स बेचने का व्यापार सुरु किया। धीरे धीरे उनका सड़क पर बेल्ट और पर्स बेचने का व्यापार चलने लगा और वो उसी काम में व्यस्त हो गए और उसी को अपना काम बना लिया। अब समय अच्छा बित रहा था उनकी जीवन कि गाड़ी पटरी पर आ गयी थी। कुछ साल के बाद उनके बड़े भाई का देहांत हो गया। अब बड़े भाई के परिवार कि ज...

क्या है किस्मत कनेक्शन? नसीब की कहानी::अगर किस्मत ख़राब हो तो ऊँट पर बैठे बौने आदमी को भी कुत्ता काट लेता है।

 यह कहानी व्यक्ति के किस्मत के बारे में है, कि कैसे हम सब किस्मत से बंधे हुए है। किस्मत को हम अलग अलग शब्दों में नसीब, समय और प्रकृति भी कह सकते है। मेरे जीवन के अब तक के अनुभव के अनुसार जो भी मैंने इस संसार में घटित होते देखा है वह सब किस्मत या नसीब पर आधारित होता है। हम सिर्फ एक कठपुतली के सामान है इस पृथ्वी पर एक निश्चित अवधि के लिए। जीवन में हम जो भी कुछ सोचते है सबकुछ वैसा नहीं होता है, क्योकि यह संसार सिर्फ हमारे अकेले लिए नहीं है। पशु, पक्षी, जिव, जंतु सभी का इस संसार पर सामान अधिकार है। किस्मत पर एक कहावत भी है जो मुझे याद है, “अगर किस्मत ख़राब हो तो ऊँट पर बैठे बौने आदमी को भी कुत्ता काट लेता है।” आइये मै आपको एक कहानी के माध्यम से बताता हु, जो मेरे एक मित्र के बारे में है, जिससे आपको समझ में आ जायेगा कि किस्मत क्या होती है, और किस्मत इन्सान को कहा से कहा पंहुचा सकती है। यह बात लगभग १४ साल पहले कि है। जब मै BAMS कि पढाई करने के लिए बेलगाम गया था। बेलगाम कर्नाटक में स्थित है। वहा पर मेरी मुलाकात प्रदीप से हुई। वह अपने चाचा के साथ आया था। प्रदीप उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से...

सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग | Sabse Bada Rog Kya Kahenge Logदुनिया को छोड़ो पहले उसे खुस रखो जिसको तुम रोजाना आईने में देखते हो।

 लोगो का क्या है वो कुछ कुछ न कुछ बोलते ही रहेंगे। कुछ करो तब भी बोलेंगे और कुछ न करो तब भी बोलेंगे। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगो का काम है कहना, छोडो बेकार कि बाते कही बीत न जाए रैना। इसलिए सुनो सबकी और करो अपने मन कि जो आपका दिल कहे लेकिन आपकी वजह से किसी को कष्ट न पहुचे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है की वह अपने आप को न देख कर दुसरो की ओर पहले देखता है की लोग क्या कह रहे है उसके बारे में?, क्या बाते करते है उसके और उसके काम के बारे में? मनुष्य जब भी कुछ नया करने जाता है तो वह पहले ये सोचने लगता है की लोग क्या कहेंगे। इसी कारण वह बहोत सारे काम छोड़ देता है लोगो के डर से। यह कहना गलत नहीं होगा की हमारे समाज में ऐसे कुछ दोगले इंसान बस्ते है जिनका काम सिर्फ दुसरो की पैरो की ज़ंजीर बनना होता हैं। वे स्वयं तो कोई कार्य करते तो नहीं है पर जब कोई दूसरा व्यक्ति करने जाता है तो सवाल खड़े करने लगते है ताने मारने लगते है जैसे की अगर किसी दूसरे की बहु नौकरी करने लगे तो उसके काम करने पे ऐतराज जताने लगते है, पहनावे पे उल्टी उल्टी बाते करने लगते है। गलती उनकी नहीं है जो कमेंट पास...

प्यार से उम्मीद और सच्चाई। क्यों टूट रहे हैं आपके रिश्ते::/कई लडकियों को तो प्यार का झासा देकर कोठे पर बेच दिया जाता है।

 आज के समय में प्यार एक खेल एक मनोरंजन और एक टाइम पास का जरिया बन गया है। प्यार का एक चलन सा हो गया है, आज इससे कल उससे तो परसों किसी और से हो जाता है यह प्यार नहीं बल्कि एक आकर्षण होता है जो समय समय पर परिवर्तित होता है लेकिन कुछ लोग इसे प्यार समझ बैठते है और इसमें पड़कर अपना समय और जिंदगी बर्बाद कर लेते है। कई लोग तो इस प्यार में अंधे होकर अपना घर छोड़ कर भाग जाते है और कई लोग तो शादी होने के बाद भी किसी और के साथ भाग जाते है। आज के समय में ये प्यार में घर से भागना आम बात है। आज के युवा लड़के और लडकिया इस मामले में जादा फसकर अपना जीवन बर्बाद कर लेते है और अपने पीछे अपने घरवालो को भी परेशान कर देते है। ज्यादातर लडकिया ही ऐसा करती है थोडा पढ़ लेने के बाद उनको लगता है कि उनके जैसा विद्वान् दुनिया में और कोई नहीं है वो जो कर रही है वही सही है और उनके घरवाले और बाकि दुनिया वाले गलत है उनको प्यार कि समझ ही नहीं है। जबकि ऐसा नहीं है असली दुनिया किताबी दुनिया से और फिल्मी दुनिया से बहुत ही अलग है जैसा कि हम फिल्मो में दिखाया जाता है और किताबो में बताया जाता है वैसा बिलकुल भी नहीं है। घर से भ...

आत्महत्या करना सही या गलत? Suicide is crime?जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है। आत्महत्या कोई हल नहीं है।

 आजकल जैसे कि आत्महत्या का एक दौर सा चल पड़ा है हर दुसरे तीसरे दिन किसी न किसी के आत्महत्या करने कि खबर आती रहती है। अब जैसे हाल ही में अभिनेता शुशांत सिंह राजपूत(Sushant Singh Rajput) कि आत्महत्या कि खबर आई। सुनकर बड़ा ही दुःख होता है कि लोग आत्महत्या जैसा बड़ा फैसला इतनी आसानी से कैसे ले लेते है। आत्महत्या एक अपराध है। जीवन बड़ा ही अनमोल है। ईश्वर का दिया हुआ अनमोल उपहार है जीवन। हमारे वेद और पुराणों के अनुसार मानव जीवन चौरासी लाख(84 Lac) योनियो में भटकने के बाद एक बार मिलती है। ईश्वर कि प्रत्येक रचना अपने आप में सर्वश्रेष्ठ है। मानव जीवन कि रचना सबसे सर्वश्रेष्ठ है इन सब रचनाओं में। इसे इस तरह आत्महत्या करके व्यर्थ न करे। समस्या किसके जीवन में नहीं आती? हमारे यहाँ तो भगवान् को भी अनेको समस्यायों का सामना करना पड़ा है, भगवान् का जीवन भी आसान नहीं रहा, समस्यायों पर विजय हासिल करने के कारण ही वो भगवान् कहलाते है। तो हमने यह कैसे सोच लिया कि हमारे जीवन में समस्याए नहीं आएँगी। सच तो यह है कि समस्यायों का सामना करके ही लोग महान बनते है। समस्याए तो आती जाती रहेंगी हमें समस्यायों से घबराना न...

एक गलत फैसला और मौत मिली वृद्धाश्रम में./बुढ़ापे के डर से दुसरो पर किया भरोसा और जिंदगी तबाह हुई।

 इस कहानी कि सुरुआत होती है उत्तर प्रदेश के एक गॉव आजमगढ़ से जहा एक बुजुर्ग धनि दम्पति रहते थे। वो एक सरकारी कोटा चलते थे जिससे उन्होंने बहुत धन कमाया और मजे से जीवन व्यतीत कर रहे थे। आलीशान मकान और जमीन जायदात सबकुछ था उनके पास सिवाय औलाद के। वे लगभग सत्तर वर्ष के हो चुके थे। कोई संतान न होने के कारण उन्हें बुढ़ापे का डर सताता था कि बुढ़ापे में उनका क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा? उनकी सम्पत्ति का क्या होगा? और बहुत सी चिंता होती रहती थी। उनके एक दूर के रिश्तेदार थे शर्मा जी जो कि मुंबई में रहते थे अक्सर उनकी बाते शर्मा जी से होती रहती थी। वे शर्मा जी के बारे में सबकुछ जानते थे और शर्मा जी भी उनके बारे में सबकुछ जानते थे। एक बार शर्मा जी ने उन्हें मुंबई बुलाया अपने घर पर रखा और पूरी मुंबई में घुमाया हर जगह ले गए उनका अच्छे से ध्यान रखा और देखभाल कि जिससे वे बुजुर्ग दम्पति बहुत खुश हुए और उनका विश्वास शर्मा जी पर और बढ़ गया। और मुंबई किसको पसंद नहीं आयेगी, मुंबई शहर ही ऐसा है कि हर कोई यहाँ खीचा चला आता है उनको भी मुंबई भा गयी। फिर धिरे धिरे यह सिलसिला चलने लगा वे बुजुर्ग दम्पति हर ...

आत्मा की शान्ति के धैर्य, संतोष, मन पर काबू करना होता है।

 आत्मा की शान्ति” सूनने में तो यह शब्द बहुत छोटा लगता है लेकिन इसका अर्थ बहुत बड़ा और गहरा है। जो इसका अर्थ समझ गया उसकी जिंदगी आसान हो जाएगी। वह अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर लेगा, सुखी जीवन का आनंद ले सकेगा और जीवन में तरक्की भी करेगा। आत्मा कि शान्ति का मतलब यहाँ मन कि शान्ति से है। इसपर एक कहावत भी है। “ मन चंगा तो कठौती में गंगा ” यदि आपका मन संतुष्ट है, आपके मन में सतोष है तब आपको कठौती में भी गंगा नज़र आएगी अन्यथा आपको गंगा नदी में जाकर भी गंगा के दर्शन नहीं होंगे। जिसके मन में संतोष है, धीरज है उसका मन उसके वश में है वह अपने जीवन को सुखमय तरीके से जीवन का आनंद लेते हुए व्यतीत कर सकता है, अन्यथा वह पूरी जीवनकाल में परेशान रहेगा यह जीवन उसे हमेशा कष्टों से भरा नजर आयेगा और वह यहाँ वहा सुख के चक्कर मे भटकता रहेगा। सुख कि प्राप्ति के लिए वह अधर्म के मार्ग पर चला जायेगा या ज्यादा सुख के लालच में या जल्दी से सुख प्राप्त हो जाये इसलिए वह गलत रास्ते पर चला जाता है और अधर्म करने लगता है। आत्मा कि शान्ति के लिए कार्य करना जरुरी है। इसलिए हमें प्रतिदिन थोडा समय निकाल कर अपने लिए मनन और च...

नींद क्या है? | How Much Do You Sleep | नींद का मतलबनींद की कमी स्वास्थ्य और कामकाजी जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।

 नींद क्या है? sleep जैसा कि हम सब जानते है कि जीवन के लिए जल अत्यंत आवश्यक है। जल के बिना हम एक दिन भी नहीं रह सकते है। जल ही जीवन है। ऐसा भी कहा जाता है, और यह प्रमाणित भी है। उसी प्रकार भोजन के बिना भी हम एक महीने से उपर जीवित नहीं रह सकते है। लेकिन क्या आपको पता है कि हम नींद के बिना कितने दिनों तक जीवित रह सकते है? तो आइये आज हम नींद के बारे में बात करते है। जिस प्रकार जल और भोजन हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है उसी प्रकार नींद भी हमारे ले अत्यंत उपयोगी है एक बार तो हम बिना भोजन के एक महिना या उससे अधिक दिन भी जीवित रह सकते है लेकिन बिना सोये या बिना नींद लिए हम ग्यारह दिन (11 days) से अधिक जीवित नही रह सकते है। तो आइये आज हम नीद के बारे में विस्तार से बात करते है। नींद एक चमत्कारी दुनिया है एक अलग ही दुनिया है। सोने के पश्चात् हम एक अलग ही दुनिया में पहुच जाते है। जिस पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं रहता है। नींद में हमें कुछ पता नहीं रहता है। नींद एक रहस्य है। हमें नींद क्यों आती है यह एक रहस्य है इसके बारे में किसी को भी पता नहीं है और यह नींद अप  cb.ने आप ही आती है और किसी भी वक्...

गुस्सा या क्रोध को कैसे काबू में करे? | How to control angerगुस्से में मनुष्य ऐसे शब्द बोल देता है जिसका उन्हें जीवन भर पछतावा रहता है।

 जैसे कि इस संसार में सभी लोगो को कभी न कभी गुस्सा या क्रोध आता ही है। जब यह गुस्सा या क्रोध आता है तब मनुष्य का दिमाग काम करना बंद कर देता है। उस समय मनुष्य के मन में जो भी आता है सब बोल देता है अच्छा बुरा कुछ नही देखता है। गुस्सा शांत होने के बाद पता चलता है कि यह हमने क्या कर दिया और अपनी गलती का अहसास भी होता है, और पछतावा भी होता है, लेकिन उससे कोई फायदा नहीं। इसके ऊपर हिंदी में एक मुहावरा भी है। “अब पछताने से क्या होगा जब चिड़िया चुग गयी खेत।” एक कहानी के माध्यम से समझते है इसके बाद आप गुस्सा करना छोड़ देंगे। अपने क्रोध को अपने वश में करना सिख जाओगे। एक गाव में एक झगड़ालू औरत रहा करती थी। अक्सर वह छोटी छोटी बातो पर गुस्सा हो जाती, गुस्से में किसी को भी गालियां दे देती और भला बुरा कहती। लेकिन कुछ समय पश्चात् उसका गुस्सा उतरता तब उसे अपने किये पर बहुत पछतावा होता। उसके परिवार के सभी सदस्य उसके इस स्वाभाव से अत्यंत परेशान रहते थे। उस घर में हमेशा ही एक लड़ाई और अशांति का माहौल बना रहता था। उस औरत के उस क्रोधी स्वाभाव के कारण उसके पडोसी भी उसे पसंद नहीं करते थे। इस बात कि समझ उस औरत ...

काश! की शादी न की होती – एक विचार | shaadi ka laddooभारतिय संस्कृति में विवाह एक शुभ और पवित्र बंधन माना गया है। मंत्रों द्वारा अग्नि के सात फ़ेरे दिलवाये जाते हैं और वर-वधू को आशीर्वाद दिये जाते है और यह सात जन्मों का बंधन माना गया हैं।

 हर शादी शुदा व्यक्ति के मन में कभी न कभी यह विचार आ ही जाता होगा कि काश! शादी न की होती, चाहे वह महिला हो या पुरुष। किसी ना किसी कारण वश यह विचार आना संभव है किसी भी इंसान के मन में, गृहस्थ जीवन को सबसे कठिन माना गया है मनुष्यो के लिए। सभी मनुष्य इसी में उलझे रहते है किसी न किसी रूप में। अक्सर जब घर के मौहोल में जब तनाव उत्पन होता है और वह तनाव हद पार करने लगता है, झेलने की ताकत को कम करने लगता है तभी ये उत्तम विचार मन में दौड़ने लगता है कि काश! शादी न की होती, काश! घर वालो की बात नहीं सुनी होती तो आज ये दिन न देखना पड़ता। काश! शादी के लिए मना कर दिया होता, ऐसी तम्माम बातें मन में आने लगती हैं। ऐसी विचार आये भी ना क्यों, क्यों की आज भी जायदातर शादियाँ घर-रिश्तेदार वाले ही करवाते हैं चाहें मर्जी हो या ना हो, लड़का या लड़की एक दूसरे को पसंद हो या ना हो, चाहें उनके विचार एक दूसरे के साथ मिलते ही ना हो, चाहें घर वालों के विचार एक दूसरे से मिलते हो या ना मिलते हो। अकसर आपने सास बहू की लड़ाई, झगड़ों के बारे में सुना होगा, सास बहू के चुटकुले सुने होंगे। जब तक ये किसी और के घर की बात होती है त...

कहते है अच्छी संगत का अच्छा नतीजा। जिसकी जैसी सोच होती है उसके दोस्त भी वैसे ही होते है।

 आज हम २१ सदी में जी रहे है | २१ सदी में तकनीक (technology) अत्यधिक तेज गति से बढ़ती जा रही है। आज के युग में ज्यदातर लोगो कि दुनिया उनके मोबाइल फोन से ही सुरु होकर मोबाइल फोन में ख़तम हो रही है। अब सबकुछ मोबाइल फोन में ही सिमित हो गया है। कहने को सब सोशल मीडिया में एक्टिव है लेकिन सिर्फ डिजिटल तरीके से। सोशल मीडिया पर सबके पास हजारो मित्र होते है। लेकिन असल जिंदगी में एक भी मित्र नहीं होते है। २१ सदी के इस युग में सभी का जीवन इतनी तेज गति से चल रहा है कि किसी के पास किसी और से मिलने का समय ही नहीं मिल रहा है। इसलिए हमें भी चाहिए कि हम सोशल मीडिया से बहार निकलकर भी देखे। सोशल मीडिया के बाहर भी बहुत ही खूबसूरत दुनिया है। और इस खूबसूरत दुनिया में अनेक खूबसूरत लोग भी है। जिसके लिए हमें सबसे एक सम्बन्ध बनाना चाहिए जो भी हमारे जीवन में आये। जिसमे सबसे अच्छा सम्बन्ध होता मित्रता का। जो किसी से भी किया जा सकता है। सम्बन्ध हो या रिश्ता इसका नियम भी पैसो कि तरह ही है। रिश्ते या संबंधो को भी कमाना पड़ता है और निभाना भी पड़ता है। नहीं तो सम्बन्ध या रिश्ते भी ख़तम हो जाते है। इसी युग में एक और...

सूने घर आज भी राह देखते हैं.. वो बंद दरवाजे बुलाते हैं पर कोई नहीं आता.!आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?

 किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव, पूना, बेंगलुरु, चंडीगढ़, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं? कल आप एक बार उन गली मोहल्लों से पैदल निकलिएगा जहां से आप बचपन में स्कूल जाते समय या दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे। तिरछी नज़रों से झांकिए.. हर घर की ओर आपको एक चुपचाप सी सुनसानियत मिलेगी, न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते जाते लोगों को ताकते बूढ़े जरूर मिल जायेंगे। आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ? भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उसके एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें लिखें। उनको लगता है या फिर दूसरे लोग उसको ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस यहीं से बच्चे निकल जाते हैं बड़े शहरों के होस्टलों में। अब भले ही दिल्ली और उस छोटे शहर में उसी क्लास ...

भारत का सबसे पहला प्राचीन विश्वविद्यालय नालंदा संस्कृत के अनुसार नालंदा का अर्थ – “नालम् ददाति इति नालन्दा” मतलब कमल का फूल है. कमल के फूल के डंठल को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. “दा” का अर्थ देना है। अतः जहाँ ज्ञान देने का अंत न हो उसे नालंदा कहा गया है.

 बिहार राज्य की राजधानी पटना से 88 किलोमीटर तथा बिहार के प्रमुख तीर्थ स्थान राजगीर से 13 किमी की दूरी पर बड़ा गांव के पास प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर स्थित है. नालंदा विश्वविद्यालय को दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय माना जाता है, प्राचीन काल में नालंदा में बौद्ध विश्वविद्यालय था, और एशिया में सबसे बड़ा स्नातकोत्तर शिक्षा का केन्द्र था. पांचवीं शताब्दी के आरम्भ से 700 वर्ष तक यहां बौद्ध धर्म दर्शन तथा अन्य विषयों की शिक्षा दी जाती थी. नालंदा की लाइब्रेरी में तकरीबन 90 लाख पांडुलिपियां और हजारों किताबें रखी हुई थी. आज से लगभग ढाई हजार साल पहले एशिया में तीन विश्वविद्यालय थे. तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा. तक्षशिला के बाद. नालंदा 800 साल तक अस्तित्व में रही. नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास चीन के ह्वेनसांग और इत्सिंग ने खोजा था. ये दोनों 7वीं शताब्दी में भारत आए थे. इन्होनें इसे दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय भी बताया था. नालंदा विश्व की यह प्रथम पूर्णत: आवासीय विश्वविद्यालय थी और उस समय इसमें तकरीबन 10,000 विद्यार्थी और लगभग 2,000 अध्यापक थे. इसमें शिक्षा ग्रहण करने के लिए व...

खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों नष्ट कर दिया था?भारतीय विद्वान और शिक्षक को उनके हकीमों से ज्यादा ज्ञान था क्या ये कारण है

 1193 में तुर्क सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था. एक बार वह काफी बीमार पड़ा. उसने अपने हकीमों से काफी इलाज करवाया मगर वह ठीक न हो सका और मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया. उस समय नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda vishwavidyalaya) के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र की काफ़ी चर्चा थी. तभी किसी ने उसको सलाह दी कि वह नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को दिखाए और इलाज करवाए. परन्तु खिलजी (Khalji) इसके लिए तैयार नहीं था. उसे अपने हकीमों पर ज्यादा भरोसा था. वह यह मानने को तैयार नहीं था की भारतीय वैद्य उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञान रखते हैं और ज्यादा काबिल हो सकते हैं. लेकिन अपनी जान बचाने के लिए उसको नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलवाना पड़ा. फिर बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी और कहां की में उनके द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की दवा नहीं खाऊंगा. बिना दवा के वो उसको ठीक करें. वैद्यराज ने कुछ सोच...

मानव कि उत्पत्ति का इतिहास सच या काल्पनिक?“पहले अंडा आया या मुर्गी“ इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

 जैसा कि हमें बताया गया है, हमने पढा भी है कि हम बंदरो से इंसान बने है। और इस बन्दर कि प्रजाति से मनुष्य बनने कि प्रक्रिया में हजारो वर्षो का समय लगा है। मनुष्य कि जीवन शैली भी पहले जानवरों कि तरह ही हुआ करती थी। वे भी अन्य जानवरों कि तरह ही जंगलो और गुफाओ में रहते थे। जानवरों को मारकर खाते थे। शिकार के लिए यहाँ वहा भटकते थे। शिकार कि खोज में बहुत दूर तक निकल जाते थे। जानवरों कि तरह रहना, जानवरों कि तरह खाना, जानवरों कि तरह शिकार करना यह सब तो संभव है। क्योकि आज भी कई ऐसे पिछड़े इलाके है जहा के आदिवासी लोग आदिमानव कि तरह जीवन व्यतीत करते है। ऐसा कई लेखको और वैज्ञानिको द्वारा बताया गया है। प्रमाण के तौर पर केवल हड्डियों के अवशेष के आलावा कुछ भी नहीं है जो यह साबित करे कि हम बन्दर से मनुष्य बने है। यह सब एक काल्पनिक कथा, कहानी बनायी गयी है, कि हम बन्दर से मनुष्य बने है। या अनुमान लगाया गया है कि शायद ऐसा हुआ होगा और इस तरह परिवर्तन हुआ होगा। हा बंदरो के शरीर कि रचना हम इंसानों के शरीर रचना जैसी ही दिखती है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम यह मान ले कि हम बन्दर से ही मनुष्य बने है। यह सब ल...

भारत का टाइटैनिक जो 1888 में डूब गया जहाज में 746 लोग (703 यात्री और 43 चालक दल के सदस्य) लापता हुए थे । SS Vaitarna

 एसएस वैतरणा, जिसे विजली (Vijli) के रूप में जाना जाता है, जो 8 नवंबर 1888 को मांडवी से बॉम्बे जाने के दौरान चक्रवाती तूफान में गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के तट से गायब हो गई थी। आपदा में 740 से अधिक लोग लापता हो गए। SS Vaitarna Grangemouth Dockyard Co. Ltd द्वारा निर्मित पहला स्टीमर था। विजली को 1885 में लॉन्च किया गया। वह स्टील से बनी स्कूनर थी और इसे पूरा करने में तीन साल लगे। इस पेंच स्टीमर में तीन मंजिल और पच्चीस केबिन थे। विजली को मांडवी, कच्छ राज्य और बॉम्बे के बीच यात्रियों और सामानों का व्यापार में इस्तेमाल किया गया। मांडवी से बंबई तक 8 रुपये के किराए पर यात्रा करने में उसे 30 घंटे लगते थे। एसएस वैतरणा को 8 नवंबर 1888, गुरुवार को मांडवी बंदरगाह पर लंगर डाला गया था, और वहा से 520 यात्रियों को लेकर द्वारका के लिए रवाना हुए। वह द्वारका पहुंची और उसमें सवार कुछ और यात्री थे, जो संख्या में 703 तक पहुंच गए। वह पोरबंदर के लिए रवाना हुई। उस समय कुछ जहाजों को तूफानों को कम करने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था क्योंकि वे आमतौर पर शांत मौसम के दौरान बंदरगाह से बंदरगाह तक जाते हैं और ...

तुलसीदास जी द्वारा श्री रामचरितमानस की रचना - सत्य कथा (Goswami Tulsidas Dwara Shri Ramcharit Manas Ki Rachna)

 श्री रामचरितमानस की रचना: चित्रकूट से लौट कर, गोस्वामी जी काशी पहुँचे और वहां प्रह्लाद घाटपर एक ब्रह्मण के घर निवास किया । वहाँ उनकी कवित्व शक्ति स्फुरित हो गयी और वह संस्कृत में रचना करने लगे। यह एक अद्भुत बात थी कि दिन में वे जितनी कविता रचना करते रात मे सब की सब लुप्त हो जाती। यह घटना रोज घटती परंतु वे समझ नहीं पाते थे कि मुझको क्या करना चाहिये। आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ। भगवान् शंकर ने प्रकट होकर कहा कि तुम अपनी भाषा मे काव्य रचना करो, संस्कृत में नहीं। नींद उचट गयी तुलसीदास जी उठकर बैठ गये। उनके हृदय मे स्वप्न की आवाज गूंजने लगी। उसी समय भगवान् श्री शंकर और माता पार्वती दोनों ही उनके सामने प्रकट हुए। तुल्सीदास जी ने साष्टांग् प्रणाम किया। शिव जी ने कहा: मातृभाषा में काव्य निर्माण करो, संस्कृत के पचडे में मत पडो। जिससे सबका कल्याण हो वही करना चाहिये। बिना सोचे विचारे अनुकरण करने की आवश्यकता नहीं है। तुम जाकर अयोध्या में रहो और वही काव्य रचना करो। जहां भगवान् की जन्म स्थली है और जो भगवान् श्रीसीताराम जी का नित्य धाम है वही उनकी कथा की रचना करना उचित होगा। मेरे आशीर्वा...

सभी के कर्म एक समान नहीं हैं - प्रेरक कहानी (Sabhi Ke Karm Ek Saman Nahin Hain)

 एक बार एक शिव भक्त धनिक शिवालय जाता है। पैरों में महँगे और नये जूते होने पर सोचता है कि क्या करूँ? यदि बाहर उतार कर जाता हूँ तो कोई उठा न ले जाये और अंदर पूजा में मन भी नहीं लगेगा। सारा ध्यान् जूतों पर ही रहेगा। उसे बाहर एक भिखारी बैठा दिखाई देता है। वह धनिक भिखारी से कहता है: भाई मेरे जूतों का ध्यान रखोगे? जब तक मैं पूजा करके वापस न आ जाऊँ भिखारी: हाँ कर देता है। अंदर पूजा करते समय धनिक सोचता है कि "हे प्रभु! आपने यह कैसा असंतुलित संसार बनाया है? किसी को इतना धन दिया है कि वह पैरों तक में महँगे जूते पहनता है तो किसी को अपना पेट भरने के लिये भीख तक माँगनी पड़ती है! कितना अच्छा हो कि सभी एक समान हो जायें।" वह धनिक निश्चय करता है कि वह बाहर आकर भिखारी को 100 का एक नोट देगा। बाहर आकर वह धनिक देखता है कि वहाँ न तो वह भिखारी है और न ही उसके जूते ही। धनिक ठगा सा रह जाता है। वह कुछ देर भिखारी का इंतजार करता है कि शायद भिखारी किसी काम से कहीं चला गया हो। पर वह नहीं आया। धनिक दुखी मन से नंगे पैर घर के लिये चल देता है। रास्ते में फुटपाथ पर देखता है कि एक आदमी जूते चप्पल बेच रहा है। धन...

छोटे से बीज में से वटवृक्ष बनता है - प्रेरक कहानी

 बात बहुत पुरानी है। एक महान संत के पास एक युवक आया और बोला: मुझे आपका शिष्य बनना है महाराज। संत बोले: तुझे शिष्य क्यों बनना है। युवक ने कहा: मुझे परमात्मा से प्रेम करना है संत ने कहा: पहले मुझे बताओं कि क्या तुम्हें अपने घर के किसी व्यक्ति से प्रेम है? युवक बोला: नहीं, मुझे किसी से भी प्रेम नहीं है। संत ने पूछा: तुझे तेरे माता-पिता या भाई-बहन किस पर ज्यादा स्नेह आता है? युवक ने नकारते हुए कहा: मुझे किसी से भी तनिक मात्र स्नेह नहीं है। पूरी दुनिया स्वार्थ परायण है, ये सब मिथ्या मायाजाल है। इसीलिए तो मैं आपकी शरण में आया हूं। तब संत ने कहा: बेटा, मेरा और तेरा कोई मेल नहीं। तुझे जो चाहिए वह मैं नहीं दे सकता। युवक यह सुन स्तब्ध रह गया। संत बोले: यदि तुझे तेरे परिवार से प्रेम होता, जिन्दगी में तूने तेरे निकट के लोगों में से किसी से भी स्नेह किया होता तो मैं उसे विशाल स्वरूप दे सकता था। थोड़ा भी प्रेमभाव होता, तो मैं उसे ही विशाल बना के परमात्मा के चरणों तक पहुंचा सकता था। छोटे से बीज में से वटवृक्ष बनता है, परन्तु जो पत्थर जैसा कठोर हो उसमें से प्रेम का झरना कैसे बहा सकता हूं। परमात्मा...

सबसे ज्यादा खुश पक्षी कौन? - प्रेरक कहानी

 एक कौआ था जो अपनी जिंदगी से बहुत खुश और संतुष्ट था। एक बार वह एक तालाब पर पानी पीने रुका। वहां पर उसने सफ़ेद रंग के पक्षी हंस को देखा। उसने सोचा मैं बहुत काला हूँ और हंस इतना सुन्दर इसलिए शायद हंस इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा। कौआ हंस के पास गया और बोला: तुम दुनिया के सबसे खुश प्राणी हो। हंस बोला: मैं भी यही सोचा करता था कि मैं दुनिया का सबसे खुश पक्षी हूँ जब तक कि मैंने तोते को न देखा था। तोते को देखने के बाद मुझे लगता है कि तोता ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि तोते के दो खुबसूरत रंग होते है इसलिए वही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होना चाहिए। कौआ तोते के पास गया और बोला: तुम ही इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो। तोता ने कहा: मैं पहले बहुत खुश था और सोचा करता था कि मैं ही दुनिया का सबसे खुबसूरत पक्षी हूँ। लेकिन जब से मैंने मोर को देखा है, मुझे लगता है कि वो ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी है क्योंकि उसके कई तरह के रंग है और वह मुझसे भी खुबसूरत है। कौआ चिड़ियाघर में मोर के पास गया और देखा कि सैकड़ों लोग मोर को देखने के लिए आए है। कौआ मोर के पास गया और बोला: तुम दुनिया के सबसे सुन्दर पक...

यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है - प्रेरक कहानी

 एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था। उसकी पत्नी ने कहा: वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें। कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया। कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने.. किसान से पूछा: क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ? किसान ने कहा: नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ? उस व्यक्ति ने कहा: मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए, लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है। किसान ने कहा: मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है। इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है। वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था। फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लग...

संसार के सभी प्राणी अपूर्ण हैं - प्रेरक कहानी

 एक कवि राजा भर्तृहरि थे। उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थीं। भर्तृहरि ने स्त्री के सौंदर्य और उसके बिना जीवन के सूनेपन पर 100 श्लोक लिखे, जो श्रृंगार शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्हीं के राज्य में एक ब्राह्मण भी रहता था, जिसने अपनी नि:स्वार्थ पूजा से देवता को प्रसन्न कर लिया। देवता ने उसे वरदान के रूप में अमर फल देते हुए कहा कि इससे आप लंबे समय तक युवा रहोगे। ब्राह्मण ने सोचा कि भिक्षा मांग कर जीवन बिताता हूं, मुझे लंबे समय तक जी कर क्या करना है। हमारा राजा बहुत अच्छा है, उसे यह फल दे देता हूं। वह लंबे समय तक जीएगा तो प्रजा भी लंबे समय तक सुखी रहेगी। वह राजा के पास गया और उनसे सारी बात बताते हुए वह फल उन्हें दे आया। राजा फल पाकर प्रसन्न हो गया। फिर मन ही मन सोचा कि यह फल मैं अपनी पत्नी को दे देता हूं। वह ज्यादा दिन युवा रहेगी तो ज्यादा दिनों तक उसके साहचर्य का लाभ मिलेगा। अगर मैंने फल खाया तो वह मुझ से पहले ही मर जाएगी और उसके वियोग में मैं भी नहीं जी सकूंगा। उसने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया। लेकिन, रानी तो नगर के कोतवाल से प्यार करती थी। वह अत्यंत सुदर्शन, हृष्ट-पुष्ट और बातूनी था। अम...

बस! अपने मां बाप की सेवा करो - प्रेरक कहानी

 एक छोटा सा बोर्ड रेहड़ी की छत से लटक रहा था, उस पर मोटे मारकर से लिखा हुआ था... घर मे कोई नही है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टायलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल ले और पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, साथ ही रेट भी लिखे हुये हैं। और अगर आपके पास पैसे नही हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाजत है! मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले, दर्जन भर केले लिए, बैग में डाले, प्राइज लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया वहाँ सौ पच्चास और दस दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमे रख कर उसे ढक दिया। बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं और भाई उधर निकले तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो हमें देख कर मुस्कुराया और बोला साहब! फल तो खत्म हो गए। नाम पूछा: तो बोला सीताराम... फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए... चाय आयी, कहने लगा पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछ पागल सी भी हो गई...

लक्ष्मी जी कहाँ निवास करतीं हैं - प्रेरक कहानी

 एक बार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे के रूप में छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए उन्हें ढूँढ रहे थे। एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताया। साथ ही उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया। तभी राजा बलि के शरीर से एक दिव्य रूपात्मा स्त्री निकली। उसे देखकर इन्द्र ने पूछा: दैत्यराज! यह स्त्री कौन है? देवी, मानुषी अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है? राजा बलि बोले: देवराज! ये देवी तीनों शक्तियों में से कोई नहीं हैं। आप स्वयं पूछ लें। इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोलीं: देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते हैं और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वी लोक पर लोग मुझे अनेक नामों से पुकारते हैं। जैसे- श्री, लक्ष्मी आदि। इन्द्र बोले: देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप इन्हें छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं? लक्ष्मी जी बोलीं: देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूँ। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उ...

जब तक दुख नहीं मिलते, प्रभु की याद नहीं आती - प्रेरक कहानी

 एक दिन किसी निर्माण के दौरान भवन की छटी मंजिल से सुपर वाईजर ने नीचे कार्य करने वाले मजदूर को आवाज दी। निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण नीचे काम करने वाला मजदूर कुछ समझ नहीं सका की उसका सुपरवाईजर उसे आवाज दे रहा है। फिर सुपरवाईजर ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक १० रु का नोट नीचे फैंका, जो ठीक मजदूर के सामने जा कर गिरा। मजदूर ने नोट उठाया और अपनी जेब मे रख लिया, और फिर अपने काम मे लग गया । अब उसका ध्यान खींचने के लिए सुपर वाईजर ने पुन: एक ५०० रु का नोट नीचे फैंका। उस मजदूर ने फिर वही किया और नोट जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया। ये देख अब सुपर वाईजर ने एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा लिया और मजदूर के उपर फैंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा। अब मजदूर ने ऊपर देखा और उसकी सुपर वाईजर से बात चालू हो गयी। ये वैसा ही है जो हमारी जिन्दगी मे होता है। भगवान् हमसे संपर्क करना, मिलना चाहता है, लेकिन हम दुनियादारी के कामो मे व्यस्त रहते है, अत: भगवान् को याद नहीं करते। भगवान् हमें छोटी छोटी खुशियों के रूप मे उपहार देता रहता है, लेकिन हम उसे याद नहीं करते, और वो खुशियां और उपहार कहाँ से आये ये ना द...

हमारी लालसाएँ और वृत्तियाँ नहीं बदलती - प्रेरक कहानी

 एक पेड़ पर दो बाज रहते थे। दोनों अक्सर एक साथ शिकार की तलाश में निकलते और जो भी पाते, उसे शाम को मिल-बांट कर खाते। कभी-कभी दोनों को दो अलग-अलग शिकार भी मिल जाते थे। बहुत दिन से उनका यही क्रम चल रहा था। एक दिन दोनों शिकार के लिए निकले, तो एक को एक साँप मिला और दूसरे को एक चूहा। अपना-अपना शिकार चोंच में दबाए दोनों पेड़ पर वापस लौटे और एक-दूसरे की शिकार कथा सुनने के लिए एक डाल पर पास-पास बैठ गए। दोनों ने अभी तुरंत ही झपट्टा मार कर अपना शिकार पकड़ा था और उन्हें बस चोंच में दबा रखा था, इसलिए साँप और चूहा- दोनों ही शिकार तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की तो सांप ने चूहे की ओर देखा और चूहे ने सांप को। सांप, चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा सांप के प्रयत्नों को देखकर अपने ही शिकारी बाज के डैनों में छिपने का उपक्रम करने लगा। यह दृश्य देखकर एक बाज गंभीर हो गया और विचारमग्न सा दिखने लगा। दूसरे ने उससे पूछा, दोस्त! यह दार्शनिकों की तरह किस चिंतन में डूब गए? पहले बाज ने अपने पकड़े हुए सांप की ओर संकेत करते हुए कहा, देखते नहीं यह कैसा मूर्ख प्...

बहरे भक्त का सत्संग प्रेम - प्रेरक कहानी

 एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था। उसे कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे। एकदम बहरा, एक शब्द भी सुन नहीं सकता था। किसी ने संतश्री से कहा - बाबा जी! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते-सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं। बहरे मुख्यत - दो बार हँसते हैं, एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब और दूसरा, अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं। बाबा जी ने कहा - जब बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है? रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है। चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है, घंटों बैठा रहता है। बाबाजी सोचने लगे, बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा। रस नहीं आता होगा तो यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए, उठकर चले जाना चाहिए। यह जाता भी नहीं है! बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहा - कथा सुनाई पड़ती है? उसने कहा - क्या बोले महाराज? बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछा - मैं जो कहता हूँ, क्या वह सुनाई पड़ता है? उसने कहा - क्या बोले महाराज? बाबाजी समझ गये कि यह नितांत बहरा है। बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखक...

ज्ञानपिपासु विद्यार्थियों - प्रेरक प्रसंग

 एक गुरु के दो शिष्य थे। एक पढ़ाई में बहुत तेज और विद्वान था और दूसरा फिसड्डी। पहले शिष्य की हर जगह प्रसंशा और सम्मान होता था। जबकि दूसरे शिष्य की लोग उपेक्षा करते थे। एक दिन रोष में दूसरा शिष्य गुरू जी के जाकर बोला- गुरूजी! मैं उससे पहले से आपके पास विद्याध्ययन कर रहा हूँ। फिर भी आपने उसे मुझसे अधिक शिक्षा दी? गुरुजी थोड़ी देर मौन रहने के बाद बोले- पहले तुम एक कहानी सुनो। एक यात्री कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे प्यास लगी। थोड़ी दूर पर उसे एक कुआं मिला। कुएं पर बाल्टी तो थी लेकिन रस्सी नहीं थी। इसलिए वह आगे बढ़ गया। थोड़ी देर बाद एक दूसरा यात्री उस कुएँ के पास आया। कुएँ पर रस्सी न देखकर उसने इधर-उधर देखा। पास में ही बड़ी-बड़ी घास उगी थी। उसने घास उखाड़कर रस्सी बटना प्रारम्भ किया। थोड़ी देर में एक लंबी रस्सी तैयार हो गयी। जिसकी सहायता से उसने कुएँ से पानी निकाला और अपनी प्यास बुझा ली। गुरु जी ने उस शिष्य से पूछा- अब तुम मुझे यह बताओ कि प्यास किस यात्री को ज्यादा लगी थी? शिष्य ने तुरंत उत्तर दिया कि दूसरे यात्री को। गुरूजी फिर बोले- प्यास दूसरे यात्री को ज्यादा लगी थी। यह हम इसलिए क...

इल्ली और घुन की कहानी (Elli Aur Dhun Ki Kahani)

 एक इल्ली और घुन था। इल्ली बोली आओ घुन कार्तिक स्नान करे, घुन बोला तू ही कार्तिक स्नान कर ले। मैं तो नहीं करूँगा। बाद में इल्ली तो राजा की लड़की के पल्ले के लगकर कार्तिक स्नान करती। घुन ने कार्तिक स्नान नहीं किया। दोनों मर गये। बाद में इल्ली के कार्तिक स्नान के पुण्य के कारण राजा के घर जन्म हुआ और घुन राजा के घर गधा बन गया। राजा ने बेटी का विवाह किया। बेटी ससुराल जाने लगी तो उसने अपनी पालकी रुकवाई और राजा से कहा यह गधा मुझे चाहिए। तब राजा ने कहा यह मत ले चाहे और धन दौलत ले ले पर लड़की नहीं मानी। मुझे तो यही चाहिए। गधे को रथ के बांध दिया तो गधा दौड़ने लगा। महल में पहुँचने पर गधे को महल के नीचे बांध दिया। जब लड़की नीचे उतरती तो गधा कहता मुझे पानी पिलादे तब लड़की ने कहा मैंने पहले ही कहा था कार्तिक स्नान कर ले पर तूने कहा था मैं तो बाजरा खाऊँगा और ठंडा-ठंडा पानी पीऊँगा। उनको बातें करते राजा ने सुन लिया, जब राजा ने कहा कि आप मुझे सारी बात बताओ तब रानी (लड़की) ने राजा को सारी बात बताई कि मैं पिछले जन्म में इल्ली थी और ये घुन था। तब मैंने कहा तू भी कार्तिक नहा ले पर वह नहीं नहाया। मैं कार...

हिन्दू या मुसलमान धर्मवीर भारती की कहानी |

 सरकारी अस्पताल के बरामदे में 30 लाशें एक कतार में रक्खी हुई थीं। लाशें, नहीं उन्हें लाशें कहना गलत होगा, मगर उन्हें जिन्दा भी नहीं कहा जा सकता था। वे सूखी हड्डियों के मुरदार ढाँचे जिन पर जर्द, झुर्रीदार चमड़ा मढ़ा हुआ था । कलकत्ते की विभिन्न सड़कों से मुरदे उठाकर लाये गये थे इलाज के लिये । उन्हें भूख की बीमारी हो गयी थी और इसीलिये वे चलते-चलते सड़क पर गिर पड़ते थे और धीरे-धीरे दम तोड़ देते थे । हिन्दोस्तान जैसे खराब आबोहवा के देश में जहाँ आये दिन एक बीमारी चल पड़ती है, यह भी एक नयी बीमारी चल निकली थी। झुण्ड के झुण्ड लोग गाँवों से चल पड़ते और चलते-चलते बिना दायीं और बायीं पटरी का ख्याल किये गिर पड़ते और फिर उठने का नाम न लेते। शासकों ने समझा यह सत्याग्रह का कोई नया तरीका है मरने दो; मेडिकल विभाग ने समझा यह मलेरिया की कोई नयी किस्म है जो बंगाल के लिए साधारण बात है। लेकिन बीमारी बढ़ती गयी। जब सड़कों पर पड़ी हुई लाशों की वजह से, मारवाड़ियों की मोटरें, दफ्तर की बसें और फौज की लारियों के आने-जाने में रुकावट होने लगी तो हमारी मेहरबान सरकार को फिक्र हुई, और इसीलिए वे 30 भुखमरे, सरकारी अस्...

सत्संग की सही शिक्षा - प्रेरक कहानी (Prerak Kahani: Satsang Ki Sahi Shiksha)

 एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो डिब्बों में मूँग के दाने दिये और कहाः ये मूँग हमारी अमानत हैं ये सड़े गले नहीं बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आयेंगे तो इन्हें ले लेंगे। संत तो तीर्थयात्रा के लिए चले गये। इधर एक शिष्य ने मूँग के डिब्बे को पूजा के स्थान पर रखा और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरे शिष्य ने मूँग के दानों को खेत में बो दिया। इस तरह दो साल में उसके पास बहुत मूँग जमा हो गये। दो साल बाद संत वापस आये और पहले शिष्य से अमानत वापस माँगी तो वह अपने घर से डिब्बा उठा लाया और संत को थमाते हुए बोलाः गुरूजी ! आपकी अमानत को मैंने अपने प्राणों की तरह सँभाला है। इसे पालने में झुलाया, आरती उतारी, पूजा- अर्चना की... संत बोलेः अच्छा ! जरा देखूँ तो सही कि अन्दर के माल का क्या हाल है ? संत ने ढक्कन खोलकर देखा तो मूँग में घुन लगे पड़े थे। आधे मूँग की तो वे चटनी बना गये, बाकी बचे-खुचे भी बेकार हो गये। संत ने शिष्य को मूँग दिखाते हुए कहाः क्यों बेटा! इन्ही घुनों की पूजा अर्चना करते रहे इतने समय तक ! शिष्य बेचारा शर्म से सिर झुकाये चुप चाप खड़ा रहा। इतने में संत ने दूसरे शिष...

My Dream Leo Tolstoy Story In English , Russian Story In English Read Online My Dream Leo Tolstoy Story In English

 As a daughter she no longer exists for me. Can’t you understand? She simply doesn’t exist. Still, I cannot possibly leave her to the charity of strangers. I will arrange things so that she can live as she pleases, but I do not wish to hear of her. Who would ever have thought . . . the horror of it, the horror of it.” He shrugged his shoulders, shook his head, and raised his eyes. These words were spoken by Prince Michael Ivanovich to his brother Peter, who was governor of a province in Central Russia. Prince Peter was a man of fifty, Michael’s junior by ten years. On discovering that his daughter, who had left his house a year before, had settled here with her child, the elder brother had come from St. Petersburg to the provincial town, where the above conversation took place. Prince Michael Ivanovich was a tall, handsome, white-haired, fresh coloured man, proud and attractive in appearance and bearing. His family consisted of a vulgar, irritable wife, who wrangled with him contin...